भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 680 में से

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पृष्ठ 463

तृतीय उद्योतः ४०३ ध्वन्यालोकः ङ्गानां व्याध्यादीनां तेषाञ्च तदङ्गानामेवादोषो नातदङ्गानाम् । तदङ्गत्वे च सम्भवत्यपि मरणस्योपन्यासो न ज्यायान् । आश्रयविच्छेदे रसस्या- त्यन्तविच्छेदप्राप्तेः । करुणस्य तु तथाविधे विषये परिपोषो भविष्य- तीति चेत् न ; तस्याप्रस्तुतत्वात् प्रस्तुतस्य च विच्छेदात् । यत्र तु करुणरसस्यैव काव्यार्थत्वं तत्राविरोधः । शृङ्गारे वा मरणस्यादीर्घकाल- व्याधि आदि का, और उनके अङ्गों का ही दोष नहीं है, न कि जो उनके अङ्ग नहीं हैं उनका । और उनका अङ्ग सम्भव होने पर भी मरण का उपन्यास ठीक नहीं है, क्योंकि आश्रय के विच्छेद हो जाने पर रस का अत्यन्त विच्छेद प्राप्त हो जाता है । उस प्रकार के विषय में करुण का परिपोष तो होगा ? ऐसा नहीं; क्योंकि वह (करुण रस) प्रस्तुत नहीं है और (जो) प्रस्तुत है (उसका) विच्छेद हो जाता है । परन्तु जहां करुणरस का ही काव्यार्थत्व है वहां विरोध नहीं । अथवा शृङ्गार में शीघ्र मिलन लोचनम् प्रायमुभयथा व्याचष्टे, तत्र प्रथमं स्वाभाविकप्रकारं निरूपयति-तदङ्गानामिति । निरपेक्षभावतया सापेक्षभावविप्रलम्भशृङ्गारविरोधिन्यपि करुणे ये व्याध्याद- यस्सर्वथाऽङ्गत्वेन दृष्टाः तेषामिति । ते हि करुणे भवन्त्येव त एव च भवन्ती- ति । शृङ्गारे तु भवन्त्येव नापि त एवेति । अतदङ्गानामिति । यथालस्यौग्र्यजु- गुप्सानामित्यर्थः । तदङ्गत्वे चेति । 'सर्व एव शृङ्गारे व्यभिचारिण इत्युक्तत्वादि' ति भावः । आश्रयस्य स्त्रीपुरुषान्यतरस्याधिष्ठानस्यापाये रतिरेवोच्छिद्येत तस्या जीवितसर्वस्वाभिमानरूपत्वेनोभयाधिष्ठानत्वात् । प्रस्तुतस्येति । विप्रलम्भस्येत्यर्थः । काव्यार्थत्वमिति । प्रस्तुतत्वमित्यर्थः । नन्वेवं सर्व एव व्य- भिचारिण इति विघटितमित्याशङ्क्याह-शृङ्गारे वेति । अदीर्घकाले यत्र मरणे उनके अङ्गों का—। निरपेक्ष भाव वाला होने के कारण सापेक्ष भाव वाले विप्रलम्भ शृङ्गार के विरोधी भी करुण में जो व्याधि आदि सर्वथा अङ्ग के रूप में देखे गए हैं उनका । वे करुण में होते हैं ही और वे ही करुण में होते हैं । शृङ्गार में होते हैं ही, किन्तु वेही नहीं होते । जो उनके अङ्ग नहीं हैं—। अर्थात् जैसे आलस्य, औग्र्य, जुगुप्सा । और उनका अङ्ग होने पर—। भाव यह कि क्योंकि 'शृङ्गार में सभी व्यभिचारी हैं यह कहा गया है' । स्त्री-पुरुष के अन्यतर अधिष्ठान रूप आश्रय के नाश होने पर रति ही उच्छिन्न हो जायगी, क्योंकि जीवितसर्वस्वाभिमान रूप होने के कारण वह उभयाधिष्ठान है । प्रस्तुत का—। अर्थात् विप्रलम्भ का । काव्यार्थत्व—। अर्थात् प्रस्तुतत्व । तब तो इस प्रकार सभी व्यभिचारी हो जायेंगे, इसलिए विघटन होगा, यह आशङ्का करके कहते हैं—अथवा शृङ्गार में—। अदीर्घकाल में जिस मरण में प्रतीति की