भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 462

४०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाल्मीकिव्यासमुख्याश्च ये प्रख्याताः कवीश्वराः । तदभिप्रायबाह्योऽयं नास्माभिर्दर्शितो नयः ॥ इति ॥ १६ ॥ विवक्षिते रसे लब्धप्रतिष्ठे तु विरोधिनाम् । बाध्यानामङ्गभावं वा प्राप्तानामुक्तिरच्छला ॥ २० ॥ स्वसामग्र्या लब्धपरिपोषे तु विवक्षिते रसे विरोधिनां विरोधि- रसाङ्गानां बाध्यानामङ्गभावं वा प्राप्तानां सतामुक्तिरदोषा । बाध्यत्वं हि विरोधिनां शक्याभिभवत्वे सति नान्यथा । तथा च तेषामुक्तिः प्रस्तुत- रसपरिपोषायैव सम्पद्यते । अङ्गभावं प्राप्तानां च तेषां विरोधित्वमेव निवर्तते । अङ्गभावप्राप्तिर्हि तेषां स्वाभाविकी समारोपकृता वा । तत्र येषां नैसर्गिकी तेषां तावदुक्तावविरोध एव । यथा विप्रलम्भशृङ्गारे तद्- और वाल्मीकि, व्यास प्रमुख जो प्रख्यात कवीश्वर हैं, उनके अभिप्राय से बाह्य नय ( मार्ग ) हमने नहीं दिखाया है । इति ॥ १९ ॥ विवक्षित रस के लब्धप्रतिष्ठ हो जाने पर बाध्य अथवा अङ्गभाव को प्राप्त विरो- धियों का कथन छलरहित है ॥ २० ॥ अपनी सामग्री से विवक्षित रस के परिपोष प्राप्त होने पर बाध्य अथवा अङ्गभाव को प्राप्त विरोधियों अर्थात् विरोधी रसाङ्गों का कथन दोषरहित है । विरोधियों का बाध्यत्व ( उनका ) अभिभव सम्भव होने पर हो सकता है अन्यथा नहीं । इसलिए उनका कथन प्रस्तुत रस के परिपोष के लिए ही सम्पन्न होगा । और उनके अङ्गभाव प्राप्त होने पर ( उनका ) विरोधित्व ही निवृत्त हो जाता है । उनके अङ्गभाव की प्राप्ति स्वाभाविक अथवा समारोपकृत होती है । उनमें से जिनकी ( प्राप्ति ) नैसर्गिक है उनके कथन में तो कोई विरोध ही नहीं । जैसे विप्रलम्भ शृङ्गार में उसके अङ्गभूत लोचनम् एवं विरोधिनां परिहारे सामान्येनोक्ते प्रतिप्रसवं नियतविषयमाह—विव- क्षित इति । बाध्यानामिति । बाध्यत्वाभिप्रायेणाङ्गत्वाभिप्रायेण वेत्यर्थः । अच्छला निर्दोषेत्यर्थः । बाध्यत्वाभिप्रायं व्याचष्टे-बाध्यत्वं हीति । अङ्गभावाभि- इस प्रकार विरोधियों के परिहार के सामान्यतः कहे जाने पर नियतविषयक प्रतिप्रसव को कहते हैं—विवक्षित—। बाध्य—। अर्थात् बाध्यत्व के अभिप्राय से अथवा अङ्गत्व के अभिप्राय से । छलरहित अर्थात् निर्दोष । बाध्यत्व के अभिप्राय की व्याख्या करते हैं—बाध्यत्व—। अङ्गभाव के अभिप्राय की उभय प्रकार से व्याख्या करते हैं, उनमें से प्रथम स्वाभाविक प्रकार का निरूपण करते हैं—