ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४०१ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः लङ्कारान्तरप्रसिद्धानामुपनागरिकाद्यानां वा यदनौचित्यमविषये निवन्धनं तदपि रसभङ्गहेतुः। एवमेषां रसविरोधिनामन्येषां चानया दिशा स्वयमु- त्प्रेक्षितानां परिहारे सत्कविभिरवहितैर्भवितव्यम् । परिकरश्लोकाश्चात्र— मुख्या व्यापारविषयाः सुकवीनां रसादयः । तेषां निबन्धने भव्ये तैः सदैवप्रमादिभिः ॥ नीरसस्तु प्रबन्धो यः सोऽपशब्दो महान् कवेः । स तेनाकविरेव स्यादन्येनास्मृतलक्षणः ॥ पूर्वे विशृङ्खलगिरः कवयः प्राप्तकीर्तयः । तान्समाश्रित्य न त्याज्या नीतिरेषा मनीषिणा ॥ जो अनौचित्य अर्थात् अविषय में निवन्धन है वह भी रसभङ्ग का हेतु है। इस प्रकार इनका और इस ढंग से स्वयं उत्प्रेक्षित रसविरोधियों के परिहार में सत्कवियों को अवहित होना चाहिए । यहाँ परिकरश्लोक भी हैं— सुकवियों के व्यापार के मुख्य विषय रसादि हैं, (इसलिए) उन्हें उनके निवन्धन में सदैव अप्रमादी होना चाहिए । जो प्रबन्ध नीरस है वह कवि का महान् अपशब्द है । उस कारण वह अकवि ही रहे कि दूसरा उसे याद न करे । प्राचीन कवि स्वतन्त्र वाणी वाले और कीर्ति को प्राप्त हो चुके हैं, उनको आश्रयण करके मनीषी को यह नीति नहीं छोड़ देनी चाहिए । लोचनम् प्रति कातरपुरुषोचितमधैर्ययोजनं दुष्टमेव । तेषामिति रसादीनाम् । तैरिति सुकविभिः । सोऽपशब्द इति दुर्यश इत्यर्थः । ननु कालिदासः परिपोषं गतस्या- पि करुणस्य रतिविलापेषु पौनःपुन्येन दीपनमकार्षीत्, तत्कोऽयं रसविरोधिनां परिहारनिर्वन्ध इत्याशङ्कयाह—पूर्वे इति । न हि वसिष्ठादिभिः कथञ्चिदपि स्मृतिमार्गस्त्यक्तस्तद्वयमपि तथा त्यजामः । अचिन्त्यहेतुकत्वादुपरिचरिताना- मिति भावः । इति शब्देन परिकरश्लोकसमाप्तिं सूचयति ॥ १६ ॥ वह अपशब्द अर्थात् दुर्यश है । कालिदास ने परिपोष को प्राप्त भी करुण का रति के विलापों में बार-बार उद्दीपन किया है, तो रस के विरोधियों का यह कौन सा परिहार का निर्बन्ध (आग्रह) है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—प्राचीन—। यदि किसी प्रकार वसिष्ठ आदि ने स्मृतिमार्ग को छोड़ दिया तो हम उस प्रकार नहीं छोड़ दें । ऊपर उठे महान् लोगों के सम्बन्ध में कारण नहीं सोचा जाता । 'इति' शब्द से परिकर श्लोक की समाप्ति सूचित करते हैं ॥ १९ ॥ २६ ध्व०