भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 460, कुल 680 में से

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पृष्ठ 460

४०० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तात्पर्यमेवैषां युक्तमिति यत्नोऽस्माभिरारब्धो न ध्वनिप्रतिपादन- मात्राभिनिवेशेन । पुनश्चायमन्यो रसभङ्गहेतुरवधारणीयो यत्परिपोषं गतस्यापि रसस्य पौनःपुन्येन दीपनम् । उपभुक्तो हि रसः स्वसामग्री- लब्धपरिपोषः पुनः पुनः परामृश्यमानः परिम्लानकुसुमकल्पः कल्पते । तथा वृत्तेर्व्यवहारस्य यदनौचित्यं तदपि रसभङ्गहेतुरेव । यथा नायकं प्रति नायिकायाः कस्याश्चिदुचितां भङ्गिमन्तरेण स्वयं सम्भोगाभिला- षकथने । यदि वा वृत्तीनां भरतप्रसिद्धानां कैशिक्यादीनां काव्या- रसादि रूप व्यङ्ग्य का तात्पर्य ही इनका ठीक है, यह यत्न हमने आरम्भ किया है न कि ध्वनि के प्रतिपादन मात्र के अभिनिवेश से । और यह फिर अन्य रसभङ्ग का हेतु अवधारण करना चाहिए जो परिपोष को प्राप्त भी रसका बार-बार उद्दीपन है । क्योंकि अपनी सामग्री से परिपोष-प्राप्त और उपयुक्त रस बार-बार परामर्श किए जाने पर परिम्लान पुरुष की भांति हो जाता है । तथा वृत्ति अर्थात् व्यवहार का जो अनौ- चित्य है वह भी रसभङ्ग का हेतु ही है । जैसे नायक के प्रति किसी नायिका के द्वारा उचित भङ्गी के बिना स्वयं सम्भोग की अभिलाषा कहने में । अथवा भरत की प्रसिद्ध कैशिकी आदि वृत्तियों का अथवा 'काव्यालङ्कार' में प्रसिद्ध उपनागरिका आदि वृत्तियों का लोचनम् वानां निवन्धनं तन्निमित्तानि स्खलितानि सर्वे दोषा इत्यर्थः । न ध्वनिप्रतिपा- दनमात्रेति । व्यङ्ग्योऽर्थो भवतु मा वा भूत् कस्तत्राभिनिवेशः ? काकदन्तपरी- क्षाप्रायमेव तत्स्यादिति भावः । वृत्त्यनौचित्यमेव चेति बहुधा व्याचष्टे, तदपी- त्यनेन चशब्दं कारिकागतं व्याचष्टे । रसभङ्गहेतुरेव इत्यनेनैवकारस्य कारिका- गतस्य भिन्नक्रमत्वमुक्तम् । रसस्य विरोधायाैवेत्यर्थः । नायकं प्रतीति । नायक- स्य हि धीरोदात्तादिभेदभिन्नस्य सर्वथा वीररसानुवेधेन भवितव्यमिति तं गुणप्रधान-भाव वाले रस-भावों का जो निबन्धन है उसके कारण स्खलित अर्थात् सारे दोष होते हैं । न कि ध्वनि के प्रतिपादन मात्र—। व्यङ्ग्य अर्थ हो अथवा मत हो, उसमें कौन अभिनिवेश है ? भाव यह कि वह कौवे के दाँत की परीक्षा के समान ही होगा । वृत्त्यनौचित्य को भी बहुधा व्याख्यान करते हैं । 'वह भी' इससे कारिका में प्रयुक्त 'और' ('च') शब्द का व्याख्यान करते हैं । 'रसभङ्ग का हेतु ही है' इससे कारिका में प्रयुक्त 'ही' (अर्थात् एवकार) का भिन्नक्रमत्व कहा है । अर्थात् रसके विरोध के लिए ही । नायक के प्रति—। धीरोदात्त आदि भेद से भिन्न नायक के सर्वथा वीररस का अनुवेध (संसर्ग) होना चाहिए, इसलिए उसके प्रति कातर पुरुषोचित अधैर्य का योजन दोषयुक्त ही है । उनका अर्थात् रसादि का । उन्हें अर्थात् सुकवियों को ।