ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३९९ ध्वन्यालोकः अनवसरे च प्रकाशनं रसस्य यथा प्रवृत्ते प्रवृत्तविविधवीरसङ्क्षये कल्प- सङ्क्षयकल्पे सङ्ग्रामे रामदेवप्रायस्यापि तावन्नायकस्यानुपक्रान्तविप्रल- म्भशृङ्गारस्य निमित्तमुचितमन्तरेणैव शृङ्गारकथायामवतारवर्णने । न चैवंविधे विषये दैवव्यामोहितत्वं कथापुरुषस्य परिहारो यतो रसबन्ध एव कवेः प्राधान्येन प्रवृत्तिनिबन्धनं युक्तम् । इतिवृत्तवर्णनं तदुपाय एवेत्युक्तं प्राक् ‘आलोकार्थी यथा दीपशिखायां यत्नवाञ्जनः’ इत्यादिना । अत एव चेतिवृत्तमात्रवर्णनप्राधान्येऽङ्गाङ्गिभावरहितरसभावनिब- न्धेन च कवीनामेवंविधानि स्खलितानि भवन्तीति रसादिरूपव्यङ्ग्य- रस का प्रकाशन, जैसे—प्रलयकाल के सदृश हो रहे विविध वीरों के नाश वाले संग्राम में विप्रलम्भ शृङ्गार के उपक्रम के बिना और बिना उचित कारण के राम जैसे देवता का भी शृङ्गारकथा में पड़ जाने का वर्णन करने में। इस प्रकार के विषय में कथा के नायक का दैववश व्यामोहित हो जाना (उसके दोष का) परिहार नहीं है, क्योंकि प्राधान्यतः कवि की प्रवृत्ति का निबन्धन रसबन्ध में ही होना चाहिए। इतिवृत्त का वर्णन उसका उपाय ही है यह पहले कह चुके हैं ‘आलोक चाहने वाला व्यक्ति जैसे दीपशिखा में यत्नवान् होता है, इत्यादि द्वारा और इसी लिए इतिवृत्त मात्र के वर्णन का प्राधान्य होने पर अङ्गाङ्गिभाव से रहित रसभाव के निबन्धन से कवियों के इस प्रकार के स्खलन होते हैं, इस प्रकार लोचनम् गृहीतो विजयवर्मवृत्तान्तवर्णने । अपि-तावदितिशब्दाभ्यां दुर्योधनादेस्तद्वर्णनं दूरापास्तमिति वेणीसंहारे द्वितीयाङ्कमेवोदाहरणत्वेन ध्वनति । अत एव वक्ष्य- ति-‘दैवव्यामोहितत्वम्’ इति । पूर्वं तु सन्ध्यङ्गाभिप्रायेण प्रत्युदाहरणमुक्तम् । कथापुरुषस्येति प्रतिनायकस्येति यावत् । अत एव चेति । यतो रसबन्ध एव मुख्यः कविव्यापारविषयः इतिवृत्तमात्र- वर्णनप्राधान्ये सति यदङ्गाङ्गिभावरहितानामविचारितगुणप्रधानभावानां रसभा- चतुर्थ अङ्क में—रत्नावली का नाम भी न लेते हुए का विजयवर्मा के वृत्तान्त के वर्णन में । (मूलग्रन्थ में ‘अपि तावत्’ इन) शब्दों से दुर्योधनादि का वह वर्णन छोड़ा जा चुका है, इसलिए वेणीसंहार में दूसरे अङ्क को ही उदाहरण रूप में ध्वनित करता है। अतएव कहेंगे—‘दैववश व्यामोहित हो जाना’। किन्तु पहले सन्धि के अङ्ग के अभिप्राय से प्रत्युदाहरण कहा गया है। कथा के नायक का अर्थात् प्रतिनायक का। और इसी लिए—। अर्थात् क्योंकि रसबन्ध ही मुख्य कवि-व्यापार का विषय है, इतिवृत्त मात्र के वर्णन का प्राधान्य होने पर अङ्गाङ्गिभाव से रहित एवं अविचारित