ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः श्चिदन्वितस्यापि विस्तरेण कथनम् । यथा विप्रलम्भशृङ्गारे नायकस्य कस्यचिद्वर्णयितुमुपक्रान्ते कवेर्यमकाद्यलङ्कारनिबन्धनरसिकतया महता प्रबन्धेन पर्वतादिवर्णने । अयं चापरो रसभङ्गहेतुरवगन्तव्यो यदकाण्ड एव विच्छित्तिः रसस्याकाण्ड एव च प्रकाशनम् । तत्रानवसरे विरामो रसस्य यथा नायकस्य कस्यचित्स्पृहणीयसमागमया नायिकया कया- चित्परां परिपोषपदवीं प्राप्ते शृङ्गारे विदिते च परस्परानुरागे समाग- मोपायचिन्तोचितं व्यवहारमुत्सृज्य स्वतन्त्रतया व्यापारान्तरवर्णने । भी अन्य वस्तु का विस्तार से वर्णन करना । जैसे विप्रलम्भ शृङ्गार में किसी नायक के वर्णन का उपक्रम करने पर कवि की यमक आदि अलङ्कारों के निबन्धन में रसिकता के कारण बड़ा-चढ़ा कर पर्वत आदि के वर्णन में । और यह दूसरा रसभङ्ग का हेतु समझना चाहिए, जो असमय में ही रस का विच्छेद और असमय में ही प्रकाशन है । उनमें से असमय में रस का विराम, जैसे किसी नायक का स्पृहणीय समागम वाली किसी नायिका के साथ शृङ्गार के परम परिपोष की अवस्था तक पहुँचने पर और परस्परानुराग के विदित होने पर समागम के उपाय की चिन्ता के उचित व्यवहार को छोड़कर स्वतन्त्र रूप से दूसरे व्यापार का वर्णन करने पर । और असमय में लोचनम् प्रकटय मुदं सन्त्यज रुषम्' इत्याद्युपक्रम्यार्थान्तरन्यासो 'न मुग्धे प्रत्येतुं प्रभवति गतः कालहरिणः' इति । मनागपि निर्वेदानुप्रवेशे सति रतेर्विच्छेदः । ज्ञातविषयसतत्त्वो हि जीवितसर्वस्वाभिमानं कथं भजेत । न हि ज्ञातशुक्तिका- रजततत्त्वस्तदुपादेयधियं भजते ऋते संवृतिमात्रात् । कथाभिरिति बहुवचनं शान्तरसस्य व्यभिचारिणो धृति मतिप्रभृतीन् सङ्गृह्णाति । नन्वन्यदनुन्मत्तः कथं वर्णयेत्, किमुत विस्तरत इत्याह-कथञ्चिदन्वितस्ये- ति । व्यापारान्तरेति । यथा वत्सराजचरिते चतुर्थेऽङ्के-रत्नावलीनामधेयमप्य- उपक्रम करके अर्थान्तरन्यास है 'री मुग्धे ( नासमझ ), काल का हिरन जाकर लौटने का नहीं' । थोड़ा भी निर्वेद का अनुप्रवेश होने पर रति का विच्छेद हो जाता है । क्योंकि विषय का तत्त्व समझ चुकने वाला कैसे ( किसी रमणी के प्रति ) 'जीवित- सर्वस्व' का अभिमान करेगा ? क्योंकि शुक्तिकारजत ( अर्थात् शुक्ति में भासमान रजत ) को तत्त्वतः समझ चुकने वाला व्यक्ति ( उसमें ) उपादेय बुद्धि नहीं करता, भ्रम मात्र के बिना । 'कथाओं द्वारा' यह बहुवचन शान्तरस के धृति, मति प्रभृति व्यभिचारियों को सङ्गृहीत करता है । अनुन्मत्त व्यक्ति कैसे अन्य का वर्णन करेगा, अथवा क्यों विस्तार से ( करेगा ) ?, इस पर कहते हैं-किसी प्रकार सम्बद्ध भी-। दूसरे व्यापार-। जैसे 'वत्सराजचरित' में