ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३९७ ध्वन्यालोकः प्रस्तुतरसापेक्षया विरोधी यो रसस्तस्य सम्बन्धिनां विभावभावा- नुभावानां परिग्रहो रसविरोधहेतुकः सम्भवनीयः । तत्र विरोधि रस- विभावपरिग्रहो यथा शान्तरसविभावेषु तद्विभावतयैव निरूपितेष्वनन्त- रमेव शृङ्गारादिविभाववर्णने । विरोधि रसभावपरिग्रहो यथा प्रियं प्रति प्रणयकलहकुपितासु कामिनीषु वैराग्यकथाभिरनुनये । विरोधि रसानु- भावपरिग्रहो यथा प्रणयकुपितायां प्रियायामप्रसीदन्त्यां नायकस्य को- पावेशविवशस्य रौद्रानुभाववर्णने । अयं चान्यो रसभङ्गहेतुर्यत्प्रस्तुतरसापेक्षया वस्तुनोऽन्यस्य कथ- प्रस्तुत रस की अपेक्षा से विरोधी जो रस है उससे सम्बन्ध रखने वाले विभाव, भाव और अनुभाव का परिग्रह रस के विरोध का हेतु हो सकता है । उनमें विरोधी रस के विभाव का परिग्रह, जैसे शान्त रस के विभावों में उसके विभाव रूप से ही निरूपित होने के बाद ही शृङ्गार आदि के विभाव के वर्णन में । विरोधी रस के भाव का परिग्रह, जैसे प्रिय के प्रति कामिनियों के प्रणयकलह से कुपित होने पर वैराग्य की कथाओं द्वारा अनुनय करने पर । विरोधी रस के अनुभाव का परिग्रह, जैसे प्रणयकुपित होने पर प्रिया के प्रसन्न न होने की स्थिति में कोप के आवेश से विवश नायक के रौद्र के अनुभावों के वर्णन में । और यह दूसरा रसभङ्ग का हेतु है कि प्रस्तुत रस की अपेक्षा किसी प्रकार सम्बद्ध लोचनम् दपि च विरुद्धं वृत्त्यनौचित्यमित्यनेन । एतत्क्रमेण व्याचष्टे—प्रस्तुतरसापेक्षये- त्यादिना । हास्यशृङ्गारयोर्वीराद्भुतयो रौद्रकरुणयोर्भयानकभीभत्सयोर्न विभाव- विरोध इत्यभिप्रायेण शान्तशृङ्गारानुपन्धस्तौ, प्रशमरागयोर्विरोधात् । विरो- धिनो रसस्य यो भावो व्यभिचारी तस्य परिग्रहः, विरोधिनस्तु यः स्थायी स्थायितया तत्परिग्रहोऽसम्भवनीय एव तदनुत्थानप्रसङ्गात् । व्यभिचारितया तु परिग्रहो भवत्येव । अत एव सामान्येन भावग्रहणम् । वैराग्यकथाभिरिति वैराग्यशब्देन निर्वेदः शान्तस्य यः स्थायी स उक्तः । यथा—‘प्रसादे वर्तस्व विरुद्ध ‘वृत्त्यनौचित्य०’ इससे (कहते हैं) । इस क्रम से व्याख्यान करते हैं । प्रस्तुत रस की अपेक्षा से० इत्यादि से । हास्य-शृङ्गार का, वीर-अद्भुत का, भयानक-बीभत्स का विभाव विरोध नहीं, इस अभिप्राय से शान्त-शृङ्गार का उपन्यास किया है, क्योंकि प्रशम और राग का विरोध है । विरोधी रस का जो भाव अर्थात् व्यभिचारी है उसका परिग्रह । परन्तु विरोधी का जो स्थायी है, स्थायी रूप से उसका परिग्रह असम्भव ही है, क्योंकि (स्थायी रूप से) उनके उत्थान का प्रसङ्ग नहीं है । परन्तु व्यभिचारी रूप से परिग्रह होगा ही । अतएव सामान्य रूप से ‘भाव’ का ग्रहण है । ‘वैराग्य की कथाओं द्वारा’ इसमें ‘वैराग्य’ शब्द से ‘निर्वेद’ शान्त रस का जो स्थायी है, वह कहा गया है । जैसे—‘प्रसन्न हो जाओ, खुशी प्रकट करो, रोष छोड़ो’ इत्यादि