भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 456, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 456

३९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कानि पुनस्तानि विरोधीनि यानि यत्नतः कवेः परिहर्तव्यानीत्युच्यते— विरोधीरससम्बन्धिविभावादिपरिग्रहः। विस्तरेणान्वितस्यापि वस्तुनोऽन्यस्य वर्णनम् ॥ १८ ॥ अकाण्ड एव विच्छित्तिरकाण्डे च प्रकाशनम् । परिपोषं गतस्यापि पौनःपुन्येन दीपनम् । रसस्य स्याद्विरोधाय वृत्त्यनौचित्यमेव च ॥ १९ ॥ फिर वे विरोधी कौन हैं जिन्हें यत्नपूर्वक कवि को परिहार करना चाहिए ? इस पर कहते हैं— विरोधी रस से सम्बन्ध रखने वाले विभाव आदि का परिग्रह (रस से) सम्बद्ध होने पर भी अन्य वस्तु का विस्तार से वर्णन, असमय में ही (रस का) विच्छेद और असमय में प्रकाशन, (रस के) परिपोष प्राप्त कर लेने पर भी बार बार (उसका ही) उद्दीपन और वृत्ति (व्यवहार) का अनौचित्य, (ये पांच) रस के विरोधी हैं ॥ १८-१९ ॥ लोचनम् रेकमुखेनैतदप्यवगंस्यते । मैवम् ; व्यतिरेकेण हि तदभावमात्रं प्रतीयते न तु तद्विरुद्धम् । तदभावमात्रं च न तथा दूषकं यथा तद्विरुद्धम् । पथ्यानुपयोगो हि न तथा व्याधिं जनयति यद्वदपथ्योपयोगः । तदाह-यत्नत इति । 'विभावे' त्यादिना श्लोकेन यदुक्तं तद्विरुद्धं विरोधीत्यादिनार्धश्लोकेनाह । 'इतिवृत्ते'त्या- दिना श्लोकद्वयेन यदुक्तं तद्विरुद्धं विस्तरेणेत्यर्धश्लोकेनाह । 'उद्दीपने'त्यर्धश्लो- कोक्तस्य विरुद्धम् अकाण्ड इत्यर्धश्लोकेन । 'रसस्ये' त्यर्धश्लोकोक्तस्य विरुद्धं परिपोषं गतस्येत्यर्धश्लोकेन । 'अलङ्कृतीनामि' त्यनेन यदुक्तं तद्विरुद्धमन्य- चुके हैं, उसीसे व्यतिरेक के प्रकार से यह भी मालूम हो जायगा । (समाधान) ऐसा नहीं; व्यतिरेक से उसका अभाव मात्र प्रतीत होता है, न कि उससे विरुद्ध । उसका अभाव मात्र उस प्रकार दूषक नहीं है जिस प्रकार उसका विरुद्ध । क्योंकि पथ्य का अनुप्रयोग उस प्रकार व्याधि उत्पन्न नहीं करता जिस प्रकार अपथ्य का उपयोग (व्याधि उत्पन्न करता है)। उसे कहते हैं—यत्नपूर्वक—। 'विभाव०' इत्यादि श्लोक से जो कहा है उसके विरुद्ध 'विरोधि०' इत्यादि आधे श्लोक से कहते हैं । 'इतिवृत्त०' इत्यादि दो श्लोकों से जो कहा है उसके विरुद्ध 'विस्तरेण०' इत्यादि श्लोकार्ध से कहते हैं । 'उद्दीपन०' इत्यादि आधे श्लोक में कहे हुए के विरुद्ध 'अकाण्ड०' इस आधे श्लोक से । 'रसस्य०' इस अर्धश्लोक के विरुद्ध 'परिपोषं गतस्य०' इस अर्ध श्लोक से । अलङ्कृतीनां०' इससे जो कहा गया है उसके विरुद्ध और दूसरा भी