ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३९५ ध्वन्यालोकः एवं रसादीनां व्यञ्जकस्वरूपमभिधाय तेषामेव विरोधिरूपं लक्ष- यितुमिदमुपक्रम्यते— प्रबन्धे मुक्तके वापि रसादीन्बन्धुमिच्छता । यत्नः कार्यः सुमतिना परिहारे विरोधिनाम् ॥ १७ ॥ प्रबन्धे मुक्तके वापि रसभावनिबन्धनं प्रत्यादृतमनाः कविर्विरो- धिपरिहारे परं यत्नमादधीत । अन्यथा त्वस्य रसमयः श्लोक एकोऽपि सम्यङ् न सम्पद्यते ॥ १७ ॥ इस प्रकार रस आदि के व्यञ्जक के स्वरूप का अभिधान करके उन्हीं के (रसादि के) विरोधी रूप को लक्षित करने के लिए यह उपक्रम करते हैं— प्रबन्ध में अथवा मुक्तक में भी रस आदि का निबन्धन करना चाहते हुए सुमति (कवि) को विरोधियों के परिहार में यत्न करना चाहिए ॥ १७ ॥ प्रबन्ध में अथवा मुक्तक में भी रसभाव के निबन्धन के प्रति आदरयुक्त मन वाला कवि विरोधियों के परिहार में अधिक यत्न करे । अन्यथा, इसका एक भी श्लोक सम्यक् रसमय सम्पन्न नहीं होगा । लोचनम् तदपेक्षोऽसौ विशेष इत्यर्थः । आदिग्रहणाच्छन्दोगुणालङ्काराणां सङ्ग्रहः । अत एव रचनया प्रसादेन चारुत्वेन चोपबृंहिता एव शब्दाः काव्ये योज्या इति तात्पर्यम् ॥ १५–१६ ॥ रसादीनां यद्व्यञ्जकं वर्णपदादिप्रबन्धान्तं तस्य स्वरूपमभिधायेति सम्बन्धः । उपक्रम्यत इति । विरोधिनामपि लक्षणकरणे प्रयोजनमुच्यते शक्य- हानत्वं नाम अनया कारिकया । लक्षणं तु विरोधि रससम्बन्धीत्यादिना भविष्यतीत्यर्थः ॥ १७ ॥ ननु 'विभावभावानुभावसञ्चार्यौचित्यचारुणः' इति यदुक्तं तत एव व्यति- सङ्ग्रह है । अतएव रचना से, प्रसाद से और चारुत्व से उपबृंहित ही शब्दों की काव्य में योजना करनी चाहिए, यह तात्पर्य है ॥ १५–१६ ॥ 'वर्ण, पद से लेकर प्रबन्ध पर्यन्त जो रसादि का व्यञ्जक है उसके स्वरूप का अभिधान करके' यह सम्बन्ध है । उपक्रम करते हैं—। इस कारिका से विरोधियों के भी लक्षण करने में 'शक्यहानत्व' (अर्थात् उन विरोधियों के लक्षण ज्ञात होने पर उनका परिहार किया जा सकेगा, यही) प्रयोजन कहते हैं । किन्तु लक्षण तो 'विरोधि रस- सम्बन्धि०' इत्यादि होगा ॥ १७ ॥ (शङ्का) जो कि 'विभाव, भाव, अनुभाव, सञ्चारी के औचित्य से चारु' यह कह