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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

तृतीय उद्योतः ३९५ ध्वन्यालोकः एवं रसादीनां व्यञ्जकस्वरूपमभिधाय तेषामेव विरोधिरूपं लक्ष- यितुमिदमुपक्रम्यते— प्रबन्धे मुक्तके वापि रसादीन्बन्धुमिच्छता । यत्नः कार्यः सुमतिना परिहारे विरोधिनाम् ॥ १७ ॥ प्रबन्धे मुक्तके वापि रसभावनिबन्धनं प्रत्यादृतमनाः कविर्विरो- धिपरिहारे परं यत्नमादधीत । अन्यथा त्वस्य रसमयः श्लोक एकोऽपि सम्यङ् न सम्पद्यते ॥ १७ ॥ इस प्रकार रस आदि के व्यञ्जक के स्वरूप का अभिधान करके उन्हीं के (रसादि के) विरोधी रूप को लक्षित करने के लिए यह उपक्रम करते हैं— प्रबन्ध में अथवा मुक्तक में भी रस आदि का निबन्धन करना चाहते हुए सुमति (कवि) को विरोधियों के परिहार में यत्न करना चाहिए ॥ १७ ॥ प्रबन्ध में अथवा मुक्तक में भी रसभाव के निबन्धन के प्रति आदरयुक्त मन वाला कवि विरोधियों के परिहार में अधिक यत्न करे । अन्यथा, इसका एक भी श्लोक सम्यक् रसमय सम्पन्न नहीं होगा । लोचनम् तदपेक्षोऽसौ विशेष इत्यर्थः । आदिग्रहणाच्छन्दोगुणालङ्काराणां सङ्ग्रहः । अत एव रचनया प्रसादेन चारुत्वेन चोपबृंहिता एव शब्दाः काव्ये योज्या इति तात्पर्यम् ॥ १५–१६ ॥ रसादीनां यद्व्यञ्जकं वर्णपदादिप्रबन्धान्तं तस्य स्वरूपमभिधायेति सम्बन्धः । उपक्रम्यत इति । विरोधिनामपि लक्षणकरणे प्रयोजनमुच्यते शक्य- हानत्वं नाम अनया कारिकया । लक्षणं तु विरोधि रससम्बन्धीत्यादिना भविष्यतीत्यर्थः ॥ १७ ॥ ननु 'विभावभावानुभावसञ्चार्यौचित्यचारुणः' इति यदुक्तं तत एव व्यति- सङ्ग्रह है । अतएव रचना से, प्रसाद से और चारुत्व से उपबृंहित ही शब्दों की काव्य में योजना करनी चाहिए, यह तात्पर्य है ॥ १५–१६ ॥ 'वर्ण, पद से लेकर प्रबन्ध पर्यन्त जो रसादि का व्यञ्जक है उसके स्वरूप का अभिधान करके' यह सम्बन्ध है । उपक्रम करते हैं—। इस कारिका से विरोधियों के भी लक्षण करने में 'शक्यहानत्व' (अर्थात् उन विरोधियों के लक्षण ज्ञात होने पर उनका परिहार किया जा सकेगा, यही) प्रयोजन कहते हैं । किन्तु लक्षण तो 'विरोधि रस- सम्बन्धि०' इत्यादि होगा ॥ १७ ॥ (शङ्का) जो कि 'विभाव, भाव, अनुभाव, सञ्चारी के औचित्य से चारु' यह कह

३९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कानि पुनस्तानि विरोधीनि यानि यत्नतः कवेः परिहर्तव्यानीत्युच्यते— विरोधीरससम्बन्धिविभावादिपरिग्रहः। विस्तरेणान्वितस्यापि वस्तुनोऽन्यस्य वर्णनम् ॥ १८ ॥ अकाण्ड एव विच्छित्तिरकाण्डे च प्रकाशनम् । परिपोषं गतस्यापि पौनःपुन्येन दीपनम् । रसस्य स्याद्विरोधाय वृत्त्यनौचित्यमेव च ॥ १९ ॥ फिर वे विरोधी कौन हैं जिन्हें यत्नपूर्वक कवि को परिहार करना चाहिए ? इस पर कहते हैं— विरोधी रस से सम्बन्ध रखने वाले विभाव आदि का परिग्रह (रस से) सम्बद्ध होने पर भी अन्य वस्तु का विस्तार से वर्णन, असमय में ही (रस का) विच्छेद और असमय में प्रकाशन, (रस के) परिपोष प्राप्त कर लेने पर भी बार बार (उसका ही) उद्दीपन और वृत्ति (व्यवहार) का अनौचित्य, (ये पांच) रस के विरोधी हैं ॥ १८-१९ ॥ लोचनम् रेकमुखेनैतदप्यवगंस्यते । मैवम् ; व्यतिरेकेण हि तदभावमात्रं प्रतीयते न तु तद्विरुद्धम् । तदभावमात्रं च न तथा दूषकं यथा तद्विरुद्धम् । पथ्यानुपयोगो हि न तथा व्याधिं जनयति यद्वदपथ्योपयोगः । तदाह-यत्नत इति । 'विभावे' त्यादिना श्लोकेन यदुक्तं तद्विरुद्धं विरोधीत्यादिनार्धश्लोकेनाह । 'इतिवृत्ते'त्या- दिना श्लोकद्वयेन यदुक्तं तद्विरुद्धं विस्तरेणेत्यर्धश्लोकेनाह । 'उद्दीपने'त्यर्धश्लो- कोक्तस्य विरुद्धम् अकाण्ड इत्यर्धश्लोकेन । 'रसस्ये' त्यर्धश्लोकोक्तस्य विरुद्धं परिपोषं गतस्येत्यर्धश्लोकेन । 'अलङ्कृतीनामि' त्यनेन यदुक्तं तद्विरुद्धमन्य- चुके हैं, उसीसे व्यतिरेक के प्रकार से यह भी मालूम हो जायगा । (समाधान) ऐसा नहीं; व्यतिरेक से उसका अभाव मात्र प्रतीत होता है, न कि उससे विरुद्ध । उसका अभाव मात्र उस प्रकार दूषक नहीं है जिस प्रकार उसका विरुद्ध । क्योंकि पथ्य का अनुप्रयोग उस प्रकार व्याधि उत्पन्न नहीं करता जिस प्रकार अपथ्य का उपयोग (व्याधि उत्पन्न करता है)। उसे कहते हैं—यत्नपूर्वक—। 'विभाव०' इत्यादि श्लोक से जो कहा है उसके विरुद्ध 'विरोधि०' इत्यादि आधे श्लोक से कहते हैं । 'इतिवृत्त०' इत्यादि दो श्लोकों से जो कहा है उसके विरुद्ध 'विस्तरेण०' इत्यादि श्लोकार्ध से कहते हैं । 'उद्दीपन०' इत्यादि आधे श्लोक में कहे हुए के विरुद्ध 'अकाण्ड०' इस आधे श्लोक से । 'रसस्य०' इस अर्धश्लोक के विरुद्ध 'परिपोषं गतस्य०' इस अर्ध श्लोक से । अलङ्कृतीनां०' इससे जो कहा गया है उसके विरुद्ध और दूसरा भी

तृतीय उद्योतः ३९७ ध्वन्यालोकः प्रस्तुतरसापेक्षया विरोधी यो रसस्तस्य सम्बन्धिनां विभावभावा- नुभावानां परिग्रहो रसविरोधहेतुकः सम्भवनीयः । तत्र विरोधि रस- विभावपरिग्रहो यथा शान्तरसविभावेषु तद्विभावतयैव निरूपितेष्वनन्त- रमेव शृङ्गारादिविभाववर्णने । विरोधि रसभावपरिग्रहो यथा प्रियं प्रति प्रणयकलहकुपितासु कामिनीषु वैराग्यकथाभिरनुनये । विरोधि रसानु- भावपरिग्रहो यथा प्रणयकुपितायां प्रियायामप्रसीदन्त्यां नायकस्य को- पावेशविवशस्य रौद्रानुभाववर्णने । अयं चान्यो रसभङ्गहेतुर्यत्प्रस्तुतरसापेक्षया वस्तुनोऽन्यस्य कथ- प्रस्तुत रस की अपेक्षा से विरोधी जो रस है उससे सम्बन्ध रखने वाले विभाव, भाव और अनुभाव का परिग्रह रस के विरोध का हेतु हो सकता है । उनमें विरोधी रस के विभाव का परिग्रह, जैसे शान्त रस के विभावों में उसके विभाव रूप से ही निरूपित होने के बाद ही शृङ्गार आदि के विभाव के वर्णन में । विरोधी रस के भाव का परिग्रह, जैसे प्रिय के प्रति कामिनियों के प्रणयकलह से कुपित होने पर वैराग्य की कथाओं द्वारा अनुनय करने पर । विरोधी रस के अनुभाव का परिग्रह, जैसे प्रणयकुपित होने पर प्रिया के प्रसन्न न होने की स्थिति में कोप के आवेश से विवश नायक के रौद्र के अनुभावों के वर्णन में । और यह दूसरा रसभङ्ग का हेतु है कि प्रस्तुत रस की अपेक्षा किसी प्रकार सम्बद्ध लोचनम् दपि च विरुद्धं वृत्त्यनौचित्यमित्यनेन । एतत्क्रमेण व्याचष्टे—प्रस्तुतरसापेक्षये- त्यादिना । हास्यशृङ्गारयोर्वीराद्भुतयो रौद्रकरुणयोर्भयानकभीभत्सयोर्न विभाव- विरोध इत्यभिप्रायेण शान्तशृङ्गारानुपन्धस्तौ, प्रशमरागयोर्विरोधात् । विरो- धिनो रसस्य यो भावो व्यभिचारी तस्य परिग्रहः, विरोधिनस्तु यः स्थायी स्थायितया तत्परिग्रहोऽसम्भवनीय एव तदनुत्थानप्रसङ्गात् । व्यभिचारितया तु परिग्रहो भवत्येव । अत एव सामान्येन भावग्रहणम् । वैराग्यकथाभिरिति वैराग्यशब्देन निर्वेदः शान्तस्य यः स्थायी स उक्तः । यथा—‘प्रसादे वर्तस्व विरुद्ध ‘वृत्त्यनौचित्य०’ इससे (कहते हैं) । इस क्रम से व्याख्यान करते हैं । प्रस्तुत रस की अपेक्षा से० इत्यादि से । हास्य-शृङ्गार का, वीर-अद्भुत का, भयानक-बीभत्स का विभाव विरोध नहीं, इस अभिप्राय से शान्त-शृङ्गार का उपन्यास किया है, क्योंकि प्रशम और राग का विरोध है । विरोधी रस का जो भाव अर्थात् व्यभिचारी है उसका परिग्रह । परन्तु विरोधी का जो स्थायी है, स्थायी रूप से उसका परिग्रह असम्भव ही है, क्योंकि (स्थायी रूप से) उनके उत्थान का प्रसङ्ग नहीं है । परन्तु व्यभिचारी रूप से परिग्रह होगा ही । अतएव सामान्य रूप से ‘भाव’ का ग्रहण है । ‘वैराग्य की कथाओं द्वारा’ इसमें ‘वैराग्य’ शब्द से ‘निर्वेद’ शान्त रस का जो स्थायी है, वह कहा गया है । जैसे—‘प्रसन्न हो जाओ, खुशी प्रकट करो, रोष छोड़ो’ इत्यादि

३९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः श्चिदन्वितस्यापि विस्तरेण कथनम् । यथा विप्रलम्भशृङ्गारे नायकस्य कस्यचिद्वर्णयितुमुपक्रान्ते कवेर्यमकाद्यलङ्कारनिबन्धनरसिकतया महता प्रबन्धेन पर्वतादिवर्णने । अयं चापरो रसभङ्गहेतुरवगन्तव्यो यदकाण्ड एव विच्छित्तिः रसस्याकाण्ड एव च प्रकाशनम् । तत्रानवसरे विरामो रसस्य यथा नायकस्य कस्यचित्स्पृहणीयसमागमया नायिकया कया- चित्परां परिपोषपदवीं प्राप्ते शृङ्गारे विदिते च परस्परानुरागे समाग- मोपायचिन्तोचितं व्यवहारमुत्सृज्य स्वतन्त्रतया व्यापारान्तरवर्णने । भी अन्य वस्तु का विस्तार से वर्णन करना । जैसे विप्रलम्भ शृङ्गार में किसी नायक के वर्णन का उपक्रम करने पर कवि की यमक आदि अलङ्कारों के निबन्धन में रसिकता के कारण बड़ा-चढ़ा कर पर्वत आदि के वर्णन में । और यह दूसरा रसभङ्ग का हेतु समझना चाहिए, जो असमय में ही रस का विच्छेद और असमय में ही प्रकाशन है । उनमें से असमय में रस का विराम, जैसे किसी नायक का स्पृहणीय समागम वाली किसी नायिका के साथ शृङ्गार के परम परिपोष की अवस्था तक पहुँचने पर और परस्परानुराग के विदित होने पर समागम के उपाय की चिन्ता के उचित व्यवहार को छोड़कर स्वतन्त्र रूप से दूसरे व्यापार का वर्णन करने पर । और असमय में लोचनम् प्रकटय मुदं सन्त्यज रुषम्' इत्याद्युपक्रम्यार्थान्तरन्यासो 'न मुग्धे प्रत्येतुं प्रभवति गतः कालहरिणः' इति । मनागपि निर्वेदानुप्रवेशे सति रतेर्विच्छेदः । ज्ञातविषयसतत्त्वो हि जीवितसर्वस्वाभिमानं कथं भजेत । न हि ज्ञातशुक्तिका- रजततत्त्वस्तदुपादेयधियं भजते ऋते संवृतिमात्रात् । कथाभिरिति बहुवचनं शान्तरसस्य व्यभिचारिणो धृति मतिप्रभृतीन् सङ्गृह्णाति । नन्वन्यदनुन्मत्तः कथं वर्णयेत्, किमुत विस्तरत इत्याह-कथञ्चिदन्वितस्ये- ति । व्यापारान्तरेति । यथा वत्सराजचरिते चतुर्थेऽङ्के-रत्नावलीनामधेयमप्य- उपक्रम करके अर्थान्तरन्यास है 'री मुग्धे ( नासमझ ), काल का हिरन जाकर लौटने का नहीं' । थोड़ा भी निर्वेद का अनुप्रवेश होने पर रति का विच्छेद हो जाता है । क्योंकि विषय का तत्त्व समझ चुकने वाला कैसे ( किसी रमणी के प्रति ) 'जीवित- सर्वस्व' का अभिमान करेगा ? क्योंकि शुक्तिकारजत ( अर्थात् शुक्ति में भासमान रजत ) को तत्त्वतः समझ चुकने वाला व्यक्ति ( उसमें ) उपादेय बुद्धि नहीं करता, भ्रम मात्र के बिना । 'कथाओं द्वारा' यह बहुवचन शान्तरस के धृति, मति प्रभृति व्यभिचारियों को सङ्गृहीत करता है । अनुन्मत्त व्यक्ति कैसे अन्य का वर्णन करेगा, अथवा क्यों विस्तार से ( करेगा ) ?, इस पर कहते हैं-किसी प्रकार सम्बद्ध भी-। दूसरे व्यापार-। जैसे 'वत्सराजचरित' में

तृतीय उद्योतः ३९९ ध्वन्यालोकः अनवसरे च प्रकाशनं रसस्य यथा प्रवृत्ते प्रवृत्तविविधवीरसङ्क्षये कल्प- सङ्क्षयकल्पे सङ्ग्रामे रामदेवप्रायस्यापि तावन्नायकस्यानुपक्रान्तविप्रल- म्भशृङ्गारस्य निमित्तमुचितमन्तरेणैव शृङ्गारकथायामवतारवर्णने । न चैवंविधे विषये दैवव्यामोहितत्वं कथापुरुषस्य परिहारो यतो रसबन्ध एव कवेः प्राधान्येन प्रवृत्तिनिबन्धनं युक्तम् । इतिवृत्तवर्णनं तदुपाय एवेत्युक्तं प्राक् ‘आलोकार्थी यथा दीपशिखायां यत्नवाञ्जनः’ इत्यादिना । अत एव चेतिवृत्तमात्रवर्णनप्राधान्येऽङ्गाङ्गिभावरहितरसभावनिब- न्धेन च कवीनामेवंविधानि स्खलितानि भवन्तीति रसादिरूपव्यङ्ग्य- रस का प्रकाशन, जैसे—प्रलयकाल के सदृश हो रहे विविध वीरों के नाश वाले संग्राम में विप्रलम्भ शृङ्गार के उपक्रम के बिना और बिना उचित कारण के राम जैसे देवता का भी शृङ्गारकथा में पड़ जाने का वर्णन करने में। इस प्रकार के विषय में कथा के नायक का दैववश व्यामोहित हो जाना (उसके दोष का) परिहार नहीं है, क्योंकि प्राधान्यतः कवि की प्रवृत्ति का निबन्धन रसबन्ध में ही होना चाहिए। इतिवृत्त का वर्णन उसका उपाय ही है यह पहले कह चुके हैं ‘आलोक चाहने वाला व्यक्ति जैसे दीपशिखा में यत्नवान् होता है, इत्यादि द्वारा और इसी लिए इतिवृत्त मात्र के वर्णन का प्राधान्य होने पर अङ्गाङ्गिभाव से रहित रसभाव के निबन्धन से कवियों के इस प्रकार के स्खलन होते हैं, इस प्रकार लोचनम् गृहीतो विजयवर्मवृत्तान्तवर्णने । अपि-तावदितिशब्दाभ्यां दुर्योधनादेस्तद्वर्णनं दूरापास्तमिति वेणीसंहारे द्वितीयाङ्कमेवोदाहरणत्वेन ध्वनति । अत एव वक्ष्य- ति-‘दैवव्यामोहितत्वम्’ इति । पूर्वं तु सन्ध्यङ्गाभिप्रायेण प्रत्युदाहरणमुक्तम् । कथापुरुषस्येति प्रतिनायकस्येति यावत् । अत एव चेति । यतो रसबन्ध एव मुख्यः कविव्यापारविषयः इतिवृत्तमात्र- वर्णनप्राधान्ये सति यदङ्गाङ्गिभावरहितानामविचारितगुणप्रधानभावानां रसभा- चतुर्थ अङ्क में—रत्नावली का नाम भी न लेते हुए का विजयवर्मा के वृत्तान्त के वर्णन में । (मूलग्रन्थ में ‘अपि तावत्’ इन) शब्दों से दुर्योधनादि का वह वर्णन छोड़ा जा चुका है, इसलिए वेणीसंहार में दूसरे अङ्क को ही उदाहरण रूप में ध्वनित करता है। अतएव कहेंगे—‘दैववश व्यामोहित हो जाना’। किन्तु पहले सन्धि के अङ्ग के अभिप्राय से प्रत्युदाहरण कहा गया है। कथा के नायक का अर्थात् प्रतिनायक का। और इसी लिए—। अर्थात् क्योंकि रसबन्ध ही मुख्य कवि-व्यापार का विषय है, इतिवृत्त मात्र के वर्णन का प्राधान्य होने पर अङ्गाङ्गिभाव से रहित एवं अविचारित

४०० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तात्पर्यमेवैषां युक्तमिति यत्नोऽस्माभिरारब्धो न ध्वनिप्रतिपादन- मात्राभिनिवेशेन । पुनश्चायमन्यो रसभङ्गहेतुरवधारणीयो यत्परिपोषं गतस्यापि रसस्य पौनःपुन्येन दीपनम् । उपभुक्तो हि रसः स्वसामग्री- लब्धपरिपोषः पुनः पुनः परामृश्यमानः परिम्लानकुसुमकल्पः कल्पते । तथा वृत्तेर्व्यवहारस्य यदनौचित्यं तदपि रसभङ्गहेतुरेव । यथा नायकं प्रति नायिकायाः कस्याश्चिदुचितां भङ्गिमन्तरेण स्वयं सम्भोगाभिला- षकथने । यदि वा वृत्तीनां भरतप्रसिद्धानां कैशिक्यादीनां काव्या- रसादि रूप व्यङ्ग्य का तात्पर्य ही इनका ठीक है, यह यत्न हमने आरम्भ किया है न कि ध्वनि के प्रतिपादन मात्र के अभिनिवेश से । और यह फिर अन्य रसभङ्ग का हेतु अवधारण करना चाहिए जो परिपोष को प्राप्त भी रसका बार-बार उद्दीपन है । क्योंकि अपनी सामग्री से परिपोष-प्राप्त और उपयुक्त रस बार-बार परामर्श किए जाने पर परिम्लान पुरुष की भांति हो जाता है । तथा वृत्ति अर्थात् व्यवहार का जो अनौ- चित्य है वह भी रसभङ्ग का हेतु ही है । जैसे नायक के प्रति किसी नायिका के द्वारा उचित भङ्गी के बिना स्वयं सम्भोग की अभिलाषा कहने में । अथवा भरत की प्रसिद्ध कैशिकी आदि वृत्तियों का अथवा 'काव्यालङ्कार' में प्रसिद्ध उपनागरिका आदि वृत्तियों का लोचनम् वानां निवन्धनं तन्निमित्तानि स्खलितानि सर्वे दोषा इत्यर्थः । न ध्वनिप्रतिपा- दनमात्रेति । व्यङ्ग्योऽर्थो भवतु मा वा भूत् कस्तत्राभिनिवेशः ? काकदन्तपरी- क्षाप्रायमेव तत्स्यादिति भावः । वृत्त्यनौचित्यमेव चेति बहुधा व्याचष्टे, तदपी- त्यनेन चशब्दं कारिकागतं व्याचष्टे । रसभङ्गहेतुरेव इत्यनेनैवकारस्य कारिका- गतस्य भिन्नक्रमत्वमुक्तम् । रसस्य विरोधायाैवेत्यर्थः । नायकं प्रतीति । नायक- स्य हि धीरोदात्तादिभेदभिन्नस्य सर्वथा वीररसानुवेधेन भवितव्यमिति तं गुणप्रधान-भाव वाले रस-भावों का जो निबन्धन है उसके कारण स्खलित अर्थात् सारे दोष होते हैं । न कि ध्वनि के प्रतिपादन मात्र—। व्यङ्ग्य अर्थ हो अथवा मत हो, उसमें कौन अभिनिवेश है ? भाव यह कि वह कौवे के दाँत की परीक्षा के समान ही होगा । वृत्त्यनौचित्य को भी बहुधा व्याख्यान करते हैं । 'वह भी' इससे कारिका में प्रयुक्त 'और' ('च') शब्द का व्याख्यान करते हैं । 'रसभङ्ग का हेतु ही है' इससे कारिका में प्रयुक्त 'ही' (अर्थात् एवकार) का भिन्नक्रमत्व कहा है । अर्थात् रसके विरोध के लिए ही । नायक के प्रति—। धीरोदात्त आदि भेद से भिन्न नायक के सर्वथा वीररस का अनुवेध (संसर्ग) होना चाहिए, इसलिए उसके प्रति कातर पुरुषोचित अधैर्य का योजन दोषयुक्त ही है । उनका अर्थात् रसादि का । उन्हें अर्थात् सुकवियों को ।

तृतीय उद्योतः ४०१ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः लङ्कारान्तरप्रसिद्धानामुपनागरिकाद्यानां वा यदनौचित्यमविषये निवन्धनं तदपि रसभङ्गहेतुः। एवमेषां रसविरोधिनामन्येषां चानया दिशा स्वयमु- त्प्रेक्षितानां परिहारे सत्कविभिरवहितैर्भवितव्यम् । परिकरश्लोकाश्चात्र— मुख्या व्यापारविषयाः सुकवीनां रसादयः । तेषां निबन्धने भव्ये तैः सदैवप्रमादिभिः ॥ नीरसस्तु प्रबन्धो यः सोऽपशब्दो महान् कवेः । स तेनाकविरेव स्यादन्येनास्मृतलक्षणः ॥ पूर्वे विशृङ्खलगिरः कवयः प्राप्तकीर्तयः । तान्समाश्रित्य न त्याज्या नीतिरेषा मनीषिणा ॥ जो अनौचित्य अर्थात् अविषय में निवन्धन है वह भी रसभङ्ग का हेतु है। इस प्रकार इनका और इस ढंग से स्वयं उत्प्रेक्षित रसविरोधियों के परिहार में सत्कवियों को अवहित होना चाहिए । यहाँ परिकरश्लोक भी हैं— सुकवियों के व्यापार के मुख्य विषय रसादि हैं, (इसलिए) उन्हें उनके निवन्धन में सदैव अप्रमादी होना चाहिए । जो प्रबन्ध नीरस है वह कवि का महान् अपशब्द है । उस कारण वह अकवि ही रहे कि दूसरा उसे याद न करे । प्राचीन कवि स्वतन्त्र वाणी वाले और कीर्ति को प्राप्त हो चुके हैं, उनको आश्रयण करके मनीषी को यह नीति नहीं छोड़ देनी चाहिए । लोचनम् प्रति कातरपुरुषोचितमधैर्ययोजनं दुष्टमेव । तेषामिति रसादीनाम् । तैरिति सुकविभिः । सोऽपशब्द इति दुर्यश इत्यर्थः । ननु कालिदासः परिपोषं गतस्या- पि करुणस्य रतिविलापेषु पौनःपुन्येन दीपनमकार्षीत्, तत्कोऽयं रसविरोधिनां परिहारनिर्वन्ध इत्याशङ्कयाह—पूर्वे इति । न हि वसिष्ठादिभिः कथञ्चिदपि स्मृतिमार्गस्त्यक्तस्तद्वयमपि तथा त्यजामः । अचिन्त्यहेतुकत्वादुपरिचरिताना- मिति भावः । इति शब्देन परिकरश्लोकसमाप्तिं सूचयति ॥ १६ ॥ वह अपशब्द अर्थात् दुर्यश है । कालिदास ने परिपोष को प्राप्त भी करुण का रति के विलापों में बार-बार उद्दीपन किया है, तो रस के विरोधियों का यह कौन सा परिहार का निर्बन्ध (आग्रह) है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—प्राचीन—। यदि किसी प्रकार वसिष्ठ आदि ने स्मृतिमार्ग को छोड़ दिया तो हम उस प्रकार नहीं छोड़ दें । ऊपर उठे महान् लोगों के सम्बन्ध में कारण नहीं सोचा जाता । 'इति' शब्द से परिकर श्लोक की समाप्ति सूचित करते हैं ॥ १९ ॥ २६ ध्व०

४०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाल्मीकिव्यासमुख्याश्च ये प्रख्याताः कवीश्वराः । तदभिप्रायबाह्योऽयं नास्माभिर्दर्शितो नयः ॥ इति ॥ १६ ॥ विवक्षिते रसे लब्धप्रतिष्ठे तु विरोधिनाम् । बाध्यानामङ्गभावं वा प्राप्तानामुक्तिरच्छला ॥ २० ॥ स्वसामग्र्या लब्धपरिपोषे तु विवक्षिते रसे विरोधिनां विरोधि- रसाङ्गानां बाध्यानामङ्गभावं वा प्राप्तानां सतामुक्तिरदोषा । बाध्यत्वं हि विरोधिनां शक्याभिभवत्वे सति नान्यथा । तथा च तेषामुक्तिः प्रस्तुत- रसपरिपोषायैव सम्पद्यते । अङ्गभावं प्राप्तानां च तेषां विरोधित्वमेव निवर्तते । अङ्गभावप्राप्तिर्हि तेषां स्वाभाविकी समारोपकृता वा । तत्र येषां नैसर्गिकी तेषां तावदुक्तावविरोध एव । यथा विप्रलम्भशृङ्गारे तद्- और वाल्मीकि, व्यास प्रमुख जो प्रख्यात कवीश्वर हैं, उनके अभिप्राय से बाह्य नय ( मार्ग ) हमने नहीं दिखाया है । इति ॥ १९ ॥ विवक्षित रस के लब्धप्रतिष्ठ हो जाने पर बाध्य अथवा अङ्गभाव को प्राप्त विरो- धियों का कथन छलरहित है ॥ २० ॥ अपनी सामग्री से विवक्षित रस के परिपोष प्राप्त होने पर बाध्य अथवा अङ्गभाव को प्राप्त विरोधियों अर्थात् विरोधी रसाङ्गों का कथन दोषरहित है । विरोधियों का बाध्यत्व ( उनका ) अभिभव सम्भव होने पर हो सकता है अन्यथा नहीं । इसलिए उनका कथन प्रस्तुत रस के परिपोष के लिए ही सम्पन्न होगा । और उनके अङ्गभाव प्राप्त होने पर ( उनका ) विरोधित्व ही निवृत्त हो जाता है । उनके अङ्गभाव की प्राप्ति स्वाभाविक अथवा समारोपकृत होती है । उनमें से जिनकी ( प्राप्ति ) नैसर्गिक है उनके कथन में तो कोई विरोध ही नहीं । जैसे विप्रलम्भ शृङ्गार में उसके अङ्गभूत लोचनम् एवं विरोधिनां परिहारे सामान्येनोक्ते प्रतिप्रसवं नियतविषयमाह—विव- क्षित इति । बाध्यानामिति । बाध्यत्वाभिप्रायेणाङ्गत्वाभिप्रायेण वेत्यर्थः । अच्छला निर्दोषेत्यर्थः । बाध्यत्वाभिप्रायं व्याचष्टे-बाध्यत्वं हीति । अङ्गभावाभि- इस प्रकार विरोधियों के परिहार के सामान्यतः कहे जाने पर नियतविषयक प्रतिप्रसव को कहते हैं—विवक्षित—। बाध्य—। अर्थात् बाध्यत्व के अभिप्राय से अथवा अङ्गत्व के अभिप्राय से । छलरहित अर्थात् निर्दोष । बाध्यत्व के अभिप्राय की व्याख्या करते हैं—बाध्यत्व—। अङ्गभाव के अभिप्राय की उभय प्रकार से व्याख्या करते हैं, उनमें से प्रथम स्वाभाविक प्रकार का निरूपण करते हैं—

तृतीय उद्योतः ४०३ ध्वन्यालोकः ङ्गानां व्याध्यादीनां तेषाञ्च तदङ्गानामेवादोषो नातदङ्गानाम् । तदङ्गत्वे च सम्भवत्यपि मरणस्योपन्यासो न ज्यायान् । आश्रयविच्छेदे रसस्या- त्यन्तविच्छेदप्राप्तेः । करुणस्य तु तथाविधे विषये परिपोषो भविष्य- तीति चेत् न ; तस्याप्रस्तुतत्वात् प्रस्तुतस्य च विच्छेदात् । यत्र तु करुणरसस्यैव काव्यार्थत्वं तत्राविरोधः । शृङ्गारे वा मरणस्यादीर्घकाल- व्याधि आदि का, और उनके अङ्गों का ही दोष नहीं है, न कि जो उनके अङ्ग नहीं हैं उनका । और उनका अङ्ग सम्भव होने पर भी मरण का उपन्यास ठीक नहीं है, क्योंकि आश्रय के विच्छेद हो जाने पर रस का अत्यन्त विच्छेद प्राप्त हो जाता है । उस प्रकार के विषय में करुण का परिपोष तो होगा ? ऐसा नहीं; क्योंकि वह (करुण रस) प्रस्तुत नहीं है और (जो) प्रस्तुत है (उसका) विच्छेद हो जाता है । परन्तु जहां करुणरस का ही काव्यार्थत्व है वहां विरोध नहीं । अथवा शृङ्गार में शीघ्र मिलन लोचनम् प्रायमुभयथा व्याचष्टे, तत्र प्रथमं स्वाभाविकप्रकारं निरूपयति-तदङ्गानामिति । निरपेक्षभावतया सापेक्षभावविप्रलम्भशृङ्गारविरोधिन्यपि करुणे ये व्याध्याद- यस्सर्वथाऽङ्गत्वेन दृष्टाः तेषामिति । ते हि करुणे भवन्त्येव त एव च भवन्ती- ति । शृङ्गारे तु भवन्त्येव नापि त एवेति । अतदङ्गानामिति । यथालस्यौग्र्यजु- गुप्सानामित्यर्थः । तदङ्गत्वे चेति । 'सर्व एव शृङ्गारे व्यभिचारिण इत्युक्तत्वादि' ति भावः । आश्रयस्य स्त्रीपुरुषान्यतरस्याधिष्ठानस्यापाये रतिरेवोच्छिद्येत तस्या जीवितसर्वस्वाभिमानरूपत्वेनोभयाधिष्ठानत्वात् । प्रस्तुतस्येति । विप्रलम्भस्येत्यर्थः । काव्यार्थत्वमिति । प्रस्तुतत्वमित्यर्थः । नन्वेवं सर्व एव व्य- भिचारिण इति विघटितमित्याशङ्क्याह-शृङ्गारे वेति । अदीर्घकाले यत्र मरणे उनके अङ्गों का—। निरपेक्ष भाव वाला होने के कारण सापेक्ष भाव वाले विप्रलम्भ शृङ्गार के विरोधी भी करुण में जो व्याधि आदि सर्वथा अङ्ग के रूप में देखे गए हैं उनका । वे करुण में होते हैं ही और वे ही करुण में होते हैं । शृङ्गार में होते हैं ही, किन्तु वेही नहीं होते । जो उनके अङ्ग नहीं हैं—। अर्थात् जैसे आलस्य, औग्र्य, जुगुप्सा । और उनका अङ्ग होने पर—। भाव यह कि क्योंकि 'शृङ्गार में सभी व्यभिचारी हैं यह कहा गया है' । स्त्री-पुरुष के अन्यतर अधिष्ठान रूप आश्रय के नाश होने पर रति ही उच्छिन्न हो जायगी, क्योंकि जीवितसर्वस्वाभिमान रूप होने के कारण वह उभयाधिष्ठान है । प्रस्तुत का—। अर्थात् विप्रलम्भ का । काव्यार्थत्व—। अर्थात् प्रस्तुतत्व । तब तो इस प्रकार सभी व्यभिचारी हो जायेंगे, इसलिए विघटन होगा, यह आशङ्का करके कहते हैं—अथवा शृङ्गार में—। अदीर्घकाल में जिस मरण में प्रतीति की

प्रत्यापत्तिसम्भवे कदाचिदुपनिबन्धो नात्यन्तविरोधी । दीर्घकाल- प्रत्यापत्तौ तु तस्यान्तरा प्रवाहविच्छेद एवेत्येवंविधेतिवृत्तोपनिबन्धनं रसबन्धप्रधानेन कविना परिहर्तव्यम् । सम्भव होने पर मरण का कदाचित् उपनिबन्ध अत्यन्त विरोधी नहीं। किन्तु दीर्घ काल पर मिलन होने पर उस (रस) का बीच में प्रवाह-विच्छेद ही हो जायगा, अतः इस प्रकार के इतिवृत्त का उपनिबन्धन रसबन्धप्रधान कवि को छोड़ देना चाहिए । लोचनम् विश्रान्तिपदबन्ध एव नोत्पद्यते तत्रास्य व्यभिचारित्वम् । कदाचिदिति । यदि तादृशीं भङ्गिं घटयितुं सुकवेः कौशलं भवति । यथा— तीर्थे तोयव्यतिकरभवे जह्नुकन्यासरय्वो- र्देहन्त्यासादमरगणनालेख्यमासाद्य सद्यः । पूर्वाकाराधिकचतुरया सङ्गतः कान्तयासौ लीलागारेष्वरमत पुनर्नन्दनाभ्यन्तरेषु ॥ अत्र स्फुटैव रत्यङ्गता मरणस्य । अत एव सुकविना मरणे पदबन्धमात्रं न कृतम्, अनूद्यमानत्वेनैवोपनिबन्धनात् । पदबन्धनिवेशे तु सर्वथा शोकोदय एवातिपरिमितकालप्रत्यापत्तिलाभेऽपि । अथ दूरपरामर्शकसहृदयसामाजिकाभिप्रायेण मरणस्यादीर्घकालप्रत्यापत्ते- रङ्गतोच्यते, हन्त तापसवत्सराजेऽपि यौगन्धरायणादिनीतिमार्गाकर्णनसंस्कृत- मतीनां वासवदत्तामरणबुद्धेरेवाभावात्करुणस्य नामापि न स्यादित्यलमवान्त- विश्रान्ति की प्रतिष्ठा ही नहीं उपपन्न होती वहाँ वह (मरण) व्यभिचारी होगा । कदाचित्—। यदि उस प्रकार की भङ्गी की घटना के लिए सुकवि का कौशल होता है । जैसे— 'गङ्गा और सरयू के जल-सङ्गम से बने तीर्थ में शरीरत्याग करके सद्यः देवताओं में गणना प्राप्त कर, पूर्व आकृति से अधिक चतुर (अर्थात् सुभग) प्रियतमा के साथ वह (अज) नन्दनवन के भीतरी लीलागारों में रमण करने लगा ।' (रघु० ८।९५) । यहाँ स्पष्ट ही मरण रति का अङ्ग है । अतएव सुकवि ने मरण में (प्रतीति की विश्रान्ति का) पदबन्ध मात्र नहीं किया है, क्योंकि अनूद्यमान रूप से ही (उसका) उपनिबन्धन है। पदबन्ध के निवेश में तो अतिपरिमित काल में प्रत्यापत्ति (अर्थात् समागम) लाभ होने पर भी सर्वथा शोक का उदय ही होता । यदि अदीर्घकाल में समागम हो जाने के कारण मरण को अङ्ग दूर परामर्शक सामाजिक के अभिप्राय से कहते हैं, खेद है, (तब तो) 'तापसवत्सराज' में भी यौगन्धरायण आदि के नीतिमार्ग के आकर्णन से संस्कृत बुद्धिवालों के वासवदत्ता के मरण बुद्धि के ही न होने के कारण करुण का नाम भी नहीं होगा । यह बहुत अवान्तर

तृतीय उद्योतः ४०५

ध्वन्यालोकः
तत्र लब्धप्रतिष्ठे तु विवक्षिते रसे विरोधिग्साङ्गानां वाध्यत्वेनोक्ता-
वदोषो यथा—
क्काकार्यं शशलक्ष्मणः क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा
दोषाणां प्रशमाय मे श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम् ।
किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा
चेतः स्वास्थ्यमुपैहि कः खलु युवा धन्योऽधरं पास्यति ॥
यथा वा पुण्डरीकस्य महाश्वेतां प्रति प्रवृत्तनिर्भरानुरागस्य द्वितीय-
मुनिकुमारोपदेशवर्णने । स्वाभाविक्यामङ्गभावप्राप्तावदोषो यथा—
उनमें से विवक्षित रस के लब्धप्रतिष्ठ होने पर बाध्यरूप से विरोधी रसाङ्गों के
कथन में दोष का अभाव, जैसे—
यह अकार्य ( अनुचित कार्य ) कहां और चन्द्रवंश कहां ? फिर वह नजर आ
जाती ! मैंने ( शास्त्रों का ) श्रवण दोषों ( काम आदि विकारों ) के शमन के लिए
किया है, अहो; क्रोध में भी ( उसका ) मुख सुन्दर. लगता था ! पापरहित विद्वान्
क्या कहेंगे ? वह स्वप्न में भी दुर्लभ हो गई । अरे चित्त स्वस्थ हो जा, कौन धन्य
युवक (उसका) अधरपान करेगा ?
अथवा जैसे महाश्वेता के प्रति पुण्डरीक के अधिक अनुरक्त हो जाने पर दूसरे
मुनिकुमार ( कपिञ्जल ) के उपदेश के वर्णन में । स्वाभाविक अङ्गभाव-प्राप्ति में दोष
का अभाव, जैसे—
लोचनम्
रेण बहुना । तस्माद् दीर्घकालतात्र पदबन्धलाभ एवेति मन्तव्यम् । एवं नैस-
र्गिकाङ्गतो व्याख्याता । समारोपितत्वे तद्विपरीतेत्यर्थलब्धत्वात्स्वकण्ठेन न
व्याख्याता ।
एवं प्रकारत्रयं व्याख्याय क्रमेणोदाहरति — तत्रेत्यादिना । क्काकार्यमिति ।
वितर्क औत्सुक्येन मतिः स्मृत्या शङ्का दैन्येन धृतिश्चिन्तया च बाध्यते । एत-
च्च द्वितीयोद्द्योतारम्भ एवोक्तमस्माभिः । द्वितीयेति । विपक्षीभूतवैराग्यविभा-
चर्चा व्यर्थ है। इसलिए यहाँ दीर्घकालता पदबन्ध के लाभ में ही (अर्थात् सहृदयों की
प्रतीतिविश्रान्ति के पदबन्ध में ही ) है यह मानना चाहिए। इस प्रकार नैसर्गिक अङ्गता
का व्याख्यान किया। समारोपित अवस्था में उसके ( नैसर्गिक ) के विपरीत, यह
अर्थ लब्ध हो जाने से स्वकण्ठतः व्याख्यान नहीं किया है।
इस प्रकार प्रकारत्रय का व्याख्यान करके क्रम से उदाहरण देते हैं — उनमें से
इत्यादि द्वारा । यह अकार्य कहाँ—। (यहाँ) वितर्क औत्सुक्य से, मति स्मृति से,
शङ्का दैन्य से और धृति चिन्ता से बाधित होती है। इसे द्वितीय उद्योत के आरम्भ में

४०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः भ्रमिमरतिमलसहृदयतां प्रलयं मूर्च्छां तमः शरीरसादम् । मरणं च जलदभुजगर्जं प्रसह्य कुरुते विषं वियोगिनीनाम् ॥ इत्यादौ। समारोपितायामप्यविरोधी यथा---'पाण्डुक्षामम्'इत्यादौ । यथा वा—'कोपात्कोमललोलबाहुलतिकापाशेन' इत्यादौ । इयं चाङ्गभावप्राप्तिरन्या यदाधिकारिकत्वात्प्रधान एकस्मिन्वाक्यार्थे रस- योर्भावयोर्वा परस्परविरोधिनोर्द्वयोरङ्गभावगमनं तस्यामपि न दोषः । मेघरूपी भुजंग से उत्पन्न विष वियोगिनियों के चक्कर, अरति, आलस्य, प्रलय (चेष्टानाश), मूर्च्छा, मोह, शरीर में दर्द और मरण हठात् उत्पन्न कर देता है। इत्यादि में । समारोपित (अङ्गभाव-प्राप्ति) में भी विरोध का अभाव, जैसे— 'पाण्डुक्षामं०' इत्यादि में । अथवा जैसे—'कोपात् कोमललोलबाहुलतिकापाशेन' इत्यादि में । और यह अन्य अङ्गभाव की प्राप्ति है कि आधिकारिक होने के कारण प्रधानभूत एक वाक्यार्थ में परस्पर विरोधी दो रसों अथवा भावों का अङ्गभाव प्राप्त होना, उसमें भी दोष नहीं। लोचनम् वाद्यवधारणेऽपि ह्यशक्यविच्छेदत्वेन दाढर्यमेवानुरागस्योक्तं भवतीति भावः । समारोपितायामिति । अङ्गभावप्राप्ताविति शेषः । पाण्डुक्षामं वक्त्रं हृदयं सरसं तवालसं च वपुः । आवेदयति नितान्तं क्षेत्रियरोगं सखि हृदन्तः ॥ अत्र करुणोचितो व्याधिःश्लेषभङ्ग्या स्थापितः। कोपादिति बद्ध्वेति हन्य- त इति च रौद्रानुभावानां रूपकबलादारोपितानां तदनिर्वाहादेवाङ्गत्वम् । तच्च पूर्वमेवोक्तं 'नातिनिर्वहणैषिता' इत्यत्रान्तरे। अन्येति। चतुर्थोऽयं प्रकार इत्यर्थः। ही हमने कह दिया है। दूसरे—। भाव यह कि विपक्षीभूत वैराग्य के विभाव आदि का अवधारण होने पर भी विच्छेद के अशक्य होने के कारण अनुराग का दाढर्द्य ही उक्त होता है । समारोपित—। 'अङ्गप्राप्ति में' यह शेष है। हे सखी,, तेरा पीला और झुलसा हुआ मुख, सरस हृदय, आलस्य भरा शरीर हृदय के भीतर नितान्त क्षेत्रिय रोग (अर्थात् इस शरीर से भी साध्य न होने वाले रोग) को सूचित करते हैं । यहाँ करुण के उचित व्याधि श्लेष की भङ्गी से स्थापित है । 'कोप से', 'बाँध कर', और 'पीटा जाता है' रूपक के बल से आरोपित इन रौद्र के अनुभावों का उसके (रूपक के) निर्वाह न होने से ही अङ्गत्व है। और उसे पहले ही कह चुके हैं 'अत्यन्त निर्वाह करने की इच्छा नहीं' इसके बीच । अन्य—। अर्थात् यह चौथा प्रकार है ।

तृतीय उद्योतः ४०७

ध्वन्यालोकः
यथोक्तं 'क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादौ । कथं तत्राविरोध इति चेत्,
द्वयोरपि तयोरन्यपरत्वेन व्यवस्थानात् । अन्यपरत्वेऽपि विरोधिनोः
कथं विरोधनिवृत्तिरिति चेत्, उच्यते—विधौ विरुद्धसमावेशस्य
दुष्टत्वं नानुवादे ।
जैसे कहा है—'क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादि में । वहां विरोध कैसे नहीं है यदि
कहें_ता ( समाधान है कि ) वे दोनों अन्यपर रूप से ( अर्थात् अङ्गरूप से )
व्यवस्थित होते हैं । यदि कहो कि अन्यपर होने पर भी दो विरोधियों के विरोध की
निवृत्ति कैसे होगी, तो कहते हैं—विधि में ( दो ) विरोधियों के समावेश का दोष है,
अनुवाद में नहीं ।
लोचनम्
पूर्वं हि विरोधिनः प्रस्तुततरसान्तरेऽङ्गतोक्ता, अधुना तु द्वयोर्विरोधिनोर्वस्त्वन्त-
रेऽङ्गभाव इति शेषः । क्षिप्त इति । व्याख्यातमेतत् 'प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे'
इत्यत्र । नन्वन्यपरत्वेऽपि स्वभावो न निवर्तते, स्वभावकृत एव च विरोध इत्य-
भिप्रायेणाह—अन्यपरत्वेऽपीति। विरोधिनोरिति। तत्स्वभावयोरिति हेतुत्वाभिप्रा-
येण विशेषणम् । उच्यत इति । अयं भावः-सामग्रीविशेषपतितत्वेन भावानां
विरोधाविरोधौ न स्वभावमात्रनिबन्धनौ शीतोष्णयोरपि विरोधाभावात् । विधा-
विति । तदेव कुरु मा कार्षीरिति यथा । विधिशब्देनात्रैकदा प्राधान्यमुच्यते ।
अत एवातिरात्रे षोडशिनं गृह्णन्ति न गृह्णन्तीति विरुद्धविधिर्विकल्पपर्यवसायी-
ति वाक्यविदः । अनुवाद इति । अन्याङ्गतायामित्यर्थः । क्रीडाङ्गत्वेन ह्यत्र
शेष यह कि विरोधी (रसाङ्ग) की प्रस्तुत रसान्तर में अङ्गता कही, अब दो विरोधी
( रसाङ्गों ) की ( प्रस्तुत ) वस्त्वन्तर में अङ्गभाव ( कहते हैं ) । 'क्षिप्तः'—। यह
'प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे' इस ( कारिका ) में व्याख्यात है । अन्यपर ( अर्थात् अङ्ग रूप )
होने पर भी स्वभाव निवृत्त नहीं होता, और विरोध स्वभावकृत ही होता है, इस
अभिप्राय से कहते हैं—अन्यपर होने पर भी—। दो विरोधियों का—। उस ( अर्थात्
विरोध ) के स्वभाव वाले' यह हेतुत्व के अभिप्राय से विशेषण है । कहते हैं—। भाव
यह है—सामग्री-विशेष में अनुप्रवेश के कारण भावों के विरोध-अविरोध होते हैं, न कि
स्वभावमात्र के कारण, क्योंकि ( सामग्रीविशेष के अनुप्रवेश के कारण ) शीत और
उष्ण में भी विरोध नहीं होता । विधि में—। जैसे 'वही करो, मत करो' । 'विधि'
शब्द से यहाँ एक समय प्राधान्य कहते कहा गया है । अतएव 'अतिरात्र में षोडशी
( पात्र ) को ग्रहण करते हैं, नहीं ग्रहण करते हैं' यह विरुद्ध विधि विकल्प में पर्यवसन्न
होती है यह मीमांसकों ( वाक्यविदों ) का कथन है । अनुवाद में—। अर्थात् अन्य की
अङ्गता में । यहाँ क्रीड़ा ( खिलवाड़ ) का अङ्ग रूप से अभिधान है, इस कारण 'राजा के

४०८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा— एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ वद मौनं समाचर । एवमाशायहग्रस्तैः क्रीडन्ति धनिनोऽर्थिभिः ॥ इत्यादौ । अत्र हि विधिप्रतिषेधयोरनूद्यमानत्वेन समावेशे न विरोधस्तथेहापि भविष्यति । श्लोके ह्यस्मिन्नीर्ष्याविप्रलम्भशृङ्गारकरुण- वस्तुनोर्न विधीयमानत्वम् । त्रिपुररिपुप्रभावातिशयस्य वाक्यार्थत्वा- त्तदङ्गत्वेन च तयोर्व्यवस्थानात् । न च रसेषु विध्यनुवादव्यवहारो नास्तीति शक्यं वक्तुम् , तेषां जैसे—आओ, जाओ, बैठो, उठो, बोलो, चुप हो जाओ, इस प्रकार धनी लोग आशा के ग्रह से ग्रस्त याचकों के साथ खिलवाड़ करते हैं। इत्यादि में । यहां विधि और प्रतिषेध के अनूद्यमान रूप में समावेश करने पर विरोध (दोष) नहीं है, उस प्रकार यहां ('क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादि में) भी होगा। इस श्लोक में ईर्ष्याविप्रलम्भ और करुण विधीयमान नहीं हैं, क्योंकि त्रिपुरारि (शिव जी) का प्रभावातिशय वाक्यार्थ है और उसके अङ्ग के रूप से वे दोनों व्यवस्थित हैं। नहीं कह सकते यह कि रसों में विधि-अनुवाद का व्यवहार नहीं है, क्योंकि लोचनम् विरुद्धानामर्थानामभिधानमिति राजनकटव्यवस्थिताततायिद्वयन्यायेन विरुद्धा- नामप्यन्यमुखप्रेक्षितापरतन्त्रीकृतानां श्रौतेन क्रमेण स्वात्मपरामर्शेऽप्यविश्राम्य- ताम्, का कथा परस्पररूपचिन्तायां येन विरोधः स्यात् । केवलं विरुद्धत्वा- दरुणाधिकरणस्थित्या यो वाक्यीय एषां पाश्चात्त्यः सम्बन्धः सम्भाव्यते स विघटताम् । ननु प्रधानतया यद्वाच्यं तत्र विधिः । अप्रधानत्वेन तु वाच्येऽनुवादः । न च रसस्य वाच्यत्वं त्वयैव सोढमित्याशङ्कमानः परिहरति—न चेति । प्रधाना- निकट खड़े दो आततायी हैं' इस न्याय के अनुसार अन्यमुखप्रेक्षिता से परतन्त्र (अर्थात् उपसर्जनीकृत) हुए, सुने क्रम के अनुसार अपने परामर्श में भी विश्रान्ति न प्राप्त करते हुए विरुद्धों के भी परस्पर रूप की चिन्ता की कोई बात ही नहीं, जिससे विरोध होगा। विरुद्ध होने के कारण 'अरुणाधिकरण' न्याय के अनुसार जो वाक्य- प्रतिपाद्य इनका सम्बन्ध सम्भावित होगा वह केवल विघटित होगा। प्रधान रूप से जो वाच्य है वहां विधि है, अप्रधान रूप से वाच्य में अनुवाद है, और रस का वाच्यत्व तुमने ही सहन नहीं किया है, यह आशङ्का करते हुए परिहार

तृतीय उद्योतः ४०९

ध्वन्यालोकः

वाक्यार्थत्वेनाभ्युपगमात् । वाक्यार्थस्य वाच्यस्य च यौ विध्यनुवादौ तौ तदाक्षिप्तानां रसानां केन वार्येते । यैर्वा साक्षात्काव्यार्थता रसादीनां नाभ्युपगम्यते, तैस्तेषां तन्निमित्तता तावदवश्यमभ्युपगन्तव्या । तथाप्यत्र श्लोके न विरोधः । यस्मादनूद्यमानाङ्गनिमित्तोभयरसवस्तु- सहकारिणो विधीयमानांशाद्भावविशेषप्रतीतिरुत्पद्यते ततश्च न कश्चिद्विरोधः । दृश्यते हि विरुद्धोभयसहकारिणः कारणात्कार्यविशेषो- उनको वाक्यार्थ रूप में माना जाता है। वाक्यार्थ और वाच्य के जो विधि-अनुवाद हैं उन्हें उसके ( वाच्यार्थ ) द्वारा आक्षिप्त रसों में कौन वारण कर सकता है ? अथवा जो रसादि को साक्षात् काव्य का अर्थ नहीं मानते हैं उन्हें उन ( रसादि ) की तन्निमित्तता ( अर्थात् काव्य के अर्थ से व्यङ्ग्यता ) अवश्य माननी चाहिए । तथापि इस श्लोक में विरोध नहीं है। क्योंकि अनूद्यमान अङ्ग के निमित्त जो उभय रसवस्तु वह सहकारी है जिसका ऐसे विधीयमान अंश से भावविशेष की प्रतीति उत्पन्न होती है, इस कारण कोई विरोध नहीं है। दो विरुद्ध हैं सहकारी जिसके ऐसे कारण से

लोचनम्

प्रधानत्वमात्रकृतौ विध्यनुवादौ, तौ च व्यङ्ग्यतायामपि भवत एवेति भावः । मुख्यतया च रस एव काव्यवाक्यार्थ इत्युक्तम् । तेनामुख्यतया यत्र सोऽर्थस्त- त्रानूद्यमानत्वं रसस्यापि युक्तम् । यदि वानूद्यमानविभावादिसमाक्षिप्तत्वाद्वरस- स्यानूद्यमानता तदाह—वाक्यार्थस्येति । यदि वा मा भूदनूद्यमानतया विरुद्धयो रसयोः समावेशः, सहकारितया तु भविष्यतीति सर्वथाविरुद्धयोर्युक्तियुक्तोऽङ्गा- ङ्गिभावो नात्र प्रयासः कश्चिदिति दर्शयति—यैर्वेति । तन्निमित्तेति । काव्यार्थो विभावादिनिमित्तं येषां रसादीनां ते तथा तेषां भावस्तत्ता । अनूद्यमाना ये हस्तक्षेपादयो रसाङ्गभूता विभावादयस्तन्निमित्तं यदुभयं करुणविप्रलम्भात्मकं करते हैं—नहीं—। भाव यह कि विधि और अनुवाद प्रधान-अप्रधानमात्रकृत हैं और वे व्यङ्ग्यता में भी होते ही हैं । यह कहा जा चुका है कि मुख्य रूप से रस ही काव्य- वाक्य का अर्थ है । इसलिए जहाँ वह अर्थ अमुख्य रूप से है वहाँ रस का भी अनूद्यमा- नत्व ठीक है। अथवा अनूद्यमान विभाव आदि द्वारा समाक्षिप्त होने के कारण रस की अनूद्यमानता है, उसे कहते हैं—वाक्यार्थ—। अथवा यदि अनूद्यमान रूप से विरुद्ध रसों का समावेश मत हो, किन्तु सहकारी रूप से होगा ! इस प्रकार सर्वथा दो विरुद्धों का अङ्गाङ्गिभाव युक्तियुक्त है, यहाँ कोई प्रयास नहीं, यह दिखाते हैं—अथवा जो—। तन्निमित्तता—। काव्यार्थ विभावादि निमित्त जिन रसादि का है उनका भाव । अनूद्यमान जो रसाङ्गभूत हस्तक्षेप आदि विभाव आदि तन्निमित्त जो उभय करुणविप्रल-

४१० | सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः त्पत्तिः। विरुद्धफलोत्पादनहेतुत्वं हि युगपदेकस्य कारणस्य विरुद्धं न तु विरुद्धोभयसहकारित्वम्। एवंविधविरुद्धपदार्थविषयः कथमभिनयः कार्यविशेष की उत्पत्ति देखी जाती है। एक साथ एक कारण का विरुद्ध फल के उत्पादन का हेतुत्व विरुद्ध है, न कि दो विरोधियों का सहकारी होना (विरुद्ध है।) यदि कहो कि इस प्रकार के विरुद्ध पदार्थों के विषय का अभिनय कैसे प्रयोग किया

लोचनम् रसवस्तु रससजातीयं तत्सहकारि यस्य विधीयमानस्य शाम्भवशरवह्निजनित- दुरितदाहलक्षणस्य तस्माद्भावविशेषे प्रेयोऽलङ्कारविषये भगवत्प्रभावातिशय लक्षणे प्रतीतिरिति सङ्गतिः। विरुद्धं यदुभयं वारितेजोगतं शीतोष्णं तत्सहकारि यस्य तण्डुलादेः कारणस्य तस्मात्कार्यविशेषस्य कोमलभक्तकरणलक्षणस्योत्पत्ति- र्दृश्यते। सर्वत्र हीत्थमेव कार्यकारणभावो बीजाङ्कुरादौ नान्यथा। ननु विरोधस्तर्हि सर्वत्राकिञ्चित्करः स्यादित्याशङ्कयाह—विरुद्धफलेति । तथा चाहुः—'नोपादानं विरुद्धस्य' इति। नन्वभिनेयार्थे काव्ये यदीदृशं वाक्यं भवेत्तदा यदि समस्ताभिनयः क्रियते तदा विरुद्धार्थविषयः कथं युगपदभिनयः कर्तुं शक्य इत्याशयेनाशङ्कमान आह—एवमिति। एतत्परिहरति—अनूद्यमानेति। अनूद्यमानमेवंविधं विरुद्धाकारं वाच्यं यत्र तादृशो यो विषयः 'एहि गच्छ पतो- त्तिष्ठ' इत्यादिस्तत्र या वार्ता सात्रापीति। •एतदुक्तं भवति—'क्षिप्तो हस्तावलग्न' इत्यादौ प्राधान्येन भीतविप्लुतादि-

म्भात्मक रसवस्तु अर्थात् रसजातीय वस्तु वह सहकारी है जिनका ऐसे शिवजी के बाण- वह्नि से उत्पन्न दुरितों का दाह रूप विधीयमान (अंश) से भावविशेष अर्थात् भगवत्प्रभावातिशय रूप प्रेयोऽलङ्कार के विषय में प्रतीति है यह सङ्गति है। विरुद्ध जो उभय जल और तेजगत शीत-उष्ण वह सहकारी है जिस तण्डुल आदि कारण का उससे कोमल भक्त का निर्माण रूप कार्यविशेष की उत्पत्ति देखी जाती है। सब जगह इस प्रकार का ही कार्यकारण भाव है, बीज-अङ्कुर आदि में अन्यथा नहीं है। तब तो विरोध सभी जगह कुछ नहीं कर सकेगा ! यह आशङ्का करके कहते हैं— विरुद्ध फल—। जैसा कि कहा है—'विरुद्ध के उपादान ( ? उत्पादन ) नहीं'। अभिने- यार्थ काव्य में यदि इस तरह का वाक्य हो तब यदि समस्त अभिनय किया जाय तब विरुद्ध अर्थों के सम्बन्ध का अभिनय कैसे किया जा सकता है ? इस आशय से आशङ्का करते हुए कहते हैं—इस प्रकार—। इसका परिहार करते हैं—अनूद्यमान—। अनूद्य- मान इस प्रकार का अर्थात् विरुद्ध आकार का वाच्य जहाँ है उस प्रकार का जो विषय 'आओ, जाओ, बैठो, उठो' इत्यादि है वहाँ जो बात होगी वह यहाँ भी। बात यह कही गई—'क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादि में प्राधान्यतः भीत, विप्लुत

तृतीय उद्योतः ४११ ध्वन्यालोकः प्रयोक्तव्य इति चेत्, अनूद्यमानैवंविधवाच्यविषये या वार्त्ता सात्रापि भविष्यति। एवं विध्यनुवादनयाश्रयेणात्र श्लोके परिहृतस्तावद्विरोधः। किं च नायकस्याभिनन्दनीयोदयस्य कस्यचित्प्रभावातिशय- वर्णने तत्प्रतिपक्षाणां यः करुणो रसः स परीक्षकाणां न वैक्लव्यमाद- जा सकता है तो ( उत्तर है कि ) अनूद्यमान इस प्रकार के वाच्य के सम्बन्ध में जो बात है वह यहां भी होगी। इस प्रकार विधि और अनुवाद की नीति का आश्रय लेकर इस श्लोक में विरोध का परिहार किया गया। और भी, अभिनन्दनीय उदय वाले किसी नायक के प्रभावातिशय के वर्णन में उसके प्रतिपक्षों ( विरोधियों ) का जो करुण रस है वह परीक्षक लोगों को व्याकुल लोचनम् दृष्ट्युपपादनक्रमेण प्राकरणिकस्तावदर्थः प्रदर्शयितव्यः। यद्यप्यत्र करुणोऽपि पराङ्गमेव तथापि विप्रलम्भापेक्षया तस्य तावन्निकटं प्राकरणिकत्वं महेश्वर- प्रभावं प्रति सोपयोगत्वात्। विप्रलम्भस्य तु कामीवेत्युत्प्रेक्षोपमाबलेनायातस्य दूरत्वात्। एवं च सास्त्रनेत्रोत्पलाभिरित्यन्तं प्राधान्येन करुणोपयोगाभिनय- क्रमेण लेशतस्तु विप्रलम्भस्य करुणेन सादृश्यात्सूचनां कृत्वा। कामीवेत्यत्र यद्यपि प्रणयकोपोचितोऽभिनयः कृतस्तथापि ततः प्रतीयमानोऽप्यसौ विप्रलम्भः समनन्तराभानीयमाने स दहतु दुरितमित्यादौ साटोपाभिनयसमर्पितो यो भगवत्प्रभावस्तत्राङ्गतायां पर्यवस्यतीति न कश्चिद्विरोधः। एतं विरोध- परिहारमुपसंहरति—एवमिति। विषयान्तरे तु प्रकारान्तरेण विरोधपरिहारमाह—किञ्चेति। परीक्षकाणा- मिति सामाजिकानां विवेकशालिनाम्। न वैक्लव्यमिति। न तादृशे विषये आदि दृष्टियों को उपपन्न करने के क्रम से प्राकरणिक अर्थ का प्रदर्शन ( अभिनय ) करना चाहिए। यद्यपि यहाँ करुण भी पराङ्ग ही है तथापि विप्रलम्भ की अपेक्षा उसका प्राकरणिकत्व निकट है, क्योंकि वह महेश्वर ( शिव जी ) के प्रभाव के प्रति उपयोगी है। किन्तु 'कामी की भाँति' इस उत्प्रेक्षा या उपमा के बल से प्राप्त विप्रलम्भ दूर पड़ जाता है। और इस प्रकार 'आँसू-भरे नेत्र कमलों वाली' इस अत्यन्त प्राधान्यत करुण के उपयोग के अभिनय के क्रम से लेशतः विप्रलम्भ की करुण के सादृश्य से सूचना करके ( अभिनय है)। 'कामी की भाँति' यहाँ पर यद्यपि प्रणयकोप के उचित अभिनय किया गया है तथापि उससे प्रतीयमान भी वह विप्रलम्भ तुरंत बाद में अभिनेयमान 'वह दुरित को दहन करें' इत्यादि में सारोप अभिनय से समर्पित जो भगवान् का प्रभाव है उसकी अङ्गता में पर्यवसन्न हो जाता है, इस प्रकार कोई विरोध नहीं। इस विरोध के परिहार का उपसंहार करते हैं—इस प्रकार—। किन्तु विषयान्तर में प्रकारान्तर से विरोध का परिहार करते हैं—और भी—। परीक्षक अर्थात् विवेकशाली सामाजिक। व्याकुल नहीं—। उस प्रकार के विषय में

४१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः धाति प्रत्युत प्रीत्यतिशयनिमित्ततां प्रतिपद्यत इत्यतस्तस्य कुण्ठशक्ति- कत्वात्तद्विरोधविधायिनो न कश्चिद्दोषः । तस्माद्वाक्यार्थीभूतस्य रसस्य भावस्य वा विरोधी रसविरोधीति वक्तुं न्याय्यः, न त्वङ्ग- भूतस्य कस्यचित् । नहीं करता, बल्कि अतिशय प्रीति का निमित्त बन जाता है, इस कारण उस ( वीर रस के आस्वादातिशय का ) विरोध करने वाला उस ( करुण ) के कुण्ठशक्तिक हो जाने के कारण कोई दोष नहीं । इसलिए वाक्यार्थीभूत ( अर्थात् प्रधानभूत ) रस अथवा भाव के विरोधी को 'रस का विरोधी' कहना ठीक है, किन्तु अङ्गभूत किसी ( रस अथवा भाव के विरोधी ) को 'रस का विरोधी' कहना ठीक नहीं ।

लोचनम् चित्तद्रुतिरुत्पद्यते करुणास्वादविश्रान्त्यभावात् , किन्तु वीरस्य योऽसौ क्रोधो व्यभिचारितां प्रतिपद्यते तत्फलरूपोऽसौ करुणरसः स्वकारणाभिव्यञ्जनद्वारेण वीरास्वादातिशय एव पर्यवस्यति । यथोक्तम्—'रौद्रस्य चैव यत्कर्म स ज्ञेयः करुणो रसः' इति । तदाह—प्रीत्यतिशयेति । अत्रोदाहरणम्— कुरबक कुचाघातक्रीडासुखेन वियुज्यसे बकुलविटपिन् स्मर्त्तव्यं ते मुखासवसेचनम् । चरणघटनाशून्यो यास्यस्यशोक सशोकता- मिति निजपुरत्यागे यस्य द्विषां जगदुः स्त्रियः ॥ भावस्य वेति । तस्मिन् रसे स्थायिनः प्रधानभूतस्य व्यभिचारिणो वा यथा विप्रलम्भशृङ्गार औत्सुक्यस्य ।

चित्तद्रुति उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि करुण के आस्वाद की विश्रान्ति नहीं । किन्तु वीर का जो वह क्रोध व्यभिचारी बन रहा है उसका फलरूप वह करुणरस अपने कारणों के अभिव्यञ्जन के द्वारा वीर के अतिशय आस्वाद में ही पर्यवसित होता है । जैसे, कहा है—रौद्र का जो ही कर्म है उसे करुण रस समझना चाहिए । उसे कहते हैं—अतिशय- प्रीति—। यहाँ उदाहरण है— हे कुरूबक, तुम कुचाघात की क्रीड़ाओं के सुख से वियुक्त हो रहे हो, हे बकुलवृक्ष, मुखासव द्वारा सेवन याद रखना, हे अशोक, चरणाघात से रहित होकर तुम सशोक हो जाओगे, इस प्रकार जिसके शत्रुओं की पत्नियाँ अपने नगर के त्याग के अवसर पर कहने लगीं । अथवा भाव का—। उस रस में स्थायी अर्थात् प्रधानभूत का अथवा व्यभिचारी का, जैसे विप्रलम्भ शृङ्गार में औत्सुक्य का ।

तृतीय उद्योतः ४१३ ध्वन्यालोकः अथवा वाक्यार्थीभूतस्यापि कस्यचित्करुणरसविषयस्य तादृशेन शृङ्गारवस्तुना भङ्गिविशेषाश्रयेण संयोजनं रसपरिपोषायैव जायते । यतः प्रकृतिमधुराः पदार्थाः शोचनीयतां प्राप्ताः प्रागवस्थाभाविभिः संस्मर्यमाणैर्विलासैरधिकतरं शोकावेशमुपजनयन्ति । यथा— अयं स रशनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः । नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीवीविस्रंसनः करः ॥ अथवा वाक्यार्थीभूत भी किसी करुण रस के विषय का उस प्रकार के शृङ्गार वस्तु के साथ भङ्गिविशेष का आधार लेकर संयोजन रस के परिपोष के लिए ही होता है । क्योंकि प्रकृतिमधुर पदार्थ शोचनीयता प्राप्त होकर पूर्व अवस्था में होने वाले, स्मरण किए जाते हुए विलासों के कारण अधिकतर शोकावेश उत्पन्न करते हैं । जैसे— रशना को ऊपर खींचने वाला, पीन स्तनों का विमर्दन करने वाला, नाभि, ऊरु, जघन का स्पर्श करने वाला, नीवी को ढीली करने वाला वह यह हाथ है । लोचनम् अधुना पूर्वस्मिन्नेव श्लोके क्षिप्त इत्यादौ प्रकारान्तरेण विरोधं परिहरति— अथवेति । अयं चात्र भावः—पूर्वं विप्रलम्भकरुणयोरन्यत्राङ्गभावगमनान्निर्वि- रोधत्वमुक्तम् । अधुना तु स विप्रलम्भः करुणस्यैवाङ्गतां प्रतिपन्नः कथं विरो- धीति व्यवस्थाप्यते—तथा हि करुणो रसो नामेष्टजनविनिपातादेर्विभावादि- त्युक्तम् । इष्टता च नाम रमणीयतामूला । ततश्च कामीवार्ड्रापराध इत्युत्प्रेक्षयेद- मुक्तम् । शांभवशरवह्निचेष्टितावलोकने प्राक्तनप्रणयकलहवृत्तान्तः स्मर्यमाण इदानीं विध्वस्ततया शोकविभावतां प्रतिपद्यते । तदाह—भङ्गिविशेषेति । अग्रा- म्यतया विभावानुभावादिरूपताप्रापणया ग्राम्योक्तिरहितेत्यर्थः । अत्रैव दृष्टान्तमाह—यथा अयमिति । अत्र भूरिश्रवसः समरभुवि निपतितं बाहुं दृष्ट्वा अब 'क्षिप्तः' इत्यादि पूर्व श्लोक में ही प्रकारान्तर से विरोध का परिहार करते हैं—अथवा—। यहाँ यह भाव है—पहले विप्रलम्भ और करुण का अन्यत्र (शिवजी के अतिशय प्रभाव में) अङ्गत्त्व प्राप्त होने से विरोध का अभाव कहा गया । अब वह विप्रलम्भ करुण का ही अङ्गत्त्व प्राप्त करके कैसे विरोधी होगा ? यह व्यवस्थापन करते हैं—जैसा कि करुण रस इष्ट जन के विनिपात आदि विभाव आदि से होता है यह कह चुके हैं । रमणीयता इष्टता के मूल में होती है । और उस कारण 'आर्द्रापराध कामी की भाँति' यह उत्प्रेक्षा से कहा है । शिव जी के शराग्नि के कार्य के अवलोकन से स्मर्यमाण प्राक्तन प्रणयकलह का वृत्तान्त अब विध्वस्त होने के कारण शोक का विभाव बन गया है । उसे कहते हैं—भङ्गिविशेष—। अर्थात् विभाव, अनुभाव आदि रूपता को प्राप्त कराने वाली ग्राम्योक्तिरहित अग्राम्यता से । यहीं दृष्टान्त कहते हैं—जैसे—। भूरिश्रवा के युद्धक्षेत्र में गिरे बाहु को देख कर उसकी पत्नियों का यह अनुशोचन है ।

४१४ | सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः

इत्यादौ। तदत्र त्रिपुरयुवतीनां शाम्भवः शराग्निरार्द्रापराधः कामी यथा व्यवहरति स्म तथा व्यवहृतवानित्यनेनापि प्रकारेणास्त्येव निर्विरोधत्वम्। तस्माद्यथा यथा निरूप्यते तथा तथात्र दोषाभावः। इत्थं च— क्रामन्त्यः क्षतकोमलाङ्गुलिगलद्रक्तैः सदर्भाः स्थलीः पादैः पातितयावकैरिव पतद्बाष्पाम्बुधौताननाः। भीता भर्तृकराव लम्बितकरास्त्वद्वैरिनाथोऽधुना दावाग्निं परितो भ्रमन्ति पुनरप्युद्यद्विवाहा इव ॥

इत्यादि में। इसलिए यहां शिवजी के शराग्नि ने आर्द्रपराध काम जिस प्रकार व्यवहार करता है उस प्रकार व्यवहार किया, इस प्रकार से भी निर्विरोधत्व है ही। इसलिए जैसे-जैसे निरूपण होगा वैसे-वैसे यहां दोष का अभाव होगा। और इस प्रकार— कोमल उंगलियों के क्षत हो जाने से रक्त टपकाते, मानों यावक (आलता) रस को गिराते, पैरों से कुशों वाली स्थलियों को पार करती, गिरते हुए बाष्पजल से धुले मुखों वाली, डरी हुई, पति के हाथ में हाथ पकड़ाए, तुम्हारे शत्रु की स्त्रियां इस समय वनाग्नि के चारों ओर भ्रमण करती हैं, मानों उनका विवाह पुनः होने लगा हो।

लोचनम्

तत्कान्तानामेतदनुशोचनम्। रशनां मेखलां सम्भोगावसरेषूर्ध्वं कर्षतीति रशनोत्कर्षी। अमुना विरोधोद्धरणप्रकारेण बहुतरं लक्ष्यमुपपादितं भवतीत्यभि- प्रायेणाह—इत्थं चेति। होमाग्निधूमकृतं बाष्पाम्बु यदि वा बन्धुगृहत्याग- दुःखोद्भवम्। भयं कुमारीजनोचितः साध्वसः। एवमियताङ्गभावं प्राप्तानामुक्ति- रच्छलेति कारिकाभागोपयोगि निरूपितमित्युपसंहरति—एवमिति। तावद्ग्रह- णेन वक्तव्यान्तरमप्यस्तीति सूचयति ॥ २० ॥ रशना अर्थात् मेखला को सम्भोग के अवसरों में ऊर्ध्व कर्षण करता है अतः रशनोत्कर्षी है। विरोध के उद्धरण के इस प्रकार से बहुत से लक्ष्य उपपादित हो जायेंगे, इस अभिप्राय से कहते हैं—और इस प्रकार—। होमाग्नि के धुयें से उत्पन्न बाष्पजल, अथवा बन्धुजनों के और गृह के त्याग के दुःख से उत्पन्न। भय अर्थात् कुमारीजन के उचित साध्वस। इस प्रकार इतने से 'अङ्गभाव को प्राप्त (विरोधियों) का कथन छलरहित (अर्थात् निर्दोष) है इस कारिका भाग के उपयोगी निरूपण किया, इसलिए उपसंहार करते हैं—इस प्रकार—। 'तब तक' ('तावत्') ग्रहण से यह सूचित करते हैं कि और भी वक्तव्य है ॥ २० ॥