ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः धाति प्रत्युत प्रीत्यतिशयनिमित्ततां प्रतिपद्यत इत्यतस्तस्य कुण्ठशक्ति- कत्वात्तद्विरोधविधायिनो न कश्चिद्दोषः । तस्माद्वाक्यार्थीभूतस्य रसस्य भावस्य वा विरोधी रसविरोधीति वक्तुं न्याय्यः, न त्वङ्ग- भूतस्य कस्यचित् । नहीं करता, बल्कि अतिशय प्रीति का निमित्त बन जाता है, इस कारण उस ( वीर रस के आस्वादातिशय का ) विरोध करने वाला उस ( करुण ) के कुण्ठशक्तिक हो जाने के कारण कोई दोष नहीं । इसलिए वाक्यार्थीभूत ( अर्थात् प्रधानभूत ) रस अथवा भाव के विरोधी को 'रस का विरोधी' कहना ठीक है, किन्तु अङ्गभूत किसी ( रस अथवा भाव के विरोधी ) को 'रस का विरोधी' कहना ठीक नहीं ।
लोचनम् चित्तद्रुतिरुत्पद्यते करुणास्वादविश्रान्त्यभावात् , किन्तु वीरस्य योऽसौ क्रोधो व्यभिचारितां प्रतिपद्यते तत्फलरूपोऽसौ करुणरसः स्वकारणाभिव्यञ्जनद्वारेण वीरास्वादातिशय एव पर्यवस्यति । यथोक्तम्—'रौद्रस्य चैव यत्कर्म स ज्ञेयः करुणो रसः' इति । तदाह—प्रीत्यतिशयेति । अत्रोदाहरणम्— कुरबक कुचाघातक्रीडासुखेन वियुज्यसे बकुलविटपिन् स्मर्त्तव्यं ते मुखासवसेचनम् । चरणघटनाशून्यो यास्यस्यशोक सशोकता- मिति निजपुरत्यागे यस्य द्विषां जगदुः स्त्रियः ॥ भावस्य वेति । तस्मिन् रसे स्थायिनः प्रधानभूतस्य व्यभिचारिणो वा यथा विप्रलम्भशृङ्गार औत्सुक्यस्य ।
चित्तद्रुति उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि करुण के आस्वाद की विश्रान्ति नहीं । किन्तु वीर का जो वह क्रोध व्यभिचारी बन रहा है उसका फलरूप वह करुणरस अपने कारणों के अभिव्यञ्जन के द्वारा वीर के अतिशय आस्वाद में ही पर्यवसित होता है । जैसे, कहा है—रौद्र का जो ही कर्म है उसे करुण रस समझना चाहिए । उसे कहते हैं—अतिशय- प्रीति—। यहाँ उदाहरण है— हे कुरूबक, तुम कुचाघात की क्रीड़ाओं के सुख से वियुक्त हो रहे हो, हे बकुलवृक्ष, मुखासव द्वारा सेवन याद रखना, हे अशोक, चरणाघात से रहित होकर तुम सशोक हो जाओगे, इस प्रकार जिसके शत्रुओं की पत्नियाँ अपने नगर के त्याग के अवसर पर कहने लगीं । अथवा भाव का—। उस रस में स्थायी अर्थात् प्रधानभूत का अथवा व्यभिचारी का, जैसे विप्रलम्भ शृङ्गार में औत्सुक्य का ।