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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 471

तृतीय उद्योतः ४११ ध्वन्यालोकः प्रयोक्तव्य इति चेत्, अनूद्यमानैवंविधवाच्यविषये या वार्त्ता सात्रापि भविष्यति। एवं विध्यनुवादनयाश्रयेणात्र श्लोके परिहृतस्तावद्विरोधः। किं च नायकस्याभिनन्दनीयोदयस्य कस्यचित्प्रभावातिशय- वर्णने तत्प्रतिपक्षाणां यः करुणो रसः स परीक्षकाणां न वैक्लव्यमाद- जा सकता है तो ( उत्तर है कि ) अनूद्यमान इस प्रकार के वाच्य के सम्बन्ध में जो बात है वह यहां भी होगी। इस प्रकार विधि और अनुवाद की नीति का आश्रय लेकर इस श्लोक में विरोध का परिहार किया गया। और भी, अभिनन्दनीय उदय वाले किसी नायक के प्रभावातिशय के वर्णन में उसके प्रतिपक्षों ( विरोधियों ) का जो करुण रस है वह परीक्षक लोगों को व्याकुल लोचनम् दृष्ट्युपपादनक्रमेण प्राकरणिकस्तावदर्थः प्रदर्शयितव्यः। यद्यप्यत्र करुणोऽपि पराङ्गमेव तथापि विप्रलम्भापेक्षया तस्य तावन्निकटं प्राकरणिकत्वं महेश्वर- प्रभावं प्रति सोपयोगत्वात्। विप्रलम्भस्य तु कामीवेत्युत्प्रेक्षोपमाबलेनायातस्य दूरत्वात्। एवं च सास्त्रनेत्रोत्पलाभिरित्यन्तं प्राधान्येन करुणोपयोगाभिनय- क्रमेण लेशतस्तु विप्रलम्भस्य करुणेन सादृश्यात्सूचनां कृत्वा। कामीवेत्यत्र यद्यपि प्रणयकोपोचितोऽभिनयः कृतस्तथापि ततः प्रतीयमानोऽप्यसौ विप्रलम्भः समनन्तराभानीयमाने स दहतु दुरितमित्यादौ साटोपाभिनयसमर्पितो यो भगवत्प्रभावस्तत्राङ्गतायां पर्यवस्यतीति न कश्चिद्विरोधः। एतं विरोध- परिहारमुपसंहरति—एवमिति। विषयान्तरे तु प्रकारान्तरेण विरोधपरिहारमाह—किञ्चेति। परीक्षकाणा- मिति सामाजिकानां विवेकशालिनाम्। न वैक्लव्यमिति। न तादृशे विषये आदि दृष्टियों को उपपन्न करने के क्रम से प्राकरणिक अर्थ का प्रदर्शन ( अभिनय ) करना चाहिए। यद्यपि यहाँ करुण भी पराङ्ग ही है तथापि विप्रलम्भ की अपेक्षा उसका प्राकरणिकत्व निकट है, क्योंकि वह महेश्वर ( शिव जी ) के प्रभाव के प्रति उपयोगी है। किन्तु 'कामी की भाँति' इस उत्प्रेक्षा या उपमा के बल से प्राप्त विप्रलम्भ दूर पड़ जाता है। और इस प्रकार 'आँसू-भरे नेत्र कमलों वाली' इस अत्यन्त प्राधान्यत करुण के उपयोग के अभिनय के क्रम से लेशतः विप्रलम्भ की करुण के सादृश्य से सूचना करके ( अभिनय है)। 'कामी की भाँति' यहाँ पर यद्यपि प्रणयकोप के उचित अभिनय किया गया है तथापि उससे प्रतीयमान भी वह विप्रलम्भ तुरंत बाद में अभिनेयमान 'वह दुरित को दहन करें' इत्यादि में सारोप अभिनय से समर्पित जो भगवान् का प्रभाव है उसकी अङ्गता में पर्यवसन्न हो जाता है, इस प्रकार कोई विरोध नहीं। इस विरोध के परिहार का उपसंहार करते हैं—इस प्रकार—। किन्तु विषयान्तर में प्रकारान्तर से विरोध का परिहार करते हैं—और भी—। परीक्षक अर्थात् विवेकशाली सामाजिक। व्याकुल नहीं—। उस प्रकार के विषय में