ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१० | सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः त्पत्तिः। विरुद्धफलोत्पादनहेतुत्वं हि युगपदेकस्य कारणस्य विरुद्धं न तु विरुद्धोभयसहकारित्वम्। एवंविधविरुद्धपदार्थविषयः कथमभिनयः कार्यविशेष की उत्पत्ति देखी जाती है। एक साथ एक कारण का विरुद्ध फल के उत्पादन का हेतुत्व विरुद्ध है, न कि दो विरोधियों का सहकारी होना (विरुद्ध है।) यदि कहो कि इस प्रकार के विरुद्ध पदार्थों के विषय का अभिनय कैसे प्रयोग किया
लोचनम् रसवस्तु रससजातीयं तत्सहकारि यस्य विधीयमानस्य शाम्भवशरवह्निजनित- दुरितदाहलक्षणस्य तस्माद्भावविशेषे प्रेयोऽलङ्कारविषये भगवत्प्रभावातिशय लक्षणे प्रतीतिरिति सङ्गतिः। विरुद्धं यदुभयं वारितेजोगतं शीतोष्णं तत्सहकारि यस्य तण्डुलादेः कारणस्य तस्मात्कार्यविशेषस्य कोमलभक्तकरणलक्षणस्योत्पत्ति- र्दृश्यते। सर्वत्र हीत्थमेव कार्यकारणभावो बीजाङ्कुरादौ नान्यथा। ननु विरोधस्तर्हि सर्वत्राकिञ्चित्करः स्यादित्याशङ्कयाह—विरुद्धफलेति । तथा चाहुः—'नोपादानं विरुद्धस्य' इति। नन्वभिनेयार्थे काव्ये यदीदृशं वाक्यं भवेत्तदा यदि समस्ताभिनयः क्रियते तदा विरुद्धार्थविषयः कथं युगपदभिनयः कर्तुं शक्य इत्याशयेनाशङ्कमान आह—एवमिति। एतत्परिहरति—अनूद्यमानेति। अनूद्यमानमेवंविधं विरुद्धाकारं वाच्यं यत्र तादृशो यो विषयः 'एहि गच्छ पतो- त्तिष्ठ' इत्यादिस्तत्र या वार्ता सात्रापीति। •एतदुक्तं भवति—'क्षिप्तो हस्तावलग्न' इत्यादौ प्राधान्येन भीतविप्लुतादि-
म्भात्मक रसवस्तु अर्थात् रसजातीय वस्तु वह सहकारी है जिनका ऐसे शिवजी के बाण- वह्नि से उत्पन्न दुरितों का दाह रूप विधीयमान (अंश) से भावविशेष अर्थात् भगवत्प्रभावातिशय रूप प्रेयोऽलङ्कार के विषय में प्रतीति है यह सङ्गति है। विरुद्ध जो उभय जल और तेजगत शीत-उष्ण वह सहकारी है जिस तण्डुल आदि कारण का उससे कोमल भक्त का निर्माण रूप कार्यविशेष की उत्पत्ति देखी जाती है। सब जगह इस प्रकार का ही कार्यकारण भाव है, बीज-अङ्कुर आदि में अन्यथा नहीं है। तब तो विरोध सभी जगह कुछ नहीं कर सकेगा ! यह आशङ्का करके कहते हैं— विरुद्ध फल—। जैसा कि कहा है—'विरुद्ध के उपादान ( ? उत्पादन ) नहीं'। अभिने- यार्थ काव्य में यदि इस तरह का वाक्य हो तब यदि समस्त अभिनय किया जाय तब विरुद्ध अर्थों के सम्बन्ध का अभिनय कैसे किया जा सकता है ? इस आशय से आशङ्का करते हुए कहते हैं—इस प्रकार—। इसका परिहार करते हैं—अनूद्यमान—। अनूद्य- मान इस प्रकार का अर्थात् विरुद्ध आकार का वाच्य जहाँ है उस प्रकार का जो विषय 'आओ, जाओ, बैठो, उठो' इत्यादि है वहाँ जो बात होगी वह यहाँ भी। बात यह कही गई—'क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादि में प्राधान्यतः भीत, विप्लुत