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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 469, कुल 680 में से

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पृष्ठ 469

तृतीय उद्योतः ४०९

ध्वन्यालोकः

वाक्यार्थत्वेनाभ्युपगमात् । वाक्यार्थस्य वाच्यस्य च यौ विध्यनुवादौ तौ तदाक्षिप्तानां रसानां केन वार्येते । यैर्वा साक्षात्काव्यार्थता रसादीनां नाभ्युपगम्यते, तैस्तेषां तन्निमित्तता तावदवश्यमभ्युपगन्तव्या । तथाप्यत्र श्लोके न विरोधः । यस्मादनूद्यमानाङ्गनिमित्तोभयरसवस्तु- सहकारिणो विधीयमानांशाद्भावविशेषप्रतीतिरुत्पद्यते ततश्च न कश्चिद्विरोधः । दृश्यते हि विरुद्धोभयसहकारिणः कारणात्कार्यविशेषो- उनको वाक्यार्थ रूप में माना जाता है। वाक्यार्थ और वाच्य के जो विधि-अनुवाद हैं उन्हें उसके ( वाच्यार्थ ) द्वारा आक्षिप्त रसों में कौन वारण कर सकता है ? अथवा जो रसादि को साक्षात् काव्य का अर्थ नहीं मानते हैं उन्हें उन ( रसादि ) की तन्निमित्तता ( अर्थात् काव्य के अर्थ से व्यङ्ग्यता ) अवश्य माननी चाहिए । तथापि इस श्लोक में विरोध नहीं है। क्योंकि अनूद्यमान अङ्ग के निमित्त जो उभय रसवस्तु वह सहकारी है जिसका ऐसे विधीयमान अंश से भावविशेष की प्रतीति उत्पन्न होती है, इस कारण कोई विरोध नहीं है। दो विरुद्ध हैं सहकारी जिसके ऐसे कारण से

लोचनम्

प्रधानत्वमात्रकृतौ विध्यनुवादौ, तौ च व्यङ्ग्यतायामपि भवत एवेति भावः । मुख्यतया च रस एव काव्यवाक्यार्थ इत्युक्तम् । तेनामुख्यतया यत्र सोऽर्थस्त- त्रानूद्यमानत्वं रसस्यापि युक्तम् । यदि वानूद्यमानविभावादिसमाक्षिप्तत्वाद्वरस- स्यानूद्यमानता तदाह—वाक्यार्थस्येति । यदि वा मा भूदनूद्यमानतया विरुद्धयो रसयोः समावेशः, सहकारितया तु भविष्यतीति सर्वथाविरुद्धयोर्युक्तियुक्तोऽङ्गा- ङ्गिभावो नात्र प्रयासः कश्चिदिति दर्शयति—यैर्वेति । तन्निमित्तेति । काव्यार्थो विभावादिनिमित्तं येषां रसादीनां ते तथा तेषां भावस्तत्ता । अनूद्यमाना ये हस्तक्षेपादयो रसाङ्गभूता विभावादयस्तन्निमित्तं यदुभयं करुणविप्रलम्भात्मकं करते हैं—नहीं—। भाव यह कि विधि और अनुवाद प्रधान-अप्रधानमात्रकृत हैं और वे व्यङ्ग्यता में भी होते ही हैं । यह कहा जा चुका है कि मुख्य रूप से रस ही काव्य- वाक्य का अर्थ है । इसलिए जहाँ वह अर्थ अमुख्य रूप से है वहाँ रस का भी अनूद्यमा- नत्व ठीक है। अथवा अनूद्यमान विभाव आदि द्वारा समाक्षिप्त होने के कारण रस की अनूद्यमानता है, उसे कहते हैं—वाक्यार्थ—। अथवा यदि अनूद्यमान रूप से विरुद्ध रसों का समावेश मत हो, किन्तु सहकारी रूप से होगा ! इस प्रकार सर्वथा दो विरुद्धों का अङ्गाङ्गिभाव युक्तियुक्त है, यहाँ कोई प्रयास नहीं, यह दिखाते हैं—अथवा जो—। तन्निमित्तता—। काव्यार्थ विभावादि निमित्त जिन रसादि का है उनका भाव । अनूद्यमान जो रसाङ्गभूत हस्तक्षेप आदि विभाव आदि तन्निमित्त जो उभय करुणविप्रल-