ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४१३ ध्वन्यालोकः अथवा वाक्यार्थीभूतस्यापि कस्यचित्करुणरसविषयस्य तादृशेन शृङ्गारवस्तुना भङ्गिविशेषाश्रयेण संयोजनं रसपरिपोषायैव जायते । यतः प्रकृतिमधुराः पदार्थाः शोचनीयतां प्राप्ताः प्रागवस्थाभाविभिः संस्मर्यमाणैर्विलासैरधिकतरं शोकावेशमुपजनयन्ति । यथा— अयं स रशनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः । नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीवीविस्रंसनः करः ॥ अथवा वाक्यार्थीभूत भी किसी करुण रस के विषय का उस प्रकार के शृङ्गार वस्तु के साथ भङ्गिविशेष का आधार लेकर संयोजन रस के परिपोष के लिए ही होता है । क्योंकि प्रकृतिमधुर पदार्थ शोचनीयता प्राप्त होकर पूर्व अवस्था में होने वाले, स्मरण किए जाते हुए विलासों के कारण अधिकतर शोकावेश उत्पन्न करते हैं । जैसे— रशना को ऊपर खींचने वाला, पीन स्तनों का विमर्दन करने वाला, नाभि, ऊरु, जघन का स्पर्श करने वाला, नीवी को ढीली करने वाला वह यह हाथ है । लोचनम् अधुना पूर्वस्मिन्नेव श्लोके क्षिप्त इत्यादौ प्रकारान्तरेण विरोधं परिहरति— अथवेति । अयं चात्र भावः—पूर्वं विप्रलम्भकरुणयोरन्यत्राङ्गभावगमनान्निर्वि- रोधत्वमुक्तम् । अधुना तु स विप्रलम्भः करुणस्यैवाङ्गतां प्रतिपन्नः कथं विरो- धीति व्यवस्थाप्यते—तथा हि करुणो रसो नामेष्टजनविनिपातादेर्विभावादि- त्युक्तम् । इष्टता च नाम रमणीयतामूला । ततश्च कामीवार्ड्रापराध इत्युत्प्रेक्षयेद- मुक्तम् । शांभवशरवह्निचेष्टितावलोकने प्राक्तनप्रणयकलहवृत्तान्तः स्मर्यमाण इदानीं विध्वस्ततया शोकविभावतां प्रतिपद्यते । तदाह—भङ्गिविशेषेति । अग्रा- म्यतया विभावानुभावादिरूपताप्रापणया ग्राम्योक्तिरहितेत्यर्थः । अत्रैव दृष्टान्तमाह—यथा अयमिति । अत्र भूरिश्रवसः समरभुवि निपतितं बाहुं दृष्ट्वा अब 'क्षिप्तः' इत्यादि पूर्व श्लोक में ही प्रकारान्तर से विरोध का परिहार करते हैं—अथवा—। यहाँ यह भाव है—पहले विप्रलम्भ और करुण का अन्यत्र (शिवजी के अतिशय प्रभाव में) अङ्गत्त्व प्राप्त होने से विरोध का अभाव कहा गया । अब वह विप्रलम्भ करुण का ही अङ्गत्त्व प्राप्त करके कैसे विरोधी होगा ? यह व्यवस्थापन करते हैं—जैसा कि करुण रस इष्ट जन के विनिपात आदि विभाव आदि से होता है यह कह चुके हैं । रमणीयता इष्टता के मूल में होती है । और उस कारण 'आर्द्रापराध कामी की भाँति' यह उत्प्रेक्षा से कहा है । शिव जी के शराग्नि के कार्य के अवलोकन से स्मर्यमाण प्राक्तन प्रणयकलह का वृत्तान्त अब विध्वस्त होने के कारण शोक का विभाव बन गया है । उसे कहते हैं—भङ्गिविशेष—। अर्थात् विभाव, अनुभाव आदि रूपता को प्राप्त कराने वाली ग्राम्योक्तिरहित अग्राम्यता से । यहीं दृष्टान्त कहते हैं—जैसे—। भूरिश्रवा के युद्धक्षेत्र में गिरे बाहु को देख कर उसकी पत्नियों का यह अनुशोचन है ।