ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१४ | सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
इत्यादौ। तदत्र त्रिपुरयुवतीनां शाम्भवः शराग्निरार्द्रापराधः कामी यथा व्यवहरति स्म तथा व्यवहृतवानित्यनेनापि प्रकारेणास्त्येव निर्विरोधत्वम्। तस्माद्यथा यथा निरूप्यते तथा तथात्र दोषाभावः। इत्थं च— क्रामन्त्यः क्षतकोमलाङ्गुलिगलद्रक्तैः सदर्भाः स्थलीः पादैः पातितयावकैरिव पतद्बाष्पाम्बुधौताननाः। भीता भर्तृकराव लम्बितकरास्त्वद्वैरिनाथोऽधुना दावाग्निं परितो भ्रमन्ति पुनरप्युद्यद्विवाहा इव ॥
इत्यादि में। इसलिए यहां शिवजी के शराग्नि ने आर्द्रपराध काम जिस प्रकार व्यवहार करता है उस प्रकार व्यवहार किया, इस प्रकार से भी निर्विरोधत्व है ही। इसलिए जैसे-जैसे निरूपण होगा वैसे-वैसे यहां दोष का अभाव होगा। और इस प्रकार— कोमल उंगलियों के क्षत हो जाने से रक्त टपकाते, मानों यावक (आलता) रस को गिराते, पैरों से कुशों वाली स्थलियों को पार करती, गिरते हुए बाष्पजल से धुले मुखों वाली, डरी हुई, पति के हाथ में हाथ पकड़ाए, तुम्हारे शत्रु की स्त्रियां इस समय वनाग्नि के चारों ओर भ्रमण करती हैं, मानों उनका विवाह पुनः होने लगा हो।
लोचनम्
तत्कान्तानामेतदनुशोचनम्। रशनां मेखलां सम्भोगावसरेषूर्ध्वं कर्षतीति रशनोत्कर्षी। अमुना विरोधोद्धरणप्रकारेण बहुतरं लक्ष्यमुपपादितं भवतीत्यभि- प्रायेणाह—इत्थं चेति। होमाग्निधूमकृतं बाष्पाम्बु यदि वा बन्धुगृहत्याग- दुःखोद्भवम्। भयं कुमारीजनोचितः साध्वसः। एवमियताङ्गभावं प्राप्तानामुक्ति- रच्छलेति कारिकाभागोपयोगि निरूपितमित्युपसंहरति—एवमिति। तावद्ग्रह- णेन वक्तव्यान्तरमप्यस्तीति सूचयति ॥ २० ॥ रशना अर्थात् मेखला को सम्भोग के अवसरों में ऊर्ध्व कर्षण करता है अतः रशनोत्कर्षी है। विरोध के उद्धरण के इस प्रकार से बहुत से लक्ष्य उपपादित हो जायेंगे, इस अभिप्राय से कहते हैं—और इस प्रकार—। होमाग्नि के धुयें से उत्पन्न बाष्पजल, अथवा बन्धुजनों के और गृह के त्याग के दुःख से उत्पन्न। भय अर्थात् कुमारीजन के उचित साध्वस। इस प्रकार इतने से 'अङ्गभाव को प्राप्त (विरोधियों) का कथन छलरहित (अर्थात् निर्दोष) है इस कारिका भाग के उपयोगी निरूपण किया, इसलिए उपसंहार करते हैं—इस प्रकार—। 'तब तक' ('तावत्') ग्रहण से यह सूचित करते हैं कि और भी वक्तव्य है ॥ २० ॥