भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 680 में से

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पृष्ठ 475

तृतीय उद्योतः ४१५ ध्वन्यालोकः इत्येवमादीनां सर्वेषामेव निर्विरोधत्वमवगन्तव्यम् । एवं तावद्रसादीनां विरोधिर्सादिभिः समावेशासमावेशयोर्विषय- विभागो दर्शितः ॥ २० ॥ इदानीं तेषामेकप्रबन्धविनिवेशने न्याय्यो यः क्रमस्तं प्रतिपादयितु- मुच्यते— प्रसिद्धेऽपि प्रबन्धानां नानारसनिबन्धने । एको रसोऽङ्गीकर्तव्यस्तेषामुत्कर्षमिच्छता ॥ २१ ॥ प्रबन्धेषु महाकाव्यादिषु नाटकादिषु वा विप्रकीर्णतयाङ्गाङ्गिभावेन बहवो रसा उपनिबध्यन्त इत्यत्र प्रसिद्धौ सत्यामपि यः प्रबन्धानां इत्यादि प्रकार के सभी का निर्विरोधत्व समझना चाहिए। इस प्रकार तब तक रसादि का विरोधी रसादि के साथ समावेश और असमावेश में विषय-विभाग दिखाया गया ॥ २० ॥ अब उन्हें एक प्रबन्ध में रखने में जो उचित क्रम है उसे प्रतिपादन के लिए कहते हैं— प्रबन्धों में नाना रसों के निबन्धन के प्रसिद्ध होने पर भी उनका उत्कर्ष चाहने वाला (कवि) एक रस को अङ्गीकार करे ॥ २१ ॥ महाकाव्य आदि अथवा नाटक आदि प्रबन्धों में विप्रकीर्ण रूप में अङ्गाङ्गिभाव से बहुत रस उपनिबद्ध होते हैं, इसकी प्रसिद्धि होने पर भी जो (कवि) प्रबन्धों में लोचनम् तदेवावतारयति—इदानीमित्यादिना । तेषां रसानां क्रम इति योजना । प्रसिद्धेऽपीति । भरतमुनिप्रभृतिभिर्निरूपितेऽपीत्यर्थः । तेषामिति प्रबन्धानाम् । महाकाव्यादिष्वित्यादिशब्दः प्रकारे । अनभिनेयान्भेदानाह, द्वितीयस्त्वभि- नेयान् । विप्रकीर्णतयेति । नायकप्रतिनायकपताकाप्रकरीनायकादिनिष्ठतयेत्यर्थः । उसे ही उतारते हैं—'अब' इत्यादि द्वारा । 'उन रसों का क्रम' यह (वाक्य की) योजना है । प्रसिद्ध होने पर भी—। अर्थात् भरत मुनि प्रभृति द्वारा निरूपित होने पर भी । उनका अर्थात् प्रबन्धों का । 'महाकाव्य आदि' में 'आदि' पद 'प्रकार' अर्थ में है । (वह प्रकारार्थक 'आदि' शब्द) अनभिनेय भेदों को कहता है, परन्तु दूसरा ('आदि' शब्द) अभिनेय (भेदों को कहता है) । विप्रकीर्ण रूप में—। अर्थात् नायकनिष्ठ, प्रतिनायकनिष्ठ, पताकानायकनिष्ठ, प्रकरीनायकनिष्ठ आदि रूप में । अङ्गाङ्गिभाव से