भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 454, कुल 680 में से

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पृष्ठ 454

३९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अन्य एवासौ सहृदयसंवेद्य इति चेत्, किमिदं सहृदयत्वं नाम ? किं रसभावानपेक्षकाव्याश्रितसमयविशेषाभिज्ञत्वम्, उत रसभावादिमयकाव्यस्वरूपपरिज्ञाननैपुण्यम् । पूर्वस्मिन् पक्षे तथा- विधसहृदयव्यवस्थापितानां शब्दविशेषाणां चारुत्वनियमो न स्यात् । पुनः समयान्तरेणान्यथापि व्यवस्थापनसम्भवात् । द्वितीयस्मिंस्तु पक्षे रसज्ञतैव सहृदयत्वमिति । तथाविधैः सहृदयैः संवेद्यो रसादिसमर्पण- सामर्थ्यमेव नैसर्गिकं शब्दानां विशेष इति व्यञ्जकत्वाश्रयमेव तेषां मुख्यं चारुत्वम् । वाचकत्वाश्रयाणान्तु प्रसाद एवार्थापेक्षायां तेषां विशेषः । अर्थानपेक्षायां त्वनुप्रासादिरेव ॥ १५-१६ ॥ अन्य ही वह कोई सहृदयसंवेद्य है यदि यह कहो (तो प्रश्न है कि) यह सहृदयत्व क्या है ? क्या रस, भाव की अपेक्षा न करके काव्य के आश्रित समय (संकेत) विशेष की जानकारी रखना (सहृदयत्व) है, अथवा रस, भाव आदि से युक्त काव्य के स्वरूप के परिज्ञान का नैपुण्य (सहृदयत्व) है ? पहले पक्ष में उस प्रकार के सहृदय द्वारा व्यवस्थापित शब्दविशेषों के चारुत्व का नियम नहीं होगा, क्योंकि पुनः दूसरे समय (संकेत) के अनुसार अन्यथा भी व्यवस्थापन सम्भव होगा । किन्तु दूसरे पक्ष में रसज्ञता ही सहृदयत्व है । उस प्रकार के सहृदयों द्वारा संवेद्य शब्दों का विशेष रसादि के समर्पण की नैसर्गिक सामर्थ्य ही है, इस प्रकार व्यञ्जकत्व के आश्रित रहने वाला ही उनका मुख्य चारुत्व है । परन्तु वाचकत्व के आश्रित (उन शब्दों का) विशेष अर्थ की अपेक्षा होने पर प्रसाद ही है । अर्थ की अपेक्षा न होने पर अनुप्रास आदि ही । लोचनम् व्यमित्याह—कोऽन्यथेति । असंवेद्यस्तावदसौ न युक्त इत्याशयेनाह— सहृदयेति । पुनरिति । अनियन्त्रितपुरुषेच्छाऽऽयत्तो हि समयः कथं नियतः स्यात् । मुख्यं चारुत्वमिति । विशेष इति पूर्वेण सम्बन्धः । अर्थापेक्षायामिति । वाच्यापेक्षायामित्यर्थः । अनुप्रासादिरेवेति । शब्दान्तरेण सह या रचना करते हैं । और इसे अवश्य स्वीकार करना चाहिए, यह कहते हैं—अन्यथा—। वह असंवेद्य होकर ठीक न होगा, इस आशय से कहते हैं—सहृदय—। पुनः—। क्योंकि पुरुष की अनियन्त्रित इच्छा के अधीन समय (सङ्केत) कैसे नियत होगा ? मुख्य- चारुत्त्व—। 'विशेष' यह पूर्व से सम्बन्ध है । अर्थ की अपेक्षा होने पर—। अर्थात् वाच्य की अपेक्षा होने पर । अनुप्रास आदि ही—। अर्थात् दूसरे शब्द के साथ जो रचना है उसकी अपेक्षावाला वह विशेष । आदि ग्रहण से शब्दगुण और शब्दालङ्कारों का