भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

तृतीय उद्योतः ४०५

ध्वन्यालोकः
तत्र लब्धप्रतिष्ठे तु विवक्षिते रसे विरोधिग्साङ्गानां वाध्यत्वेनोक्ता-
वदोषो यथा—
क्काकार्यं शशलक्ष्मणः क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा
दोषाणां प्रशमाय मे श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम् ।
किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा
चेतः स्वास्थ्यमुपैहि कः खलु युवा धन्योऽधरं पास्यति ॥
यथा वा पुण्डरीकस्य महाश्वेतां प्रति प्रवृत्तनिर्भरानुरागस्य द्वितीय-
मुनिकुमारोपदेशवर्णने । स्वाभाविक्यामङ्गभावप्राप्तावदोषो यथा—
उनमें से विवक्षित रस के लब्धप्रतिष्ठ होने पर बाध्यरूप से विरोधी रसाङ्गों के
कथन में दोष का अभाव, जैसे—
यह अकार्य ( अनुचित कार्य ) कहां और चन्द्रवंश कहां ? फिर वह नजर आ
जाती ! मैंने ( शास्त्रों का ) श्रवण दोषों ( काम आदि विकारों ) के शमन के लिए
किया है, अहो; क्रोध में भी ( उसका ) मुख सुन्दर. लगता था ! पापरहित विद्वान्
क्या कहेंगे ? वह स्वप्न में भी दुर्लभ हो गई । अरे चित्त स्वस्थ हो जा, कौन धन्य
युवक (उसका) अधरपान करेगा ?
अथवा जैसे महाश्वेता के प्रति पुण्डरीक के अधिक अनुरक्त हो जाने पर दूसरे
मुनिकुमार ( कपिञ्जल ) के उपदेश के वर्णन में । स्वाभाविक अङ्गभाव-प्राप्ति में दोष
का अभाव, जैसे—
लोचनम्
रेण बहुना । तस्माद् दीर्घकालतात्र पदबन्धलाभ एवेति मन्तव्यम् । एवं नैस-
र्गिकाङ्गतो व्याख्याता । समारोपितत्वे तद्विपरीतेत्यर्थलब्धत्वात्स्वकण्ठेन न
व्याख्याता ।
एवं प्रकारत्रयं व्याख्याय क्रमेणोदाहरति — तत्रेत्यादिना । क्काकार्यमिति ।
वितर्क औत्सुक्येन मतिः स्मृत्या शङ्का दैन्येन धृतिश्चिन्तया च बाध्यते । एत-
च्च द्वितीयोद्द्योतारम्भ एवोक्तमस्माभिः । द्वितीयेति । विपक्षीभूतवैराग्यविभा-
चर्चा व्यर्थ है। इसलिए यहाँ दीर्घकालता पदबन्ध के लाभ में ही (अर्थात् सहृदयों की
प्रतीतिविश्रान्ति के पदबन्ध में ही ) है यह मानना चाहिए। इस प्रकार नैसर्गिक अङ्गता
का व्याख्यान किया। समारोपित अवस्था में उसके ( नैसर्गिक ) के विपरीत, यह
अर्थ लब्ध हो जाने से स्वकण्ठतः व्याख्यान नहीं किया है।
इस प्रकार प्रकारत्रय का व्याख्यान करके क्रम से उदाहरण देते हैं — उनमें से
इत्यादि द्वारा । यह अकार्य कहाँ—। (यहाँ) वितर्क औत्सुक्य से, मति स्मृति से,
शङ्का दैन्य से और धृति चिन्ता से बाधित होती है। इसे द्वितीय उद्योत के आरम्भ में

४०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः भ्रमिमरतिमलसहृदयतां प्रलयं मूर्च्छां तमः शरीरसादम् । मरणं च जलदभुजगर्जं प्रसह्य कुरुते विषं वियोगिनीनाम् ॥ इत्यादौ। समारोपितायामप्यविरोधी यथा---'पाण्डुक्षामम्'इत्यादौ । यथा वा—'कोपात्कोमललोलबाहुलतिकापाशेन' इत्यादौ । इयं चाङ्गभावप्राप्तिरन्या यदाधिकारिकत्वात्प्रधान एकस्मिन्वाक्यार्थे रस- योर्भावयोर्वा परस्परविरोधिनोर्द्वयोरङ्गभावगमनं तस्यामपि न दोषः । मेघरूपी भुजंग से उत्पन्न विष वियोगिनियों के चक्कर, अरति, आलस्य, प्रलय (चेष्टानाश), मूर्च्छा, मोह, शरीर में दर्द और मरण हठात् उत्पन्न कर देता है। इत्यादि में । समारोपित (अङ्गभाव-प्राप्ति) में भी विरोध का अभाव, जैसे— 'पाण्डुक्षामं०' इत्यादि में । अथवा जैसे—'कोपात् कोमललोलबाहुलतिकापाशेन' इत्यादि में । और यह अन्य अङ्गभाव की प्राप्ति है कि आधिकारिक होने के कारण प्रधानभूत एक वाक्यार्थ में परस्पर विरोधी दो रसों अथवा भावों का अङ्गभाव प्राप्त होना, उसमें भी दोष नहीं। लोचनम् वाद्यवधारणेऽपि ह्यशक्यविच्छेदत्वेन दाढर्यमेवानुरागस्योक्तं भवतीति भावः । समारोपितायामिति । अङ्गभावप्राप्ताविति शेषः । पाण्डुक्षामं वक्त्रं हृदयं सरसं तवालसं च वपुः । आवेदयति नितान्तं क्षेत्रियरोगं सखि हृदन्तः ॥ अत्र करुणोचितो व्याधिःश्लेषभङ्ग्या स्थापितः। कोपादिति बद्ध्वेति हन्य- त इति च रौद्रानुभावानां रूपकबलादारोपितानां तदनिर्वाहादेवाङ्गत्वम् । तच्च पूर्वमेवोक्तं 'नातिनिर्वहणैषिता' इत्यत्रान्तरे। अन्येति। चतुर्थोऽयं प्रकार इत्यर्थः। ही हमने कह दिया है। दूसरे—। भाव यह कि विपक्षीभूत वैराग्य के विभाव आदि का अवधारण होने पर भी विच्छेद के अशक्य होने के कारण अनुराग का दाढर्द्य ही उक्त होता है । समारोपित—। 'अङ्गप्राप्ति में' यह शेष है। हे सखी,, तेरा पीला और झुलसा हुआ मुख, सरस हृदय, आलस्य भरा शरीर हृदय के भीतर नितान्त क्षेत्रिय रोग (अर्थात् इस शरीर से भी साध्य न होने वाले रोग) को सूचित करते हैं । यहाँ करुण के उचित व्याधि श्लेष की भङ्गी से स्थापित है । 'कोप से', 'बाँध कर', और 'पीटा जाता है' रूपक के बल से आरोपित इन रौद्र के अनुभावों का उसके (रूपक के) निर्वाह न होने से ही अङ्गत्व है। और उसे पहले ही कह चुके हैं 'अत्यन्त निर्वाह करने की इच्छा नहीं' इसके बीच । अन्य—। अर्थात् यह चौथा प्रकार है ।

तृतीय उद्योतः ४०७

ध्वन्यालोकः
यथोक्तं 'क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादौ । कथं तत्राविरोध इति चेत्,
द्वयोरपि तयोरन्यपरत्वेन व्यवस्थानात् । अन्यपरत्वेऽपि विरोधिनोः
कथं विरोधनिवृत्तिरिति चेत्, उच्यते—विधौ विरुद्धसमावेशस्य
दुष्टत्वं नानुवादे ।
जैसे कहा है—'क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादि में । वहां विरोध कैसे नहीं है यदि
कहें_ता ( समाधान है कि ) वे दोनों अन्यपर रूप से ( अर्थात् अङ्गरूप से )
व्यवस्थित होते हैं । यदि कहो कि अन्यपर होने पर भी दो विरोधियों के विरोध की
निवृत्ति कैसे होगी, तो कहते हैं—विधि में ( दो ) विरोधियों के समावेश का दोष है,
अनुवाद में नहीं ।
लोचनम्
पूर्वं हि विरोधिनः प्रस्तुततरसान्तरेऽङ्गतोक्ता, अधुना तु द्वयोर्विरोधिनोर्वस्त्वन्त-
रेऽङ्गभाव इति शेषः । क्षिप्त इति । व्याख्यातमेतत् 'प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे'
इत्यत्र । नन्वन्यपरत्वेऽपि स्वभावो न निवर्तते, स्वभावकृत एव च विरोध इत्य-
भिप्रायेणाह—अन्यपरत्वेऽपीति। विरोधिनोरिति। तत्स्वभावयोरिति हेतुत्वाभिप्रा-
येण विशेषणम् । उच्यत इति । अयं भावः-सामग्रीविशेषपतितत्वेन भावानां
विरोधाविरोधौ न स्वभावमात्रनिबन्धनौ शीतोष्णयोरपि विरोधाभावात् । विधा-
विति । तदेव कुरु मा कार्षीरिति यथा । विधिशब्देनात्रैकदा प्राधान्यमुच्यते ।
अत एवातिरात्रे षोडशिनं गृह्णन्ति न गृह्णन्तीति विरुद्धविधिर्विकल्पपर्यवसायी-
ति वाक्यविदः । अनुवाद इति । अन्याङ्गतायामित्यर्थः । क्रीडाङ्गत्वेन ह्यत्र
शेष यह कि विरोधी (रसाङ्ग) की प्रस्तुत रसान्तर में अङ्गता कही, अब दो विरोधी
( रसाङ्गों ) की ( प्रस्तुत ) वस्त्वन्तर में अङ्गभाव ( कहते हैं ) । 'क्षिप्तः'—। यह
'प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे' इस ( कारिका ) में व्याख्यात है । अन्यपर ( अर्थात् अङ्ग रूप )
होने पर भी स्वभाव निवृत्त नहीं होता, और विरोध स्वभावकृत ही होता है, इस
अभिप्राय से कहते हैं—अन्यपर होने पर भी—। दो विरोधियों का—। उस ( अर्थात्
विरोध ) के स्वभाव वाले' यह हेतुत्व के अभिप्राय से विशेषण है । कहते हैं—। भाव
यह है—सामग्री-विशेष में अनुप्रवेश के कारण भावों के विरोध-अविरोध होते हैं, न कि
स्वभावमात्र के कारण, क्योंकि ( सामग्रीविशेष के अनुप्रवेश के कारण ) शीत और
उष्ण में भी विरोध नहीं होता । विधि में—। जैसे 'वही करो, मत करो' । 'विधि'
शब्द से यहाँ एक समय प्राधान्य कहते कहा गया है । अतएव 'अतिरात्र में षोडशी
( पात्र ) को ग्रहण करते हैं, नहीं ग्रहण करते हैं' यह विरुद्ध विधि विकल्प में पर्यवसन्न
होती है यह मीमांसकों ( वाक्यविदों ) का कथन है । अनुवाद में—। अर्थात् अन्य की
अङ्गता में । यहाँ क्रीड़ा ( खिलवाड़ ) का अङ्ग रूप से अभिधान है, इस कारण 'राजा के

४०८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा— एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ वद मौनं समाचर । एवमाशायहग्रस्तैः क्रीडन्ति धनिनोऽर्थिभिः ॥ इत्यादौ । अत्र हि विधिप्रतिषेधयोरनूद्यमानत्वेन समावेशे न विरोधस्तथेहापि भविष्यति । श्लोके ह्यस्मिन्नीर्ष्याविप्रलम्भशृङ्गारकरुण- वस्तुनोर्न विधीयमानत्वम् । त्रिपुररिपुप्रभावातिशयस्य वाक्यार्थत्वा- त्तदङ्गत्वेन च तयोर्व्यवस्थानात् । न च रसेषु विध्यनुवादव्यवहारो नास्तीति शक्यं वक्तुम् , तेषां जैसे—आओ, जाओ, बैठो, उठो, बोलो, चुप हो जाओ, इस प्रकार धनी लोग आशा के ग्रह से ग्रस्त याचकों के साथ खिलवाड़ करते हैं। इत्यादि में । यहां विधि और प्रतिषेध के अनूद्यमान रूप में समावेश करने पर विरोध (दोष) नहीं है, उस प्रकार यहां ('क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादि में) भी होगा। इस श्लोक में ईर्ष्याविप्रलम्भ और करुण विधीयमान नहीं हैं, क्योंकि त्रिपुरारि (शिव जी) का प्रभावातिशय वाक्यार्थ है और उसके अङ्ग के रूप से वे दोनों व्यवस्थित हैं। नहीं कह सकते यह कि रसों में विधि-अनुवाद का व्यवहार नहीं है, क्योंकि लोचनम् विरुद्धानामर्थानामभिधानमिति राजनकटव्यवस्थिताततायिद्वयन्यायेन विरुद्धा- नामप्यन्यमुखप्रेक्षितापरतन्त्रीकृतानां श्रौतेन क्रमेण स्वात्मपरामर्शेऽप्यविश्राम्य- ताम्, का कथा परस्पररूपचिन्तायां येन विरोधः स्यात् । केवलं विरुद्धत्वा- दरुणाधिकरणस्थित्या यो वाक्यीय एषां पाश्चात्त्यः सम्बन्धः सम्भाव्यते स विघटताम् । ननु प्रधानतया यद्वाच्यं तत्र विधिः । अप्रधानत्वेन तु वाच्येऽनुवादः । न च रसस्य वाच्यत्वं त्वयैव सोढमित्याशङ्कमानः परिहरति—न चेति । प्रधाना- निकट खड़े दो आततायी हैं' इस न्याय के अनुसार अन्यमुखप्रेक्षिता से परतन्त्र (अर्थात् उपसर्जनीकृत) हुए, सुने क्रम के अनुसार अपने परामर्श में भी विश्रान्ति न प्राप्त करते हुए विरुद्धों के भी परस्पर रूप की चिन्ता की कोई बात ही नहीं, जिससे विरोध होगा। विरुद्ध होने के कारण 'अरुणाधिकरण' न्याय के अनुसार जो वाक्य- प्रतिपाद्य इनका सम्बन्ध सम्भावित होगा वह केवल विघटित होगा। प्रधान रूप से जो वाच्य है वहां विधि है, अप्रधान रूप से वाच्य में अनुवाद है, और रस का वाच्यत्व तुमने ही सहन नहीं किया है, यह आशङ्का करते हुए परिहार

तृतीय उद्योतः ४०९

ध्वन्यालोकः

वाक्यार्थत्वेनाभ्युपगमात् । वाक्यार्थस्य वाच्यस्य च यौ विध्यनुवादौ तौ तदाक्षिप्तानां रसानां केन वार्येते । यैर्वा साक्षात्काव्यार्थता रसादीनां नाभ्युपगम्यते, तैस्तेषां तन्निमित्तता तावदवश्यमभ्युपगन्तव्या । तथाप्यत्र श्लोके न विरोधः । यस्मादनूद्यमानाङ्गनिमित्तोभयरसवस्तु- सहकारिणो विधीयमानांशाद्भावविशेषप्रतीतिरुत्पद्यते ततश्च न कश्चिद्विरोधः । दृश्यते हि विरुद्धोभयसहकारिणः कारणात्कार्यविशेषो- उनको वाक्यार्थ रूप में माना जाता है। वाक्यार्थ और वाच्य के जो विधि-अनुवाद हैं उन्हें उसके ( वाच्यार्थ ) द्वारा आक्षिप्त रसों में कौन वारण कर सकता है ? अथवा जो रसादि को साक्षात् काव्य का अर्थ नहीं मानते हैं उन्हें उन ( रसादि ) की तन्निमित्तता ( अर्थात् काव्य के अर्थ से व्यङ्ग्यता ) अवश्य माननी चाहिए । तथापि इस श्लोक में विरोध नहीं है। क्योंकि अनूद्यमान अङ्ग के निमित्त जो उभय रसवस्तु वह सहकारी है जिसका ऐसे विधीयमान अंश से भावविशेष की प्रतीति उत्पन्न होती है, इस कारण कोई विरोध नहीं है। दो विरुद्ध हैं सहकारी जिसके ऐसे कारण से

लोचनम्

प्रधानत्वमात्रकृतौ विध्यनुवादौ, तौ च व्यङ्ग्यतायामपि भवत एवेति भावः । मुख्यतया च रस एव काव्यवाक्यार्थ इत्युक्तम् । तेनामुख्यतया यत्र सोऽर्थस्त- त्रानूद्यमानत्वं रसस्यापि युक्तम् । यदि वानूद्यमानविभावादिसमाक्षिप्तत्वाद्वरस- स्यानूद्यमानता तदाह—वाक्यार्थस्येति । यदि वा मा भूदनूद्यमानतया विरुद्धयो रसयोः समावेशः, सहकारितया तु भविष्यतीति सर्वथाविरुद्धयोर्युक्तियुक्तोऽङ्गा- ङ्गिभावो नात्र प्रयासः कश्चिदिति दर्शयति—यैर्वेति । तन्निमित्तेति । काव्यार्थो विभावादिनिमित्तं येषां रसादीनां ते तथा तेषां भावस्तत्ता । अनूद्यमाना ये हस्तक्षेपादयो रसाङ्गभूता विभावादयस्तन्निमित्तं यदुभयं करुणविप्रलम्भात्मकं करते हैं—नहीं—। भाव यह कि विधि और अनुवाद प्रधान-अप्रधानमात्रकृत हैं और वे व्यङ्ग्यता में भी होते ही हैं । यह कहा जा चुका है कि मुख्य रूप से रस ही काव्य- वाक्य का अर्थ है । इसलिए जहाँ वह अर्थ अमुख्य रूप से है वहाँ रस का भी अनूद्यमा- नत्व ठीक है। अथवा अनूद्यमान विभाव आदि द्वारा समाक्षिप्त होने के कारण रस की अनूद्यमानता है, उसे कहते हैं—वाक्यार्थ—। अथवा यदि अनूद्यमान रूप से विरुद्ध रसों का समावेश मत हो, किन्तु सहकारी रूप से होगा ! इस प्रकार सर्वथा दो विरुद्धों का अङ्गाङ्गिभाव युक्तियुक्त है, यहाँ कोई प्रयास नहीं, यह दिखाते हैं—अथवा जो—। तन्निमित्तता—। काव्यार्थ विभावादि निमित्त जिन रसादि का है उनका भाव । अनूद्यमान जो रसाङ्गभूत हस्तक्षेप आदि विभाव आदि तन्निमित्त जो उभय करुणविप्रल-

४१० | सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः त्पत्तिः। विरुद्धफलोत्पादनहेतुत्वं हि युगपदेकस्य कारणस्य विरुद्धं न तु विरुद्धोभयसहकारित्वम्। एवंविधविरुद्धपदार्थविषयः कथमभिनयः कार्यविशेष की उत्पत्ति देखी जाती है। एक साथ एक कारण का विरुद्ध फल के उत्पादन का हेतुत्व विरुद्ध है, न कि दो विरोधियों का सहकारी होना (विरुद्ध है।) यदि कहो कि इस प्रकार के विरुद्ध पदार्थों के विषय का अभिनय कैसे प्रयोग किया

लोचनम् रसवस्तु रससजातीयं तत्सहकारि यस्य विधीयमानस्य शाम्भवशरवह्निजनित- दुरितदाहलक्षणस्य तस्माद्भावविशेषे प्रेयोऽलङ्कारविषये भगवत्प्रभावातिशय लक्षणे प्रतीतिरिति सङ्गतिः। विरुद्धं यदुभयं वारितेजोगतं शीतोष्णं तत्सहकारि यस्य तण्डुलादेः कारणस्य तस्मात्कार्यविशेषस्य कोमलभक्तकरणलक्षणस्योत्पत्ति- र्दृश्यते। सर्वत्र हीत्थमेव कार्यकारणभावो बीजाङ्कुरादौ नान्यथा। ननु विरोधस्तर्हि सर्वत्राकिञ्चित्करः स्यादित्याशङ्कयाह—विरुद्धफलेति । तथा चाहुः—'नोपादानं विरुद्धस्य' इति। नन्वभिनेयार्थे काव्ये यदीदृशं वाक्यं भवेत्तदा यदि समस्ताभिनयः क्रियते तदा विरुद्धार्थविषयः कथं युगपदभिनयः कर्तुं शक्य इत्याशयेनाशङ्कमान आह—एवमिति। एतत्परिहरति—अनूद्यमानेति। अनूद्यमानमेवंविधं विरुद्धाकारं वाच्यं यत्र तादृशो यो विषयः 'एहि गच्छ पतो- त्तिष्ठ' इत्यादिस्तत्र या वार्ता सात्रापीति। •एतदुक्तं भवति—'क्षिप्तो हस्तावलग्न' इत्यादौ प्राधान्येन भीतविप्लुतादि-

म्भात्मक रसवस्तु अर्थात् रसजातीय वस्तु वह सहकारी है जिनका ऐसे शिवजी के बाण- वह्नि से उत्पन्न दुरितों का दाह रूप विधीयमान (अंश) से भावविशेष अर्थात् भगवत्प्रभावातिशय रूप प्रेयोऽलङ्कार के विषय में प्रतीति है यह सङ्गति है। विरुद्ध जो उभय जल और तेजगत शीत-उष्ण वह सहकारी है जिस तण्डुल आदि कारण का उससे कोमल भक्त का निर्माण रूप कार्यविशेष की उत्पत्ति देखी जाती है। सब जगह इस प्रकार का ही कार्यकारण भाव है, बीज-अङ्कुर आदि में अन्यथा नहीं है। तब तो विरोध सभी जगह कुछ नहीं कर सकेगा ! यह आशङ्का करके कहते हैं— विरुद्ध फल—। जैसा कि कहा है—'विरुद्ध के उपादान ( ? उत्पादन ) नहीं'। अभिने- यार्थ काव्य में यदि इस तरह का वाक्य हो तब यदि समस्त अभिनय किया जाय तब विरुद्ध अर्थों के सम्बन्ध का अभिनय कैसे किया जा सकता है ? इस आशय से आशङ्का करते हुए कहते हैं—इस प्रकार—। इसका परिहार करते हैं—अनूद्यमान—। अनूद्य- मान इस प्रकार का अर्थात् विरुद्ध आकार का वाच्य जहाँ है उस प्रकार का जो विषय 'आओ, जाओ, बैठो, उठो' इत्यादि है वहाँ जो बात होगी वह यहाँ भी। बात यह कही गई—'क्षिप्तो हस्तावलग्नः' इत्यादि में प्राधान्यतः भीत, विप्लुत

तृतीय उद्योतः ४११ ध्वन्यालोकः प्रयोक्तव्य इति चेत्, अनूद्यमानैवंविधवाच्यविषये या वार्त्ता सात्रापि भविष्यति। एवं विध्यनुवादनयाश्रयेणात्र श्लोके परिहृतस्तावद्विरोधः। किं च नायकस्याभिनन्दनीयोदयस्य कस्यचित्प्रभावातिशय- वर्णने तत्प्रतिपक्षाणां यः करुणो रसः स परीक्षकाणां न वैक्लव्यमाद- जा सकता है तो ( उत्तर है कि ) अनूद्यमान इस प्रकार के वाच्य के सम्बन्ध में जो बात है वह यहां भी होगी। इस प्रकार विधि और अनुवाद की नीति का आश्रय लेकर इस श्लोक में विरोध का परिहार किया गया। और भी, अभिनन्दनीय उदय वाले किसी नायक के प्रभावातिशय के वर्णन में उसके प्रतिपक्षों ( विरोधियों ) का जो करुण रस है वह परीक्षक लोगों को व्याकुल लोचनम् दृष्ट्युपपादनक्रमेण प्राकरणिकस्तावदर्थः प्रदर्शयितव्यः। यद्यप्यत्र करुणोऽपि पराङ्गमेव तथापि विप्रलम्भापेक्षया तस्य तावन्निकटं प्राकरणिकत्वं महेश्वर- प्रभावं प्रति सोपयोगत्वात्। विप्रलम्भस्य तु कामीवेत्युत्प्रेक्षोपमाबलेनायातस्य दूरत्वात्। एवं च सास्त्रनेत्रोत्पलाभिरित्यन्तं प्राधान्येन करुणोपयोगाभिनय- क्रमेण लेशतस्तु विप्रलम्भस्य करुणेन सादृश्यात्सूचनां कृत्वा। कामीवेत्यत्र यद्यपि प्रणयकोपोचितोऽभिनयः कृतस्तथापि ततः प्रतीयमानोऽप्यसौ विप्रलम्भः समनन्तराभानीयमाने स दहतु दुरितमित्यादौ साटोपाभिनयसमर्पितो यो भगवत्प्रभावस्तत्राङ्गतायां पर्यवस्यतीति न कश्चिद्विरोधः। एतं विरोध- परिहारमुपसंहरति—एवमिति। विषयान्तरे तु प्रकारान्तरेण विरोधपरिहारमाह—किञ्चेति। परीक्षकाणा- मिति सामाजिकानां विवेकशालिनाम्। न वैक्लव्यमिति। न तादृशे विषये आदि दृष्टियों को उपपन्न करने के क्रम से प्राकरणिक अर्थ का प्रदर्शन ( अभिनय ) करना चाहिए। यद्यपि यहाँ करुण भी पराङ्ग ही है तथापि विप्रलम्भ की अपेक्षा उसका प्राकरणिकत्व निकट है, क्योंकि वह महेश्वर ( शिव जी ) के प्रभाव के प्रति उपयोगी है। किन्तु 'कामी की भाँति' इस उत्प्रेक्षा या उपमा के बल से प्राप्त विप्रलम्भ दूर पड़ जाता है। और इस प्रकार 'आँसू-भरे नेत्र कमलों वाली' इस अत्यन्त प्राधान्यत करुण के उपयोग के अभिनय के क्रम से लेशतः विप्रलम्भ की करुण के सादृश्य से सूचना करके ( अभिनय है)। 'कामी की भाँति' यहाँ पर यद्यपि प्रणयकोप के उचित अभिनय किया गया है तथापि उससे प्रतीयमान भी वह विप्रलम्भ तुरंत बाद में अभिनेयमान 'वह दुरित को दहन करें' इत्यादि में सारोप अभिनय से समर्पित जो भगवान् का प्रभाव है उसकी अङ्गता में पर्यवसन्न हो जाता है, इस प्रकार कोई विरोध नहीं। इस विरोध के परिहार का उपसंहार करते हैं—इस प्रकार—। किन्तु विषयान्तर में प्रकारान्तर से विरोध का परिहार करते हैं—और भी—। परीक्षक अर्थात् विवेकशाली सामाजिक। व्याकुल नहीं—। उस प्रकार के विषय में

४१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः धाति प्रत्युत प्रीत्यतिशयनिमित्ततां प्रतिपद्यत इत्यतस्तस्य कुण्ठशक्ति- कत्वात्तद्विरोधविधायिनो न कश्चिद्दोषः । तस्माद्वाक्यार्थीभूतस्य रसस्य भावस्य वा विरोधी रसविरोधीति वक्तुं न्याय्यः, न त्वङ्ग- भूतस्य कस्यचित् । नहीं करता, बल्कि अतिशय प्रीति का निमित्त बन जाता है, इस कारण उस ( वीर रस के आस्वादातिशय का ) विरोध करने वाला उस ( करुण ) के कुण्ठशक्तिक हो जाने के कारण कोई दोष नहीं । इसलिए वाक्यार्थीभूत ( अर्थात् प्रधानभूत ) रस अथवा भाव के विरोधी को 'रस का विरोधी' कहना ठीक है, किन्तु अङ्गभूत किसी ( रस अथवा भाव के विरोधी ) को 'रस का विरोधी' कहना ठीक नहीं ।

लोचनम् चित्तद्रुतिरुत्पद्यते करुणास्वादविश्रान्त्यभावात् , किन्तु वीरस्य योऽसौ क्रोधो व्यभिचारितां प्रतिपद्यते तत्फलरूपोऽसौ करुणरसः स्वकारणाभिव्यञ्जनद्वारेण वीरास्वादातिशय एव पर्यवस्यति । यथोक्तम्—'रौद्रस्य चैव यत्कर्म स ज्ञेयः करुणो रसः' इति । तदाह—प्रीत्यतिशयेति । अत्रोदाहरणम्— कुरबक कुचाघातक्रीडासुखेन वियुज्यसे बकुलविटपिन् स्मर्त्तव्यं ते मुखासवसेचनम् । चरणघटनाशून्यो यास्यस्यशोक सशोकता- मिति निजपुरत्यागे यस्य द्विषां जगदुः स्त्रियः ॥ भावस्य वेति । तस्मिन् रसे स्थायिनः प्रधानभूतस्य व्यभिचारिणो वा यथा विप्रलम्भशृङ्गार औत्सुक्यस्य ।

चित्तद्रुति उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि करुण के आस्वाद की विश्रान्ति नहीं । किन्तु वीर का जो वह क्रोध व्यभिचारी बन रहा है उसका फलरूप वह करुणरस अपने कारणों के अभिव्यञ्जन के द्वारा वीर के अतिशय आस्वाद में ही पर्यवसित होता है । जैसे, कहा है—रौद्र का जो ही कर्म है उसे करुण रस समझना चाहिए । उसे कहते हैं—अतिशय- प्रीति—। यहाँ उदाहरण है— हे कुरूबक, तुम कुचाघात की क्रीड़ाओं के सुख से वियुक्त हो रहे हो, हे बकुलवृक्ष, मुखासव द्वारा सेवन याद रखना, हे अशोक, चरणाघात से रहित होकर तुम सशोक हो जाओगे, इस प्रकार जिसके शत्रुओं की पत्नियाँ अपने नगर के त्याग के अवसर पर कहने लगीं । अथवा भाव का—। उस रस में स्थायी अर्थात् प्रधानभूत का अथवा व्यभिचारी का, जैसे विप्रलम्भ शृङ्गार में औत्सुक्य का ।

तृतीय उद्योतः ४१३ ध्वन्यालोकः अथवा वाक्यार्थीभूतस्यापि कस्यचित्करुणरसविषयस्य तादृशेन शृङ्गारवस्तुना भङ्गिविशेषाश्रयेण संयोजनं रसपरिपोषायैव जायते । यतः प्रकृतिमधुराः पदार्थाः शोचनीयतां प्राप्ताः प्रागवस्थाभाविभिः संस्मर्यमाणैर्विलासैरधिकतरं शोकावेशमुपजनयन्ति । यथा— अयं स रशनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः । नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीवीविस्रंसनः करः ॥ अथवा वाक्यार्थीभूत भी किसी करुण रस के विषय का उस प्रकार के शृङ्गार वस्तु के साथ भङ्गिविशेष का आधार लेकर संयोजन रस के परिपोष के लिए ही होता है । क्योंकि प्रकृतिमधुर पदार्थ शोचनीयता प्राप्त होकर पूर्व अवस्था में होने वाले, स्मरण किए जाते हुए विलासों के कारण अधिकतर शोकावेश उत्पन्न करते हैं । जैसे— रशना को ऊपर खींचने वाला, पीन स्तनों का विमर्दन करने वाला, नाभि, ऊरु, जघन का स्पर्श करने वाला, नीवी को ढीली करने वाला वह यह हाथ है । लोचनम् अधुना पूर्वस्मिन्नेव श्लोके क्षिप्त इत्यादौ प्रकारान्तरेण विरोधं परिहरति— अथवेति । अयं चात्र भावः—पूर्वं विप्रलम्भकरुणयोरन्यत्राङ्गभावगमनान्निर्वि- रोधत्वमुक्तम् । अधुना तु स विप्रलम्भः करुणस्यैवाङ्गतां प्रतिपन्नः कथं विरो- धीति व्यवस्थाप्यते—तथा हि करुणो रसो नामेष्टजनविनिपातादेर्विभावादि- त्युक्तम् । इष्टता च नाम रमणीयतामूला । ततश्च कामीवार्ड्रापराध इत्युत्प्रेक्षयेद- मुक्तम् । शांभवशरवह्निचेष्टितावलोकने प्राक्तनप्रणयकलहवृत्तान्तः स्मर्यमाण इदानीं विध्वस्ततया शोकविभावतां प्रतिपद्यते । तदाह—भङ्गिविशेषेति । अग्रा- म्यतया विभावानुभावादिरूपताप्रापणया ग्राम्योक्तिरहितेत्यर्थः । अत्रैव दृष्टान्तमाह—यथा अयमिति । अत्र भूरिश्रवसः समरभुवि निपतितं बाहुं दृष्ट्वा अब 'क्षिप्तः' इत्यादि पूर्व श्लोक में ही प्रकारान्तर से विरोध का परिहार करते हैं—अथवा—। यहाँ यह भाव है—पहले विप्रलम्भ और करुण का अन्यत्र (शिवजी के अतिशय प्रभाव में) अङ्गत्त्व प्राप्त होने से विरोध का अभाव कहा गया । अब वह विप्रलम्भ करुण का ही अङ्गत्त्व प्राप्त करके कैसे विरोधी होगा ? यह व्यवस्थापन करते हैं—जैसा कि करुण रस इष्ट जन के विनिपात आदि विभाव आदि से होता है यह कह चुके हैं । रमणीयता इष्टता के मूल में होती है । और उस कारण 'आर्द्रापराध कामी की भाँति' यह उत्प्रेक्षा से कहा है । शिव जी के शराग्नि के कार्य के अवलोकन से स्मर्यमाण प्राक्तन प्रणयकलह का वृत्तान्त अब विध्वस्त होने के कारण शोक का विभाव बन गया है । उसे कहते हैं—भङ्गिविशेष—। अर्थात् विभाव, अनुभाव आदि रूपता को प्राप्त कराने वाली ग्राम्योक्तिरहित अग्राम्यता से । यहीं दृष्टान्त कहते हैं—जैसे—। भूरिश्रवा के युद्धक्षेत्र में गिरे बाहु को देख कर उसकी पत्नियों का यह अनुशोचन है ।

४१४ | सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः

इत्यादौ। तदत्र त्रिपुरयुवतीनां शाम्भवः शराग्निरार्द्रापराधः कामी यथा व्यवहरति स्म तथा व्यवहृतवानित्यनेनापि प्रकारेणास्त्येव निर्विरोधत्वम्। तस्माद्यथा यथा निरूप्यते तथा तथात्र दोषाभावः। इत्थं च— क्रामन्त्यः क्षतकोमलाङ्गुलिगलद्रक्तैः सदर्भाः स्थलीः पादैः पातितयावकैरिव पतद्बाष्पाम्बुधौताननाः। भीता भर्तृकराव लम्बितकरास्त्वद्वैरिनाथोऽधुना दावाग्निं परितो भ्रमन्ति पुनरप्युद्यद्विवाहा इव ॥

इत्यादि में। इसलिए यहां शिवजी के शराग्नि ने आर्द्रपराध काम जिस प्रकार व्यवहार करता है उस प्रकार व्यवहार किया, इस प्रकार से भी निर्विरोधत्व है ही। इसलिए जैसे-जैसे निरूपण होगा वैसे-वैसे यहां दोष का अभाव होगा। और इस प्रकार— कोमल उंगलियों के क्षत हो जाने से रक्त टपकाते, मानों यावक (आलता) रस को गिराते, पैरों से कुशों वाली स्थलियों को पार करती, गिरते हुए बाष्पजल से धुले मुखों वाली, डरी हुई, पति के हाथ में हाथ पकड़ाए, तुम्हारे शत्रु की स्त्रियां इस समय वनाग्नि के चारों ओर भ्रमण करती हैं, मानों उनका विवाह पुनः होने लगा हो।

लोचनम्

तत्कान्तानामेतदनुशोचनम्। रशनां मेखलां सम्भोगावसरेषूर्ध्वं कर्षतीति रशनोत्कर्षी। अमुना विरोधोद्धरणप्रकारेण बहुतरं लक्ष्यमुपपादितं भवतीत्यभि- प्रायेणाह—इत्थं चेति। होमाग्निधूमकृतं बाष्पाम्बु यदि वा बन्धुगृहत्याग- दुःखोद्भवम्। भयं कुमारीजनोचितः साध्वसः। एवमियताङ्गभावं प्राप्तानामुक्ति- रच्छलेति कारिकाभागोपयोगि निरूपितमित्युपसंहरति—एवमिति। तावद्ग्रह- णेन वक्तव्यान्तरमप्यस्तीति सूचयति ॥ २० ॥ रशना अर्थात् मेखला को सम्भोग के अवसरों में ऊर्ध्व कर्षण करता है अतः रशनोत्कर्षी है। विरोध के उद्धरण के इस प्रकार से बहुत से लक्ष्य उपपादित हो जायेंगे, इस अभिप्राय से कहते हैं—और इस प्रकार—। होमाग्नि के धुयें से उत्पन्न बाष्पजल, अथवा बन्धुजनों के और गृह के त्याग के दुःख से उत्पन्न। भय अर्थात् कुमारीजन के उचित साध्वस। इस प्रकार इतने से 'अङ्गभाव को प्राप्त (विरोधियों) का कथन छलरहित (अर्थात् निर्दोष) है इस कारिका भाग के उपयोगी निरूपण किया, इसलिए उपसंहार करते हैं—इस प्रकार—। 'तब तक' ('तावत्') ग्रहण से यह सूचित करते हैं कि और भी वक्तव्य है ॥ २० ॥

तृतीय उद्योतः ४१५ ध्वन्यालोकः इत्येवमादीनां सर्वेषामेव निर्विरोधत्वमवगन्तव्यम् । एवं तावद्रसादीनां विरोधिर्सादिभिः समावेशासमावेशयोर्विषय- विभागो दर्शितः ॥ २० ॥ इदानीं तेषामेकप्रबन्धविनिवेशने न्याय्यो यः क्रमस्तं प्रतिपादयितु- मुच्यते— प्रसिद्धेऽपि प्रबन्धानां नानारसनिबन्धने । एको रसोऽङ्गीकर्तव्यस्तेषामुत्कर्षमिच्छता ॥ २१ ॥ प्रबन्धेषु महाकाव्यादिषु नाटकादिषु वा विप्रकीर्णतयाङ्गाङ्गिभावेन बहवो रसा उपनिबध्यन्त इत्यत्र प्रसिद्धौ सत्यामपि यः प्रबन्धानां इत्यादि प्रकार के सभी का निर्विरोधत्व समझना चाहिए। इस प्रकार तब तक रसादि का विरोधी रसादि के साथ समावेश और असमावेश में विषय-विभाग दिखाया गया ॥ २० ॥ अब उन्हें एक प्रबन्ध में रखने में जो उचित क्रम है उसे प्रतिपादन के लिए कहते हैं— प्रबन्धों में नाना रसों के निबन्धन के प्रसिद्ध होने पर भी उनका उत्कर्ष चाहने वाला (कवि) एक रस को अङ्गीकार करे ॥ २१ ॥ महाकाव्य आदि अथवा नाटक आदि प्रबन्धों में विप्रकीर्ण रूप में अङ्गाङ्गिभाव से बहुत रस उपनिबद्ध होते हैं, इसकी प्रसिद्धि होने पर भी जो (कवि) प्रबन्धों में लोचनम् तदेवावतारयति—इदानीमित्यादिना । तेषां रसानां क्रम इति योजना । प्रसिद्धेऽपीति । भरतमुनिप्रभृतिभिर्निरूपितेऽपीत्यर्थः । तेषामिति प्रबन्धानाम् । महाकाव्यादिष्वित्यादिशब्दः प्रकारे । अनभिनेयान्भेदानाह, द्वितीयस्त्वभि- नेयान् । विप्रकीर्णतयेति । नायकप्रतिनायकपताकाप्रकरीनायकादिनिष्ठतयेत्यर्थः । उसे ही उतारते हैं—'अब' इत्यादि द्वारा । 'उन रसों का क्रम' यह (वाक्य की) योजना है । प्रसिद्ध होने पर भी—। अर्थात् भरत मुनि प्रभृति द्वारा निरूपित होने पर भी । उनका अर्थात् प्रबन्धों का । 'महाकाव्य आदि' में 'आदि' पद 'प्रकार' अर्थ में है । (वह प्रकारार्थक 'आदि' शब्द) अनभिनेय भेदों को कहता है, परन्तु दूसरा ('आदि' शब्द) अभिनेय (भेदों को कहता है) । विप्रकीर्ण रूप में—। अर्थात् नायकनिष्ठ, प्रतिनायकनिष्ठ, पताकानायकनिष्ठ, प्रकरीनायकनिष्ठ आदि रूप में । अङ्गाङ्गिभाव से

४१६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः छायातिशययोगमिच्छति तेन तेषां रसानामन्यतमः कश्चिद्विवक्षितो रसोऽङ्गित्त्वेन विनिवेशयितव्य इत्ययं युक्ततरो मार्गः ॥ २१ ॥ ननु रसान्तरेषु बहुषु प्राप्तपरिपोषेषु सत्सु कथमेकस्याङ्गिता न विरुध्यत इत्याशङ्क्येदमूच्यते— रसान्तरसमावेशः प्रस्तुतस्य रसस्य यः। नोपहन्त्यङ्गितां सोऽस्य स्थायित्वेनावभासिनः ॥ २२ ॥ छायातिशय का योग चाहता है उसे उन रसों में से किसी एक विवक्षित रस को अङ्गी रूप से रखना चाहिए, यह मार्ग युक्ततर है ॥ २१ ॥ (शंका) बहुत से रसान्तरों के परिपोष प्राप्त होने पर कैसे एक का अङ्गी होना विरुद्ध नहीं होगा ? यह आशङ्का करके यह कहते हैं— रसान्तरों के साथ जो प्रस्तुत रस का समावेश है वह स्थायी रूप से प्रतीत होने वाले इस (प्रधान रस) के अङ्गित्व को उपहत नहीं करता ॥ २२ ॥ लोचनम् अङ्गाङ्गिभावेनेत्येकनायकनिष्ठत्वेन । युक्ततर इति । यद्यपि समवकारादौ पर्याय- बन्धादौ च नैकस्याङ्गित्त्वं तथापि नायुक्तता तस्याप्येवंविधो यः प्रबन्धः तद्यथा नाटकं महाकाव्यं वा तदुत्कृष्टतरमिति तरशब्दस्यार्थः ॥ २१ ॥ नन्विति । स्वयं लब्धपरिपोषत्वे कथमङ्गत्त्वम् ? अलब्धपरिपोषत्वे वा कथं रसत्वमिति रसत्वमङ्गत्वं चान्योन्यविरुद्धं तेषां चाङ्गत्वायोगे कथमेकस्याङ्गित्त्व- मुक्तमिति भावः । रसान्तरेति । प्रस्तुतस्य समस्तेतिवृत्तव्यापिनस्तत एव विततव्याप्तिकत्वेनाङ्गिभावोचितस्य रसस्य रसान्तरैरितिवृत्तवशायातत्वेन परि- मितकथाशकलव्यापिभिर्यः समावेशः समुपबृंहणं स तस्य स्थायित्वेनेति- अर्थात् एकनायकनिष्ठ रूप से । युक्ततर—। यद्यपि समवकार आदि में और पर्यायबन्ध आदि में एक अङ्गी नहीं होता, तथापि उसकी भी अयुक्तता नहीं है, इस प्रकार का जो प्रबन्ध वह जैसे नाटक अथवा महाकाव्य है वह उत्कृष्टतर है, यह 'तर' शब्द का अर्थ है ॥ २१ ॥ (शङ्का)—। स्वयं परिपोष प्राप्त कर लेने पर अङ्गत्व कैसे होगा ? अथवा परिपोष प्राप्त न होने पर रसत्व कैसे होगा, इस प्रकार रसत्व और अङ्गत्व दोनों परस्पर विरुद्ध हैं और उनके अङ्गत्व के न होने पर कैसे एक का अङ्गित्व कहा गया यह भाव है । रसान्तर—। अर्थात् प्रस्तुत अर्थात् समस्त इतिवृत्त में व्याप्त रहने वाले, इसी लिए व्याप्ति के विस्तृत होने से अङ्गत्व के उचित रस का, इतिवृत्तवश प्राप्त होने के कारण परिमित कथाखण्डों में व्याप्त रहने वाले रसान्तरों के साथ जो समावेश अर्थात् समुपबृंहण है वह स्थायी रूप से अर्थात् इतिवृत्त में व्यापक के रूप से भासित

तृतीय उद्योतः ४१७ ध्वन्यालोकः प्रबन्धेषु प्रथमतं प्रस्तुत: सन् पुनः पुनरनुसन्धीयमानत्वेन स्थायी यो रसस्तस्य सकलबन्धव्यापिनो रसान्तरैरन्तरालवर्तिभिः समावेशो यः स नाङ्गितामुपहन्ति । एतदेवोपपादयितुमुच्यते— कार्यमेकं यथा व्यापि प्रबन्धस्य विधीयते । तथा रसस्यापि विधौ विरोधो नैव विद्यते ॥ २३ ॥ प्रबन्धों में पहले प्रस्तुत होता हुआ, बार-बार अनुसन्धीयमान होने के कारण स्थायी जो रस है, सकल रचना में व्याप्त रहने वाले उसके मध्यवर्ती रसान्तरों के साथ जो समावेश है वह अङ्गित्वि को उपहत नहीं करता । इसे ही उपपादन करने के लिए कहते हैं— जिस प्रकार प्रबन्ध का एक व्यापक कार्य बनाया जाता है उस प्रकार रस के भी विधान में कोई विरोध नहीं है ॥ २३ ॥ लोचनम् वृत्तव्यापितया भासमानस्य नाङ्गितामुपहन्ति, अङ्गितां पोषयत्येवेत्यर्थः । एतदुक्तं भवति—अङ्गभूतान्यपि रसान्तराणि स्वविभावादिसामग्र्या स्वा- वस्थायां यद्यपि लब्धपरिपोषाणि चमत्कारगोचरतां प्रतिपद्यन्ते, तथापि स चमत्कारस्तावत्येव न परितुष्य विश्राम्यति किं तु चमत्कारान्तरमनुधावति । सर्वत्रैव ह्यङ्गाङ्गिभावेऽयमेवोदन्तः । यथाह तत्रभवान्— गुणः कृतात्मसंस्कारः प्रधानं प्रतिपद्यते । प्रधानस्योपकारे हि तथा भूयसि वर्तते ॥ इति ॥ २२ ॥ उपपादयितुमिति । दृष्टान्तस्य समुचितस्य निरूपणेनेति भावः । न्यायेन होनेवाले उस ( रस ) अङ्गत्व को उपहत ( विघात ) नहीं करता, बल्कि अङ्गत्व को पुष्ट ही करता है । बात यह कही गई—अङ्गभूत भी रसान्तर अपने विभावादि की सामग्री से अपनी अवस्था में यद्यपि परिपोष प्राप्त करके चमत्कारगोचर बन जाते हैं तथापि वह चमत्कार उतने ही तक परितुष्ट होकर विश्राम कर लेता किन्तु अन्य चमत्कार का अनुधावन करता है । क्योंकि सभी अङ्गाङ्गिभाव में यही वृत्तान्त है । जैसा कि कहते हैं— गुण ( अर्थात् अङ्गभूत ) अन्य के अपने संस्कार किये जाने पर प्रधान का अधिका- धिक उपकार करता है ॥ २२ ॥ उपपादन करने के लिए—। भाव यह कि समुचित दृष्टान्त के निरूपण के द्वारा २७ ध्व०

४१८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सन्ध्यादिमयस्य प्रबन्धशरीरस्य यथा कार्यमेकमनुयायि व्यापकं कल्प्यते न च तत्कार्यान्तरैर्न सङ्कीर्यते, न च तैः सङ्कीर्यमाणस्यापि तस्य प्राधान्यमपचीयते, तथैव रसस्याप्येकस्य सन्निवेशे क्रियमाणे सन्धि आदि से युक्त प्रबन्ध-शरीर का एक अनुयायी व्यापक कार्य कल्पित करते हैं, ऐसा नहीं कि वह अन्य कार्यों से संकीर्ण नहीं होता और न कि उनसे संकीर्ण होकर भी उसके प्राधान्य का अपचय होता है, उसी प्रकार एक रस के भी सन्निवेश लोचनम् चैतदेवोपपद्यते, कार्यं हि तावदेकमेवाधिकारिकं व्यापकं प्रासङ्गिककार्यान्तरोप- क्रियमाणमवश्यमङ्गीकार्यम् । तत्पृष्ठवर्तिनीनां नायकचित्तवृत्तीनां तन्मूलादेवाङ्गाङ्गि- भावः प्रवाहपतित इति किमत्रापूर्वमिति तात्पर्यम् । तथेति । व्याप्तितया । यदि वा एवकारो भिन्नक्रमः, तथैव तेनैव प्रकारेण कार्याङ्गाङ्गिभावरूपेण रसानामपि बलादेवासावापततीत्यर्थः । तथा च वृत्तौ वक्ष्यति ‘तथैवे’ति । कार्यमिति । ‘स्वल्पमात्रं समुत्सृष्टं बहुधा यद्विसर्पति’ इति लक्षितं बीजम् । बीजात्प्रभृति प्रयोजनानां विच्छेदे यदविच्छेदकारणं यावत्समाप्तिबन्धं स तु बिन्दुः’ इति बिन्दुरूपयार्थप्रकृत्या निर्वहणपर्यन्तं व्याप्नोति तदाह—अनु- यायीति । अनेन बीजं बिन्दुश्चेत्यर्थप्रकृती सङ्गृहीते । कार्यान्तरैरिति । ‘आग- र्भादाविमर्शाद्वा पताका विनिवर्तते’ इति प्रासङ्गिकं यत्पताकालक्षणार्थप्रकृति- निष्ठं कार्यं यानि च ततोऽप्यूनव्याप्तितया प्रकरीलक्षणानि कार्याणि तैरित्येवं और न्याय के अनुसार यही उपपन्न होता है कि प्रासङ्गिक कार्यान्तरों से उपकृत होता हुआ एक ही आधिकारिक व्यापक कार्य अवश्य अङ्गीकार करना चाहिए । उस (कार्य) के पीछे चलने वाली नायक की चित्तवृत्तियों के उसके (अर्थात् कार्यों के अङ्गाङ्गिभाव के) बल से ही अङ्गाङ्गिभाव का क्रम चला है, यहाँ नई बात क्या है यह तात्पर्य है । उस प्रकार—। अर्थात् व्यापक रूप से । अथवा ‘ही’ (एवकार) भिन्न क्रम है, उसी प्रकार उसी प्रकार से कार्य के अङ्गाङ्गिभाव के रूप से रसों का भी बलपूर्वक वह (अङ्गाङ्गिभाव) होगा । जैसा कि वृत्ति में कहेंगे उसी प्रकार— । कार्य—। ‘बीज’ का लक्षण है ‘जो थोड़ी मात्रा में छोड़े जाने पर बहुत प्रकार से फैल जाता है’ । ‘बीज’ से लेकर प्रयोजनों के विच्छेद की स्थिति में जो अविच्छेद का कारण समाप्तिपर्यन्त है वह ‘बिन्दु’ है । इस बिन्दुरूप अर्थप्रकृति से निर्वहणपर्यन्त व्याप्त रहता है उसे कहते हैं—अनुयायी—। इससे ‘बीज’ और ‘बिन्दु’ इन दो अर्थ प्रकृतियों को सङ्गृहीत किया । अन्य कार्यों से—। ‘गर्भ’ अथवा ‘विमर्श’ सन्धिपर्यन्त पताका लौटती है’ इस पताका रूप अर्थ-प्रकृति में रहने वाला प्रासङ्गिक जो कार्य है और जो उससे भी अधिक व्याप्ति रूप से प्रकरी रूप कार्य हैं उनसे, इस प्रकार पाँच

तृतीय उद्योतः ४१९ ध्वन्यालोकः विरोधो न कश्चित् । प्रत्युत प्रत्युदितविवेकानाम Klingon-not-included अनुसन्धानवतां सचेतसां तथाविधे विषये प्रह्लादातिशयः प्रवर्तते ॥ २३ ॥ किए जाने पर कोई विरोध नहीं है । बल्कि प्रत्युदित विवेक वाले एवं अनुसन्धानशील सहृदयों का उस प्रकार के विषय में अतिशय प्रह्लाद होता है । लोचनम् पञ्चानामर्थप्रकृतीनां वाक्यैकवाक्यतया निवेश उक्तः । तथाविध इति । यथा तापसवत्सराजे । एवमनेन श्लोकेनाङ्गाङ्गितायां दृष्टान्तनिरूपणमितिवृत्तबलापतितत्वं च रसाङ्गाङ्गिभावस्येति द्वयं निरूपितम् । वृत्तिग्रन्थोऽप्युभयाभिप्रायेणैव नेयः । शृङ्गारेण वीरस्याविरोधो युद्धनयपराक्रमादिना कन्यारत्नलाभादौ । हास्यस्य तु स्पष्टमेव तदङ्गत्वम् । हास्यस्य स्वयमपुरुषार्थस्वभावत्वेऽपि समधिकतररञ्जनो- त्पादनेन शृङ्गाराङ्गतयैव तथात्वम् । रौद्रस्यापि तेन कथञ्चिदविरोधः । यथो- क्तम्—'शृङ्गारश्च तैः प्रसभं सेव्यते' । तैरिति रौद्रप्रभृतिभिः रक्षोदानवोद्धत- मनुष्यैरित्यर्थः । केवलं नायिकाविषयमौग्र्यं तत्र परिहर्तव्यम् । असम्भाव्य- पृथिवीसम्मार्जनादिजनितविस्मयतया तु वीराद्भुतयोः समावेशः । यथाह मुनिः—'वीरस्य चैव यत्कर्म सोऽद्भुतः' इति । वीररौद्रयोर्धीरोद्धते भीमसेनादौ समावेशः क्रोधोत्साहयोरविरोधात् । रौद्रकरुणयोरपि मुनिनैवोक्तः— ‘रौद्रस्यैव च यत्कर्म स ज्ञेयः करुणो रसः ।' इति । अर्थ-प्रकृतियों के वाक्यैकवाक्य रूप से निवेश कहा है। उस प्रकार के—। जैसे 'तापसवत्सराज' में । इस प्रकार इस श्लोक से अङ्गाङ्गिभाव में दृष्टान्त का निरूपण और ( इसके अङ्गाङ्गिभाव का ) इतिवृत्त के बल से होना ये दो बातें निरूपण कीं । वृत्तिग्रन्थ को भी दोनों के अभिप्राय से ही समझना चाहिए । शृङ्गार के साथ वीर का अविरोध युद्ध, नीति और पराक्रम आदि द्वारा कन्यारत्न के लाभ आदि में । हास्य तो स्पष्ट ही उस ( शृङ्गार ) का अङ्ग है । हास्य स्वयं अपुरुषार्थ रूप है तथापि सम्यक् प्रकार से अधिकतर रञ्जन के उत्पन्न करने से शृङ्गार के अङ्गरूप से ही उस प्रकार ( पुरुषार्थ ) है । रौद्र का भी उस ( शृङ्गार ) के साथ कथञ्चित् विरोध नहीं । जैसे, कहा है— 'वे लोग शृङ्गार का हठात् सेवन करते हैं' । 'वे लोग' अर्थात् रौद्र प्रभृति राक्षस, दानव और उद्धत मनुष्य । केवल नायिका के सम्बन्ध का औग्र्य वहाँ परिहर्तव्य है । पृथिवी के सम्मार्जन आदि असम्भाव्य कार्यों से विस्मय के उत्पन्न करने के कारण वीर और अद्भुत का समावेश है । जैसे मुनि कहते हैं—'और वीर का ही जो कर्म है वह अद्भुत है' । वीर और रौद्र का धीरोद्धत भीमसेन आदि में समावेश है, क्योंकि क्रोध और उत्साह में विरोध नहीं । रौद्र और करुण में भी मुनि ने ही कहा है— 'रौद्र का ही जो कर्म है उसे करुण रस समझना चाहिए ।'

४२० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ननु येषां रसानां परस्पराविरोधः यथा—वीरशृङ्गारयोः शृङ्गार- हास्ययो रौद्रशृङ्गारयोर्वीराद्भुतयोर्वीररौद्रयो रौद्रकरुणयोः शृङ्गाराद्भुत- योर्वा तत्र भवत्वङ्गाङ्गिभावः । तेषां तु स कथं भवेद्येषां परस्परं बाध्य- बाधकभावः । यथा—शृङ्गारबीभत्सयोर्वीरभयानकयोः शान्तरौद्रयोः शान्तशृङ्गारयोर्वा इत्याशङ्क्येदमुच्यते— अविरोधी विरोधी वा रसोऽङ्गिनि रसान्तरे । परिपोषं न नेतव्यस्तथा स्यादविरोधिता ॥ २४ ॥ ( शङ्का ) जिन रसों का परस्पर में अविरोध है, जैसे वीर और शृङ्गार का, शृङ्गार और हास्य का, रौद्र और शृङ्गार का, वीर और अद्भुत का, वीर और रौद्र का, रौद्र और करुण का अथवा शृङ्गार और अद्भुत का। उनमें अङ्गाङ्गिभाव हो । परन्तु उनका वह ( अङ्गाङ्गिभाव ) कैसे होगा जिनका परस्पर में बाध्यबाधक भाव है । जैसे शृङ्गार और बीभत्स का, वीर और भयानक का, शान्त और रौद्र का, अथवा शान्त और शृङ्गार का । यह आशङ्का करके यह कहते हैं— अन्य रस के अङ्गी होने पर अविरोधी अथवा विरोधी रस को परिपोष तक नहीं पहुँचाना चाहिए, इस प्रकार विरोध नहीं होगा ॥ २४ ॥ लोचनम् शृङ्गाराद्भुतयोरिति। यथा रत्नावल्यामैन्द्रजालिकदर्शने। शृङ्गारबीभत्सयोरिति । ययोर्हि परस्परोन्मूलनात्मकतयैवोद्भवस्तत्र कोऽङ्गाङ्गिभावः आलम्बननिमग्न- रूपतया च रतिरुत्तिष्ठति ततः पलायमानरूपतया जुगुप्सेति समानाश्रयत्वेन तयोरन्योन्यसंस्कारोन्मूलनत्वम् । भयोत्साहावप्येवमेव विरुद्धौ वाच्यौ । शान्तस्यापि तत्त्वज्ञानसमुत्थितसमस्तसंसारविषयनिर्वेदप्राणत्वेन सर्वतो निरीहस्वभावस्य विषयासक्तिजीविताभ्यां रतिक्रोधाभ्यां विरोध एव ॥ २३ ॥ अविरोधी विरोधी वेति । वाग्रहणस्यायमभिप्रायः—अङ्गिरसापेक्षया यस्य शृङ्गार और अद्भुत का—। जैसे 'रत्नावली' में ऐन्द्रजालिक के दर्शन के प्रसङ्ग में । शृङ्गार और बीभत्स का—। जिन ( शृङ्गार और बीभत्स का परस्पर उन्मूलनात्मक रूप से ही उद्भव है वहाँ कौन सा अङ्गाङ्गिभाव होगा ? आलम्बन में निमग्नरूपता से रति का उद्भव होता है और उस ( आलम्बन ) से पलायमानरूपता से जुगुप्सा का उदय होता है । इसलिए समानाश्रय रूप से दोनों एक दूसरे के संस्कारों का उन्मूलन करते हैं । भय और उत्साह भी इसी प्रकार विरुद्ध कहे जाने चाहिए । तत्त्वज्ञान से समुत्थित समस्त संसार के विषय में निर्वेद प्राण होने के कारण सब प्रकार से निरीहस्वभाव शान्त का भी विषयासक्ति से अनुप्राणित रति और क्रोध से विरोध ही है ॥ २३ ॥ अविरोधी अथवा विरोधी—। 'अथवा' ग्रहण का यह अभिप्राय है—अङ्गी रस की

तृतीय उद्योतः ४२१ ध्वन्यालोकः अङ्गिनि रसान्तरे शृङ्गारादौ प्रबन्धव्यङ्ग्ये सति अविरोधी विरोधी वा रसः परिपोषं न नेतव्यः। तत्राविरोघिनो रसस्याङ्गिरसापेक्षया- त्यन्तमाधिक्यं न कर्तव्यमित्ययं प्रथमः परिपोषपरिहारः। उत्कर्ष- साम्येऽपि तयोर्विरोधासम्भवात्। यथा— अन्य शृङ्गार आदि रस के अङ्गी अर्थात् प्रबन्धव्यङ्ग्य होने पर अविरोधी अथवा विरोधी रस को परिपोष तक नहीं पहुँचाना चाहिए। उसमें अविरोधी रस का अङ्गी रस की अपेक्षा अत्यन्त आधिक्य नहीं करना चाहिए, इस प्रकार यह पहला परिपोष का परिहार है। उत्कर्ष का साम्य होने पर भी उन दोनों का विरोध सम्भव नहीं। जैसे— लोचनम् रसान्तरस्योत्कर्षो निवध्यते तदा तदविरुद्धोऽपि रसो निबद्धश्चोद्यावहः। अथ तु युक्त्याङ्गिनि रसेऽङ्गभावतानयेनोपपत्तिर्घटते तद्विरुद्धोऽपि रसो वक्ष्यमाणेन विषयभेदादियोजनानोपनिबध्यमानो न दोषावह इति विरोधाविरोधाव- किञ्चित्करौ। विनिवेशनप्रकार एव त्ववधातव्यमिति। अङ्गिनीति सप्तम्यनादरे। अङ्गिनं रसविशेषमनादृत्य न्यक्कृत्याङ्गभूतो न पोषयितव्य इत्यर्थः। अविरोधि- तेति। निर्दोषतेत्यर्थः। परिपोषपरिहारे त्रीन् प्रकारानाह—तत्रेत्यादिना तृतीय इत्यन्तेन। ननु न्यूनत्वं कर्तव्यमिति वाच्ये आधिक्यस्य का सम्भावना येनोक्त- माधिक्यं न कर्तव्यमित्याशङ्क्याह—उत्कर्षसाम्य इति। अपेक्षा जिस अन्य रस का उत्कर्ष निबन्धन करते हैं तब उस (अङ्गी रस) के अविरुद्ध भी रस दोषावह होता है। परन्तु युक्तिपूर्वक अङ्गी रस में अङ्गभावता के प्रकार से उपपत्ति घटती है तो उसके (अङ्गी रस के) विरुद्ध भी रस वक्ष्यमाण विषयभेद आदि के योजन से उपनिबद्धयमान होकर दोषावह नहीं होता, इस प्रकार विरोध और अविरोध नहीं कुछ नहीं करते। केवल विनिवेशन के प्रकार में ही अवधान रखना चाहिए। अङ्गी में 'सप्तमी' अनादरार्थक है, अर्थात् अङ्गी रसविशेष का अनादर करके—तिरस्कार करके अङ्गभूत (रस) का पोषण नहीं करना चाहिए। विरोध नहीं (अविरोधिता)—। अर्थात् निर्दोषता। परिपोष के परिहार में तीन प्रकारों को कहते हैं—'उनमें' इत्यादि से लेकर 'तृतीय' तक। 'न्यूनत्व करना चाहिए' यह जब कि कहना चाहिए ऐसी स्थिति में आधिक्य की सम्भावना हो कौन, जिससे कहा कि 'अधिक्य नहीं करना चाहिए'! यह आशङ्का करके कहते हैं—उत्कर्ष का साम्य होने पर भी—।

४२२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः एकन्तो रुअइ पिआ अण्णन्तो समरतूरणिग्घोसो । णेहेण रणरसेण अ भडस्स दोलाइअं हिअअम् ॥ यथा वा— कण्ठाच्छित्त्वाक्षमालावलयमिव करे हारमावर्तयन्ती कृत्वा पर्यङ्कबन्धं विषधरपतिना मेखलाया गुणेन । मिथ्यामन्त्राभिजापस्फुरदधरपुटव्यञ्जिताव्यक्तहासा देवी सन्ध्याभ्यसूयाहसितपशुपतिस्तत्र दृष्टा तु वोऽव्यात् ॥ एक ओर प्रिया रो रही है दूसरी ओर युद्ध के तूर्य का गर्जन है । स्नेह और रणराग से भट का हृदय दोलायित हो रहा है । अथवा जैसे— कण्ठ से हार निकाल कर अक्षमाला-वलय की भांति हाथ में फेरती हुई, मेखला ( करधनी ) के गुणरूपी सर्पराज के द्वारा पर्यङ्कबन्ध आसन मार कर झूठमूठ के मंत्र पढ़ने से फुरफुराते अधरपुट के द्वारा अव्यक्त हास व्यञ्जित करती हुई, सन्ध्या ( अपनी सौत ) के प्रति ईर्ष्यावश पशुपति ( शिव जी ) का उपहास करती हुई देखी गई देवी ( पार्वती ) आप लोगों की रक्षा करें । लोचनम् एकतो रोदिति प्रिया अन्यतः समरतूर्यनिर्घोषः । स्नेहेन रणरसेन च भटस्य दोलायितं हृदयम् ॥ इति च्छाया । रोदिति प्रियेत्यतो रत्युत्कर्षः । समरतूर्येति भटस्येति चोत्साहोत्कर्षः । दोलायितमिति तयोरन्यूनाधिकतया साम्यमुक्तम् । एतच्च मुक्तकविषयमेव भवति न तु प्रबन्धविषयमिति केचिदाहुस्तच्चासत्; आधिकारिकेष्वितिवृत्तेषु त्रिवर्गफलसमप्राधान्यस्य सम्भवात् । तथाहि— रत्नावल्यां सचिवायत्तसिद्धित्वाभिप्रायेण पृथिवीराज्यलाभ आधिकारिकं फलं कन्यारत्नलाभः प्रासङ्गिकं फलं, नायकाभिप्रायेण तु विपर्यय इति स्थिते मन्त्रिबुद्धौ नायकबुद्धौ च स्वाम्यमात्यबुद्ध्येकत्वात्फलमिति नीत्या एकीक्रिय- 'प्रिया रो रही है' यहाँ 'रति' का उत्कर्ष है । और 'युद्ध का तूर्य' यह भट के उत्साह का उत्कर्ष है । 'दोलायित' के द्वारा उन दोनों ( रति और उत्साह ) का अन्यूनाधिक ( न कम न ज्यादा ) होने के कारण साम्य कहा है । 'यह मुक्तक में ही होता है न कि प्रबन्ध में होता है' यह कुछ लोगों ने कहा है वह ठीक नहीं; क्योंकि आधिकारिक इतिवृत्तों में त्रिवर्ग रूप फल का समप्राधान्य सम्भव है । जैसा कि— 'रत्नावली' में 'सचिवायत्तसिद्धित्व' के अभिप्राय से पृथ्वी के राज्य का लाभ आधि- कारिक फल है और कन्यारत्न का लाभ प्रासङ्गिक फल है, परन्तु नायक के अभिप्राय से विपरीत है, ऐसी स्थिति में स्वामी और अमात्य की बुद्धि के एक होने से फल होता है इस नीति से मन्त्री की बुद्धि और नायक की बुद्धि के एक किए जाने पर समप्राधान्य

तृतीय उद्योतः ४२३ ध्वन्यालोकः इत्यत्र । अङ्गिरसविरुद्धानां व्यभिचारिणां प्राचुर्येणानिवेशनम् , निवेशने वा क्षिप्रमेवाङ्गिरसव्यभिचार्यनुवृत्तिरिति द्वितीयः । अङ्गत्वेन पुनः पुनः प्रत्यवेक्षा परिपोषं नीयमानस्याप्यङ्गभूतस्य यहाँ पर । अङ्गी रस के विरुद्ध व्यभिचारी भावों का अधिकता से निवेश न करना, अथवा निवेश करने पर शीघ्र ही अङ्गी रस के व्यभिचारी की अनुवृत्ति यह दूसरा ( परिपोष का परिहार ) है । परिपोष तक पहुँचाए गए भी अङ्गभूत रस की अङ्ग रूप से बार-बार प्रत्यवेक्षा, लोचनम् माणायां समप्राधान्यमेव पर्यवस्यति । यथोक्तम्-‘कवेः प्रयत्नान्नेतॄणां युक्तानाम्’ इत्यलमवान्तरेण बहुना । एवं प्रथमं प्रकारं निरूप्य द्वितीयमाह—अङ्गीति । अनिवेशनमिति । अङ्गभूते रस इति शेषः । नन्वेवं नासौ परितुष्टो भवेदित्याशङ्क्य—निवेशने वेति । अत एव वाग्रहणमुत्तरपक्षदार्ढ्यं सूचयति न विकल्पम् । तथा चैक एवायं प्रकारः । अन्यथा तु द्वौ स्याताम् । अङ्गिनो रसस्य यो व्यभिचारी तस्यानुवृत्तिरनु- सन्धानम् । यथा—‘कोपात्कोमललोल’ इति श्लोकेऽङ्गभूतायां रतावङ्गत्वेन यः क्रोध उपनिबद्धस्तत्र बद्ध्वा दृढम्-इत्यमर्षस्य निवेशितस्य क्षिप्रमेव रुदत्येति हसन्निति च इत्युचितेष्यौत्सुक्यहर्षानुसन्धानम् । तृतीयं प्रकारमाह—अङ्गत्वेनेति । अत्र च तापसवत्सराजे वत्सराजस्य ही पर्यवसित होता है । जैसे कहा है—‘कवि के प्रयत्न से युक्त नायकों का०’ यह बहुत अवान्तर चर्चा ठीक नहीं । इस प्रकार प्रथम प्रकार का निरूपण करके दूसरे को कहते हैं—अङ्गी—। निवेशन न करना—। शेष यह कि अङ्गभूत रस में । इस प्रकार वह परितुष्ट नहीं होगा, यह आशङ्का करके मतान्तर कहते हैं—अथवा निवेशन में—। अतएव ‘अथवा’ ग्रहण उत्तर पक्ष का दार्ढ्य सूचित करता है न कि विकल्प । जैसा कि यह एक ही प्रकार है, अन्यथा दो होते । अङ्गी रस का जो व्यभिचारी है उसकी अनुवृत्ति अर्थात् अनुसन्धान । जैसे—‘कोपात् कोमललोल०’ इस श्लोक में अङ्गभूत रति में अङ्गरूप से जो क्रोध उपनिबद्ध किया गया है उसमें ‘बद्ध्वा दृढं’ से निवेशित अमर्ष के शीघ्र ही ( व्यभिचारी रूप से ) ‘रुदत्या’ और ‘हसन्’ इस रति के उचित औत्सुक्य और हर्ष से अनुसन्धान है । तीसरा प्रकार कहते हैं—अङ्ग रूप से—। यहाँ पर ‘तापसवत्सराज’ में वत्सराज का

४२४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः रसस्येति तृतीयः । अनया दिशान्येऽपि प्रकारा उत्प्रेक्षणीयाः । विरोधिनस्तु रसस्याङ्गिरसापेक्षया कस्यचिन्न्यूनता सम्पादनीया । यथा शान्तेऽङ्गिनी शृङ्गारस्य शृङ्गारे वा शान्तस्य । परिपोषरहितस्य रसस्य कथं रसत्वमिति चेत्—उक्तमत्राङ्गिरसापेक्षयेति । अङ्गिनो हि रसस्य यावान् परिपोषस्तावंस्तस्य न कर्तव्यः, स्वतस्तु सम्भवी परिपोषः केन वार्यते । एतच्चापेक्षिकं प्रकर्षयोगित्वमेकस्य रसस्य यह तीसरा (परिपोष का परिहार) है । इस प्रकार से अन्य प्रकारों की भी उत्प्रेक्षा कर लेनी चाहिए । अङ्गी रस की अपेक्षा किसी विरोधी रस की न्यूनता सम्पादन करनी चाहिए । जैसे अङ्गी शान्त (रस) में शृङ्गार की अथवा शृङ्गार में शान्त की । यदि कहो कि परिपोषरहित रस का रसत्व कैसा ? तो यहाँ कह चुके हैं 'अङ्गी रस की अपेक्षा' । अङ्गी रस का जितना परिपोष है उतना उसका नहीं करना चाहिए, परन्तु स्वतः होने वाले परिपोष को कौन निवारण कर सकता है ? बहुत रसों वाले प्रबन्धों में एक रस का रसों के साथ अङ्गाङ्गिभाव न स्वीकार करने वाला भी इस आपेक्षिक प्रकर्ष का निराकरण नहीं कर सकता, इस प्रकार से अविरोधी और विरोधी लोचनम् पद्मावतीविषयः सम्भोगशृङ्गार उदाहरणीकर्तव्यः । अन्येऽपीति । विभावानु- भावानां चापि उत्कर्षो न कर्तव्योऽङ्गिरसविरोधिनां निवेशनमेव वा न कार्यम्, कृतमपि चाङ्गिरसविभावानुभावैरुपबृंहणीयम् । परिपोषिता अपि विरुद्धरस- विभावानुभावा अङ्गत्वं प्रति जागरयितव्या इत्यादि स्वयं शक्यमुत्प्रेक्षितुम् । एवं विरोध्यविरोधिसाधारणं प्रकारमभिधाय विरोधिविषया साधारणदोष- परिहारप्रकारगतत्वेनैव विशेषान्तरमप्याह—विरोधिन इति । सम्भवीति । प्रधानावरोधित्वेनेति शेषः । एतच्चेति । उपकार्योपकारकभावो रसानां नास्ति पद्मावती के प्रति सम्भोग शृङ्गार को उदाहरण देना चाहिए । अन्य प्रकारों की भी—। और विभावों तथा अनुभावों का भी उत्कर्ष नहीं करना चाहिए, अथवा अङ्गी रस के विरोधी (विभावों तथा अनुभावों) का निवेश ही नहीं करना चाहिए, कर देने पर भी अङ्गी रस के विभावों तथा अनुभावों का पोषण करना चाहिए । परिपोषित भी विरुद्ध रस के विभाव तथा अनुभावों को अङ्गत्व के प्रति जागरित करना चाहिए, इत्यादि स्वयं उत्प्रेक्षा की जा सकती है । इस प्रकार विरोधी और अविरोधी के साधारण प्रकार का अभिधान करके विरोधी के विषय में असाधारण दोषपरिहार के प्रकार में ही विशेषान्तर की चर्चा करते हैं—परन्तु विरोधी—। सम्भव होने वाला—। शेष यह कि प्रधान के अविरोधी रूप से । इस (आपेक्षिक)—। रसों का उपकार्योप-