भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 484, कुल 680 में से

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पृष्ठ 484

४२४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः रसस्येति तृतीयः । अनया दिशान्येऽपि प्रकारा उत्प्रेक्षणीयाः । विरोधिनस्तु रसस्याङ्गिरसापेक्षया कस्यचिन्न्यूनता सम्पादनीया । यथा शान्तेऽङ्गिनी शृङ्गारस्य शृङ्गारे वा शान्तस्य । परिपोषरहितस्य रसस्य कथं रसत्वमिति चेत्—उक्तमत्राङ्गिरसापेक्षयेति । अङ्गिनो हि रसस्य यावान् परिपोषस्तावंस्तस्य न कर्तव्यः, स्वतस्तु सम्भवी परिपोषः केन वार्यते । एतच्चापेक्षिकं प्रकर्षयोगित्वमेकस्य रसस्य यह तीसरा (परिपोष का परिहार) है । इस प्रकार से अन्य प्रकारों की भी उत्प्रेक्षा कर लेनी चाहिए । अङ्गी रस की अपेक्षा किसी विरोधी रस की न्यूनता सम्पादन करनी चाहिए । जैसे अङ्गी शान्त (रस) में शृङ्गार की अथवा शृङ्गार में शान्त की । यदि कहो कि परिपोषरहित रस का रसत्व कैसा ? तो यहाँ कह चुके हैं 'अङ्गी रस की अपेक्षा' । अङ्गी रस का जितना परिपोष है उतना उसका नहीं करना चाहिए, परन्तु स्वतः होने वाले परिपोष को कौन निवारण कर सकता है ? बहुत रसों वाले प्रबन्धों में एक रस का रसों के साथ अङ्गाङ्गिभाव न स्वीकार करने वाला भी इस आपेक्षिक प्रकर्ष का निराकरण नहीं कर सकता, इस प्रकार से अविरोधी और विरोधी लोचनम् पद्मावतीविषयः सम्भोगशृङ्गार उदाहरणीकर्तव्यः । अन्येऽपीति । विभावानु- भावानां चापि उत्कर्षो न कर्तव्योऽङ्गिरसविरोधिनां निवेशनमेव वा न कार्यम्, कृतमपि चाङ्गिरसविभावानुभावैरुपबृंहणीयम् । परिपोषिता अपि विरुद्धरस- विभावानुभावा अङ्गत्वं प्रति जागरयितव्या इत्यादि स्वयं शक्यमुत्प्रेक्षितुम् । एवं विरोध्यविरोधिसाधारणं प्रकारमभिधाय विरोधिविषया साधारणदोष- परिहारप्रकारगतत्वेनैव विशेषान्तरमप्याह—विरोधिन इति । सम्भवीति । प्रधानावरोधित्वेनेति शेषः । एतच्चेति । उपकार्योपकारकभावो रसानां नास्ति पद्मावती के प्रति सम्भोग शृङ्गार को उदाहरण देना चाहिए । अन्य प्रकारों की भी—। और विभावों तथा अनुभावों का भी उत्कर्ष नहीं करना चाहिए, अथवा अङ्गी रस के विरोधी (विभावों तथा अनुभावों) का निवेश ही नहीं करना चाहिए, कर देने पर भी अङ्गी रस के विभावों तथा अनुभावों का पोषण करना चाहिए । परिपोषित भी विरुद्ध रस के विभाव तथा अनुभावों को अङ्गत्व के प्रति जागरित करना चाहिए, इत्यादि स्वयं उत्प्रेक्षा की जा सकती है । इस प्रकार विरोधी और अविरोधी के साधारण प्रकार का अभिधान करके विरोधी के विषय में असाधारण दोषपरिहार के प्रकार में ही विशेषान्तर की चर्चा करते हैं—परन्तु विरोधी—। सम्भव होने वाला—। शेष यह कि प्रधान के अविरोधी रूप से । इस (आपेक्षिक)—। रसों का उपकार्योप-

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