ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४२५ ध्वन्यालोकः बहुरसेषु प्रबन्धेषु रसानामङ्गाङ्गिभावमनभ्युपगच्छताप्यशक्यप्रतिक्षेप- मित्यनेन प्रकारेणाविरोधिनां विरोधिनां च रसानामङ्गाङ्गिभावेन समावेशे प्रबन्धेषु स्यादविरोधः । एतच्च सर्वं येषां रसो रसान्तरस्य व्यभिचारी- रसों का अङ्गाङ्गिभाव से समावेश होने पर प्रबन्धों में विरोध न होगा । और यह सब उनके मत से कहा गया है जिनका यह सिद्धान्त है कि रस रसान्तर का व्यभि- लोचनम् स्वचमत्कारविश्रान्तत्वात् ; अन्यथा रसत्वायोगात् , तदभावे च कथमङ्गाङ्गि- तेत्यपि येषां मतं तैरपि कस्यचिद्रसस्य प्रकृष्टत्वं भूयः प्रबन्धव्यापकत्वमन्येषां चाल्पप्रबन्धानुगामित्वमभ्युपगन्तव्यमितिवृत्तसङ्घटनाया एवान्यथानुपपत्तेः, भूयः प्रबन्धव्यापकस्य च रसस्य रसान्तरैर्यदि न काचित्सङ्गतिस्तदितिवृत्त- स्यापि न स्यात्सङ्गतिश्छेदयमेवोपकार्योपकारकभावः । न च चमत्कारविश्रान्ते- विरोधः कश्चिदिति समनन्तरमेवोक्तं तदाह—अनभ्युपगच्छतापीति । शब्दमात्रे- णासौ नाभ्युपगच्छति । अकाम एवाभ्युपगमयितव्य इति भावः । अन्यस्तु व्याचष्टे-एतच्चापेक्षिकमित्यादिग्रन्थो द्वितीयमतमभिप्रेत्य यत्र रसानामुपकार्योप- कारकता नास्ति, तत्रापि हि भूयो वृत्तव्याप्तत्वमेवाङ्गित्वमिति । एतच्चासत् ; एवं हि एतच्च सर्वमिति सर्वशब्देन य उपसंहार एकपक्षविषयः मतान्तरेऽपीत्यादिना च यो द्वितीयपक्षोपक्रमः सोऽतीव दुःश्लिष्ट इत्यलं पूर्ववंश्यैः सह बहुना संलापेन । येषामिति । भावाध्यायसमाप्तावस्ति श्लोकः— कारकभाव नहीं है, क्योंकि ( वे ) अपने ही चमत्कार में विश्रान्त होते हैं । अन्यथा ( उनका ) रसत्व नहीं बन सकेगा । और रसत्व के अभाव में ( उनका ) अङ्गाङ्गिभाव कैसा ? यह भी जिनका मत है उन्हें भी किसी रस का प्रकृष्टत्व अर्थात् प्रबन्ध में अधिक व्यापकत्व और अन्य ( रसों ) का थोड़े प्रबन्ध में अनुगामित्व स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि इसके बिना इतिवृत्त सङ्घटन ही उपपन्न होगा । और प्रबन्ध में अधिक व्यापक रस का रसान्तरों के साथ यदि कोई सम्बन्ध नहीं, तब इतिवृत्त का भी सम्बन्ध नहीं है, ( इस लिए ) यही उपकार्योपकारकभाव है । चमत्कारविश्रान्ति का कोई विरोध नहीं है यह जो अभी कहा है उसे कहते हैं—न स्वीकार करने वाला भो—। वचनमात्र से वह स्वीकार नहीं करता । भाव यह कि नहीं चाहता हुआ भी वह स्वीकार कराने योग्य है । किन्तु दूसरे व्याख्यान करते हैं—‘इस आपेक्षिक’ इत्यादि ग्रन्थ दूसरे मत को अभिप्रेत करके है, जहाँ रसों का उपकार्योपकारकभाव नहीं है, वहाँ भी वृत्त ( अर्थात् कथा ) में अधिक व्याप्तत्व रूप ही अङ्गित्त्व है’ । यह ( व्याख्यान ) ठीक नहीं । क्योंकि इस प्रकार ‘और यह सब’ यहाँ ‘सब’ शब्द से एक पक्ष का उपसंहार है और ‘मतान्तर में भी’ इत्यादि द्वारा जो-जो दूसरे पक्ष का उपक्रम है वह अतीव दुःश्लिष्ट ( बेमेल ) होगा । अपने पूर्वजों के साथ बहुत संलाप ठीक नहीं । जिनका—। भावाध्याय की समाप्ति में श्लोक है—