ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४२३ ध्वन्यालोकः इत्यत्र । अङ्गिरसविरुद्धानां व्यभिचारिणां प्राचुर्येणानिवेशनम् , निवेशने वा क्षिप्रमेवाङ्गिरसव्यभिचार्यनुवृत्तिरिति द्वितीयः । अङ्गत्वेन पुनः पुनः प्रत्यवेक्षा परिपोषं नीयमानस्याप्यङ्गभूतस्य यहाँ पर । अङ्गी रस के विरुद्ध व्यभिचारी भावों का अधिकता से निवेश न करना, अथवा निवेश करने पर शीघ्र ही अङ्गी रस के व्यभिचारी की अनुवृत्ति यह दूसरा ( परिपोष का परिहार ) है । परिपोष तक पहुँचाए गए भी अङ्गभूत रस की अङ्ग रूप से बार-बार प्रत्यवेक्षा, लोचनम् माणायां समप्राधान्यमेव पर्यवस्यति । यथोक्तम्-‘कवेः प्रयत्नान्नेतॄणां युक्तानाम्’ इत्यलमवान्तरेण बहुना । एवं प्रथमं प्रकारं निरूप्य द्वितीयमाह—अङ्गीति । अनिवेशनमिति । अङ्गभूते रस इति शेषः । नन्वेवं नासौ परितुष्टो भवेदित्याशङ्क्य—निवेशने वेति । अत एव वाग्रहणमुत्तरपक्षदार्ढ्यं सूचयति न विकल्पम् । तथा चैक एवायं प्रकारः । अन्यथा तु द्वौ स्याताम् । अङ्गिनो रसस्य यो व्यभिचारी तस्यानुवृत्तिरनु- सन्धानम् । यथा—‘कोपात्कोमललोल’ इति श्लोकेऽङ्गभूतायां रतावङ्गत्वेन यः क्रोध उपनिबद्धस्तत्र बद्ध्वा दृढम्-इत्यमर्षस्य निवेशितस्य क्षिप्रमेव रुदत्येति हसन्निति च इत्युचितेष्यौत्सुक्यहर्षानुसन्धानम् । तृतीयं प्रकारमाह—अङ्गत्वेनेति । अत्र च तापसवत्सराजे वत्सराजस्य ही पर्यवसित होता है । जैसे कहा है—‘कवि के प्रयत्न से युक्त नायकों का०’ यह बहुत अवान्तर चर्चा ठीक नहीं । इस प्रकार प्रथम प्रकार का निरूपण करके दूसरे को कहते हैं—अङ्गी—। निवेशन न करना—। शेष यह कि अङ्गभूत रस में । इस प्रकार वह परितुष्ट नहीं होगा, यह आशङ्का करके मतान्तर कहते हैं—अथवा निवेशन में—। अतएव ‘अथवा’ ग्रहण उत्तर पक्ष का दार्ढ्य सूचित करता है न कि विकल्प । जैसा कि यह एक ही प्रकार है, अन्यथा दो होते । अङ्गी रस का जो व्यभिचारी है उसकी अनुवृत्ति अर्थात् अनुसन्धान । जैसे—‘कोपात् कोमललोल०’ इस श्लोक में अङ्गभूत रति में अङ्गरूप से जो क्रोध उपनिबद्ध किया गया है उसमें ‘बद्ध्वा दृढं’ से निवेशित अमर्ष के शीघ्र ही ( व्यभिचारी रूप से ) ‘रुदत्या’ और ‘हसन्’ इस रति के उचित औत्सुक्य और हर्ष से अनुसन्धान है । तीसरा प्रकार कहते हैं—अङ्ग रूप से—। यहाँ पर ‘तापसवत्सराज’ में वत्सराज का