भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 680 में से

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पृष्ठ 482

४२२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः एकन्तो रुअइ पिआ अण्णन्तो समरतूरणिग्घोसो । णेहेण रणरसेण अ भडस्स दोलाइअं हिअअम् ॥ यथा वा— कण्ठाच्छित्त्वाक्षमालावलयमिव करे हारमावर्तयन्ती कृत्वा पर्यङ्कबन्धं विषधरपतिना मेखलाया गुणेन । मिथ्यामन्त्राभिजापस्फुरदधरपुटव्यञ्जिताव्यक्तहासा देवी सन्ध्याभ्यसूयाहसितपशुपतिस्तत्र दृष्टा तु वोऽव्यात् ॥ एक ओर प्रिया रो रही है दूसरी ओर युद्ध के तूर्य का गर्जन है । स्नेह और रणराग से भट का हृदय दोलायित हो रहा है । अथवा जैसे— कण्ठ से हार निकाल कर अक्षमाला-वलय की भांति हाथ में फेरती हुई, मेखला ( करधनी ) के गुणरूपी सर्पराज के द्वारा पर्यङ्कबन्ध आसन मार कर झूठमूठ के मंत्र पढ़ने से फुरफुराते अधरपुट के द्वारा अव्यक्त हास व्यञ्जित करती हुई, सन्ध्या ( अपनी सौत ) के प्रति ईर्ष्यावश पशुपति ( शिव जी ) का उपहास करती हुई देखी गई देवी ( पार्वती ) आप लोगों की रक्षा करें । लोचनम् एकतो रोदिति प्रिया अन्यतः समरतूर्यनिर्घोषः । स्नेहेन रणरसेन च भटस्य दोलायितं हृदयम् ॥ इति च्छाया । रोदिति प्रियेत्यतो रत्युत्कर्षः । समरतूर्येति भटस्येति चोत्साहोत्कर्षः । दोलायितमिति तयोरन्यूनाधिकतया साम्यमुक्तम् । एतच्च मुक्तकविषयमेव भवति न तु प्रबन्धविषयमिति केचिदाहुस्तच्चासत्; आधिकारिकेष्वितिवृत्तेषु त्रिवर्गफलसमप्राधान्यस्य सम्भवात् । तथाहि— रत्नावल्यां सचिवायत्तसिद्धित्वाभिप्रायेण पृथिवीराज्यलाभ आधिकारिकं फलं कन्यारत्नलाभः प्रासङ्गिकं फलं, नायकाभिप्रायेण तु विपर्यय इति स्थिते मन्त्रिबुद्धौ नायकबुद्धौ च स्वाम्यमात्यबुद्ध्येकत्वात्फलमिति नीत्या एकीक्रिय- 'प्रिया रो रही है' यहाँ 'रति' का उत्कर्ष है । और 'युद्ध का तूर्य' यह भट के उत्साह का उत्कर्ष है । 'दोलायित' के द्वारा उन दोनों ( रति और उत्साह ) का अन्यूनाधिक ( न कम न ज्यादा ) होने के कारण साम्य कहा है । 'यह मुक्तक में ही होता है न कि प्रबन्ध में होता है' यह कुछ लोगों ने कहा है वह ठीक नहीं; क्योंकि आधिकारिक इतिवृत्तों में त्रिवर्ग रूप फल का समप्राधान्य सम्भव है । जैसा कि— 'रत्नावली' में 'सचिवायत्तसिद्धित्व' के अभिप्राय से पृथ्वी के राज्य का लाभ आधि- कारिक फल है और कन्यारत्न का लाभ प्रासङ्गिक फल है, परन्तु नायक के अभिप्राय से विपरीत है, ऐसी स्थिति में स्वामी और अमात्य की बुद्धि के एक होने से फल होता है इस नीति से मन्त्री की बुद्धि और नायक की बुद्धि के एक किए जाने पर समप्राधान्य