भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 481

तृतीय उद्योतः ४२१ ध्वन्यालोकः अङ्गिनि रसान्तरे शृङ्गारादौ प्रबन्धव्यङ्ग्ये सति अविरोधी विरोधी वा रसः परिपोषं न नेतव्यः। तत्राविरोघिनो रसस्याङ्गिरसापेक्षया- त्यन्तमाधिक्यं न कर्तव्यमित्ययं प्रथमः परिपोषपरिहारः। उत्कर्ष- साम्येऽपि तयोर्विरोधासम्भवात्। यथा— अन्य शृङ्गार आदि रस के अङ्गी अर्थात् प्रबन्धव्यङ्ग्य होने पर अविरोधी अथवा विरोधी रस को परिपोष तक नहीं पहुँचाना चाहिए। उसमें अविरोधी रस का अङ्गी रस की अपेक्षा अत्यन्त आधिक्य नहीं करना चाहिए, इस प्रकार यह पहला परिपोष का परिहार है। उत्कर्ष का साम्य होने पर भी उन दोनों का विरोध सम्भव नहीं। जैसे— लोचनम् रसान्तरस्योत्कर्षो निवध्यते तदा तदविरुद्धोऽपि रसो निबद्धश्चोद्यावहः। अथ तु युक्त्याङ्गिनि रसेऽङ्गभावतानयेनोपपत्तिर्घटते तद्विरुद्धोऽपि रसो वक्ष्यमाणेन विषयभेदादियोजनानोपनिबध्यमानो न दोषावह इति विरोधाविरोधाव- किञ्चित्करौ। विनिवेशनप्रकार एव त्ववधातव्यमिति। अङ्गिनीति सप्तम्यनादरे। अङ्गिनं रसविशेषमनादृत्य न्यक्कृत्याङ्गभूतो न पोषयितव्य इत्यर्थः। अविरोधि- तेति। निर्दोषतेत्यर्थः। परिपोषपरिहारे त्रीन् प्रकारानाह—तत्रेत्यादिना तृतीय इत्यन्तेन। ननु न्यूनत्वं कर्तव्यमिति वाच्ये आधिक्यस्य का सम्भावना येनोक्त- माधिक्यं न कर्तव्यमित्याशङ्क्याह—उत्कर्षसाम्य इति। अपेक्षा जिस अन्य रस का उत्कर्ष निबन्धन करते हैं तब उस (अङ्गी रस) के अविरुद्ध भी रस दोषावह होता है। परन्तु युक्तिपूर्वक अङ्गी रस में अङ्गभावता के प्रकार से उपपत्ति घटती है तो उसके (अङ्गी रस के) विरुद्ध भी रस वक्ष्यमाण विषयभेद आदि के योजन से उपनिबद्धयमान होकर दोषावह नहीं होता, इस प्रकार विरोध और अविरोध नहीं कुछ नहीं करते। केवल विनिवेशन के प्रकार में ही अवधान रखना चाहिए। अङ्गी में 'सप्तमी' अनादरार्थक है, अर्थात् अङ्गी रसविशेष का अनादर करके—तिरस्कार करके अङ्गभूत (रस) का पोषण नहीं करना चाहिए। विरोध नहीं (अविरोधिता)—। अर्थात् निर्दोषता। परिपोष के परिहार में तीन प्रकारों को कहते हैं—'उनमें' इत्यादि से लेकर 'तृतीय' तक। 'न्यूनत्व करना चाहिए' यह जब कि कहना चाहिए ऐसी स्थिति में आधिक्य की सम्भावना हो कौन, जिससे कहा कि 'अधिक्य नहीं करना चाहिए'! यह आशङ्का करके कहते हैं—उत्कर्ष का साम्य होने पर भी—।