ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ननु येषां रसानां परस्पराविरोधः यथा—वीरशृङ्गारयोः शृङ्गार- हास्ययो रौद्रशृङ्गारयोर्वीराद्भुतयोर्वीररौद्रयो रौद्रकरुणयोः शृङ्गाराद्भुत- योर्वा तत्र भवत्वङ्गाङ्गिभावः । तेषां तु स कथं भवेद्येषां परस्परं बाध्य- बाधकभावः । यथा—शृङ्गारबीभत्सयोर्वीरभयानकयोः शान्तरौद्रयोः शान्तशृङ्गारयोर्वा इत्याशङ्क्येदमुच्यते— अविरोधी विरोधी वा रसोऽङ्गिनि रसान्तरे । परिपोषं न नेतव्यस्तथा स्यादविरोधिता ॥ २४ ॥ ( शङ्का ) जिन रसों का परस्पर में अविरोध है, जैसे वीर और शृङ्गार का, शृङ्गार और हास्य का, रौद्र और शृङ्गार का, वीर और अद्भुत का, वीर और रौद्र का, रौद्र और करुण का अथवा शृङ्गार और अद्भुत का। उनमें अङ्गाङ्गिभाव हो । परन्तु उनका वह ( अङ्गाङ्गिभाव ) कैसे होगा जिनका परस्पर में बाध्यबाधक भाव है । जैसे शृङ्गार और बीभत्स का, वीर और भयानक का, शान्त और रौद्र का, अथवा शान्त और शृङ्गार का । यह आशङ्का करके यह कहते हैं— अन्य रस के अङ्गी होने पर अविरोधी अथवा विरोधी रस को परिपोष तक नहीं पहुँचाना चाहिए, इस प्रकार विरोध नहीं होगा ॥ २४ ॥ लोचनम् शृङ्गाराद्भुतयोरिति। यथा रत्नावल्यामैन्द्रजालिकदर्शने। शृङ्गारबीभत्सयोरिति । ययोर्हि परस्परोन्मूलनात्मकतयैवोद्भवस्तत्र कोऽङ्गाङ्गिभावः आलम्बननिमग्न- रूपतया च रतिरुत्तिष्ठति ततः पलायमानरूपतया जुगुप्सेति समानाश्रयत्वेन तयोरन्योन्यसंस्कारोन्मूलनत्वम् । भयोत्साहावप्येवमेव विरुद्धौ वाच्यौ । शान्तस्यापि तत्त्वज्ञानसमुत्थितसमस्तसंसारविषयनिर्वेदप्राणत्वेन सर्वतो निरीहस्वभावस्य विषयासक्तिजीविताभ्यां रतिक्रोधाभ्यां विरोध एव ॥ २३ ॥ अविरोधी विरोधी वेति । वाग्रहणस्यायमभिप्रायः—अङ्गिरसापेक्षया यस्य शृङ्गार और अद्भुत का—। जैसे 'रत्नावली' में ऐन्द्रजालिक के दर्शन के प्रसङ्ग में । शृङ्गार और बीभत्स का—। जिन ( शृङ्गार और बीभत्स का परस्पर उन्मूलनात्मक रूप से ही उद्भव है वहाँ कौन सा अङ्गाङ्गिभाव होगा ? आलम्बन में निमग्नरूपता से रति का उद्भव होता है और उस ( आलम्बन ) से पलायमानरूपता से जुगुप्सा का उदय होता है । इसलिए समानाश्रय रूप से दोनों एक दूसरे के संस्कारों का उन्मूलन करते हैं । भय और उत्साह भी इसी प्रकार विरुद्ध कहे जाने चाहिए । तत्त्वज्ञान से समुत्थित समस्त संसार के विषय में निर्वेद प्राण होने के कारण सब प्रकार से निरीहस्वभाव शान्त का भी विषयासक्ति से अनुप्राणित रति और क्रोध से विरोध ही है ॥ २३ ॥ अविरोधी अथवा विरोधी—। 'अथवा' ग्रहण का यह अभिप्राय है—अङ्गी रस की