ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४१९ ध्वन्यालोकः विरोधो न कश्चित् । प्रत्युत प्रत्युदितविवेकानाम Klingon-not-included अनुसन्धानवतां सचेतसां तथाविधे विषये प्रह्लादातिशयः प्रवर्तते ॥ २३ ॥ किए जाने पर कोई विरोध नहीं है । बल्कि प्रत्युदित विवेक वाले एवं अनुसन्धानशील सहृदयों का उस प्रकार के विषय में अतिशय प्रह्लाद होता है । लोचनम् पञ्चानामर्थप्रकृतीनां वाक्यैकवाक्यतया निवेश उक्तः । तथाविध इति । यथा तापसवत्सराजे । एवमनेन श्लोकेनाङ्गाङ्गितायां दृष्टान्तनिरूपणमितिवृत्तबलापतितत्वं च रसाङ्गाङ्गिभावस्येति द्वयं निरूपितम् । वृत्तिग्रन्थोऽप्युभयाभिप्रायेणैव नेयः । शृङ्गारेण वीरस्याविरोधो युद्धनयपराक्रमादिना कन्यारत्नलाभादौ । हास्यस्य तु स्पष्टमेव तदङ्गत्वम् । हास्यस्य स्वयमपुरुषार्थस्वभावत्वेऽपि समधिकतररञ्जनो- त्पादनेन शृङ्गाराङ्गतयैव तथात्वम् । रौद्रस्यापि तेन कथञ्चिदविरोधः । यथो- क्तम्—'शृङ्गारश्च तैः प्रसभं सेव्यते' । तैरिति रौद्रप्रभृतिभिः रक्षोदानवोद्धत- मनुष्यैरित्यर्थः । केवलं नायिकाविषयमौग्र्यं तत्र परिहर्तव्यम् । असम्भाव्य- पृथिवीसम्मार्जनादिजनितविस्मयतया तु वीराद्भुतयोः समावेशः । यथाह मुनिः—'वीरस्य चैव यत्कर्म सोऽद्भुतः' इति । वीररौद्रयोर्धीरोद्धते भीमसेनादौ समावेशः क्रोधोत्साहयोरविरोधात् । रौद्रकरुणयोरपि मुनिनैवोक्तः— ‘रौद्रस्यैव च यत्कर्म स ज्ञेयः करुणो रसः ।' इति । अर्थ-प्रकृतियों के वाक्यैकवाक्य रूप से निवेश कहा है। उस प्रकार के—। जैसे 'तापसवत्सराज' में । इस प्रकार इस श्लोक से अङ्गाङ्गिभाव में दृष्टान्त का निरूपण और ( इसके अङ्गाङ्गिभाव का ) इतिवृत्त के बल से होना ये दो बातें निरूपण कीं । वृत्तिग्रन्थ को भी दोनों के अभिप्राय से ही समझना चाहिए । शृङ्गार के साथ वीर का अविरोध युद्ध, नीति और पराक्रम आदि द्वारा कन्यारत्न के लाभ आदि में । हास्य तो स्पष्ट ही उस ( शृङ्गार ) का अङ्ग है । हास्य स्वयं अपुरुषार्थ रूप है तथापि सम्यक् प्रकार से अधिकतर रञ्जन के उत्पन्न करने से शृङ्गार के अङ्गरूप से ही उस प्रकार ( पुरुषार्थ ) है । रौद्र का भी उस ( शृङ्गार ) के साथ कथञ्चित् विरोध नहीं । जैसे, कहा है— 'वे लोग शृङ्गार का हठात् सेवन करते हैं' । 'वे लोग' अर्थात् रौद्र प्रभृति राक्षस, दानव और उद्धत मनुष्य । केवल नायिका के सम्बन्ध का औग्र्य वहाँ परिहर्तव्य है । पृथिवी के सम्मार्जन आदि असम्भाव्य कार्यों से विस्मय के उत्पन्न करने के कारण वीर और अद्भुत का समावेश है । जैसे मुनि कहते हैं—'और वीर का ही जो कर्म है वह अद्भुत है' । वीर और रौद्र का धीरोद्धत भीमसेन आदि में समावेश है, क्योंकि क्रोध और उत्साह में विरोध नहीं । रौद्र और करुण में भी मुनि ने ही कहा है— 'रौद्र का ही जो कर्म है उसे करुण रस समझना चाहिए ।'