ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सन्ध्यादिमयस्य प्रबन्धशरीरस्य यथा कार्यमेकमनुयायि व्यापकं कल्प्यते न च तत्कार्यान्तरैर्न सङ्कीर्यते, न च तैः सङ्कीर्यमाणस्यापि तस्य प्राधान्यमपचीयते, तथैव रसस्याप्येकस्य सन्निवेशे क्रियमाणे सन्धि आदि से युक्त प्रबन्ध-शरीर का एक अनुयायी व्यापक कार्य कल्पित करते हैं, ऐसा नहीं कि वह अन्य कार्यों से संकीर्ण नहीं होता और न कि उनसे संकीर्ण होकर भी उसके प्राधान्य का अपचय होता है, उसी प्रकार एक रस के भी सन्निवेश लोचनम् चैतदेवोपपद्यते, कार्यं हि तावदेकमेवाधिकारिकं व्यापकं प्रासङ्गिककार्यान्तरोप- क्रियमाणमवश्यमङ्गीकार्यम् । तत्पृष्ठवर्तिनीनां नायकचित्तवृत्तीनां तन्मूलादेवाङ्गाङ्गि- भावः प्रवाहपतित इति किमत्रापूर्वमिति तात्पर्यम् । तथेति । व्याप्तितया । यदि वा एवकारो भिन्नक्रमः, तथैव तेनैव प्रकारेण कार्याङ्गाङ्गिभावरूपेण रसानामपि बलादेवासावापततीत्यर्थः । तथा च वृत्तौ वक्ष्यति ‘तथैवे’ति । कार्यमिति । ‘स्वल्पमात्रं समुत्सृष्टं बहुधा यद्विसर्पति’ इति लक्षितं बीजम् । बीजात्प्रभृति प्रयोजनानां विच्छेदे यदविच्छेदकारणं यावत्समाप्तिबन्धं स तु बिन्दुः’ इति बिन्दुरूपयार्थप्रकृत्या निर्वहणपर्यन्तं व्याप्नोति तदाह—अनु- यायीति । अनेन बीजं बिन्दुश्चेत्यर्थप्रकृती सङ्गृहीते । कार्यान्तरैरिति । ‘आग- र्भादाविमर्शाद्वा पताका विनिवर्तते’ इति प्रासङ्गिकं यत्पताकालक्षणार्थप्रकृति- निष्ठं कार्यं यानि च ततोऽप्यूनव्याप्तितया प्रकरीलक्षणानि कार्याणि तैरित्येवं और न्याय के अनुसार यही उपपन्न होता है कि प्रासङ्गिक कार्यान्तरों से उपकृत होता हुआ एक ही आधिकारिक व्यापक कार्य अवश्य अङ्गीकार करना चाहिए । उस (कार्य) के पीछे चलने वाली नायक की चित्तवृत्तियों के उसके (अर्थात् कार्यों के अङ्गाङ्गिभाव के) बल से ही अङ्गाङ्गिभाव का क्रम चला है, यहाँ नई बात क्या है यह तात्पर्य है । उस प्रकार—। अर्थात् व्यापक रूप से । अथवा ‘ही’ (एवकार) भिन्न क्रम है, उसी प्रकार उसी प्रकार से कार्य के अङ्गाङ्गिभाव के रूप से रसों का भी बलपूर्वक वह (अङ्गाङ्गिभाव) होगा । जैसा कि वृत्ति में कहेंगे उसी प्रकार— । कार्य—। ‘बीज’ का लक्षण है ‘जो थोड़ी मात्रा में छोड़े जाने पर बहुत प्रकार से फैल जाता है’ । ‘बीज’ से लेकर प्रयोजनों के विच्छेद की स्थिति में जो अविच्छेद का कारण समाप्तिपर्यन्त है वह ‘बिन्दु’ है । इस बिन्दुरूप अर्थप्रकृति से निर्वहणपर्यन्त व्याप्त रहता है उसे कहते हैं—अनुयायी—। इससे ‘बीज’ और ‘बिन्दु’ इन दो अर्थ प्रकृतियों को सङ्गृहीत किया । अन्य कार्यों से—। ‘गर्भ’ अथवा ‘विमर्श’ सन्धिपर्यन्त पताका लौटती है’ इस पताका रूप अर्थ-प्रकृति में रहने वाला प्रासङ्गिक जो कार्य है और जो उससे भी अधिक व्याप्ति रूप से प्रकरी रूप कार्य हैं उनसे, इस प्रकार पाँच