ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४१७ ध्वन्यालोकः प्रबन्धेषु प्रथमतं प्रस्तुत: सन् पुनः पुनरनुसन्धीयमानत्वेन स्थायी यो रसस्तस्य सकलबन्धव्यापिनो रसान्तरैरन्तरालवर्तिभिः समावेशो यः स नाङ्गितामुपहन्ति । एतदेवोपपादयितुमुच्यते— कार्यमेकं यथा व्यापि प्रबन्धस्य विधीयते । तथा रसस्यापि विधौ विरोधो नैव विद्यते ॥ २३ ॥ प्रबन्धों में पहले प्रस्तुत होता हुआ, बार-बार अनुसन्धीयमान होने के कारण स्थायी जो रस है, सकल रचना में व्याप्त रहने वाले उसके मध्यवर्ती रसान्तरों के साथ जो समावेश है वह अङ्गित्वि को उपहत नहीं करता । इसे ही उपपादन करने के लिए कहते हैं— जिस प्रकार प्रबन्ध का एक व्यापक कार्य बनाया जाता है उस प्रकार रस के भी विधान में कोई विरोध नहीं है ॥ २३ ॥ लोचनम् वृत्तव्यापितया भासमानस्य नाङ्गितामुपहन्ति, अङ्गितां पोषयत्येवेत्यर्थः । एतदुक्तं भवति—अङ्गभूतान्यपि रसान्तराणि स्वविभावादिसामग्र्या स्वा- वस्थायां यद्यपि लब्धपरिपोषाणि चमत्कारगोचरतां प्रतिपद्यन्ते, तथापि स चमत्कारस्तावत्येव न परितुष्य विश्राम्यति किं तु चमत्कारान्तरमनुधावति । सर्वत्रैव ह्यङ्गाङ्गिभावेऽयमेवोदन्तः । यथाह तत्रभवान्— गुणः कृतात्मसंस्कारः प्रधानं प्रतिपद्यते । प्रधानस्योपकारे हि तथा भूयसि वर्तते ॥ इति ॥ २२ ॥ उपपादयितुमिति । दृष्टान्तस्य समुचितस्य निरूपणेनेति भावः । न्यायेन होनेवाले उस ( रस ) अङ्गत्व को उपहत ( विघात ) नहीं करता, बल्कि अङ्गत्व को पुष्ट ही करता है । बात यह कही गई—अङ्गभूत भी रसान्तर अपने विभावादि की सामग्री से अपनी अवस्था में यद्यपि परिपोष प्राप्त करके चमत्कारगोचर बन जाते हैं तथापि वह चमत्कार उतने ही तक परितुष्ट होकर विश्राम कर लेता किन्तु अन्य चमत्कार का अनुधावन करता है । क्योंकि सभी अङ्गाङ्गिभाव में यही वृत्तान्त है । जैसा कि कहते हैं— गुण ( अर्थात् अङ्गभूत ) अन्य के अपने संस्कार किये जाने पर प्रधान का अधिका- धिक उपकार करता है ॥ २२ ॥ उपपादन करने के लिए—। भाव यह कि समुचित दृष्टान्त के निरूपण के द्वारा २७ ध्व०