भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 680 में से

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पृष्ठ 450

३९० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र ह्यचिराद्भविष्यन्ति पन्थान इत्यत्र भविष्यन्तीत्यस्मिन् पदे प्रत्ययः कालविशेषाभिधायी रसपरिपोषहेतुः प्रकाशते । अयं हि गाथार्थः प्रवासविप्रलम्भशृङ्गारविभावतया विभाव्यमानो रसवान् । यथात्र प्रत्ययांशो व्यञ्जकस्तथा क्वचित्प्रकृत्यंशोऽपि दृश्यते । यथा— तद्गेहं नतभित्ति मन्दिरमिदं लब्धावगाहं दिवः सा धेनुर्जरती चरन्ति करिणामेता घनाभा घटाः । स क्षुद्रो मुसलध्वनिः कलमिदं सङ्गीतकं योषिता- माश्चर्यं दिवसैर्द्विजोऽयमीयतीं भूमिं समारोपितः ॥ अत्र श्लोके दिवसैरित्यस्मिन् पदे प्रकृत्यंशोऽपि द्योतकः । सर्व- नाम्नां च व्यञ्जकत्वं यथानन्तरोक्ते श्लोके । अत्र च सर्वनाम्नामेव यहां 'शीघ्र ही मार्ग हो जायेंगे' इसमें 'हो जायेंगे' इस पद में प्रत्यय कालविशेष का अभिधान करने वाला एवं रसपरिपोष का हेतु प्रकाशित होता है । यह गाथार्थ प्रवास विप्रलम्भ शृङ्गार के विभाव के रूप में विभाव्यमान होकर रसवान् हो जाता है । जैसे यहां प्रत्ययांश व्यञ्जक है वैसे कहीं पर प्रकृत्यंश भी देखा जाता है । जैसे— झुकी भीतों वाला वह घर (और कहां) यह आकाश का अवगाहन करने वाला (आलीशान) भवन; वह बूढ़ी गाय (और कहां) यह हाथियों का झुण्ड घूम रहा है; वह मूसल की क्षुद्र आवाज (और कहां) यह महिलाओं का अव्यक्त-मधुर सङ्गीत; आश्चर्य है कि (कुछ ही) दिनों में यह ब्राह्मण इस अवस्था तक पहुंचा दिया गया ! इस श्लोक में 'दिनों में' ('दिवसैः') इस पद में प्रकृत्यंश भी द्योतक है । सर्व- नामों का व्यञ्जकत्व जैसे अभी कहे गए (इस) श्लोक में । यहां सर्वनामों के ही व्यञ्जकत्व को कवि ने मन में रख कर 'क्व' इत्यादि शब्द का प्रयोग नहीं किया है । लोचनम् मिति भावः । रसपरिपोषेति । उत्प्रेक्ष्यमाणो वर्षासमयः कम्पकारी किमुत वर्तमान इति ध्वन्यते । अंशांशिकप्रसङ्गादेवाह—यथात्रेति । दिवसार्थो ह्यत्रात्यन्तासम्भाव्यमानतामस्यार्थस्य ध्वनति । सर्वनाम्नां चेति । प्रकृत्यंशस्य चेत्यर्थः । तेन प्रकृत्यंशेन सम्भूय सर्वनामव्यञ्जकं दृश्यत इत्युक्तं रसपरिपोष—। उत्प्रेक्ष्यमाण कम्पकारी वर्षा समय क्या वर्तमान है ? यह ध्वनित होता है । अंशांशिक प्रसंग से ही कहते हैं—जैसे यहाँ—। यहाँ 'दिवस' का अर्थ इस अर्थ की अत्यन्त असम्भाव्यमानता ध्वनित करता है । सर्वनामों का—। अर्थात् प्रकृत्यंश का । उस प्रकृत्यंश के साथ मिलकर सर्वनाम व्यञ्जक