भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 680 में से

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पृष्ठ 451

तृतीय उद्योतः ३९१ ध्वन्यालोकः व्यञ्जकत्वं हृदि व्यवस्थाप्य कविना क्लेत्यादिशब्दप्रयोगो न कृतः । अनया दिशा सहृदयैरन्येऽपि व्यञ्जकविशेषाः स्वयमुत्प्रेक्षणीयाः । एत- च्च सर्वं पदवाक्यरचनाद्योतननोक्त्यैव गतार्थमपि वैचित्र्येण व्युत्पत्तये पुनरुक्तम् । इस ढङ्ग से सहृदयों को अन्य भी व्यञ्जक विशेषों की उत्प्रेक्षा स्वयं करनी चाहिए । यह सब पद, वाक्य और रचना के द्योतन के कथन से ही गतार्थ था तब भी वैचित्र्य से व्युत्पत्ति के लिए फिर से कहा है । लोचनम् भवतीति न पौनरुक्त्यम् । तथा हि तदिति पदं नतभित्तीत्येतत्प्रकृत्यंशसहायं समस्तामङ्गलनिधानभूतां मूषकाद्याकीर्णतां ध्वनति । तदिति हि केवलमुच्य- माने समुत्कर्षातिशयोऽपि संभाव्येत । न च नतभित्तिशब्देनाप्येते दौर्भाग्याय- तनत्वसूचका विशेषा उक्ताः । एवं सा धेनुरित्यादावपि योज्यम् । एवंविधे च विषये स्मरणाकारद्योतकता तच्छब्दस्य । न तु यच्छब्दसंबद्धतेत्युक्तं प्राक् । अत एवात्र तदिदंशब्दादिना स्मृत्यनुभवयोरत्यन्तविरुद्धविषयतासूचनेनाश्चर्य- विभावता योजिता । तदिदंशब्दाद्यभावे तु सर्वमसङ्गतं स्यादिति तदिदमंश- योरेव प्राणत्वं योज्यम् । एतच्च द्विशः सामस्त्यं त्रिशः सामस्त्यमिति व्यञ्जक- मित्युपलक्षणपरम् । तेन लोष्टप्रस्तारन्यायेनानन्तवैचित्र्यमुक्तम् । यद्वक्ष्यत्य- न्येऽपीति । अतिविक्षिप्ततया शिष्यबुद्धिसमाधानं न भवेदित्यभिप्रायेण संक्षिपति—एतच्चेति । वितत्याभिधानेऽपि प्रयोजनं स्मारयति—वैचित्र्येणेति । देखा जाता है, अतः पौनरुक्त्य नहीं है । जैसा कि 'वह' यह पद 'झुकी भीतोंवाला' ('नतभित्ति') इस प्रकृत्यंश की सहायता से समस्त अमङ्गलों का निधानभूत मूषक आदि द्वारा आकीर्णता को ध्वनित करता है। केवल 'वह' ('तत्') कहते तो अतिशय समुत्कर्ष भी सम्भावित होने लगता । न कि (केवल) 'नतभित्ति' शब्द से भी दौर्भाग्य के आयतनत्व के सूचक ये विशेष कहे गए हैं। इस प्रकार 'वह गाय' इत्यादि में भी लगाना चाहिए। इस प्रकार के विषय में 'वह' ('तत्') शब्द स्मरण के आकार का द्योतन करता है, न कि 'जो' ('यत्') शब्द के साथ सम्बद्ध है यह पहले कह चुके हैं। अत एव यहाँ 'तत्' और 'इदं' ('वह' और 'यह') शब्द आदि से स्मृति और अनुभव की अत्यन्त विरुद्धविषयता के सूचन द्वारा आश्चर्य की विभावता योजित की है। 'तत्' और 'इदं' शब्द आदि के अभाव में सब असङ्गत हो जाता, इसलिए 'तत्' और 'इदं' (अर्थात् 'वह' और 'यह') इस अंशों को प्राण (चमत्कारकारी) समझना चाहिए । और यह दो का सामस्त्य और तीन का सामस्त्य व्यञ्जक है, यह उपलक्षण में तात्पर्य रखता है । इस लिए 'लोष्टप्रस्तारन्याय' से अनन्त वैचित्र्य कहा गया । अत्यन्त प्रसृत होने के कारण शिष्य की बुद्धि का समाधान नहीं होगा, इस अभिप्राय से संक्षेप करते हैं—यह सब—। विस्तार करके कथन में भी प्रयोजन की याद दिलाते हैं—वैचित्र्य—।