भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 680 में से

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पृष्ठ 452

३९२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः ननु चार्थसामर्थ्याक्षेप्या रसादय इत्युक्तम्, तथा च सुबादीनां व्यञ्जकत्ववैचित्र्यकथनमनन्वितमेव । उक्तमत्र पदानां व्यञ्जकत्वो- क्त्यवसरे । किञ्चार्थविशेषाक्षेप्यत्वेऽपि रसादीनां तेषामर्थविशेषाणां व्य- ञ्जकशब्दाविनाभावित्वादयथाप्रदर्शितं व्यञ्जकस्वरूपपरिज्ञानं विभज्यो- पयुज्यत एव । शब्दविशेषाणां चान्यत्र च चारुत्वं यद्विभागेनोपदर्शितं तदपि तेषां व्यञ्जकत्वेनैवावस्थितमित्यवगन्तव्यम् । ( शङ्का ) अर्थ की सामर्थ्य से रसादि आक्षिप्त होते हैं यह कहा गया है, फिर सुप् आदि का व्यञ्जकत्व-वैचित्र्य कहना असम्बद्ध ही है ! ( समाधान ) पदों के व्यञ्ज- कत्व के अवसर में इस सम्बन्ध में कह चुके हैं । और भी, रसादि का अर्थविशेष द्वारा आक्षेप स्वीकार करने पर भी उनकी अर्थविशेषों के व्यञ्जक शब्दों के बिना प्रतीति न होने के कारण जैसा कि दिखाया गया है ( उस प्रकार ) व्यञ्जक के स्वरूप का परिज्ञान विभाग करके उपयोगी है ही । यह जानना चाहिए कि अन्यत्र शब्द- विशेषों का जो चारुत्व अलग-अलग दिखाया गया है वह भी उनके व्यञ्जकत्व से ही व्यवस्थित है । लोचनम् नन्विति । पूर्वं निर्णीतमप्येतदविस्मरणार्थमधिकामिधानार्थं चाक्षिप्तम् । उक्तमत्रेति । न वाचकत्वं ध्वनिव्यवहारोपयोगि येनावाचकस्य व्यञ्जकत्वं न स्यात् इति प्रागेवोक्तम् । ननु न गीतादिवद्रसाभिव्यञ्जकत्वेऽपि शब्दस्य तत्र व्यापारोऽस्त्येव; स च व्यञ्जनात्मकैवेति भावः । एतच्चास्माभिः प्रथमोद्द्योते निर्णीतचरम् । न चेदमस्माभिरपूर्वमुक्तमित्याह—शब्दविशेषाणां चेति । अन्यत्रेति । भामहविवरणे । विभागेनेति । स्रक्चन्दनादयः शब्दाः शृङ्गारे चारवो बीभत्से त्वचारव इति रसकृत एव विभागः । रसं प्रति च शब्दस्य व्यञ्जकत्वमेवेत्युक्तं प्राक् । ( शङ्का )—। पहले निर्णीत होने पर भी भूल न जाय इसके लिए और अधिक बात कहने के लिए आक्षेप किया है । इस सम्बन्ध में कह चुके हैं—। यह पहले ही कह चुके हैं कि वाचकत्व ध्वनि के व्यवहार में उपयोगी नहीं है, जिससे अवाचक का व्यञ्जकत्व नहीं होता । भाव यह कि गीतादि की भाँति रसाभिव्यञ्जक होने पर भी शब्द का उसमें व्यापार नहीं है और वह ( शब्द ) व्यञ्जनरूप ही है । इसे हम प्रथम उद्योत में निर्णय कर चुके हैं । न कि यह बिलकुल अपूर्व बात कही है, यह कहते हैं— शब्दविशेषों का—। अन्यत्र—भामह के विवरण में । अलग-अलग— माला, चन्दन आदि शब्द शृङ्गार में सुन्दर और बीभत्स में असुन्दर हैं, इस प्रकार विभाग रसकृत ही है । यह पहले कह चुके हैं कि रस के प्रति शब्द का व्यञ्जकत्व ही है ।