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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

३८० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अलक्ष्यक्रमो ध्वनेरात्मा रसादिः सुब्विशेषैस्तिङ्विशेषैर्वचनविशे- षैः सम्बन्धविशेषैः कारकशक्तिभिः कृद्विशेषैस्तद्धितविशेषैः समासैश्चेति । चशब्दान्निपातोपसर्गकालादिभिः प्रयुक्तैरभिव्यज्यमानो दृश्यते । यथा— न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरयस्तत्राप्यसौ तापसः सोऽप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः । धिग्धिग्छक्रजितं प्रबोधितवता किं कुम्भकर्णेन वा स्वर्गग्रामटिकाविलुण्ठनवृथोच्छूनैः किमेभिर्भुजैः ॥ अलक्ष्यक्रम ध्वनि का आत्मा रसादि प्रयुक्त सुब्विशेष, तिङ्विशेष, वचनविशेष, सम्बन्धविशेष, कारक-शक्ति, कृद्विशेष, तद्धितविशेष और समासों से, ‘और’ ( च ) शब्द से, निपात, उपसर्ग, काल आदि से अभिव्यक्त होता हुआ देखा जाता है । जैसे— यही मेरा न्यक्कार ( अपमान ) है, कि मेरे शत्रु हैं, उसमें भी वह तापस है, वह भी यहीं पर राक्षसकुल का हनन कर रहा है, अहो ! रावण भी जी रहा है । इन्द्रजित् मेघनाद को धिक्कार है, धिक्कार है, जगाए गए कुम्भकर्ण से क्या लाभ और स्वर्ग की गांटिया को विलुण्ठन के कारण वृथा ही ( अभिमान से ) फूली इन मेरी भुजाओं से क्या लाभ ? लोचनम् च वाक्यशेषोऽध्याहार्यः विभावादिव्यञ्जनद्वारतया पारम्पर्येणेत्येवंरूपः। ममारय इति। मम शत्रुसद्भावो नोचित इति सम्बन्धानौचित्यं क्रोधविभावं व्यनक्ति अरय इति बहुवचनम् । तपो विद्यते यस्येति पौरुषकथाहीनत्वं तद्धितेन मत्वर्थीयेना- भिव्यक्तम् । तत्रापिशब्देन निपातसमुदायेनात्यन्तासम्भावनीयत्वम् । मत्कर्तृका यदि जीवनक्रिया तदा हननक्रिया तावदनुचिता। तस्यां च स कर्ता अपिशब्दे- न मनुष्यमात्रकम् । अत्रैवेति-मदधिष्ठितो देशोऽधिकरणम् निःशेषेण हन्यमा- ‘व्यञ्जकत्व दिखाई देता है’ इत्यादि में ‘विभावादि के व्यञ्जन के द्वारा परम्परा से’ इस प्रकार का वाक्यशेष अध्याहार कर लेना चाहिए। मेरे शत्रु—। ‘शत्रु’ यह बहुवचन ‘मेरे शत्रु का होना उचित नहीं’ यह सम्बन्धानौचित्य रूप क्रोध के विभाव को व्यञ्जित करता है । ‘तप विद्यमान है जिसका’ इस यत्वर्थीय तद्धित से पुरुषार्थ का अभाव अभि- व्यक्त होता है । निपातसमुदाय रूप ‘तत्रापि’ ( उसमें भी ) शब्द से अत्यन्त असम्भव- नीयता ( अभिव्यक्त होती है )। यदि मैं जी रहा हूं तब हननकार्य अनुचित है । और उस ( क्रिया ) में वह कर्ता, ‘भी’ ( अपि ) शब्द कुत्सित मनुष्यमात्र । यहीं पर—। मेरे द्वारा अधिष्ठित देश अधिकरण, निःशेष रूप से हन्यमान होने से और राक्षसबल

तृतीय उद्योतः ३८१ ध्वन्यालोकः अत्र हि श्लोके भूयसा सर्वेषामप्येषां स्फुटमेव व्यञ्जकत्वं दृश्य- ते । तत्र 'मे यदरयः' इत्यनेन सुप्सम्बन्धवचनानामभिव्यञ्जकत्वम् । 'तत्राप्यसौ तापस' इत्यत्र तद्धितनिपातयोः । 'सोऽप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः' इत्यत्र तिङ्कारक शक्तीनाम् । 'धिग्वि- क्छक्रजितम्' इत्यादौ श्लोकार्धे कृत्तद्धितसमासोपसर्गाणाम् । एवंवि- इस श्लोक में बहुशः इन सभी का व्यञ्जकत्व दिखाई देता है। उनमें से 'कि मेरे शत्रु हैं' इससे सुप्, सम्बन्ध और वचन का अभिव्यञ्जकत्व है। 'उनमें भी वह तापस है' यहां तद्धित और निपात का । 'वह भी यहीं पर राक्षसकुल का हनन कर रहा है, अहो रावण जी रहा है !' यहां तिङ् और कारक-शक्तियों का। 'इन्द्रजित् (मेघनाद) को धिक्कार है' इत्यादि श्लोकार्ध में कृत्, तद्धित, समास और उपसर्ग लोचनम् नतया राक्षसबलं च कर्मेति तदिदमसंभाव्यमानमुपनतमिति पुरुषकारासम्प- त्तिर्ध्वन्यते तिङ्कारकशक्तिप्रतिपादकैश्च शब्दैः । रावण इति त्वर्थान्तरसङ्क्रमि- तवाच्यत्वं पूर्वमेव व्याख्यातम् । धिग्धिगिति निपातस्य शक्रं जितवानित्याख्या- यिकेयमिति उपपदसमासेन सहकृतः स्वर्गेत्यादिसमासस्य स्वपौरुषानुस्मरणं प्रति व्यञ्जकत्वम् । ग्रामटिकेति स्वार्थिकतद्धितप्रयोगस्य स्त्रीप्रत्ययसहितस्या- बहुमानास्पदत्वं प्रति, विलुण्ठनशब्दे विशब्दस्य निर्दयावस्कन्दनं प्रति व्यञ्जक- त्वम् । वृथाशब्दस्य निपातस्य स्वात्मपौरुषनिन्दां प्रति व्यञ्जकता । भुजैरिति बहुवचनेन प्रत्युत भारमात्रमेतदिति व्यज्यते । तेन तिलशस्तिलशोऽपि विभ- ज्यमानेऽत्र श्लोके सर्व एवांशो व्यञ्जकत्वेन आतीति किमन्यत् । एतदर्थप्रदर्श- नस्य फलं दर्शयति-एवमिति । एकस्य पदस्येति यदुक्तं तदुदाहरति-यथात्रेति । (राक्षसकुल) कर्म, यह सम्भव नहीं होकर सम्भव हो रहा है, इस प्रकार पौरुष का अभाव तिङ् और कारकशक्ति के प्रतिपादक शब्दों से ध्वनित हो रहा है। 'रावण' (कम्पित कर देने वाला) यह अर्थान्तर सङ्क्रमितवाच्यत्व पहले ही व्याख्यान किया जा चुका है। 'शक्र को जीता है' यह आख्यायिका है, इस उपपद समास का साथ देने वाला 'धिक्, धिक्' इस निपात (व्यञ्जक है), स्वर्ग० इत्यादि समास अपने पौरुष के अनुस्मरण के प्रति व्यञ्जक है। 'ग्रामटिका (गउंटिया) इस स्त्री प्रत्यय सहित स्वार्थिक तद्धित प्रयोग का अबहुमानास्पदत्व के प्रति और 'विलुण्ठन' शब्द में 'वि' शब्द का निर्दयतापूर्वक अवस्कन्दन (आक्रमण) के प्रति व्यञ्जकत्व है। निपात 'वृथा' शब्द की अपने पौरुष की निन्दा के प्रति व्यञ्जकता है। 'भुजाओं से' इस बहुवचन से 'प्रत्युत यह भार मात्र है' यह व्यक्त होता है। इस प्रकार तिल-तिल विभाग करने पर इस श्लोक में सभी अंश व्यञ्जक रूप में प्रतीत होता है, और क्या ? इस अर्थ के प्रदर्शन का फल दिखाते हैं—इस प्रकार—। 'एक पद का' जो कहा है उसका उदाहरण देते

३८२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः धस्य व्यञ्जकभूयस्त्वे च घटमाने काव्यस्य सर्वातिशायिनी बन्ध- च्छाया समुन्मीलति । यत्र हि व्यङ्ग्यावभासिनः पदस्यैकस्यैव ताव- दाविर्भावस्तत्रापि काव्ये कापि बन्धच्छाया किमुत यत्र तेषां बहूनां समवायः । यथात्रानन्तरोदितश्लोके । अत्र हि रावण इत्यस्मिन् पदे- ऽर्थान्तरसंक्रमितवाच्येन ध्वनिप्रभेदेनालङ्कृतेऽपि पुनरनन्तरोक्तानां का। इस प्रकार के (प्रयोग का) बहुशः व्यञ्जकत्व के घटित होने से काव्य की सर्वातिशायिनी बन्धच्छाया समुन्मीलित होती है। जहां कि व्यङ्ग्य को अवभासित करने वाले एक ही पद का आविर्भाव है वहाँ भी काव्य में बन्धच्छाया है, जहां उन बहुतों का समवाय है (वहां) क्या कहना ? जैसा कि अभी उदाहृत श्लोक में। यहां ‘रावण’ इस पद के ध्वनि के प्रभेद अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य के द्वारा अलंकृत होने पर लोचनम् अतिक्रान्तं न तु कदाचन वर्तमानतामवलम्बमानं सुखं येषु ते काला इति, सर्व एव न तु सुखं प्रति वर्तमानः स कोऽपि काललेश इत्यर्थः । प्रतीपान्युप- स्थितानि वृत्तानि प्रत्यावर्तमानमनानि तथा दूरभावीन्यपि प्रत्युपस्थितानि निक- टतया वर्तमानानि भवन्ति दारुणानि दुःखानि येषु ते । दुःखं बहुप्रकारमेव प्रतिवर्तमानाः सर्वे कालांशा इत्यनेन कालस्य तावन्निर्वेदमभिव्यञ्जयतः शान्त- रसव्यञ्जकत्वम् । देशस्याप्याह-पृथिवी श्वः श्वः प्रातः प्रातर्दिनादिनं पापीय- दिवसाः पापानां सम्बन्धिनः पापिष्ठजनस्वामिका दिवसा यस्यां सा तथो- क्ता । स्वभावत एव तावत्कालो दुःखमयः तत्रापि पापिष्ठजनस्वामिकपृथिवी- लक्षणदेशदौरात्म्याद्विशेषतो दुःखमय इत्यर्थः । तथा हि श्वः श्व इति दिनादिनं गतयौवना वृद्धस्त्रीवदसंभाव्यमानसंभोगा गतयौवनतया हि यो यो दिवस आगच्छति स स पूर्वपूर्वापेक्षया पापीयान् निकृष्टत्वात् । यदि वेयसुनन्तोऽयं हैं—जैसे यहां—। वे समय जिनमें सुख अतिक्रान्त हो गया है, न कि वर्तमानता को अवलम्बन कर रहा है, अर्थात् सभी, न कि सुख के प्रति वर्तमान वह कोई भी काललेश। जिन (समयों) में प्रतिकूल दारुण दुःख गये भी पुनः लौटे हुए और दूर काल में होने- वाले भी निकट रूप से वर्तमान मालूम होते हैं। बहुत प्रकार के ही दुःख को प्रवर्तित करते हुए सभी कालांश हैं, इस प्रकार निर्वेद की व्यञ्जना करते हुए काल का शान्त- रसव्यञ्जकत्व है। देश का भी कहते हैं—पृथिवी हर सुबह, दिन-दिन पापीयदिवसा है अर्थात् पापों के सम्बन्धी, पापिष्ठ जन स्वामी हैं जिनमें ऐसे दिवसों वाली है। अर्थात् स्वभावतः ही दुःखमय है, उसमें भी स्वामी के रूप में पापिष्ठ जनों वाले पृथ्वि के रूप में देश के दौरात्म्य के कारण विशेष रूप से दुःखमय है। जैसा कि दिन-दिन गतयौवना स्त्री की भांति असम्भाव्यमान सम्भोग वाली। यौवन के चले जाने पर जो-जो दिन आता है वह-वह पूर्व-पूर्व की अपेक्षा पापीयान् होता है, क्योंकि निकृष्ट होता है।

तृतीय उद्योतः ३८३ ध्वन्यालोकः व्यञ्जकप्रकाराणामुद्भासनम् । दृश्यन्ते च महात्मनां प्रतिभाविशेषभा- जां बाहुल्येनैवंविधा बन्धप्रकाराः । यथा महर्षेर्व्यासस्य— अतिक्रान्तसुखाः कालाः प्रत्युपस्थितदारुणाः । श्वः श्वः पापीयदिवसा पृथिवी गतयौवना ॥ अत्र हि कृत्तद्धितवचनैरलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यः, 'पृथिवी गतयौवना' इत्यनेन चात्यन्ततिरस्कृतवाच्यो ध्वनिः प्रकाशितः । एषां च सुबादीनामेकैकशः समुदितानां च व्यञ्जकत्वं महाकवी- नां प्रबन्धेषु प्रायेण दृश्यते । सुबन्तस्य व्यञ्जकत्वं यथा— तालैः शिञ्जललयसुभगैः कान्तया नर्तितो मे यामध्यास्ते दिवसविगमे नीलकण्ठः सुहृद्वः ॥ भी अभी कहे गए व्यञ्जक प्रकारों का उद्भासन है । प्रतिभाविशेष वाले महात्माओं के बहुशः इस प्रकार के बन्धप्रकार देखे गए हैं । जैसे, महर्षि व्यास का—सुख के समय समाप्त हो गए और दुःख के समय उपस्थित हैं, गतयौवना पृथिवी के उत्तरोत्तर बुरे दिन आ रहे हैं । यहां कृत्, तद्धित और वचन से अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य और 'गतयौवना पृथिवी' से अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य ध्वनि प्रकाशित है । इन सुप् आदि का अलग-अलग और मिल कर व्यञ्जकत्व महाकवियों के प्रबन्धों में प्रायः देखा जाता है । सुबन्त का व्यञ्जकत्व, जैसे— मेरी प्रियतमा द्वारा वलय के झंकारों से सुन्दर तालियां बजा कर नचाया गया तुम्हारा सुहृद मयूर सन्ध्याकाल में जिस ( वासयष्टि ) पर बैठता है । लोचनम् शब्दो मुनिनैव प्रयुक्तो णिजन्तो वा । अत्यन्तेति । सोऽपि प्रकारोऽस्यैवाङ्गता- मेतीति भावः । सुबन्तस्येति । समुदितत्वे तूदाहरणं दत्तं व्यस्तत्वे चोच्यत इति भावः । तालैरिति बहुवचनमनेकविधं वैदग्ध्यं ध्वनत् विप्रलम्भोद्दीपकतामेति । अथवा इयसुन्त शब्द का मुनि ने ही प्रयोग किया है ( यह आर्ष प्रयोग है ), या णिजन्त है । अत्यन्त—। भाव यह कि वह भी प्रकार इसी का अङ्ग हो जाता है । सुबन्त का—। भाव यह कि मिल कर ( व्यञ्जकत्व ) में तो उदाहरण दे दिया, अब अलग-अलग ( व्यञ्जकत्व ) में कहते हैं । तालियां—यह बहुवचन अनेक विध वैदग्ध्य को ध्वनित करता हुआ विप्रलम्भ का उद्दीपक हो रहा है ।

३८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तिङन्तस्य यथा— अवसर रोउं चिअ णिम्मिआईं मा पुंस मे हअच्छीईं । दंसणमेत्तुम्मुत्तेहिं जहिं हिअअं तुह ण णाअम् ॥ यथा वा— मा पन्थं रुन्धीओ अवेहि बालअ अहोसि अहिरीओ । अम्हेअ णिरिच्छाओ सुण्णघरं रक्खिदव्वं णो ॥ तिङन्त का, जैसे— हटो, मेरी हत आंखें रोने के लिए ही बनी हैं, ( इन्हें ) मत बढ़ावो, दर्शनमात्र से उन्मत्त जिन्होंने तुम्हारे इस प्रकार के हृदय को नहीं जाना । अथवा जैसे— नासमझ रास्ता मत रोको, हटो, अहो, तुम तो निर्लज्ज हो । हम परतन्त्र हैं, क्योंकि हमें अपने सूने घर की रखवाली करनी है । लोचनम् अपसर रोदितुमेव निर्मिते मा पुंसय हते अक्षिणी मे । दर्शनमात्रोन्मत्ताभ्यां याभ्यां तव हृदयमेवंरूपं न ज्ञातम् ॥ उन्मत्तो हि न किञ्चिज्जानातीति न कस्याप्यत्रापराधः दैवेनेत्थमेव निर्माणं कृतमिति । अपसर मा वृथा प्रयास कार्षीः दैवस्य विपरिवर्तयितुमशक्यत्वा-दिति तिङन्तो व्यञ्जकः तदनुगृहीतानि पदान्तराण्यपीति भावः । मा पन्थानं रुधः अपेहि बालक अप्रौढ अहो असि अह्रीकः । वयं परतन्त्रा यतः शून्यगृहं मामकं रक्षणीयं वर्तते ॥ इत्यत्रापेहीति तिङन्तमिदं ध्वनति—त्वं तावदप्रौढो लोकमध्ये यदेवं प्रकाश-यसि । अस्ति तु सङ्केतस्थानं शून्यगृहं तत्रैवागन्तव्यमिति । 'अन्यत्र व्रज बालक' अप्रौढ बुद्धे स्नान्तीं मां कि प्रकर्षेणालोकयेत्येतत् । भो इति सोल्लुण्ठ-माह्वानम् । जायाभीरुकाणां सम्बन्धितटमेव न भवति । अत्र जायातो ये क्योंकि उन्मत्त कुछ नहीं समझता, इसलिए यहां किसी का अपराध नहीं, दैव ने ऐसा ही निर्माण किया है । भाव यह कि हटो, व्यर्थ प्रयास मत करो, दैव का परिवर्तन नहीं किया जा सकता, इस प्रकार तिङन्त व्यञ्जक है और उसके द्वारा अनुगृहीत पदान्तर भी ( व्यञ्जक ) हैं । यहां 'हटो' यह तिङन्त यह ध्वनित करता है—तुम अप्रौढ़ हो, लोगों के बीच इसे खोल दोगे, सङ्केतस्थान शून्य गृह है, वहीं आना । हे अप्रौढ़ बुद्धि वाले बाल अन्यत्र चले जाओ, स्नान करती हुई मुझे क्यों गुरेर कर देखता है 'अरे' ( भो ), यह सपरिहास आह्वान है । पत्नी से डरने वालों का यह तट ही नहीं होता । यहां पत्नी से जो डरने

तृतीय उद्योतः ३८५ ध्वन्यालोकः सम्बन्धस्य यथा— अण्णत्त वच्च बालअ हा अन्ति किं मं पुलोएसिएअम् । भो जाआभीरुआणं तडं विअण होई ॥ कृतकप्रयोगेषु प्राकृतेषु तद्धितविषये व्यञ्जकत्वमावेद्यत एव । अवज्ञातिशये कः । समासानां च वृत्त्यौचित्येन विनियोजने । निपा- तानां व्यञ्जकत्वं यथा— अयमेकपदे तया वियोगः प्रियया चोपनतः सुदुःसहो मे । नववारिधरोदयादहोभिर्भवितव्यं च निरातपार्द्धरम्यैः ॥ सम्बन्ध का जैसे— नासमझ, यहां से हट जा, स्नान करती हुई मुझे क्यों गुरेर कर देखता है, अरे, पत्नी से डरने वालों का यह तट नहीं है ! प्राकृतों में 'क' ( प्रत्यय ) के प्रयोग किए जाने पर तद्धित के विषय में व्यञ्जकत्व प्रतीत किया ही जाता है । ( यहां ) अवज्ञातिशय में 'क' ( प्रयुक्त है ) । और वृत्ति के औचित्य के अनुसार योजना करने पर समासों का ( व्यञ्जकत्व होता है ) । निपातों का व्यञ्जकत्व, जैसे— यह एक साथ ही प्रिया के साथ असह्य मेरा वियोग उपस्थित हो गया और नये बादलों के उमड़ पड़ने से दिन भी आतपरहित, छोटे और रम्य होने लगे । लोचनम् भीरवस्तेषामेतत्स्थानमिति दूरापेतः सम्बन्ध इत्यनेन सम्बन्धेनेर्ष्यातिशयः प्रच्छन्नकामिन्याभिव्यक्तः । कृतकेति कग्रहणं तद्धितोपलक्षणार्थम् । कृतः कप्रत्य- यप्रयोगो येषु काव्यवाक्येषु यथा जायाभीरुकाणामिति । ये ह्यरसज्ञा धर्म- पत्नीषु प्रेमपरतन्त्रास्तेभ्यः कोऽन्यो जगति कुत्सितः स्यादिति कप्रत्ययोऽव- ज्ञातिशयद्योतकः । समासानां चेति । केवलानामेव व्यञ्जकत्वमावेद्यत इति सम्बन्धः । वाले हैं उनका यह स्थान है, यह सम्बन्ध दूरापेत ( अर्थात् बिलकुल नहीं ) है, इस ( षष्ठ्यर्थ ) सम्बन्ध से प्रच्छन्न कामिनी ने ईर्ष्यातिशय अभिव्यक्त किया । 'क' के प्रयोग—। 'क' ग्रहण तद्धित के उपलक्षणार्थ है, किया गया है 'क' प्रत्यय का प्रयोग जिन काव्यवाक्यों में, जैसे 'जायाभीरुकाणाम्' जो अरसज्ञ अपनी धर्मपत्नियों में ही प्रेम- परतन्त्र होते हैं, उनसे ( बढ़कर ) कौन दूसरा संसार में कुत्सित होगा ? इस अवज्ञा- तिशय का 'क' प्रत्यय द्योतक है । समासों का—। सम्बन्ध यह है कि केवल ( समासों ) का ही व्यञ्जकत्व सूचित किया जाता है । २५ ध्व०

३८६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इत्यत्र चशब्दः । यथा वा — मुहुराङ्गुलिसंवृताधरोष्ठं प्रतिषेधाक्षरविक्लवाभिरामम् । मुखमंसविवर्ति पक्ष्मलाक्ष्याः कथमप्युन्नमितं न चुम्बितं तु ॥ अत्र तुशब्दः । निपातानां प्रसिद्धमपीह द्योतकत्वं रसापेक्षयोक्त- मिति द्रष्टव्यम् । उपसर्गाणां व्यञ्जकत्वं यथा— नीवाराः शुकगर्भकोटरमुखभ्रष्टास्तरूणामधः प्रस्निग्धाः क्वचिदिङ्गुदीफलभिदः सूच्यन्त एवोपलाः । विश्वासोपगमादभिन्नगतयः शब्दं सहन्ते मृगा- स्तोयाधारपथाश्च वल्कलशिखानिष्यन्दलेखाङ्किताः ॥ यहां 'और' शब्द । अथवा, जैसे— बार-बार अङ्गुलियों से ढंके गए अधरोष्ठ वाले, निषेध के अक्षर ( 'नहीं' आदि ) और व्याकुलता से अभिराम ( उस ) पक्ष्मल आँखों वाली ( शकुन्तला ) के कंधे पर मुड़े हुए मुख को किसी प्रकार ऊपर उठा लिया, परन्तु चूम नहीं सका । यहां 'तु' शब्द । यद्यपि निपातों का द्योतकत्व प्रसिद्ध है तथापि यहां ( उनका द्योतकत्व ) रस की अपेक्षा से समझना चाहिए । उपसर्गों का व्यञ्जकत्व, जैसे— नीवार सुग्गों के खोड़लों के अग्रभाग से गिर कर वृक्षों के नीचे पड़े हैं । कहीं पर चिकने पत्थर सूचित करते हैं कि इनसे इंगुदी के फलों का भेदन किया जाता है । हिरण विश्वस्त हो जाने से अभिन्नगति होकर शब्द को सहन करते हैं और जल के बहाव के मार्ग वल्कलों ( वृक्ष की छालों ) के अग्रभाग से टपकती हुई बूंदों की रेखा से अंकित हैं । लोचनम् चशब्द इति जातावेकवचनम् । द्वौ चशब्दावेवमाहतुः काकतालीयन्यायेन गण्डस्योपरि स्फोट इतिवत्तद्वियोगश्च वर्षासमयश्च सममुपगतौ एतदलं प्राणहर- णाय । अत एव रम्यपदेन सुतरामुद्दीपनविभावत्वमुक्तम् । तुशब्द इति । पश्चा- त्तापसूचकस्सन् तावन्मात्रपरिचुम्बनलाभेनापि कृतकृत्यता स्यादिति ध्वनतीति भावः । प्रसिद्धमपीति। वैयाकरणादिगृहेषु हि प्राक्प्रयोगस्वातन्त्र्यप्रयोगाभावात्- 'और' शब्द जाति में एकवचन है । दो 'और' ( 'च' ) शब्द इस प्रकार कहते हैं—काकतालीयन्याय से गण्ड के ऊपर फोड़े की भांति उसका वियोग और वर्षाकाल दोनों साथ ही प्राप्त हो गए हैं, यह प्राणहरण के लिए काफी है । अतएव 'रम्य' पद से सुतरां उद्दीपन विभाव को कहा है । 'तु' शब्द—। भाव यह कि पश्चात्ताप का सूचक होता हुआ उतने मात्र परिचुम्बन के लाभ से भी कृतकृत्यता ही यह ध्वनित करता है । प्रसिद्ध है तथापि—। भाव यह कि वैयाकरण आदि के घरों में ( धातु के ) पहले

तृतीय उद्योतः ३८७ ध्वन्यालोकः इत्यादौ। द्वित्राणां चोपसर्गाणामेकत्र पदे यः प्रयोगः सोऽपि रसव्यक्त्यनुगुणतयैव निर्दोषः। यथा—'प्रभ्रश्यत्युत्तरीयत्विषि तमसि समुद्वीक्ष्य वीतावृतीन्द्राग्जन्तून्' इत्यादौ। यथा वा—'मनुष्यवृत्त्या समुपाचरन्तम्' इत्यादौ। इत्यादि में। दो-तीन उपसर्गों का भी एक पद में जो प्रयोग है वह भी रस की व्यञ्जना के अनुगुण रूप से ही निर्दोष है। जैसे—उत्तरीय की भांति अन्धकार के विगलित हो जाने पर सद्यः जन्तुओं को आवरण से रहित देखकर०, इत्यादि में (समुद्वीक्ष्य = देखकर इस स्थल में)। अथवा, जैसे—मनुष्य के व्यापार से समुपा- चरण करते हुए को०, इत्यादि में। लोचनम् षष्ठ्याद्यश्रवणालिङ्गसंख्याविरहाच्च वाचकवैलक्षण्येन द्योतका निपाता इत्युद्धो- ष्यत एवेति भावः। प्रकर्षेण स्निग्धा इति प्रशब्दः प्रकर्षं द्योतयन्निङ्गुदीफलानां सरसत्वमाचक्षाण आश्रमस्य सौन्दर्यातिशयं ध्वनति। 'तापसस्य फलविशेष- विषयोऽभिलाषातिरेको ध्वन्यते' इति त्वसत्; अभिज्ञानशाकुन्तले हि राज्ञ इयमुक्तिर्न तापसस्येत्यलम्। द्वित्राणामित्यनेनाधिक्यं निरस्यति। सम्यगुच्चै- र्विशेषेणोेक्षितत्वे भगवतः कृपातिशयोऽभिव्यक्तः। मनुष्यवृत्त्या समुपाचरन्तं स्वबुद्धिसामान्यकृतानुमानाः। योगीश्वरैरप्यसुबोधमीश त्वां बोद्धुमिच्छन्त्यबुधाः स्वतकैः॥ सम्यग्भूतमुपांशुकृत्वा आ समन्ताच्चरन्तमित्यनेन लोकानुजिघृक्षातिशय- स्तत्तदाचरतः परमेश्वरस्य ध्वनितः। ही प्रयोग होने, स्वतन्त्र रूप से प्रयोग न होने, षष्ठी आदि के श्रवण न होने और लिङ्ग तथा संख्या के न होने के कारण निपात शब्द वाचक शब्द से विलक्षण रूप से द्योतक घोषित किए गए हैं। (प्रस्निग्धाः) अर्थात् 'प्रकर्षेण स्निग्धाः' इसमें 'प्र' शब्द प्रकर्ष द्योतित करता और इङ्गुदीफलों का सरसत्व कहता हुआ आश्रम के अतिशय सौन्दर्य को ध्वनित करता है। 'तापस का फलविशेष के सम्बन्ध में अभिलाषातिरेक ध्वनित होता है' यह (व्याख्यान) गलत है, क्योंकि 'अभिज्ञानशाकुन्तल' में यह राजा की उक्ति है, न कि तापस की, इत्यलम्। दो-तीन इस (कथन) से आधिक्य का निरास करते हैं। (समुद्वीक्ष्य = देखकर) सम्यक् अर्थात् उच्चैः, विशेष रूप से ईक्षित (दृष्ट) होने में भगवान् (सूर्य) का कृपातिशय अभिव्यक्त होता है। मनुष्य के व्यापार से समुपाचरण करते हुए, योगीश्वरों द्वारा भी दुर्बोध आपको हे ईश, अपनी सामान्य बुद्धिसे अनुमान करके अबुध जन अपने तर्कों से जानना चाहते हैं। 'सम्यक् भूतमुपांशुकृत्वा आ समन्तात् चरन्तं' इससे तत् तत् का आचरण करते हुए परमेश्वर का लोकानुग्रह का इच्छातिशय अभिव्यक्त किया।

३८८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः निपातानामपि तथैव। यथा—‘अहो बतासि स्पृहणीयवीर्यः’ इत्यादौ। यथा वा— ये जीवन्ति न मान्ति ये स्म वपुषि प्रीत्या प्रनृत्यन्ति च प्रस्यन्दिप्रमदाश्रवः पुलकिता दृष्टे गुणिन्यूर्जिते। हा धिक्कष्टमहो क्व यामि शरणं तेषां जनानां कृते नीतानां प्रलयं शठेन विधिना साधुद्विषः पुष्यता॥ इत्यादौ। पदपौनरुक्त्यं च व्यञ्जकत्वापेक्षयैव कदाचित्प्रयुज्यमानं शोभा- मावहति। यथा— यद्वञ्चनाहितमतिर्बहुचाटुगर्भं कार्योन्मुखः खलजनः कृतकं ब्रवीति। निपातों का भी उसी प्रकार। जैसे—'अहो तुम स्पृहणीय पराक्रम वाले हो!' इत्यादि में। अथवा, जैसे— गुणीजन की वृद्धि देख कर आनन्द के अश्रु प्रवाहित करने वाले एवं पुलकित होने वाले जो व्यक्ति जीवित हैं, (खुशी के मारे) जो अपने शरीर में अंट नहीं पाते, प्रीति से नृत्य करने लग जाते हैं, उन जनों के लिए, जिन्हें दुष्टों को प्रश्रय देने वाले शठ विधाता ने समाप्त कर डाला है, किसकी शरण में जाऊं? हा धिक् कष्टम्! इत्यादि में। पदपौनरुक्त्य भी व्यञ्जकत्व की अपेक्षा से ही कदाचित् प्रयुज्यमान होकर शोभा प्राप्त करता है। जैसे— जो कि धोखा देने में लगी बुद्धि वाला, काम निकालने वाला दुष्ट जन बहुत लोचनम् तथैवेति। रसव्याञ्जकत्वेन द्वित्राणामपि प्रयोगो निर्दोष इत्यर्थः। श्लाघा- तिशयो निर्वेदातिशयश्च अहो बतेति हा धिगिति च ध्वन्यते। प्रसङ्गात्पौन- रुक्त्यान्तरमपि व्यञ्जकमित्याह—पदपौनरुक्त्यमिति। पदग्रहणं वाक्यादेरपि उसी प्रकार—। अर्थात् रसके व्यञ्जक रूप से दो-तीन (निपातों) का प्रयोग निर्दोष है। 'अहो' 'बत' 'हा' 'धिक्' से श्लाघातिशय और निर्वेदातिशय ध्वनित होते हैं। प्रसङ्ग से 'पौनरुक्त्यान्तर भी व्यञ्जक है, यह कहते हैं—पदपौनरुक्त्य—। 'पद' ग्रहण वाक्यादि का भी यथासम्भव उपलक्षण है। समझते हैं—। 'वे ही सब कुछ

तृतीय उद्योतः ३८९ ध्वन्यालोकः तत्साधवो न न विदन्ति विदन्ति किन्तु कर्तुं वृथाप्रणयमसय न पारयन्ति ॥ इत्यादौ । कालस्य व्यञ्जकत्वं यथा— समविसमर्णिविसेसा समन्तओ मन्दमन्दसंआरा । अइरा होहिन्ति पहा मणोरहाणं पि दुल्लंघा ॥ [ समविषमनिर्विशेषाः समन्ततो मन्दमन्दसञ्चाराः । अचिराद्भविष्यन्ति पन्थानो मनोरथानामपि दुर्लङ्घ्याः ॥ इति छाया ] खुशामद से भरी बनावटी बात करता है उसे साधुजन नहीं समझते हैं यह नहीं, समझते हैं, किन्तु वे लोग उसके आग्रह को व्यर्थ करने में समर्थ नहीं हो पाते । इत्यादि में । काल का व्यञ्जकत्व, जैसे— शीघ्र ही चारों ओर ( वर्षाकाल में पानी भर जाने के कारण ) मार्ग सम और विषम के भेद से रहित, अत्यन्त मन्द सञ्चार योग्य एवं मनोरथों के भी दुर्लङ्घ्य हो जायेंगे । लोचनम् यथासम्भवमुपलक्षणम् । विदन्तीति । त एव हि सर्वं विदन्ति सुतरामिति ध्वन्यते । वाक्यपौनरुक्त्यं यथा—'पश्य द्वीपादन्यस्मादपि' इति वचनानन्तरं 'कः सन्देहः ? द्वीपादन्यस्मादपि' इत्यनेनेप्सितप्राप्तिरविघ्नितैव ध्वन्यते । 'किं किम् ? स्वस्था भवन्ति मयि जीवति' इत्यनेनामर्षातिशयः । 'सर्वक्षितिभृतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी' इत्युन्मादातिशयः । कालस्येति । तिङन्तपदानुप्रविष्टस्याप्यर्थकलापस्य कारककालसंख्योपग्रह- रूपस्य मध्येऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां सूक्ष्मदृशा भागगतमपि व्यञ्जकत्वं विचार्य- ठीक-ठीक समझते हैं, यह ध्वनित होता है । वाक्यपौनरुक्त्य, जैसे—( 'रत्नावली' में ) 'द्वीपादन्यस्मादपि' इस वचन के बाद 'कः सन्देहः द्वीपादन्यस्मादपि' इससे ईप्सित वस्तु की प्राप्ति विघ्नरहित ही है यह ध्वनित होता है । 'किं किं ? स्वस्था भवन्ति मयि जीवति' इससे अमर्षातिशय ( ध्वनित होता है ) । सर्वक्षितिभृतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी' यह ( वक्ता का ) उन्मादातिशय ध्वनित होता है । काल का—। भाव यह कि कारक, काल, संख्या, उपग्रह रूप तिङन्त पद में अनुप्रविष्ट अर्थसमूह के बीच अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा सूक्ष्म दृष्टि से भागगत ( अर्थात् कारक आदि चारों के एकदेश भूत कालगत ) भी व्यञ्जकत्व का विचार करना चाहिए ।

३९० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र ह्यचिराद्भविष्यन्ति पन्थान इत्यत्र भविष्यन्तीत्यस्मिन् पदे प्रत्ययः कालविशेषाभिधायी रसपरिपोषहेतुः प्रकाशते । अयं हि गाथार्थः प्रवासविप्रलम्भशृङ्गारविभावतया विभाव्यमानो रसवान् । यथात्र प्रत्ययांशो व्यञ्जकस्तथा क्वचित्प्रकृत्यंशोऽपि दृश्यते । यथा— तद्गेहं नतभित्ति मन्दिरमिदं लब्धावगाहं दिवः सा धेनुर्जरती चरन्ति करिणामेता घनाभा घटाः । स क्षुद्रो मुसलध्वनिः कलमिदं सङ्गीतकं योषिता- माश्चर्यं दिवसैर्द्विजोऽयमीयतीं भूमिं समारोपितः ॥ अत्र श्लोके दिवसैरित्यस्मिन् पदे प्रकृत्यंशोऽपि द्योतकः । सर्व- नाम्नां च व्यञ्जकत्वं यथानन्तरोक्ते श्लोके । अत्र च सर्वनाम्नामेव यहां 'शीघ्र ही मार्ग हो जायेंगे' इसमें 'हो जायेंगे' इस पद में प्रत्यय कालविशेष का अभिधान करने वाला एवं रसपरिपोष का हेतु प्रकाशित होता है । यह गाथार्थ प्रवास विप्रलम्भ शृङ्गार के विभाव के रूप में विभाव्यमान होकर रसवान् हो जाता है । जैसे यहां प्रत्ययांश व्यञ्जक है वैसे कहीं पर प्रकृत्यंश भी देखा जाता है । जैसे— झुकी भीतों वाला वह घर (और कहां) यह आकाश का अवगाहन करने वाला (आलीशान) भवन; वह बूढ़ी गाय (और कहां) यह हाथियों का झुण्ड घूम रहा है; वह मूसल की क्षुद्र आवाज (और कहां) यह महिलाओं का अव्यक्त-मधुर सङ्गीत; आश्चर्य है कि (कुछ ही) दिनों में यह ब्राह्मण इस अवस्था तक पहुंचा दिया गया ! इस श्लोक में 'दिनों में' ('दिवसैः') इस पद में प्रकृत्यंश भी द्योतक है । सर्व- नामों का व्यञ्जकत्व जैसे अभी कहे गए (इस) श्लोक में । यहां सर्वनामों के ही व्यञ्जकत्व को कवि ने मन में रख कर 'क्व' इत्यादि शब्द का प्रयोग नहीं किया है । लोचनम् मिति भावः । रसपरिपोषेति । उत्प्रेक्ष्यमाणो वर्षासमयः कम्पकारी किमुत वर्तमान इति ध्वन्यते । अंशांशिकप्रसङ्गादेवाह—यथात्रेति । दिवसार्थो ह्यत्रात्यन्तासम्भाव्यमानतामस्यार्थस्य ध्वनति । सर्वनाम्नां चेति । प्रकृत्यंशस्य चेत्यर्थः । तेन प्रकृत्यंशेन सम्भूय सर्वनामव्यञ्जकं दृश्यत इत्युक्तं रसपरिपोष—। उत्प्रेक्ष्यमाण कम्पकारी वर्षा समय क्या वर्तमान है ? यह ध्वनित होता है । अंशांशिक प्रसंग से ही कहते हैं—जैसे यहाँ—। यहाँ 'दिवस' का अर्थ इस अर्थ की अत्यन्त असम्भाव्यमानता ध्वनित करता है । सर्वनामों का—। अर्थात् प्रकृत्यंश का । उस प्रकृत्यंश के साथ मिलकर सर्वनाम व्यञ्जक

तृतीय उद्योतः ३९१ ध्वन्यालोकः व्यञ्जकत्वं हृदि व्यवस्थाप्य कविना क्लेत्यादिशब्दप्रयोगो न कृतः । अनया दिशा सहृदयैरन्येऽपि व्यञ्जकविशेषाः स्वयमुत्प्रेक्षणीयाः । एत- च्च सर्वं पदवाक्यरचनाद्योतननोक्त्यैव गतार्थमपि वैचित्र्येण व्युत्पत्तये पुनरुक्तम् । इस ढङ्ग से सहृदयों को अन्य भी व्यञ्जक विशेषों की उत्प्रेक्षा स्वयं करनी चाहिए । यह सब पद, वाक्य और रचना के द्योतन के कथन से ही गतार्थ था तब भी वैचित्र्य से व्युत्पत्ति के लिए फिर से कहा है । लोचनम् भवतीति न पौनरुक्त्यम् । तथा हि तदिति पदं नतभित्तीत्येतत्प्रकृत्यंशसहायं समस्तामङ्गलनिधानभूतां मूषकाद्याकीर्णतां ध्वनति । तदिति हि केवलमुच्य- माने समुत्कर्षातिशयोऽपि संभाव्येत । न च नतभित्तिशब्देनाप्येते दौर्भाग्याय- तनत्वसूचका विशेषा उक्ताः । एवं सा धेनुरित्यादावपि योज्यम् । एवंविधे च विषये स्मरणाकारद्योतकता तच्छब्दस्य । न तु यच्छब्दसंबद्धतेत्युक्तं प्राक् । अत एवात्र तदिदंशब्दादिना स्मृत्यनुभवयोरत्यन्तविरुद्धविषयतासूचनेनाश्चर्य- विभावता योजिता । तदिदंशब्दाद्यभावे तु सर्वमसङ्गतं स्यादिति तदिदमंश- योरेव प्राणत्वं योज्यम् । एतच्च द्विशः सामस्त्यं त्रिशः सामस्त्यमिति व्यञ्जक- मित्युपलक्षणपरम् । तेन लोष्टप्रस्तारन्यायेनानन्तवैचित्र्यमुक्तम् । यद्वक्ष्यत्य- न्येऽपीति । अतिविक्षिप्ततया शिष्यबुद्धिसमाधानं न भवेदित्यभिप्रायेण संक्षिपति—एतच्चेति । वितत्याभिधानेऽपि प्रयोजनं स्मारयति—वैचित्र्येणेति । देखा जाता है, अतः पौनरुक्त्य नहीं है । जैसा कि 'वह' यह पद 'झुकी भीतोंवाला' ('नतभित्ति') इस प्रकृत्यंश की सहायता से समस्त अमङ्गलों का निधानभूत मूषक आदि द्वारा आकीर्णता को ध्वनित करता है। केवल 'वह' ('तत्') कहते तो अतिशय समुत्कर्ष भी सम्भावित होने लगता । न कि (केवल) 'नतभित्ति' शब्द से भी दौर्भाग्य के आयतनत्व के सूचक ये विशेष कहे गए हैं। इस प्रकार 'वह गाय' इत्यादि में भी लगाना चाहिए। इस प्रकार के विषय में 'वह' ('तत्') शब्द स्मरण के आकार का द्योतन करता है, न कि 'जो' ('यत्') शब्द के साथ सम्बद्ध है यह पहले कह चुके हैं। अत एव यहाँ 'तत्' और 'इदं' ('वह' और 'यह') शब्द आदि से स्मृति और अनुभव की अत्यन्त विरुद्धविषयता के सूचन द्वारा आश्चर्य की विभावता योजित की है। 'तत्' और 'इदं' शब्द आदि के अभाव में सब असङ्गत हो जाता, इसलिए 'तत्' और 'इदं' (अर्थात् 'वह' और 'यह') इस अंशों को प्राण (चमत्कारकारी) समझना चाहिए । और यह दो का सामस्त्य और तीन का सामस्त्य व्यञ्जक है, यह उपलक्षण में तात्पर्य रखता है । इस लिए 'लोष्टप्रस्तारन्याय' से अनन्त वैचित्र्य कहा गया । अत्यन्त प्रसृत होने के कारण शिष्य की बुद्धि का समाधान नहीं होगा, इस अभिप्राय से संक्षेप करते हैं—यह सब—। विस्तार करके कथन में भी प्रयोजन की याद दिलाते हैं—वैचित्र्य—।

३९२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः ननु चार्थसामर्थ्याक्षेप्या रसादय इत्युक्तम्, तथा च सुबादीनां व्यञ्जकत्ववैचित्र्यकथनमनन्वितमेव । उक्तमत्र पदानां व्यञ्जकत्वो- क्त्यवसरे । किञ्चार्थविशेषाक्षेप्यत्वेऽपि रसादीनां तेषामर्थविशेषाणां व्य- ञ्जकशब्दाविनाभावित्वादयथाप्रदर्शितं व्यञ्जकस्वरूपपरिज्ञानं विभज्यो- पयुज्यत एव । शब्दविशेषाणां चान्यत्र च चारुत्वं यद्विभागेनोपदर्शितं तदपि तेषां व्यञ्जकत्वेनैवावस्थितमित्यवगन्तव्यम् । ( शङ्का ) अर्थ की सामर्थ्य से रसादि आक्षिप्त होते हैं यह कहा गया है, फिर सुप् आदि का व्यञ्जकत्व-वैचित्र्य कहना असम्बद्ध ही है ! ( समाधान ) पदों के व्यञ्ज- कत्व के अवसर में इस सम्बन्ध में कह चुके हैं । और भी, रसादि का अर्थविशेष द्वारा आक्षेप स्वीकार करने पर भी उनकी अर्थविशेषों के व्यञ्जक शब्दों के बिना प्रतीति न होने के कारण जैसा कि दिखाया गया है ( उस प्रकार ) व्यञ्जक के स्वरूप का परिज्ञान विभाग करके उपयोगी है ही । यह जानना चाहिए कि अन्यत्र शब्द- विशेषों का जो चारुत्व अलग-अलग दिखाया गया है वह भी उनके व्यञ्जकत्व से ही व्यवस्थित है । लोचनम् नन्विति । पूर्वं निर्णीतमप्येतदविस्मरणार्थमधिकामिधानार्थं चाक्षिप्तम् । उक्तमत्रेति । न वाचकत्वं ध्वनिव्यवहारोपयोगि येनावाचकस्य व्यञ्जकत्वं न स्यात् इति प्रागेवोक्तम् । ननु न गीतादिवद्रसाभिव्यञ्जकत्वेऽपि शब्दस्य तत्र व्यापारोऽस्त्येव; स च व्यञ्जनात्मकैवेति भावः । एतच्चास्माभिः प्रथमोद्द्योते निर्णीतचरम् । न चेदमस्माभिरपूर्वमुक्तमित्याह—शब्दविशेषाणां चेति । अन्यत्रेति । भामहविवरणे । विभागेनेति । स्रक्चन्दनादयः शब्दाः शृङ्गारे चारवो बीभत्से त्वचारव इति रसकृत एव विभागः । रसं प्रति च शब्दस्य व्यञ्जकत्वमेवेत्युक्तं प्राक् । ( शङ्का )—। पहले निर्णीत होने पर भी भूल न जाय इसके लिए और अधिक बात कहने के लिए आक्षेप किया है । इस सम्बन्ध में कह चुके हैं—। यह पहले ही कह चुके हैं कि वाचकत्व ध्वनि के व्यवहार में उपयोगी नहीं है, जिससे अवाचक का व्यञ्जकत्व नहीं होता । भाव यह कि गीतादि की भाँति रसाभिव्यञ्जक होने पर भी शब्द का उसमें व्यापार नहीं है और वह ( शब्द ) व्यञ्जनरूप ही है । इसे हम प्रथम उद्योत में निर्णय कर चुके हैं । न कि यह बिलकुल अपूर्व बात कही है, यह कहते हैं— शब्दविशेषों का—। अन्यत्र—भामह के विवरण में । अलग-अलग— माला, चन्दन आदि शब्द शृङ्गार में सुन्दर और बीभत्स में असुन्दर हैं, इस प्रकार विभाग रसकृत ही है । यह पहले कह चुके हैं कि रस के प्रति शब्द का व्यञ्जकत्व ही है ।

तृतीय उद्योतः ३९३ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः यत्रापि तत्सम्प्रति न प्रतिभासते तत्रापि व्यञ्जके रचनान्तरे यद् दृष्टं सौष्ठवं तेषां प्रवाहपतितानां तदेवाभ्यासादपोद्धृतानामप्यव- भासत इत्यवसातव्यम् । कोऽन्यथा तुल्ये वाचकत्वे शब्दानां चारुत्व- विषयो विशेषः स्यात् । जहां भी वह इस समय नहीं मालूम पड़ता वहां भी व्यञ्जक दूसरी रचना में जो सौष्ठव देखा गया है, प्रवाह में पड़े हुए उनका वही (चारुत्व) अभ्यासवश प्रतीत होता है, यह समझना चाहिए। अन्यथा समानवाचकत्व के होने पर शब्दों के चारुत्व का विशेष कौन होता ? लोचनम् यत्रापीति । स्रक्चन्दनादिशब्दानां तदानीं शृङ्गारादिव्यञ्जकत्वाभावेऽपि व्यञ्जकत्वशक्तेर्भूयसा दर्शनात्तदधिवाससुन्दरीभूतमर्थं प्रतिपादयितुं सामर्थ्य- मस्ति । तथाहि—'तटी तारं ताम्यति' इत्यत्र तटशब्दस्य पुंस्त्वनपुंसकत्वे अनादृत्य स्त्रीत्वमेवाश्रितं सहृदयैः 'स्त्रीति नामापि मधुरम्' इति कृत्वा । यथा वास्मदुपाध्यायस्य विद्वत्कविसहृदयचक्रवर्तिनो भट्टेन्दुराजस्य— इन्दीवरद्युति यदा बिभृयान्न लक्ष्म स्युर्विस्मयैकसुहृदोऽस्य यदा विलासाः । स्यान्नाम पुण्यपरिणामवशात्तथापि किं किं कपोलतलकोमलकान्तिरिन्दुः ॥ अत्र हीन्दीवरलक्ष्मविस्मयसुहृद्विलासनामपरिणामकोमलादयः शब्दाः शृङ्गाराभिव्यञ्जनदृष्टशक्तयोऽत्र परं सौन्दर्यमावहन्ति । अवश्यं चैतदभ्युपगन्त- जहाँ भी—। माला, चन्दन आदि शब्दों का उस समय (अर्थात् शृङ्गार के अतिरिक्त स्थल में) शृङ्गारादि के व्यञ्जक न होने पर भी (उनकी) व्यञ्जकत्वशक्ति के बार-बार देखे जाने के कारण उनके रहने से सुन्दर हुए अर्थ को प्रतिपादन करने की सामर्थ्य है। जैसा कि 'तटी तारं ताम्यति' ( 'तटी जोर से क्लान्त हो रही है' ) यहाँ सहृदयों ने 'तट' शब्द के पुंस्त्व और नपुंसकत्व का अनादर करके स्त्रीत्व का ही आश्रयण किया है यह समझ कर 'स्त्री' यह नाम भी मधुर है। अथवा, जैसे विद्वानों, कवियों और सहृदयों के चक्रवर्ती हमारे उपाध्याय भट्ट इन्दुराज का— पुण्यों के परिणामवश यदि चन्द्रमा नील चिह्न धारण नहीं करता, यदि इसके विलास विस्मय के एकमात्र सुहृद् होते, तथापि (सुन्दरी के) कपोलतल की भांति कोमल कान्तिवाला, क्या-क्या हो सकता था ? यहाँ शृङ्गार के अभिव्यञ्जन में दृष्टशक्ति वाले नीलकमल (इन्दीवर), चिह्न, विस्मय, सुहृद्, विलास, (नाम), परिणाम, कोमल आदि शब्द अधिक सौन्दर्य धारण

३९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अन्य एवासौ सहृदयसंवेद्य इति चेत्, किमिदं सहृदयत्वं नाम ? किं रसभावानपेक्षकाव्याश्रितसमयविशेषाभिज्ञत्वम्, उत रसभावादिमयकाव्यस्वरूपपरिज्ञाननैपुण्यम् । पूर्वस्मिन् पक्षे तथा- विधसहृदयव्यवस्थापितानां शब्दविशेषाणां चारुत्वनियमो न स्यात् । पुनः समयान्तरेणान्यथापि व्यवस्थापनसम्भवात् । द्वितीयस्मिंस्तु पक्षे रसज्ञतैव सहृदयत्वमिति । तथाविधैः सहृदयैः संवेद्यो रसादिसमर्पण- सामर्थ्यमेव नैसर्गिकं शब्दानां विशेष इति व्यञ्जकत्वाश्रयमेव तेषां मुख्यं चारुत्वम् । वाचकत्वाश्रयाणान्तु प्रसाद एवार्थापेक्षायां तेषां विशेषः । अर्थानपेक्षायां त्वनुप्रासादिरेव ॥ १५-१६ ॥ अन्य ही वह कोई सहृदयसंवेद्य है यदि यह कहो (तो प्रश्न है कि) यह सहृदयत्व क्या है ? क्या रस, भाव की अपेक्षा न करके काव्य के आश्रित समय (संकेत) विशेष की जानकारी रखना (सहृदयत्व) है, अथवा रस, भाव आदि से युक्त काव्य के स्वरूप के परिज्ञान का नैपुण्य (सहृदयत्व) है ? पहले पक्ष में उस प्रकार के सहृदय द्वारा व्यवस्थापित शब्दविशेषों के चारुत्व का नियम नहीं होगा, क्योंकि पुनः दूसरे समय (संकेत) के अनुसार अन्यथा भी व्यवस्थापन सम्भव होगा । किन्तु दूसरे पक्ष में रसज्ञता ही सहृदयत्व है । उस प्रकार के सहृदयों द्वारा संवेद्य शब्दों का विशेष रसादि के समर्पण की नैसर्गिक सामर्थ्य ही है, इस प्रकार व्यञ्जकत्व के आश्रित रहने वाला ही उनका मुख्य चारुत्व है । परन्तु वाचकत्व के आश्रित (उन शब्दों का) विशेष अर्थ की अपेक्षा होने पर प्रसाद ही है । अर्थ की अपेक्षा न होने पर अनुप्रास आदि ही । लोचनम् व्यमित्याह—कोऽन्यथेति । असंवेद्यस्तावदसौ न युक्त इत्याशयेनाह— सहृदयेति । पुनरिति । अनियन्त्रितपुरुषेच्छाऽऽयत्तो हि समयः कथं नियतः स्यात् । मुख्यं चारुत्वमिति । विशेष इति पूर्वेण सम्बन्धः । अर्थापेक्षायामिति । वाच्यापेक्षायामित्यर्थः । अनुप्रासादिरेवेति । शब्दान्तरेण सह या रचना करते हैं । और इसे अवश्य स्वीकार करना चाहिए, यह कहते हैं—अन्यथा—। वह असंवेद्य होकर ठीक न होगा, इस आशय से कहते हैं—सहृदय—। पुनः—। क्योंकि पुरुष की अनियन्त्रित इच्छा के अधीन समय (सङ्केत) कैसे नियत होगा ? मुख्य- चारुत्त्व—। 'विशेष' यह पूर्व से सम्बन्ध है । अर्थ की अपेक्षा होने पर—। अर्थात् वाच्य की अपेक्षा होने पर । अनुप्रास आदि ही—। अर्थात् दूसरे शब्द के साथ जो रचना है उसकी अपेक्षावाला वह विशेष । आदि ग्रहण से शब्दगुण और शब्दालङ्कारों का

तृतीय उद्योतः ३९५ ध्वन्यालोकः एवं रसादीनां व्यञ्जकस्वरूपमभिधाय तेषामेव विरोधिरूपं लक्ष- यितुमिदमुपक्रम्यते— प्रबन्धे मुक्तके वापि रसादीन्बन्धुमिच्छता । यत्नः कार्यः सुमतिना परिहारे विरोधिनाम् ॥ १७ ॥ प्रबन्धे मुक्तके वापि रसभावनिबन्धनं प्रत्यादृतमनाः कविर्विरो- धिपरिहारे परं यत्नमादधीत । अन्यथा त्वस्य रसमयः श्लोक एकोऽपि सम्यङ् न सम्पद्यते ॥ १७ ॥ इस प्रकार रस आदि के व्यञ्जक के स्वरूप का अभिधान करके उन्हीं के (रसादि के) विरोधी रूप को लक्षित करने के लिए यह उपक्रम करते हैं— प्रबन्ध में अथवा मुक्तक में भी रस आदि का निबन्धन करना चाहते हुए सुमति (कवि) को विरोधियों के परिहार में यत्न करना चाहिए ॥ १७ ॥ प्रबन्ध में अथवा मुक्तक में भी रसभाव के निबन्धन के प्रति आदरयुक्त मन वाला कवि विरोधियों के परिहार में अधिक यत्न करे । अन्यथा, इसका एक भी श्लोक सम्यक् रसमय सम्पन्न नहीं होगा । लोचनम् तदपेक्षोऽसौ विशेष इत्यर्थः । आदिग्रहणाच्छन्दोगुणालङ्काराणां सङ्ग्रहः । अत एव रचनया प्रसादेन चारुत्वेन चोपबृंहिता एव शब्दाः काव्ये योज्या इति तात्पर्यम् ॥ १५–१६ ॥ रसादीनां यद्व्यञ्जकं वर्णपदादिप्रबन्धान्तं तस्य स्वरूपमभिधायेति सम्बन्धः । उपक्रम्यत इति । विरोधिनामपि लक्षणकरणे प्रयोजनमुच्यते शक्य- हानत्वं नाम अनया कारिकया । लक्षणं तु विरोधि रससम्बन्धीत्यादिना भविष्यतीत्यर्थः ॥ १७ ॥ ननु 'विभावभावानुभावसञ्चार्यौचित्यचारुणः' इति यदुक्तं तत एव व्यति- सङ्ग्रह है । अतएव रचना से, प्रसाद से और चारुत्व से उपबृंहित ही शब्दों की काव्य में योजना करनी चाहिए, यह तात्पर्य है ॥ १५–१६ ॥ 'वर्ण, पद से लेकर प्रबन्ध पर्यन्त जो रसादि का व्यञ्जक है उसके स्वरूप का अभिधान करके' यह सम्बन्ध है । उपक्रम करते हैं—। इस कारिका से विरोधियों के भी लक्षण करने में 'शक्यहानत्व' (अर्थात् उन विरोधियों के लक्षण ज्ञात होने पर उनका परिहार किया जा सकेगा, यही) प्रयोजन कहते हैं । किन्तु लक्षण तो 'विरोधि रस- सम्बन्धि०' इत्यादि होगा ॥ १७ ॥ (शङ्का) जो कि 'विभाव, भाव, अनुभाव, सञ्चारी के औचित्य से चारु' यह कह

३९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कानि पुनस्तानि विरोधीनि यानि यत्नतः कवेः परिहर्तव्यानीत्युच्यते— विरोधीरससम्बन्धिविभावादिपरिग्रहः। विस्तरेणान्वितस्यापि वस्तुनोऽन्यस्य वर्णनम् ॥ १८ ॥ अकाण्ड एव विच्छित्तिरकाण्डे च प्रकाशनम् । परिपोषं गतस्यापि पौनःपुन्येन दीपनम् । रसस्य स्याद्विरोधाय वृत्त्यनौचित्यमेव च ॥ १९ ॥ फिर वे विरोधी कौन हैं जिन्हें यत्नपूर्वक कवि को परिहार करना चाहिए ? इस पर कहते हैं— विरोधी रस से सम्बन्ध रखने वाले विभाव आदि का परिग्रह (रस से) सम्बद्ध होने पर भी अन्य वस्तु का विस्तार से वर्णन, असमय में ही (रस का) विच्छेद और असमय में प्रकाशन, (रस के) परिपोष प्राप्त कर लेने पर भी बार बार (उसका ही) उद्दीपन और वृत्ति (व्यवहार) का अनौचित्य, (ये पांच) रस के विरोधी हैं ॥ १८-१९ ॥ लोचनम् रेकमुखेनैतदप्यवगंस्यते । मैवम् ; व्यतिरेकेण हि तदभावमात्रं प्रतीयते न तु तद्विरुद्धम् । तदभावमात्रं च न तथा दूषकं यथा तद्विरुद्धम् । पथ्यानुपयोगो हि न तथा व्याधिं जनयति यद्वदपथ्योपयोगः । तदाह-यत्नत इति । 'विभावे' त्यादिना श्लोकेन यदुक्तं तद्विरुद्धं विरोधीत्यादिनार्धश्लोकेनाह । 'इतिवृत्ते'त्या- दिना श्लोकद्वयेन यदुक्तं तद्विरुद्धं विस्तरेणेत्यर्धश्लोकेनाह । 'उद्दीपने'त्यर्धश्लो- कोक्तस्य विरुद्धम् अकाण्ड इत्यर्धश्लोकेन । 'रसस्ये' त्यर्धश्लोकोक्तस्य विरुद्धं परिपोषं गतस्येत्यर्धश्लोकेन । 'अलङ्कृतीनामि' त्यनेन यदुक्तं तद्विरुद्धमन्य- चुके हैं, उसीसे व्यतिरेक के प्रकार से यह भी मालूम हो जायगा । (समाधान) ऐसा नहीं; व्यतिरेक से उसका अभाव मात्र प्रतीत होता है, न कि उससे विरुद्ध । उसका अभाव मात्र उस प्रकार दूषक नहीं है जिस प्रकार उसका विरुद्ध । क्योंकि पथ्य का अनुप्रयोग उस प्रकार व्याधि उत्पन्न नहीं करता जिस प्रकार अपथ्य का उपयोग (व्याधि उत्पन्न करता है)। उसे कहते हैं—यत्नपूर्वक—। 'विभाव०' इत्यादि श्लोक से जो कहा है उसके विरुद्ध 'विरोधि०' इत्यादि आधे श्लोक से कहते हैं । 'इतिवृत्त०' इत्यादि दो श्लोकों से जो कहा है उसके विरुद्ध 'विस्तरेण०' इत्यादि श्लोकार्ध से कहते हैं । 'उद्दीपन०' इत्यादि आधे श्लोक में कहे हुए के विरुद्ध 'अकाण्ड०' इस आधे श्लोक से । 'रसस्य०' इस अर्धश्लोक के विरुद्ध 'परिपोषं गतस्य०' इस अर्ध श्लोक से । अलङ्कृतीनां०' इससे जो कहा गया है उसके विरुद्ध और दूसरा भी

तृतीय उद्योतः ३९७ ध्वन्यालोकः प्रस्तुतरसापेक्षया विरोधी यो रसस्तस्य सम्बन्धिनां विभावभावा- नुभावानां परिग्रहो रसविरोधहेतुकः सम्भवनीयः । तत्र विरोधि रस- विभावपरिग्रहो यथा शान्तरसविभावेषु तद्विभावतयैव निरूपितेष्वनन्त- रमेव शृङ्गारादिविभाववर्णने । विरोधि रसभावपरिग्रहो यथा प्रियं प्रति प्रणयकलहकुपितासु कामिनीषु वैराग्यकथाभिरनुनये । विरोधि रसानु- भावपरिग्रहो यथा प्रणयकुपितायां प्रियायामप्रसीदन्त्यां नायकस्य को- पावेशविवशस्य रौद्रानुभाववर्णने । अयं चान्यो रसभङ्गहेतुर्यत्प्रस्तुतरसापेक्षया वस्तुनोऽन्यस्य कथ- प्रस्तुत रस की अपेक्षा से विरोधी जो रस है उससे सम्बन्ध रखने वाले विभाव, भाव और अनुभाव का परिग्रह रस के विरोध का हेतु हो सकता है । उनमें विरोधी रस के विभाव का परिग्रह, जैसे शान्त रस के विभावों में उसके विभाव रूप से ही निरूपित होने के बाद ही शृङ्गार आदि के विभाव के वर्णन में । विरोधी रस के भाव का परिग्रह, जैसे प्रिय के प्रति कामिनियों के प्रणयकलह से कुपित होने पर वैराग्य की कथाओं द्वारा अनुनय करने पर । विरोधी रस के अनुभाव का परिग्रह, जैसे प्रणयकुपित होने पर प्रिया के प्रसन्न न होने की स्थिति में कोप के आवेश से विवश नायक के रौद्र के अनुभावों के वर्णन में । और यह दूसरा रसभङ्ग का हेतु है कि प्रस्तुत रस की अपेक्षा किसी प्रकार सम्बद्ध लोचनम् दपि च विरुद्धं वृत्त्यनौचित्यमित्यनेन । एतत्क्रमेण व्याचष्टे—प्रस्तुतरसापेक्षये- त्यादिना । हास्यशृङ्गारयोर्वीराद्भुतयो रौद्रकरुणयोर्भयानकभीभत्सयोर्न विभाव- विरोध इत्यभिप्रायेण शान्तशृङ्गारानुपन्धस्तौ, प्रशमरागयोर्विरोधात् । विरो- धिनो रसस्य यो भावो व्यभिचारी तस्य परिग्रहः, विरोधिनस्तु यः स्थायी स्थायितया तत्परिग्रहोऽसम्भवनीय एव तदनुत्थानप्रसङ्गात् । व्यभिचारितया तु परिग्रहो भवत्येव । अत एव सामान्येन भावग्रहणम् । वैराग्यकथाभिरिति वैराग्यशब्देन निर्वेदः शान्तस्य यः स्थायी स उक्तः । यथा—‘प्रसादे वर्तस्व विरुद्ध ‘वृत्त्यनौचित्य०’ इससे (कहते हैं) । इस क्रम से व्याख्यान करते हैं । प्रस्तुत रस की अपेक्षा से० इत्यादि से । हास्य-शृङ्गार का, वीर-अद्भुत का, भयानक-बीभत्स का विभाव विरोध नहीं, इस अभिप्राय से शान्त-शृङ्गार का उपन्यास किया है, क्योंकि प्रशम और राग का विरोध है । विरोधी रस का जो भाव अर्थात् व्यभिचारी है उसका परिग्रह । परन्तु विरोधी का जो स्थायी है, स्थायी रूप से उसका परिग्रह असम्भव ही है, क्योंकि (स्थायी रूप से) उनके उत्थान का प्रसङ्ग नहीं है । परन्तु व्यभिचारी रूप से परिग्रह होगा ही । अतएव सामान्य रूप से ‘भाव’ का ग्रहण है । ‘वैराग्य की कथाओं द्वारा’ इसमें ‘वैराग्य’ शब्द से ‘निर्वेद’ शान्त रस का जो स्थायी है, वह कहा गया है । जैसे—‘प्रसन्न हो जाओ, खुशी प्रकट करो, रोष छोड़ो’ इत्यादि

३९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः श्चिदन्वितस्यापि विस्तरेण कथनम् । यथा विप्रलम्भशृङ्गारे नायकस्य कस्यचिद्वर्णयितुमुपक्रान्ते कवेर्यमकाद्यलङ्कारनिबन्धनरसिकतया महता प्रबन्धेन पर्वतादिवर्णने । अयं चापरो रसभङ्गहेतुरवगन्तव्यो यदकाण्ड एव विच्छित्तिः रसस्याकाण्ड एव च प्रकाशनम् । तत्रानवसरे विरामो रसस्य यथा नायकस्य कस्यचित्स्पृहणीयसमागमया नायिकया कया- चित्परां परिपोषपदवीं प्राप्ते शृङ्गारे विदिते च परस्परानुरागे समाग- मोपायचिन्तोचितं व्यवहारमुत्सृज्य स्वतन्त्रतया व्यापारान्तरवर्णने । भी अन्य वस्तु का विस्तार से वर्णन करना । जैसे विप्रलम्भ शृङ्गार में किसी नायक के वर्णन का उपक्रम करने पर कवि की यमक आदि अलङ्कारों के निबन्धन में रसिकता के कारण बड़ा-चढ़ा कर पर्वत आदि के वर्णन में । और यह दूसरा रसभङ्ग का हेतु समझना चाहिए, जो असमय में ही रस का विच्छेद और असमय में ही प्रकाशन है । उनमें से असमय में रस का विराम, जैसे किसी नायक का स्पृहणीय समागम वाली किसी नायिका के साथ शृङ्गार के परम परिपोष की अवस्था तक पहुँचने पर और परस्परानुराग के विदित होने पर समागम के उपाय की चिन्ता के उचित व्यवहार को छोड़कर स्वतन्त्र रूप से दूसरे व्यापार का वर्णन करने पर । और असमय में लोचनम् प्रकटय मुदं सन्त्यज रुषम्' इत्याद्युपक्रम्यार्थान्तरन्यासो 'न मुग्धे प्रत्येतुं प्रभवति गतः कालहरिणः' इति । मनागपि निर्वेदानुप्रवेशे सति रतेर्विच्छेदः । ज्ञातविषयसतत्त्वो हि जीवितसर्वस्वाभिमानं कथं भजेत । न हि ज्ञातशुक्तिका- रजततत्त्वस्तदुपादेयधियं भजते ऋते संवृतिमात्रात् । कथाभिरिति बहुवचनं शान्तरसस्य व्यभिचारिणो धृति मतिप्रभृतीन् सङ्गृह्णाति । नन्वन्यदनुन्मत्तः कथं वर्णयेत्, किमुत विस्तरत इत्याह-कथञ्चिदन्वितस्ये- ति । व्यापारान्तरेति । यथा वत्सराजचरिते चतुर्थेऽङ्के-रत्नावलीनामधेयमप्य- उपक्रम करके अर्थान्तरन्यास है 'री मुग्धे ( नासमझ ), काल का हिरन जाकर लौटने का नहीं' । थोड़ा भी निर्वेद का अनुप्रवेश होने पर रति का विच्छेद हो जाता है । क्योंकि विषय का तत्त्व समझ चुकने वाला कैसे ( किसी रमणी के प्रति ) 'जीवित- सर्वस्व' का अभिमान करेगा ? क्योंकि शुक्तिकारजत ( अर्थात् शुक्ति में भासमान रजत ) को तत्त्वतः समझ चुकने वाला व्यक्ति ( उसमें ) उपादेय बुद्धि नहीं करता, भ्रम मात्र के बिना । 'कथाओं द्वारा' यह बहुवचन शान्तरस के धृति, मति प्रभृति व्यभिचारियों को सङ्गृहीत करता है । अनुन्मत्त व्यक्ति कैसे अन्य का वर्णन करेगा, अथवा क्यों विस्तार से ( करेगा ) ?, इस पर कहते हैं-किसी प्रकार सम्बद्ध भी-। दूसरे व्यापार-। जैसे 'वत्सराजचरित' में

तृतीय उद्योतः ३९९ ध्वन्यालोकः अनवसरे च प्रकाशनं रसस्य यथा प्रवृत्ते प्रवृत्तविविधवीरसङ्क्षये कल्प- सङ्क्षयकल्पे सङ्ग्रामे रामदेवप्रायस्यापि तावन्नायकस्यानुपक्रान्तविप्रल- म्भशृङ्गारस्य निमित्तमुचितमन्तरेणैव शृङ्गारकथायामवतारवर्णने । न चैवंविधे विषये दैवव्यामोहितत्वं कथापुरुषस्य परिहारो यतो रसबन्ध एव कवेः प्राधान्येन प्रवृत्तिनिबन्धनं युक्तम् । इतिवृत्तवर्णनं तदुपाय एवेत्युक्तं प्राक् ‘आलोकार्थी यथा दीपशिखायां यत्नवाञ्जनः’ इत्यादिना । अत एव चेतिवृत्तमात्रवर्णनप्राधान्येऽङ्गाङ्गिभावरहितरसभावनिब- न्धेन च कवीनामेवंविधानि स्खलितानि भवन्तीति रसादिरूपव्यङ्ग्य- रस का प्रकाशन, जैसे—प्रलयकाल के सदृश हो रहे विविध वीरों के नाश वाले संग्राम में विप्रलम्भ शृङ्गार के उपक्रम के बिना और बिना उचित कारण के राम जैसे देवता का भी शृङ्गारकथा में पड़ जाने का वर्णन करने में। इस प्रकार के विषय में कथा के नायक का दैववश व्यामोहित हो जाना (उसके दोष का) परिहार नहीं है, क्योंकि प्राधान्यतः कवि की प्रवृत्ति का निबन्धन रसबन्ध में ही होना चाहिए। इतिवृत्त का वर्णन उसका उपाय ही है यह पहले कह चुके हैं ‘आलोक चाहने वाला व्यक्ति जैसे दीपशिखा में यत्नवान् होता है, इत्यादि द्वारा और इसी लिए इतिवृत्त मात्र के वर्णन का प्राधान्य होने पर अङ्गाङ्गिभाव से रहित रसभाव के निबन्धन से कवियों के इस प्रकार के स्खलन होते हैं, इस प्रकार लोचनम् गृहीतो विजयवर्मवृत्तान्तवर्णने । अपि-तावदितिशब्दाभ्यां दुर्योधनादेस्तद्वर्णनं दूरापास्तमिति वेणीसंहारे द्वितीयाङ्कमेवोदाहरणत्वेन ध्वनति । अत एव वक्ष्य- ति-‘दैवव्यामोहितत्वम्’ इति । पूर्वं तु सन्ध्यङ्गाभिप्रायेण प्रत्युदाहरणमुक्तम् । कथापुरुषस्येति प्रतिनायकस्येति यावत् । अत एव चेति । यतो रसबन्ध एव मुख्यः कविव्यापारविषयः इतिवृत्तमात्र- वर्णनप्राधान्ये सति यदङ्गाङ्गिभावरहितानामविचारितगुणप्रधानभावानां रसभा- चतुर्थ अङ्क में—रत्नावली का नाम भी न लेते हुए का विजयवर्मा के वृत्तान्त के वर्णन में । (मूलग्रन्थ में ‘अपि तावत्’ इन) शब्दों से दुर्योधनादि का वह वर्णन छोड़ा जा चुका है, इसलिए वेणीसंहार में दूसरे अङ्क को ही उदाहरण रूप में ध्वनित करता है। अतएव कहेंगे—‘दैववश व्यामोहित हो जाना’। किन्तु पहले सन्धि के अङ्ग के अभिप्राय से प्रत्युदाहरण कहा गया है। कथा के नायक का अर्थात् प्रतिनायक का। और इसी लिए—। अर्थात् क्योंकि रसबन्ध ही मुख्य कवि-व्यापार का विषय है, इतिवृत्त मात्र के वर्णन का प्राधान्य होने पर अङ्गाङ्गिभाव से रहित एवं अविचारित