ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
तृतीय उद्योतः ३४३ ध्वन्यालोकः अभ्युपगते वा वाक्यव्यङ्ग्यत्वे रसादीनां न नियता काचित्स- ङ्घटना तेषामाश्रयत्वं प्रतिपद्यत इत्यनियतसङ्घटनाः शब्दा एव गुणानां या रस आदि को वाक्यव्यङ्ग्य मान लेने पर कोई नियत सङ्घटना उनका ( गुणों का ) आश्रय नहीं होती है, इसलिए जिनकी सङ्घटना नियत नहीं है ऐसे लोचनम् वर्णव्यङ्ग्यो हि यावद्रस उक्तस्तावदवाचकस्यापि पदस्य श्रवणमात्रावसेयेन स्वसौभाग्येन वर्णवदेव यद्रसाभिव्यक्तिहेतुत्वं स्फुटमेव लभ्यत इति तदेव माधुर्यादीति किं सङ्घटनया ? तथा च पद्व्यङ्ग्यो यावद्ध्वनिरुक्तस्तावच्छुद्ध- स्यापि पदस्य स्वार्थस्मारकत्वेनापि रसाभिव्यक्तियोग्यार्थावभासकत्वमेव माधुर्यादीति तत्रापि कः सङ्घटनाया उपयोगः । ननु वाक्यव्यङ्ग्ये ध्वनौ तर्ह्यवश्यमनुप्रवेष्टव्यं सङ्घटनया स्वसौन्दर्यं वाच्य- सौन्दर्यं वा, तया विना कुत इत्याशङ्क्याह—अभ्युपगत इति । वाशब्दोऽपि- शब्दार्थे, वाक्यव्यङ्ग्यत्वेऽपीत्यत्र योज्यः । एतदुक्तं भवति-अनुप्रविशतु तत्र सङ्घटना, न हि तस्याः सन्निधानं प्रत्याचक्ष्महे । किं तु माधुर्यस्य न नियता सङ्घटना आश्रयो वा स्वरूपं वा तया विना वर्णपदव्यङ्ग्ये रसादौ भावान्मा- धुर्यादेः वाक्यव्यङ्ग्येऽपि तादृशीं सङ्घटनां विहायापि वाक्यस्य तद्रसव्यञ्ज- कत्वात् सङ्घटना सन्निहितापि रसव्यक्तावप्रयोजिकेति । तस्मादौपचारिकत्वेऽपि शब्दाश्रया एव गुणा इत्युपसंहरति-शब्दा एवेति । वर्ण से व्यङ्ग्य भी कहा जा चुका है तब तो अवाचक भी पद का श्रवणमात्र से निर्धारणीय अपने सौभाग्य के कारण वर्ण की ही भांति जो रसाभिव्यक्ति का हेतुत्व स्पष्ट ही प्राप्त ( प्रतीत ) होता है, वही माधुर्य आदि है, सङ्घटना से क्या ? जैसा कि जब कि ध्वनि पदव्यङ्ग्य भी कहा गया है तब शुद्ध भी पद का स्वार्थ के स्मारक होने के कारण भी रसाभिव्यक्ति के योग्य अर्थ का अवभासकत्व ही माधुर्य आदि है, वहां भी सङ्घटना का कौन उपयोग है ? यह आशङ्का करके कि वाक्यव्यङ्ग्य ध्वनि में अवश्य ही सङ्घटना को अनुप्रवेश करना चाहिए, उसके बिना अपना ( वाक्य का ) सौन्दर्य अथवा वाच्य का सौन्दर्य कैसे होगा ?, कहते हैं—या रस आदि को—। 'या' शब्द 'भी' ('अपि') शब्द के अर्थ में है, यहां लगाना चाहिए 'वाक्यव्यङ्ग्य होने पर भी' । बात यह कही गई—वहां संघ- टना प्रवेश करे, हम उसके सन्निधान का प्रत्याख्यान नहीं करते । किन्तु नियत संघटना माधुर्य का आश्रय अथवा स्वरूप नहीं है, क्योंकि उस सङ्घटना के बिना भी वर्णपद- व्यङ्ग्य रसादि में ( माधुर्य ) रहता है । माधुर्यादि के वाक्यव्यङ्ग्य में उस प्रकार की सङ्घटना को छोड़कर भी वाक्य उस रस का व्यञ्जक होता है, सङ्घटना सन्निहित होकर भी रस की व्यञ्जना में प्रयोजक नहीं है । इस कारण औपचारिक होने पर भी गुण शब्द के आश्रित ही हैं, इस प्रकार उपसंहार करते हैं—शब्द ही ।
३४४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
व्यङ्ग्यविशेषानुगता आश्रयाः । ननु माधुर्ये यदि नामैवमुच्यते तदुच्य-
ताम् ; ओजसः पुनः कथमियतसङ्घटनशब्दाश्रयत्वम् । न ह्यसमासा
सङ्घटना कदाचिदोजस आश्रयतां प्रतिपद्यते । उच्यते—यदि न प्रसि-
द्विमात्रग्रहदूषितं चेतस्तदत्रापि न न ब्रूमः । ओजसः कथमसमासा
सङ्घटना नाश्रयः । यतो रौद्रादीन् हि प्रकाशयतः काव्यस्य दीप्तिरो-
ज इति प्राक्प्रतिपादितम् । तच्चौजो यद्यसमासायामपि सङ्घटनायां स्या-
त्को दोषो भवेत् । न चाचारुत्वं सहृदयहृदयसंवेद्यमस्ति । तस्मादनि-
यतसङ्घटनशब्दाश्रयत्वे गुणानां न काचित्क्षतिः । तेषां तु चक्षुरादी-
शब्द ही व्यङ्ग्यविशेष से अनुगत होकर गुणों के आश्रय हैं । ( शंका ) यदि माधुर्य
के विषय में इस प्रकार कहते हैं तो कह सकते हैं; परन्तु ओजस् का नियत सङ्घटना
से रहित शब्दों का आश्रयत्व कैसे बन सकता है ? क्योंकि असमासा सङ्घटना कभी
ओजस् का आश्रय नहीं बन सकती । ( उत्तर ) कहते हैं—यदि प्रसिद्धिमात्र के प्रति
आग्रह से मन दूषित नहीं है तो हम यहाँ भी नहीं नहीं कहतें । असमासा सङ्घटना
ओजस् की आश्रय कैसे नहीं ? क्योंकि रौद्र आदि को प्रकाशित करते हुए काव्य
की दीप्ति 'ओजस्' है, यह पहले प्रतिपादन कर चुके हैं । और वह ओजस् यदि
असमासा सङ्घटना में भी हो तो क्या दोष होगा । सहृदय द्वारा संवेद्य कोई अचारुत्व
भी तो नहीं । इस कारण गुणों के नियत सङ्घटना से रहित शब्दों के आश्रय होने से
लोचनम्
नन्विति । वाक्यव्यङ्ग्यध्वन्यभिप्रायेणेदं मन्तव्यमिति केचित् ।
वयं तु ब्रूमः-वर्णपदव्यङ्ग्येऽप्योजसि रौद्रादिस्वभावे वर्णपदानामेकाकिनां
स्वसौन्दर्यमपि न तादृगुन्मीलति यावद्यावत्तानि सङ्घटनाङ्कितानि न कृतानी-
ति सामान्येनैवायं पूर्वपक्ष इति । प्रकाशयत इति 'लक्षणहेत्वोः' इति शतृप्रत्ययः ।
रौद्रादिप्रकाशनाल्लक्ष्यमाणमोज इति भावः । नचेति । चशब्दो हेतौ । यस्मात्
‘यो यः शस्त्रम्’ इत्यादौ नाचारुत्वं प्रतिभाति तस्मादित्यर्थः । तेषान्विति गुणा-
शङ्का—कुछ लोगों के अनुसार वाक्यव्यङ्ग्य ध्वनि के अभिप्राय से यह मानना
चाहिए । परन्तु हम कहते हैं—रौद्रादिस्वभाव ओजस् के वर्णपदव्यङ्ग्य होने पर भी
अकेले वर्णपदों का अपना सौन्दर्य भी तबतक उस प्रकार नहीं उन्मीलित होता जबतक
वे ( वर्णपद ) सङ्घटना से अङ्कित नहीं किए जाते हैं, यह सामान्यरूप से पूर्वपक्ष है ।
'प्रकाशयतः' ( प्रकाशित करते हुए ) 'लक्षणहेत्वोः' ( पा. सू. ३. २. १२६ ) इस सूत्र से
शतृप्रत्यय है । भाव यह कि, रौद्र आदि के प्रकाशन से सम्यक् लक्षित होता हुआ ओजस् ।
और गुण—। 'और' ( च ) शब्द हेतु अर्थ में । अर्थात् जिस कारण 'यो यः शस्त्रम्'
तृतीय उद्योतः ३४५ ध्वन्यालोकः नामिव यथास्वं विषयनियमितस्य स्वरूपस्य न कदाचिद्व्यभिचारः। तस्मादन्ये गुणा अन्या च सङ्घटना। न च सङ्घटनामाश्रिता गुणा इत्येकं दर्शनम्। अथवा सङ्घटनारूपा एव गुणाः। यतूक्तम्—'सङ्घटनावद्गुणानामप्यनियतविषयत्वं प्राप्नोति। लक्ष्ये व्यभिचारदर्शनात्' इति। तत्राप्येतदुच्यते-यत्र लक्ष्ये परिकल्पित- विषयव्यभिचारस्तद्विरूपमेवास्तु। कथमचारुत्वं तादृशे विषये सहृदयानां नावभातीति चेत् ? कविशक्तितिरोहितत्वात्। द्विविधो हि दोषः- कवेरव्युत्पत्तिकृतोऽशक्तिकृतश्च। तत्राव्युत्पत्तिकृतो दोषः शक्तितिर- स्कृतत्वात् कदाचिन्न लक्ष्यते। यस्त्वशक्तिकृतो दोषः स झटिति प्रतीयते। परिकरश्लोकश्चात्र— कोई क्षति नहीं। परन्तु उन (गुणों) का चक्षु आदि की भाँति, अपने-अपने विषय- नियमित स्वरूप का कभी व्यभिचार नहीं है। इस कारण गुण अन्य हैं और सङ्घटना अन्य है। और, गुण सङ्घटना के आश्रित नहीं है यह एक दर्शन (सिद्धान्त) है। अथवा सङ्घटना रूप ही गुण हैं। जो कि कहा है—'सङ्घटना की भांति गुणों का भी अनियत-विषयत्व प्राप्त होगा, क्योंकि लक्ष्य में व्यभिचार देखा जाता है। वहाँ भी यह कहते हैं—'जिस लक्ष्य में परिकल्पित विषय (के नियम) का व्यभिचार है, वह विरूप ही (दूषित ही) होगा। यदि यह कहो कि उस प्रकार के विषय में सहृदयों को अचारुत्व कैसे नहीं होता तो (उत्तर है कि) कवि की शक्ति द्वारा (दोष के) तिरोहित हो जाने के कारण। क्योंकि दोष दो प्रकार का है—कवि की अव्युत्पत्ति द्वारा कृत और अशक्ति द्वारा कृत। उनमें अव्युत्पत्तिकृत दोष शक्ति से तिरस्कृत हो जाने के कारण कभी लक्षित नहीं होता। परन्तु जो अशक्तिकृत दोष है वह झट प्रतीत हो जाता है। यहां परिकर-श्लोक भी है— लोचनम् नाम्। यथास्वमिति। 'शृङ्गार एव परमो मनःप्रह्लादनो रसः' इत्यादिना च विषयनियम उक्त एव। अथवेति। रसाभिव्यक्तावेतदेव सामर्थ्यं शब्दानां यत्त- त्था तथा सङ्घटमानत्वमिति भावः। इत्यादि में अचारुत्व प्रतीत नहीं होता उस कारण। परन्तु उनका अर्थात् गुणों का। अपने अपने—। 'शृङ्गार ही मन को परम आह्लादित करने वाला रस है' इत्यादि द्वारा भी विषयनियम कहा जा चुका ही है। अथवा—। भाव यह कि रसाभिव्यक्ति में गुणों की इतनी ही सामर्थ्य है जो उस उस प्रकार सङ्घटमानत्व है।
३४६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ‘अव्युत्पत्तिकृतो दोषः शक्त्या संव्रियते कवेः । यस्त्वशक्तिकृतस्तस्य स झटित्यवभासते ॥’ तथा हि—महाकवीनामप्युत्तमदेवताविषयप्रसिद्धसंभोगशृङ्गारनिब- न्धनाद्यनौचित्यं शक्तितिरस्कृतत्वात् ग्राम्यत्वेन न प्रतिभासते । यथा कुमारसम्भवे देवीसम्भोगवर्णनम् । एवमादौ च विषये यथौचित्या- त्यागस्तथा दर्शितमेवाग्रे । शक्तितिरस्कृतत्वं चान्वयव्यतिरेकाभ्यामव- 'कवि की अव्युत्पत्ति द्वारा कृत दोष शक्ति से ढंक जाता है, परन्तु जो उसकी अशक्ति द्वारा कृत है वह झट प्रतीत हो जाता है।' जैसा कि—महाकवियों का भी उत्तम देवता के सम्बन्ध में प्रसिद्ध सम्भोग शृङ्गार का निबन्धन आदि अनौचित्य शक्ति से तिरस्कृत होने के कारण ग्राम्य रूप से नहीं प्रतिभासित होता। जैसे, 'कुमारसम्भव' में देवी का सम्भोगवर्णन।—और इत्यादि प्रकार के विषय में जैसा औचित्य का त्याग नहीं है इस प्रकार आगे दिखाया ही है। और शक्ति द्वारा तिरस्कृतत्व अन्वय-व्यतिरेक द्वारा निश्चित होता है। जैसा लोचनम् शक्तिः प्रतिभानं वर्णनीयवस्तुविषयनूत्तनोल्लेखशालित्वम् । व्युत्पत्तिस्तदुप- योगिसमस्तवस्तुपौर्वापर्यपरामर्शकौशलम् । तस्येति कवेः । अनौचित्यमिति । आस्वादयितॄणां यः चमत्काराविघातस्तदेव रससर्वस्वम् आस्वादायत्तत्वात् । उत्तमदेवतासंभोगपरामर्शे च पितृसंभोग इव लज्जातङ्कादिना कश्चमत्कारा- वकाश इत्यर्थः । शक्तितिरस्कृतत्वादिति । संभोगोऽपि ह्यसौ वर्णितस्तथा प्रतिभानवता कविना यथा तत्रैव विश्रान्तं हृदयं पौर्वापर्यपरामर्शं कर्तुं न ददा- ति यथा निर्व्याजपराक्रमस्य पुरुषस्याविषयेऽपि युध्यमानस्य तावत्तस्मिन्नवसरे साधुवादो वितीर्यते न तु पौर्वापर्यपरामर्शो तथात्रापीति भावः । दर्शितमेवेति । शक्ति अर्थात् प्रतिभान, अर्थात् वर्णनीय वस्तु के सम्बन्ध में नई बात की उल्लेख- शालिता। व्युत्पत्ति अर्थात् उस (वर्णनीय) के उपयोगी समस्त वस्तुओं के पौर्वापर्य- पूर्वक परामर्श में कौशल। उसकी अर्थात् कवि की। अनौचित्य—। आस्वाद करने वालों के जो चमत्कार का अविघात है वही आस्वाद के अधीन होने के कारण रस- सर्वस्व है। अर्थात् उत्तमदेवता के सम्भोग के परामर्श में पितृसम्भोग की भांति कौन सा चमत्कार का अवकाश है! शक्ति द्वारा तिरस्कृत होने के कारण—। भाव यह कि प्रतिभानयुक्त कवि द्वारा वह सम्भोग भी उस प्रकार वर्णित है जैसे कि उसीमें विश्रान्त हृदय को पौर्वापर्य का परामर्श करने नहीं देता, जिस प्रकार कोई निर्व्याज पराक्रम वाला व्यक्ति जब बिना विषय के भी युद्ध करने लगता है उस अवसर में साधुवाद वितरण किया जाता है न कि पौर्वापर्य के परामर्श में (प्रवृत्ति होती है) उस प्रकार
तृतीय उद्योतः ३४७ ध्वन्यालोकः सीयते । तथा हि शक्तिरहितेन कविना एवंविधे विषये शृङ्गार उपनि- बध्यमानः स्फुटमेव दोषत्वेन प्रतिभासते । नन्वस्मिन् पक्षे 'यो यः शस्त्रं बिभर्ति' इत्यादौ किमचारुत्वम् ? अप्रतीयमानमेवारोपयामः । तस्माद् गुणव्यतिरिक्तत्वे गुणरूपत्वे गुणरूपत्वे च सङ्घटनाया अन्यः कश्चिन्नियमहेतुर्वक्तव्य इत्युच्यते । —तन्नियमे हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः ॥ ६ ॥ तत्र वक्ता कविः कविनिबद्धो वा, कविनिबद्धश्चापि रसभावरहितो रसभावसमन्वितो वा, रसोऽपि कथानायकाश्रयस्तद्विपक्षाश्रयो वा, कथानायकश्च धीरोदात्तादिभेदभिन्नः पूर्वस्तदनन्तरो वेति विकल्पाः । कि शक्तिरहित कवि के द्वारा इस प्रकार के विषय में उपनिबध्यमान शृङ्गार स्पष्ट ही दोषरूप से मालूम पड़ता है । ( प्रश्न ) इस पक्ष में 'यो यः शस्त्रं बिभर्ति' इत्यादि में अचारुत्व क्या है ? प्रतीत न होते हुए अचारुत्व का आरोप करते हैं । इसलिए गुण से व्यतिरिक्त होने और गुणरूप होने में सङ्घटना का अन्य कोई नियम हेतु कहना चाहिए, अतः कहते हैं— उसके नियमन में हेतु वक्ता और वाच्य का औचित्य है ॥ ६ ॥ उनमें से वक्ता कवि अथवा कविनिबद्ध हो सकता है, और कविनिबद्ध भी रसभावरहित अथवा रसभावसमन्वित हो सकता है, रस भी कथानायक के आश्रित अथवा उसके विपक्षके आश्रित हो सकता है और कथानायक धीरोदात्त आदि भेद से लोचनम् कारिकाकारेणेति भूतप्रत्ययः । वक्ष्यते हि—'अनौचित्यादृते नान्यद्रसभङ्गस्य कारणम्' इत्यादि । अप्रतीयमानमेवेति । पूर्वापरपरामर्शविवेकशालिभिरपीत्य- र्थः । गुणव्यतिरिक्तत्व इति । व्यतिरेकपञ्चे हि सङ्घटनाया नियमहेतुरेव नास्ति ऐक्यपक्षेऽपि न रसो नियमहेतुरित्यन्यो वक्तव्यः । तन्नियम इति कारिकावशेषः । कथां नयति स्वकर्त्तव्याङ्गभावमिति कथाना- यको यो निर्वहणे फलभागी । धीरोदात्तादीति । धर्मयुद्धवीरप्रधानो धीरोदात्तः । यहां भी । दिखाया ही है—। कारिकाकार ने, यह भूतप्रत्यय है । कहेंगे—'अनौचित्य के अतिरिक्त कोई रसभङ्ग का कारण नहीं' इत्यादि । प्रतीत न होते हुए—। अर्थात् पूर्वापर के परामर्श के विवेक वालों द्वारा भी । गुण से व्यतिरिक्त होने में—। व्यतिरेक ( भेद ) पक्ष में सङ्घटना का नियमहेतु ही नहीं है, ऐक्य ( अभेद ) पक्ष में भी रस नियमहेतु नहीं है, अतः अन्य कहना चाहिए । उसके नियमन में यह कारिका का अवशेष है । कथा को अपने कर्त्तव्य का अङ्गत्व प्राप्त कराता है अतः कथानायक है, जो निर्वहण में फल प्राप्त करता है । धीरोदात्त आदि—। धर्मवीर, युद्धवीर-प्रधान धीरो-
३४८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाच्यं च ध्वन्यात्मरसाङ्गं रसाभासाङ्गं वा, अभिनेयार्थमनभिनेयार्थं वा, उत्तमप्रकृत्याश्रयं तदितराश्रयं वेति बहुप्रकारम् । तत्र यदा कविरपगत- भिन्न पूर्व अथवा उसके बाद का हो सकता है, इस प्रकार विकल्प हैं । और वाच्य भी ध्वनिरूप रस का अङ्ग, अथवा रसाभास का अङ्ग, अभिनेयार्थ अथवा अनभिनेयार्थ, उत्तम प्रकृति के आश्रित अथवा उससे इतर के आश्रित, बहुत प्रकार का लोचनम् वीररौद्रप्रधानो धीरोद्धतः । वीरशृङ्गारप्रधानो धीरललितः । दानधर्मवीरशान्त- प्रधानो धीरप्रशान्त इति चत्वारो नायकाः क्रमेण सात्त्वत्यारभटीकैशिकीभार- तीलक्षणवृत्तिप्रधानाः । पूर्वः कथानायकस्तदनन्तर उपनायकः । विकल्पा इति । वक्तृभेदा इत्यर्थः । वाच्यमिति । ध्वन्यात्मा ध्वनिस्वभावो यो रसस्तस्याङ्गं व्य- ङ्गकमित्यर्थः । अभिनेयो वागङ्गसत्त्वाहार्यैराभिमुख्यं साक्षात्कारप्रायं नेयोऽर्थो व्यङ्ग्यरूपो ध्वनिस्वभावो यस्य तदभिनेयार्थं वाच्यं, स एव हि काव्यार्थ इत्यु- च्यते । तस्यैव चाभिनयेन योगः। यदाह मुनिः-'वागङ्गसत्त्वोपेतान् काव्यार्थान् भावयन्ति' इत्यादि तत्र तत्र । रसाभिनयानान्तरीकतया तु तद्विभावादिरूपतया वाच्योऽर्थोऽभनीयत इति वाच्यमभिनेयार्थमित्येषैव युक्ततरा वाचोयुक्तिः । न त्वत्र व्यपदेशिवद्भावो व्याख्येयः, यथान्यैः । तदितरेति । मध्यमप्रकृत्याश्रयमध- मप्रकृत्याश्रयं चेत्यर्थः । एवं वक्तृभेदान्वाच्यभेदांश्चाभिधाय तद्गतमौचित्यं नि- यामकमाह—तत्रेति । रचनाया इति सङ्घटनायाः । रसभावहीनोऽनाविष्टस्ता- दात्त । वीररौद्रप्रधान धीरोद्धत । वीरशृङ्गारप्रधान धीरललित । दानधर्मवीरशान्त- प्रधान धीरप्रशान्त, ये चार नायक क्रम से सात्त्वती, आरभटी, कैशिकी, भारतीरूप वृत्तिप्रधान होते हैं । पूर्व कथानायक, उसके बाद उपनायक । विकल्प— । अर्थात् वक्तृभेद । वाच्य— । ध्वनिरूप अर्थात् ध्वनिस्वभाव जो रस उसका अङ्ग अर्थात् व्यञ्जक । अभिनेय अर्थात् वाणी, अङ्ग, सत्त्व, आहार्य द्वारा आभिमुख्य अर्थात् साक्षा- त्कारप्राय पहुंचाया गया अर्थ व्यङ्ग्यरूप ध्वनिस्वभाव है जिसका वह अभिनेयार्थ वाच्य, वही 'काव्यार्थ' कहा जाता है । उसी का अभिनय के साथ सम्बन्ध है । क्योंकि मुनि ने कहा है—'वाणी, अङ्ग और सत्त्व से उपेत काव्यार्थों का भावन करते हैं', इत्यादि वहां-वहां । रसाभिनय का नान्तरीयक (अविनाभाव, अत्यावश्यक) होने से उसके (रस के) विभाव आदि रूप होने के कारण वाच्य अर्थ अभिनीत होता है, इस प्रकार वाच्य अभिनेयार्थ है यही कहने का ढङ्ग अच्छा है, न कि यहां व्यपदेशिवद्भाव ('राहोः शिरः' की भांति भेदविवक्षा) व्याख्यान के योग्य है, जैसा कि अन्य लोगों ने (व्याख्यान किया है) । उससे इतर— । अर्थात् मध्यम प्रकृति के आश्रित और उत्तम प्रकृति के आश्रित । इस प्रकार वक्ता के भेदों और वाच्य के भेदों का अभिधान करके नियामक तद्गत औचित्य को कहते हैं—उनमें से— । रचना की अर्थात् सङ्घटना की
तृतीय उद्योतः ३४९
ध्वन्यालोकः
रसभावो वक्ता तदा रचनायाः कामचारः । यदापि कविनिबद्धो वक्ता
रसभावरहितस्तदा स एव; यदा तु कविः कविनिबद्धो वा वक्ता रस-
भावसमन्वितो रसश्च प्रधानाश्रितत्वाद् ध्वन्यात्मभूतस्तदा नियमेनैव
तत्रासमासामध्यसमासे एव सङ्घटने । करुणविप्रलम्भशृङ्गारयोस्त्व-
समासैव सङ्घटना । कथमिति चेत्; उच्यते-रसो यदा प्राधान्येन
हो सकता है । उनमें से जब कवि रसभावरहित वक्ता हो तब रचना की
स्वतन्त्रता है, और जब कविनिबद्ध वक्ता रसभावरहित हो तब वही है; परन्तु जब
कवि अथवा कविनिबद्ध वक्ता रसभावसमन्वित हो, और रस प्रधान के आश्रित
होने के कारण ध्वनिरूप हो चुका हो तब नियमतः ही वहाँ असमासा और मध्य-
समासा ही सङ्घटनाएं होंगी । परन्तु करुण और विप्रलम्भ शृङ्गार में असमासा ही
सङ्घटना होगी । यदि कहो 'कैसे ?' तो कहते हैं-रस जब प्राधान्य से प्रतिपाद्य
लोचनम्
पक्षादिरुदासीनोऽपीतिवृत्ताङ्गतया यद्यपि प्रधानरसानुयाय्येव, तथापि तावति
रसादिहीन इत्युक्तम् । स एवेति कामचारः । एवं शुद्धवक्त्रौचित्यं विचार्य वाच्यौ-
चित्त्येन सह तदेवाह-यदा त्विति । कविर्यद्यपि रसाविष्ट एव वक्ता युक्तः ।
अन्यथा 'स एव वीतरागश्चेत्' इति स्थित्या नीरसमेव काव्यं स्यात् । तथापि
यदा यमकादिचित्रदर्शनप्रधानोऽसौ भवति, तदा 'रसादिहीन' इत्युक्तम् । नि-
यमेन रसभावसमन्वितो वक्ता न तु कथञ्चिदपि तटस्थः । रसश्च ध्वन्यात्मभूत
एव न तु रसवदलङ्कारप्रायः । तदासमासामध्यसमासे एव सङ्घटने, अन्यथा
तु दीर्घसमासापीत्येवं योज्यम् । तेन नियमशब्दस्य द्वयोश्चैवकारयोः पौनरुक्त्य-
मनाशङ्क्यम् । कथमिति चेदिति । किं धर्मसूत्रकारवचनमेतदिति भावः । उच्यत-
रसभावहीन अनाविष्ट तापस आदि उदासीन भी इतिवृत्त के अङ्ग रूप से यद्यपि
प्रधान रस का अनुयायी ही होता है तथापि उतने में (अपने आप में) रसादि से हीन
होता है यह कहा है। वही-। स्वतन्त्रता । इस प्रकार शुद्ध वक्ता के औचित्य को
विचार करके वाच्यौचित्य के साथ उसी को कहते हैं-परन्तु जब-। कवि यद्यपि
रसाविष्ट ही वक्ता ठीक होता है । अन्यथा 'वही वीतराग हो' इस स्थिति के अनुसार
काव्य नीरस ही होगा, तथापि वह जब यमक आदि चित्र देखने में लग जाता है तब
'रसादिहीन' हो जाता है, यह कहा है । नियमतः वक्ता रसभावसमन्वित होता है न
कि किसी प्रकार भी उसे तटस्थ होना चाहिए । और रस ध्वनि का रूप ही होना
चाहिए, न कि रसवदलङ्कार । ऐसी स्थिति में असमासा और मध्यमसमासा ही सङ्घट-
नाएं होंगी, अन्यथा दीर्घसमासा भी होगी, इस प्रकार (ग्रन्थ) को लगाना चाहिए ।
इसलिए 'नियम' शब्द का और दो 'ही' (एवकार) का प्रयोग आशंकनीय नहीं हैं ।
कैसे ?-भाव यह कि क्या यह धर्मसूत्रकार का वचन है ! कहते हैं-। अर्थात् न्याय की
३५० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रतिपाद्यस्तदा तत्प्रतीतौ व्यवधायका विरोधिनश्च सर्वात्मनैव परि- हार्याः। एवं च दीर्घसमासा सङ्घटना समासानामनेकप्रकारसम्भावनया कदाचिद्रसप्रतीतिं व्यवदधातीति तस्यां नात्यन्तमभिनिवेशः शोभते। विशेषतोऽभिनेयार्थे काव्ये, ततोऽन्यत्र च विशेषतः करुणविप्रलम्भशृङ्गा- रयोः। तयोर्हि सुकुमारतरत्वात् स्वल्पायामप्यस्वच्छतायां शब्दार्थयोः प्रतीतिर्मन्थरीभवति। रसान्तरे पुनः प्रतिपाद्ये रौद्रादौ मध्यमसमासा होता है तब उसकी प्रतीति में व्यवधायक और विरोधी सब प्रकार से ही परिहार्य होते हैं। और इस प्रकार दीर्घसमासा सङ्घटना समासों के अनेक प्रकारों की सम्भावना के कारण कदाचित् रस की प्रतीति का व्यवधान करती है, इसलिए उसमें अत्यन्त अभिनिवेश शोभा नहीं देता। विशेषतः अभिनेयार्थ काव्य में, और उससे अतिरिक्त में विशेषतः करुण और विप्रलम्भ शृङ्गार में। क्योंकि उन दोनों के सुकुमारतर होने के कारण थोड़ी भी अस्वच्छता होने पर शब्द-अर्थ की प्रतीति मन्थर (शिथिल) हो जाती है। और रौद्र आदि दूसरे रसों के प्रतिपादन में मध्यमसमासा सङ्घटना लोचनम् इति। न्यायोपपत्त्येत्यर्थः। तत्प्रतीताविति। तदास्वादे ये व्यवधायका आस्वाद- विघ्नरूपा विरोधिनश्च तद्विपरीतास्वादमया इत्यर्थः। सम्भावनयेति। अनेकप्रकारः सम्भाव्यते सङ्घटना तु सम्भावनायां प्रयोक्त्रीति द्वौ णिचौ। विशेषतोऽभिने- यार्थेति। अनुटितेन व्यङ्ग्येन तावत्समासार्थाभिनयो न शक्यः कर्तुम्। काका- दयोऽन्तरप्रसादगानादयश्च। तत्र दुष्प्रयोज्या बहुतरसन्देहप्रसरा च तत्र प्रति- पत्तिर्न नाट्येऽनुरूपा स्यात्। प्रत्यक्षरूपत्वात्तस्या इति भावः। अन्यत्र चेति। अनभिनेयार्थेऽपि। मन्थरीभवतीति। आस्वादो विघ्नितत्वात्प्रतिहन्यत इत्यर्थः। तस्या दीर्घसमाससङ्घटनायाः य आक्षेपस्तेन विना यो न भवति व्यङ्ग्याभि- उपपत्ति से। उसकी प्रतीति में—। अर्थात् उसके आस्वाद में जो व्यवधायक और आस्वाद के विघ्नरूप विरोधी हैं, उसके विपरीत आस्वादमय। सम्भावना के कारण—। अनेक प्रकार सम्भावित होती है, और सङ्घटना सम्भावना में प्रयोजककर्त्री है, इस- लिए दो 'णिच्' हैं। विशेषतः अभिनेयार्थ—। बिना व्यङ्ग्य अर्थ के तोड़े समासार्थ का अभिनय नहीं किया जा सकता। काकु आदि और बीच में प्रसन्न करने के लिए गान आदि। भाव यह कि वहां यह दुष्प्रयोज्य है और नाट्य में बहुत सन्देहों से भरी प्रतिपत्ति अनुरूप नहीं होती। क्योंकि वह प्रत्यक्षरूप होती है। और उससे अतिरिक्त में—। अनभिनेयार्थ में भी। मन्थर हो जाती है—विघ्नित हो जाने के कारण आस्वाद प्रति- हत हो जाता है। उस दीर्घसमाससङ्घटना के आक्षेप के बिना जो व्यङ्ग्य का अभि-
तृतीय उद्योतः ३५१ ध्वन्यालोकः सङ्घटना कदाचिद्धीरोद्धतनायकसम्बन्धव्यापाराश्रयेण दीर्घसमासापि वा तदाक्षेपाविनाभावरसोचितवाच्यापेक्षया न विगुणा भवतीति सापि नात्यन्तं परिहार्या। सर्वासु च सङ्घटनासु प्रसादाख्यो गुणो व्यापी। स हि सर्वरससाधारणः सर्वसङ्घटनासाधारणश्चेत्युक्तम्। प्रसादातिक्रमे ह्यस- मासापि सङ्घटना करुणविप्रलम्भशृङ्गारौ न व्यनक्ति। तदपरित्यागे च मध्यमसमासापि न न प्रकाशयति। तस्मात्सर्वत्र प्रसादोऽनुसर्तव्यः। अत एव च 'यो यः शस्त्रं विभर्ति' इत्यादौ यद्योजसः स्थितिर्नेष्यते अथवा दीर्घसमासा भी कभी धीरोद्धत नायक के सम्बन्ध या व्यापार के सहारे, उसके आक्षेप के बिना न हो सकने वाले इसके उचित वाच्य की अपेक्षा से विगुण (प्रतिकूल) नहीं होती, इसलिए वह भी अत्यन्त परिहार्य नहीं है। और सभी सङ्घटनाओं में प्रसाद नाम का गुण व्याप्त रहने वाला है। क्योंकि वह सर्वरससाधारण और सर्वसङ्घटनासाधारण कहा गया है। प्रसाद के बिना असमासा भी सङ्घटना करुण और शृङ्गार को व्यक्त नहीं करती है और उसके होने पर मध्यमसमासा भी सङ्घटना नहीं प्रकाशित करती है यह बात नहीं। इसलिए सर्वत्र प्रसाद का अनुसरण करना चाहिए। और इसलिए ही 'यो यः शस्त्रं विभर्ति' इत्यादि में यदि ओजस् की स्थिति लोचनम् व्यञ्जकस्तादृशो रसोचितो रसव्यञ्जकतयोपादीयमानो वाच्यस्तस्य यासावपेक्षा दीर्घसमाससङ्घटनां प्रति सा अवैगुण्ये हेतुः। नायकस्याक्षेपो व्यापार इति यद्व्याख्यातं तन्न श्लिष्यतीत्यलम्। व्यापीति। या काचित्सङ्घटना सा तथा कर्तव्या, यथा वाच्ये झटिति भवति प्रतीतिरिति यावत्। उक्तमिति। 'समर्प- कत्वं काव्यस्य यत्तु' इत्यादिना। न व्यनक्तीति। व्यञ्जकस्य स्ववाच्यस्यैवा- त्यायनादिति भावः। तदिति। प्रसादस्यापरित्यागे अभीष्टत्वादत्रार्थे स्वकण्ठे- व्यञ्जक नहीं होता उस प्रकार का रसोचित अर्थात् रस के व्यञ्जक रूप से उपादीयमान वाच्य है उसकी जो यह अपेक्षा दीर्घसमाससङ्घटना के प्रति है वह अप्रातिकूल्य में हेतु है। नायक का आक्षेप अर्थात् व्यापार यह जो व्याख्यान किया गया है वह मेल जैसे नहीं खाता अतः ठीक नहीं। व्याप्त रहने वाला—। मतलब कि जो कोई सङ्घटना है वह उस प्रकार करनी चाहिए जिस प्रकार कि वाच्य अर्थ में प्रतीति झट हो जाय। कहा गया है—। 'समर्पकत्वं काव्यस्य यत्तु' इत्यादि द्वारा। व्यक्त नहीं करती है—। भाव यह कि क्योंकि व्यञ्जक अपने वाच्य का ही प्रत्यायन नहीं कर पाता। उसके—। प्रसाद के होने पर अभीष्ट होता है, इस अर्थ में अपने कण्ठ से 'अन्वय-व्यतिरेक' कह
३५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
तत्प्रसादाख्य एव गुणो न माधुर्यम् । न चाचारुत्वम्; अभिप्रेतरस-
प्रकाशनात् । तस्माद्गुणाव्यतिरिक्तत्वे गुणव्यतिरिक्तत्वे वा सङ्घटनाया
यथोक्तौचित्याद्विषयनियमोऽस्तीति तस्या अपि रसव्यञ्जकत्वम् ।
तस्याश्च रसाभिव्यक्तिनिमित्तभूताया योऽयमनन्तरोक्तो नियमहेतुः स
एव गुणानां नियतो विषय इति गुणाश्रयेण व्यवस्थानेमप्यविरुद्धम् ।
विषयाश्रयमप्यन्यदौचित्यं तां नियच्छति ।
काव्यप्रभेदाश्रयतः स्थिता भेदवती हि सा ॥ ७ ॥
अभिमत नहीं है [तो (वहां) प्रसाद ही गुण है माधुर्य नहीं। अभिप्रेत रस के
प्रकाशन हो जाने से अचारुत्व नहीं है। इसलिए गुण से अतिरिक्त न होने अथवा
गुण से अतिरिक्त होने में सङ्घटना का यथोक्त औचित्य के कारण विषयनियम है,
अतः उसका भी रसव्यञ्जकत्व है। और रस की अभिव्यक्ति में निमित्तभूत उस
(सङ्घटना) का जो यह अभी कहा गया नियमहेतु है वही गुणों का नियत विषय है,
इसलिए गुण के आश्रित रूप से (सङ्घटना के) व्यवस्थापन में भी विरोध नहीं ॥५-६॥
विषय के आश्रित भी दूसरा औचित्य उसका नियमन करता है, काव्य के प्रभेदों
के अनुसार वह भिन्न होती है ॥ ७ ॥
लोचनम्
नान्वयव्यतिरेकावुक्तौ । न माधुर्यमिति । ओजोमाधुर्ययोरन्योन्याभावरूपत्वं प्राङ्-
निरूपितमिति तयोः सङ्करोऽत्यन्तं श्रुतिबाह्य इति भावः । अभिप्रेतेति । प्रसादे-
नैव स रसः प्रकाशितः न न प्रकाशित इत्यर्थः । तस्मादिति । यदि गुणाः
सङ्घटनैकरूपास्तथापि गुणनियम एव सङ्घटनाया नियमः । गुणाधीन सङ्घ-
टनापक्षेऽप्येवम् । सङ्घटनाश्रयगुणपक्षेऽपि सङ्घटनाया नियामकत्वेन
यद्वक्तृवाच्यौचित्यं हेतुत्वेनोक्तं तद्गुणानामपि नियमहेतुरिति पक्षत्रयेऽपि न
कश्चिद्विप्लव इति तात्पर्यम् ॥ ५-६ ॥
नियामकान्तरमप्यस्तीत्याह-विषयाश्रयमिति । विषयशब्देन सङ्घात-
दिए । माधुर्य नहीं—। भाव यह कि ओजस् और माधुर्य का अन्योन्याभावरूपत्व पहले
निरूपण किया जा चुका है, अतः उनको संकर अत्यन्त श्रुतिबाह्य (कभी सुना
नहीं गया) है। अभिप्रेत-। प्रसाद से ही वह रस प्रकाशित है, अर्थात् नहीं प्रकाशित
है यह बात नहीं। इसलिए-। यदि गुण सङ्घटना रूप हैं तथापि गुणनियम ही
सङ्घटना का नियम है। गुण के अधीन सङ्घटना के पक्ष में भी इसी प्रकार है।
सङ्घटना के आश्रित गुण के पक्ष में भी सङ्घटना के नियामक होने से जो वक्तृगत
और वाच्यगत औचित्य को हेतुरूप से कहा है वह गुणों का भी नियमहेतु है, इस
प्रकार तीनों पक्षों में भी कोई विप्लव नहीं है, यह तात्पर्य है ॥ ५-६ ॥
दूसरा नियामक भी है यह कहते हैं-विषय के आश्रित-। 'विषय' शब्द से
तृतीय उद्योतः ३५३ ध्वन्यालोकः वक्तृवाच्यगतौचित्ये सत्यपि विषयाश्रयमन्यदौचित्यं सङ्घटनां नियच्छति। यतः काव्यस्य प्रभेदा मुक्तकं संस्कृतप्राकृतापभ्रंश- निबद्धम्। सन्दानितकविशेषककलापककुलकानि। पर्यायबन्धः परिकथा खण्डकथा-सकलकथे सर्गबन्धोऽभिनेयार्थमाख्यायिका-कथे वक्तृगत और वाच्यगत औचित्य के होने पर भी विषय के आश्रित दूसरा औचित्य सङ्घटना को नियमन करता है। क्योंकि काव्य के प्रभेद संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश में निबद्ध मुक्तक, सन्दानितक, विशेषक, कलापक, कुलक, पर्यायबन्ध, परिकथा, खण्डकथा और सकलकथा, सर्गबन्ध, अभिनेयार्थ, आख्यायिका, कथा आदि इस लोचनम् विशेष उक्तः। यथा हि सेनाद्यात्मकसङ्घातनिवेशी पुरुषः कातरोऽपि तदौचि- त्यादनुगुणतयैवास्ते तथा काव्यवाक्यमपि सङ्घातविशेषात्मकसन्दानितका- दिमध्यनिविष्टं तदौचित्येन वर्तते। मुक्तकं तु विषयशब्देन यदुक्तं तत्सङ्घाता- भावेन स्वातन्त्र्यमात्रं प्रदर्शयितुं स्वप्रतिष्ठितमाकाशमिति यथा। अपिशब्देने- दमाह—सत्यपि वक्तृवाच्यौचित्ये विषयौचित्यं केवलं तारतम्यभेदमात्रव्या- पृतम्, न तु विषयौचित्येन वक्तृवाच्यौचित्यं निवार्यत इति। मुक्तकमिति। मुक्तमन्येनानालिङ्गितं तस्य सञ्ज्ञायां कन्। तेन स्वतन्त्रतया परिसमाप्तनिरा- काङ्क्षार्थमपि प्रबन्धमध्यवर्ति न मुक्तकमित्युच्यते। मुक्तकस्यैव विशेषणं संस्कृतेत्यादि। क्रमभावित्वात्तथैव निर्देशः। द्वाभ्यां क्रियासमाप्तौ सन्दानित- कम्। त्रिभिर्विशेषकम्। चतुर्भिः कलापकम्। पञ्चप्रभृतिभिः कुलकम्। इति 'सङ्घातविशेष' कहा गया है। जैसे कोई सेना आदि रूप सङ्घात में रहने वाला कातर भी पुरुष उसके औचित्य के कारण अनुगुणरूप (अकातर रूप) से ही है उसी प्रकार सङ्घातविशेष रूप सन्दानितक आदि के बीच रहने वाला काव्यवाक्य भी उसके (वचन के) औचित्य से होता है। परन्तु 'विषय' शब्द से जो कहा है उसके सङ्घात के अभाव के कारण स्वप्रतिष्ठित आकाश की भाँति स्वातन्त्र्यमात्र को दिखाने के लिए मुक्तक (को कहा) है। 'भी' शब्द से यह कहते हैं—वक्तृगत औचित्य और वाच्यगत औचित्य के होने पर भी विषयगत औचित्य केवल तारतम्य भेद मात्र का प्रयोजक है, न कि विषयगत औचित्य से वक्तृगत और वाच्यगत औचित्य निवारण किए जाते हैं। मुक्तक—। मुक्त अर्थात् अन्य से अनालिङ्गित, संज्ञा में 'कन्'। इसलिए स्वतन्त्र रूप से निराकांक्ष अर्थ से रहित भी प्रबन्ध के बीच रहने वाला 'मुक्तक' नहीं कहलाता। संस्कृत० इत्यादि 'मुक्तक' का ही विशेषण है। क्रम से होने के कारण उसी प्रकार निर्देश है। दो (पद्यों) से क्रिया के समाप्त हो जाने पर 'सन्दानितक' होता है, तीन से 'विशेषक', चार से 'कलापक', पाँच प्रभृति से 'कुलक'। इस प्रकार क्रिया की समाप्तिप्रयुक्त भेद द्वन्द्व समास द्वारा निर्दिष्ट हैं। २३ ध्व०
३५४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
इत्येवमादयः । तदाश्रयेणापि सङ्घटना विशेषवती भवति । तत्र मुक्त-
केषु रससन्धाभिनिवेशिनः कवेस्तदाश्रयमौचित्यम् । तच्च दर्शितमेव ।
अन्यत्र कामचारः ।
प्रकार हैं। उनके आश्रय से भी सङ्घटना विशेष प्रकार की होती है। उनमें से
मुक्तकों में रस के निबन्धन में अभिनिवेश रखने वाले कवि का रस के आश्रित
औचित्य है। उसे दिखा ही चुके हैं। अन्यत्र स्वतन्त्रता है।
लोचनम्
क्रियासमाप्तिकृता भेदा इति द्वन्द्वेन निर्दिष्टाः । अवान्तरक्रियासमाप्तावपि वसन्त-
वर्णनादिरेकवर्णनीयोद्देशेन प्रवृत्तः पर्यायबन्धः । एकं धर्मादिपुरुषार्थमुद्दिश्य
प्रकारवैचित्र्येणानन्तवृत्तान्तवर्णनप्रकारा परिकथा । एकदेशवर्णना खण्ड-
कथा । समस्तफलान्तेतिवृत्तवर्णना सकलकथा । द्वयोरपि प्राकृतप्रसिद्धत्वाद्
द्वन्द्वेन निर्देशः । पूर्वेषां तु मुक्तकादीनां भाषायामनियमः । महाकाव्यरूपः
पुरुषार्थफलः समस्तवस्तुवर्णनाप्रबन्धः सर्गबन्धः संस्कृत एव । अभिनेयार्थं
दशरूपकं नाटिकात्रोटकरासकप्रकरणिकाद्यवान्तरप्रपञ्चसहितमनेकभाषाम्या-
मिश्ररूपम् । आख्यायिकोच्छ्वासादिना वक्त्रापरवक्त्रादिना च युक्ता ।
कथा तद्विरहिता । उभयोरपि गद्यबन्धस्वरूपतया द्वन्द्वेन निर्देशः । आदिग्रह-
णाच्चम्पूः । यथाह दण्डी-'गद्यपद्यमयी चम्पूः' इति । अन्यत्रेति । रसबन्धान-
भिनिवेशे ।
अवान्तर क्रिया के समाप्त होने पर भी वसन्त-वर्णन आदि एक वर्णनीय के उद्देश्य से
प्रवृत्त (काव्य) 'पर्यायबन्ध' होता है। धर्म आदि एक पुरुषार्थ के उद्देश्य से विभिन्न
प्रकारों से अनन्त वृत्तान्तों के वर्णन का प्रकार 'परिकथा' होती है। एकदेश
(किसी प्रसिद्ध कथा के एक भाग) का वर्णन 'खण्डकथा' होती है। समस्त फल-
पर्यन्त इतिवृत्त का वर्णन 'सकलकथा' होती है । (खण्डकथा और सकलकथा इन)
दोनों के प्राकृत में प्रसिद्ध होने के कारण द्वन्द्व समास द्वारा निर्देश है। किन्तु 'मुक्तक'
आदि पहले प्रभेदों की भाषा में नियम नहीं। महाकाव्यरूप पुरुषार्थ फल वाला
एवं समस्त वस्तुओं के वर्णनों वाला प्रबन्ध संस्कृत में ही होता है। अभिनेयार्थ
दशरूपक नाटिका, त्रोटक, रासक, प्रकरणिका आदि अवान्तर प्रपञ्चसहित, अनेक
भाषाओं का मिलाजुला रूप है। आख्यायिका उच्छ्वास आदि से और वक्त्र और
अपरवक्त्र आदि से युक्त होती है। कथा उनसे विरहित होती है। दोनों (आख्यायिका
और कथा) का भी गद्यबन्ध स्वरूप होने के कारण द्वन्द्व समास से निर्देश है।
'आदि' ग्रहण से 'चम्पू' । जैसा दण्डी ने कहा है—'गद्यपद्यमयी चम्पूः' । अन्यत्र—।
अर्थात् रस के निबन्धन का अभिनिवेश जहाँ नहीं है।
तृतीय उद्योतः ३५५ ध्वन्यालोकः मुक्तकेषु प्रबन्धेष्विव रसबन्धाभिनिवेशिनः कवयो दृश्यन्ते । यथा ह्यमरुकस्य कवेर्मुक्ताकाः शृङ्गाररसस्यन्दिनः प्रबन्धायमानाः प्रसिद्धा एव । सन्दानितकादिषु तु विकटनिबन्ध नौचित्यान्मध्यमसमासादीर्घ- समासे एव रचने । प्रबन्धाश्रयेषु यथोक्तप्रबन्धौचित्यमेवानुसर्तव्यम् । प्रबन्धों की भाँति मुक्तकों में कवि लोग रस के निबन्धन का अभिनिवेश रखने वाले देखे जाते हैं । जैसा कि कवि अमरुक के मुक्तक शृङ्गार रस की वर्षा करने वाले एवं प्रबन्ध काव्य सदृश प्रसिद्ध ही हैं । किन्तु सन्दानितक आदि में विकट निबन्धन के औचित्य से मध्यम समासा और दीर्घसमासा ही रचनाएं हैं। प्रबन्ध के आश्रित ( काव्यों ) में यथोक्त प्रबन्ध के औचित्य का ही अनुसरण करना चाहिए । पर्याय- लोचनम् ननु मुक्तके विभावादिसङ्घटना कथं येन तदायत्तो रसः स्यादित्याश- ङ्क्याह—मुक्तकेष्विति । अमरुकस्येति । कथमपि कृतप्रत्यापत्तौ प्रिये स्खलितोत्तरे विरहकृशया कृत्वा व्याजप्रकलितमश्रुतम् । असहनसखीश्रोत्रप्राप्तिं विशङ्क्य ससम्भ्रमं विवलितदृशा शून्ये गेहे समुच्छ्वसितं ततः ॥ इत्यत्र हि श्लोके स्फुटैव विभावादिसम्पत्प्रतीतिः । विकटेति । असमासायां हि सङ्घटनायां मन्थररूपा प्रतीतिः साकाङ्क्षा सती चिरेण क्रियापदं दूरवर्त्य- नुधावन्ती वाच्यप्रतीतावेव विश्रान्ता सती न रसत्तत्त्वचर्वणायोग्या स्यादिति भावः । प्रबन्धाश्रयेष्विति । सन्दानितकादिषु कुलकान्तेषु । यदि वा प्रबन्धेऽपि मुक्तकस्यास्तु सद्भावः, पूर्वापरनिरपेक्षेणापि हि येन रसचर्वणा क्रियते तद्देव मुक्तक में विभावादि की सङ्घटना कैसे होगी जिससे उसके अधीन रस होगा, यह आशङ्का करके कहते हैं—मुक्तकों में—। अमरुक के—। 'गोत्रस्खलन के अपराधी प्रिय के होने पर किसी प्रकार विश्वास दिलाने पर विरह से कृश नायिका ने ( पुनः समागम की आशा से ) बहाना करके अनसुनी कर दिया, फिर न सहन करने वाली सखी के कानों में ( बात के ) पहुँच जाने के प्रमाद से व्याकुल हो सूने घर में आँखें झुका कर के उच्छ्वास लेने लगी ।' इस श्लोक में स्पष्ट ही विभावादि-सम्पत् की प्रतीति होती है । विकट—। भाव यह कि असमासा सङ्घटना में मन्थररूप प्रतीति देर तक दूरवर्ती क्रियापद का अनुधावन करती हुई वाच्य की प्रतीति में ही विश्रान्त होती हुई इस तत्त्व की चर्वणा के योग्य नहीं होगी । प्रबन्ध के आश्रित—। सन्दानितक आदि में कुलक पर्यन्त में । अथवा प्रबन्ध में भी मुक्तक का सद्भाव माना जाय । पूर्वापर-निरपेक्ष जिस ( श्लोक ) से रसचर्वणा की जाय वह मुक्तक है । जैसे ( मेघदूत का ) 'त्वामालिख्य प्रणयकुपिताम्'
३५६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः पर्यायबन्धे पुनरसमासामध्यमसमासे एव सङ्घटने । कदाचिदर्थौचित्या- श्रयेण दीर्घसमासायामपि सङ्घटनायां परुषा ग्राम्या च वृत्तिः परिह- र्त्तव्या । परिकथायां कामचारः, तत्रेतिवृत्तमात्रोपन्यासेन नात्यन्तं- रसबन्धाभिनिवेशात् । खण्डकथासकलकथयोस्तु प्राकृतप्रसिद्धयोः कुलका- दिनिबन्धनभूयस्त्वादीर्घसमासायामपि न विरोधः । वृत्त्यौचित्यं तु यथा- रसमनुसर्तव्यम् । सर्गबन्धे तु रसतात्पर्ये यथारसमौचित्यमन्यथा तु कामचारः, द्वयोरपि मार्गयोः सर्गबन्धविधायिनां दर्शनाद्रसतात्पर्यं साधीयः । अभिनेयार्थे तु सर्वथा रसबन्धेऽभिनिवेशः कार्यः । आख्या- बन्ध में असमसा और मध्यमसमासा ही सङ्घटनाए हैं। कभी अर्थ के औचित्य के आश्रय से दीर्घसमासा भी सङ्घटना में परुषा और ग्राम्या वृत्ति को छोड़ देना चाहिए । परिकथा में स्वतन्त्रता है, क्योंकि उसमें केवल इतिवृत्त के वर्णन होने से रस के निबन्धन का अभिनिवेश अत्यन्त नहीं होता। किन्तु प्राकृत में प्रसिद्ध खण्डकथा और सकलकथा में कुलक आदि के निबन्धन के आधिक्य के कारण दीर्घसमासा होने पर भी विरोध नहीं। किन्तु इसके अनुसार वृत्तियों का औचित्य अनुसरण करना चाहिए। किन्तु रस में तात्पर्य वाले सर्गबन्ध में रस के अनुसार औचित्य है, अन्यथा स्वतन्त्रता है। सर्गबन्ध के निर्माता दोनों मार्गों में देखे जाते हैं, (किन्तु) रस में तात्पर्य अच्छा होता है। परन्तु अभिनेयार्थ में सर्वथा रस के निबन्धन में अभिनिवेश करना चाहिए। आख्यायिका और कथा में तो गद्य के निबन्धन का लोचनम् मुक्तकम् । यथा—'त्वामालिख्य प्रणयकुपिताम्' इत्यादिश्लोकः । कदाचिदिति । रौद्रादिविषये । नात्यन्तमिति । रसबन्धे यो नात्यन्तमभिनिवेशस्तस्मादिति सङ्गतिः । वृत्त्यौचित्यमिति । परुषोपनागरिकाग्राम्याणां वृत्तीनामौचित्यं यथाप्र- बन्धं यथारसं च । अन्यथेति । कथामात्रतात्पर्ये वृत्तिष्वपि कामचारः। द्वयोरपीति सप्तमी । कथातात्पर्ये सर्गबन्धो यथा भट्टजयन्तकस्य कादम्बरीकथासारम् । इत्यादि श्लोक । कभी अर्थात् रौद्र आदि के विषय में। अत्यन्त नहीं—। रस के निबन्धन में जो अत्यन्त अभिनिवेश नहीं है उससे यह सङ्गति है। वृत्तियों का औचित्य—। परुषा, उपनागरिका, ग्राम्या वृत्तियों का प्रबन्ध के अनुसार और रस के अनुसार औचित्य । अन्यथा—। कथामात्र में तात्पर्य होने पर वृत्तियों में भी स्वतन्त्रता है। दोनों मार्गों में, यह सप्तमी है। कथा के तात्पर्य में सर्गबन्ध, जैसे भट्ट जयन्तक का कादम्बरी-कथासार; रस में तात्पर्य, जैसे रघुवंश आदि। अन्य (व्याख्याकार)
तृतीय उद्योतः ३५७ ध्वन्यालोकः यिकाकथयोस्तु गद्यनिबन्धनबाहुल्याद्गद्ये च छन्दोबन्धाभिन्नप्रस्थान- त्वादिह नियमे हेतुरकृतपूर्वोऽपि मनाक्क्रियते ॥ ७ ॥ एतद्यथोक्तमौचित्यमेव तस्या नियामकम् । सर्वत्र गद्यबन्धेऽपि छन्दोनियमवर्जिते ॥ ८ ॥ यदेतदौचित्यं वक्तृवाच्यगतं सङ्घटनाया नियामकमुक्तमेतदेव गद्ये छन्दोनियमवर्जितेऽपि विषयापेक्षं नियमहेतुः । तथा ह्यत्रापि यदा कविः कविनिबद्धो वा वक्ता रसभावरहितस्तदा कामचारः । रसभाव- समन्विते तु वक्तरि पूर्वोक्तमेवानुसर्तव्यम् । तत्रापि च विषयौचित्य- मेव । आख्यायिकायां तु भूम्ना मध्यमसामासादीर्घसमासे एव सङ्घटने । गद्यस्य विकटबन्धाश्रयेण छायावत्त्वात् । तत्र च तस्य प्रकृष्यमाण- बाहुल्य होने से और गद्य में छन्दोबन्ब से अतिरिक्त प्रस्थान होने से पहले नियामक हेतु न किए जाने पर भी थोड़ा (निर्देश) करते हैं ॥ ७ ॥ यही यथोक्त औचित्य सर्वत्र छन्द के नियमों से वर्जित गद्यबन्ध में भी उसका नियामक होता है ॥ ८ ॥ जो यह वक्तृगत और वाच्यगत औचित्य सङ्घटना का नियामक कहा गया है, यही छन्द के नियमों से वर्जित गद्य में भी विषयगत औचित्यसहित नियामक होता है। जैसा कि यहाँ भी जब कवि अथवा कविनिबद्ध वक्ता रसभाव से रहित होता है तब स्वतन्त्रता होती है। किन्तु रसभाव से समन्वित वक्ता के होने पर पूर्वोक्त का ही अनुसरण करना चाहिए। उसमें भी विषयगत औचित्य ही होता है। किन्तु आख्यायिका में अधिकांश मध्यमसमासा और दीर्घसमासा सङ्घटनाएं ही होती हैं। क्योंकि गद्य विकट रचना के कारण सुन्दर होता है, क्योंकि उसका उसमें प्रकर्ष लोचनम् रसतात्पर्यं यथा रघुवंशादि । अन्ये तु संस्कृतप्राकृतयोर्द्वयोरिति व्याचक्षते, तत्र तु रसतात्पर्यं साधीय इति यदुक्तं तत्किमपेक्ष्येति नेयार्थं स्यात् ॥ ७ ॥ विषयापेक्षमिति । गद्यबन्धस्य भेदा एव विषयत्वेनानुमन्तव्याः ॥ ८ ॥ व्याख्यान करते हैं 'संस्कृत, प्राकृत दोनों में'। उस व्याख्यान में जो कि (ग्रन्थ में) 'रस में तात्पर्य अच्छा होता है' कहा है, वह किस अपेक्षा से ? इस लिए नेयार्थ... (असमर्थ) होगा ॥ ७ ॥ विषयगत औचित्य—। गद्यरचना के भेद ही विषय रूप से मानने चाहिए ॥८॥
३५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
त्वात् । कथायां तु विकटबन्धप्राचुर्येऽपि गद्यस्य रसबन्धोक्तमौचित्य-
मनुसर्तव्यम् ॥ ८ ॥
रसबन्धोक्तमौचित्यं भाति सर्वत्र संश्रिता ।
रचना विषयापेक्षं तत्तु किञ्चिद्विभेदवत् ॥ ९ ॥
अथवा पद्यवद्गद्यबन्धेऽपि रसबन्धोक्तमौचित्यं सर्वत्र संश्रिता रचना
भवति । तत्तु विषयापेक्षं किञ्चिद्विशेषवद्भवति, न तु सर्वाकारम् । तथा
हि गद्यबन्धेऽप्यतिदीर्घसमासा रचना न विप्रलम्भशृङ्गारकरुणयोराख्या-
होता है। किन्तु कथा में गद्य की विकट रचना के प्राचुर्य होने पर भी रस के
निबन्धन के उक्त औचित्य का अनुसरण करना चाहिए ॥ ८ ॥
रसबन्ध में कहे गए औचित्य के सर्वत्र आश्रित रचना शोभा देती है, किन्तु
विषयगत (औचित्य) के अनुसार उसमें कुछ भेद हो जाता है ॥ ९ ॥
अथवा पद्य की भांति गद्यबन्ध में भी रसबन्ध में कहे गए औचित्य के सर्वत्र
आश्रित रचना शोभा देती है, किन्तु उसमें विषयगत (औचित्य) के अनुसार कुछ
विशेष हो जाता है, सब प्रकार से नहीं। जैसा कि गद्यबन्ध में भी दीर्घसमासा रचना
विप्रलम्भ शृङ्गार और करुण में आख्यायिका में भी नहीं शोभा देती। नाटक आदि में
लोचनम्
स्थितपक्षन्तु दर्शयति—रसबन्धोक्तमिति । वृत्तौ च वाशब्दोऽस्यैव पक्षस्य
स्थितिद्योतकः । यथा—
स्त्रियो नरपतिर्वह्निर्विषं युक्त्या निषेवितम् ।
स्वार्थाय यदि वा दुःखसम्भारायैव केवलम् ॥ इति ।
रचना सङ्घटना । तर्हि विषयौचित्यं सर्वथैव त्यक्तं नेत्याह—तदेव रसौ-
चित्यं विषयं सहकारितयापेक्ष्य किञ्चिद्विभेदोऽवान्तरवैचित्र्यं विद्यते यस्य
सम्पाद्यत्वेन तादृशं भवति । एतद्व्याचष्टे–तत्त्विति । सर्वाकारमिति क्रियाविशे-
स्थितपक्ष को दिखाते हैं—रसबन्ध में कहे गए—। वृत्ति में 'अथवा' शब्द इसी
पक्ष की स्थिति का द्योतक है। जैसे—
स्त्रियो नरपतिर्वह्निर्विषं युक्त्या निषेवितम् ।
स्वार्थाय यदि वा दुःखसम्भारायैव केवलम् ॥
स्त्री, राजा, अग्नि और विष युक्तिपूर्वक सेवन किए जाने पर स्वार्थ के लिए होते
हैं, अथवा केवल दुःखसम्भार के लिए ही होते हैं।
रचना अर्थात् सङ्घटना । तो विषयगत औचित्य को सर्वथा नहीं छोड़ा है, यह
कहते हैं—वही रस का औचित्य विषय को सहकारी रूप से अपेक्षा करके कुछ विभेद
अर्थात् अवान्तर-वैचित्र्य है जिसका सम्पाद्य रूप से उस प्रकार का होता है। इसका
तृतीय उद्योतः ३५९ ध्वन्यालोकः यिकायामपि शोभते । नाटकादावप्यसमासैव न रौद्रवीरादिवर्णने । विषयापेक्षं त्वौचित्यं प्रमाणतोऽपकृष्यते प्रकृष्यते च । तथा ह्याख्यायि- कायां नात्यन्तमसमासा स्वविषयेऽपि नाटकादौ नातिदीर्घसमासा चेति सङ्घटनाया दिगनुसर्तव्या ॥ ९ ॥ इदानीमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो ध्वनिः प्रबन्धात्मा रामायणमहाभार- तादौ प्रकाशमानः प्रसिद्ध एव । तस्य तु यथा प्रकाशनं तत्प्रतिपाद्यते- विभावभावानुभावसञ्चार्यौचित्यचारुणः । विधिः कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्प्रेक्षितस्य वा ॥ १० ॥ असमासा ही होती है, रौद्र, वीर आदि के वर्णन में नहीं । किन्तु विषयगत औचित्य प्रमाण के अनुसार घट जाता है और बढ़ जाता है । जैसा कि आख्यायिका में अपने विषय में भी अत्यन्त असमासा और नाटक आदि में अतिदीर्घसमासा नहीं होनी चाहिए । इस प्रकार सङ्घटना की दिशा का अनुसरण करना चाहिए ॥ ९ ॥ अब, प्रबन्ध रूप अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि रामायण, महाभारत आदि में प्रकाश- मान प्रसिद्ध ही है, किन्तु उसका जैसे प्रकाशन है उसे प्रतिपादन करते हैं— विभाव, ( स्थायी ) भाव, अनुभाव, सञ्चारी के औचित्य से सुन्दर, वृत्त ( ऐतिहासिक ) अथवा उत्प्रेक्षित ( कल्पित ) कथाशरीर का निर्माण ॥ १० ॥ लोचनम् षणम् । असमासैवति । सर्वत्रैवेति शेषः । तथा हि वाक्याभिनयलक्षणे 'चूर्ण- पादैः प्रसन्नैः' इत्यादि मुनिरभ्यधात् । अत्रापवादमाह—न चेति । नाटकादा- विति । स्वविषयेऽपीति सम्बन्धः ॥ ६ ॥ एवं सङ्घटनायां चालक्ष्यक्रमो दीप्यत इति निर्णीतम् । प्रबन्धे दीप्यत इति तु निर्विवादसिद्धोऽयमर्थ इति नात्र वक्तव्यं किञ्चिदस्ति । केवलं कविसहृ- दयान् व्युत्पादयितुं रसव्यञ्जने येतिकर्तव्यता प्रबन्धस्य सा निरूप्येत्याशये- नाह—इदानीमिति । इदानीं तत्प्रकारजातं प्रतिपाद्यत इति सम्बन्धः । प्रथमं व्याख्यान करते हैं—किन्तु उसमें—। 'सब प्रकार से' यह क्रियाविशेषण है । असमासा ही—। सर्वत्र ही, यह शेष है । जैसा कि वाक्याभिनय के लक्षण में मुनि ने 'चूर्णपादैः प्रसन्नैः' इत्यादि कहा है । यहां अपवाद कहते हैं—नहीं—। नाटक आदि में—। 'अपने विषय में भी' यह सम्बन्ध है ॥ ९ ॥ इस प्रकार सङ्घटना में भी अलक्ष्यक्रम दीप्त होता है यह निर्णय किया । प्रबन्ध में भी दीप्त होता है यह तो निर्विवाद सिद्ध बात है, अतः इस सम्बन्ध में कुछ वक्तव्य नहीं है । केवल कवियों और सहृदयों को व्युत्पन्न करने के लिए रस के व्यञ्जन में जो प्रबन्ध की इतिकर्तव्यता ( प्रकार ) है वह निरूपणीय है, इस आशय से कहते हैं— अब—। अब उन प्रकारों का प्रतिपादन करते हैं, यह सम्बन्ध है । पहला तो—।
३६० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इतिवृत्तवशायातां त्यक्त्वाऽननुगुणां स्थितिम् । उत्प्रेक्ष्याऽप्यन्तराभीष्टरसोचितकथोन्नयः ॥ ११ ॥ सन्धिसन्ध्यङ्गघटनं रसाभिव्यक्त्यपेक्षया । न तु केवलया शास्त्रस्थितिसम्पादनेच्छया ॥ १२ ॥ उद्दीपनप्रशमने यथावसरमन्तरा । रसस्यारब्धविश्रान्तेरनुसन्धानमङ्गिनः ॥ १३ ॥ अलङ्कृतीनां शक्तावप्यानुरूप्येण योजनम् । प्रबन्धस्य रसादीनां व्यञ्जकत्वे निबन्धनम् ॥ १४ ॥ प्रबन्धोऽपि रसादीनां व्यञ्जक इत्युक्तं तस्य व्यञ्जकत्वे निबन्ध- नम् । प्रथमं तावद्विभावभावानुभावसञ्चार्यौचित्यचारुणः कथाशरीरस्य इतिवृत्त के वश आई हुई (रस के) प्रतिकूल स्थिति को छोड़ कर कल्पना करके भी बीच में अभीष्ट रस के उचित कथा का उन्नयन ॥ ११ ॥ सन्धि और सन्धि के अङ्गों का योजन रस की अभिव्यक्ति की अपेक्षा से (होना चाहिए) न कि केवल शास्त्र की मर्यादा को सम्पन्न करने की इच्छा से ॥ १२ ॥ अवसर पर (रस का) उद्दीपन और प्रशमन, तथा बीच में आरब्ध होकर विश्रान्त होते हुए अङ्गी (प्रधान) रस का अनुसन्धान ॥ १३ ॥ शक्ति (सामर्थ्य) होने पर भी अलङ्कारों का योजन अनुरूपता से (करना चाहिए); यह प्रबन्ध के रसादिव्यञ्जक होने में हेतु है ॥ १४ ॥ प्रबन्ध भी रसादि का व्यञ्जक होता है, यह कह चुके हैं, उसके व्यञ्जक होने में हेतु । पहला (हेतु) तो विभाव, (स्थायी) भाव, अनुभाव, सञ्चारो के औचित्य से सुन्दर कथाशरीर का निर्माण अर्थात् यथायोग्य प्रतिपादनार्थ अभीष्ट रस, भाव आदि की लोचनम् तावदिति प्रबन्धस्य व्यञ्जकत्वे ये प्रकारास्ते क्रमेणैवोपयोगिनः । पूर्वं हि कथा- परीक्षा । तत्राधिकावापः फलपर्यन्ततानयनम्, रसं प्रति जागरणम्, तदुचित- विभावादिवर्णनेऽलङ्कारौचित्यमिति । तत्क्रमेण पञ्चकं व्याचष्टे—विभावेत्या- प्रबन्ध के व्यञ्जक होने में जो प्रकार हैं वे क्रम से ही उपयोगी हैं। पहले कथा की परीक्षा, उसमें अधिक ग्रहण अर्थात् फलपर्यन्त पहुंचाना, रसके प्रति जागरण, उसके उचित विभाव आदि के वर्णन में अलङ्कार का औचित्य । क्रम से उस पञ्चक का व्याख्यान करते हैं—'विभाव' इत्यादि द्वारा । उसका औचित्य—। अर्थात् शृङ्गार के वर्णन की इच्छा वाले को उस प्रकार की कथा का आश्रयण करना चाहिए जिसमें ऋतु,
तृतीय उद्योतः ३६१ ध्वन्यालोकः विधिर्यथायथं प्रतिपिपादयिषितरसभावाद्यपेक्षया य उचितो विभावो भावोऽनुभावः सञ्चारी वा तदौचित्यचारुणः कथाशरीरस्य विधिर्व्य- ञ्जकत्वे निबन्धनमेकम् । तत्र विभावौचित्यं तावत्प्रसिद्धम् । भावौचि- त्यं तु प्रकृत्यौचित्यात् । प्रकृतिर्ह्युत्तममध्यमाधमभावेन दिव्यमानुषादि- भावेन च विभेदिनी । तां यथायथमनुसृत्यासङ्कीर्णः स्थायी भाव उपनिबध्यमान औचित्यभाग् भवति । अन्यथा तु केवलमानुषाश्रयेण दिव्यस्य केवलदिव्याश्रयेण वा केवलमानुषस्योत्साहादय उपनिबध्य- माना अनुचिता भवन्ति । तथा च केवलमानुषस्य राजादेर्वर्णने सत्ता- र्णवलङ्घनादिलक्षणा व्यापारा उपनिबध्यमानाः सौष्ठवभृतोऽपि नीरसा एव नियमेन भवन्ति, तत्र त्वनौचित्यमेव हेतुः । अपेक्षा से जो विभाव, (स्थायी) भाव, अनुभाव अथवा सञ्चारी है, उसके औचित्य से सुन्दर कथाशरीर का निर्माण व्यञ्जक होने में एक हेतु है । उनमें विभाव का औचित्य प्रसिद्ध है । भाव का औचित्य प्रकृति के औचित्य से होता है । प्रकृति उत्तम, मध्यम, अधम भाव से और दिव्य, मानुष आदि भाव से विभिन्न होती है । उसे यथायोग्य अनुसरण करके असङ्कीर्ण स्थायी भाव उपनिबध्यमान होकर औचित्य- युक्त होता है । अन्यथा केवल मानुष के आश्रय से दिव्य के अथवा केवल दिव्य के आश्रय से केवलमानुष के उत्साह आदि उपनिबध्यमान होकर अनुचित होते हैं । जैसा कि केवलमानुष राजा आदि के वर्णन में सात समुद्रों का पार करना आदि रूप व्यापार उपनिबध्यमान होकर सौष्ठवयुक्त होने पर भी नीरस ही नियमतः होते हैं, उसमें तो अनौचित्य ही हेतु है । लोचनम् दिना । तदौचित्येति । शृङ्गारवर्णनेच्छुना तादृशी कथा संश्रयणीया यस्यामृतु- माल्यादेर्विभावस्य लीलादेरनुभावस्य हर्षधृत्यादेः सञ्चारिणः स्फुट एव सद्भाव इत्यर्थः । प्रसिद्धमिति । लोके भरतशास्त्रे च । व्यापार इति । तद्विषयोत्साहो- पलक्षणमेतत् । स्थाय्यौचित्यं हि व्याख्येयत्वेनोपक्रान्तं नानुभावौचित्यम् । सौष्ठवभृतोऽपीति । वर्णनामहिम्नेत्यर्थः । तत्र त्विति नीरसत्वे । माल्य आदि विभाव का, लीला आदि अनुभाव का, हर्ष, धृति आदि सञ्चारी का स्पष्ट ही सद्भाव हो । प्रसिद्ध—। लोक में और भरतशास्त्र में । व्यापार—। उस विषय के उत्साह का यह उपलक्षण है । क्योंकि स्थायी का औचित्य व्याख्येय रूप से उपक्रान्त है न कि अनुभाव का औचित्य । सौष्ठवयुक्त होने पर भी—। अर्थात् वर्णना की महिमा से । उसमें तो—। अर्थात् नीरसत्व में ।
३६२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ननु नागलोकगमनादयः सातवाहनप्रभृतीनां श्रूयन्ते, तदलो- कसामान्यप्रभावातिशयवर्णने किमनौचित्यं सर्वोर्वीभरणक्षमाणां क्ष्मा- भुजामिति । नतदस्ति ; न वयं ब्रूमो यत्प्रभावातिशयवर्णनममुचितं राज्ञाम्, किं तु केवलमानुषाश्रयेण योत्पाद्यवस्तुकथा क्रियते तस्यां दिव्यमौचित्यं न योजनीयम् । दिव्यमानुष्यायां तु कथायामुभयौचित्य- योजनमविरुद्धमेव । यथा पाण्ड्वादिकथायाम् । सातवाहनादिषु तु येषु यावदपदानं श्रूयते तेषु तावन्मात्रमनुगम्यमानमनुगुणत्वेन प्रतिभासते। व्यतिरिक्तं तु तेषामेवोपनिबध्यमानमनुचितम् । तदयमत्र परमार्थः— अनौचित्यादृते नान्यद्रसभङ्गस्य कारणम् । प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत्परा ॥ (शंका) सातवाहन प्रभृति (राजाओं) के नागलोकगमन आदि (कार्य) सुने जाते हैं, तो समस्त पृथिवी के भरण में समर्थ राजाओं के अलोकसामान्य अति- शय प्रभाव के वर्णन में क्या वह अनौचित्य है ! (समाधान) यह नहीं है; हम नहीं कहते हैं कि राजाओं के अतिशय प्रभाव का वर्णन अनुचित है, किन्तु केवलमानुष के आश्रय से जो उत्पाद्य (कल्पित) वस्तुकथा रची जाती है उसमें दिव्य औचित्य की योजना नहीं करनी चाहिए । परन्तु दिव्यमानुष कथा में उभय प्रकार के औचित्य का योजन अविरुद्ध ही है। जैसे पाण्डु आदि की कथा में। किन्तु जिन सातवाहन आदि में जितना अपदान (पूर्व वृत्तान्त) सुना जाता है उनमें उतने मात्र तक अनुगमन करना अनुकूल रूप से मालूम पड़ता है। परन्तु उनका ही उससे व्यतिरिक्त का वर्णन अनुचित हो जाता है। तो यह यहां परमार्थ है— 'अनौचित्य को छोड़ कर कोई दूसरा रसभङ्ग का कारण नहीं है, और प्रसिद्ध औचित्य का योजन रस की परा उपनिषद् है।' लोचनम् व्यतिरिक्तं त्विति । अधिकमित्यर्थः । एतदुक्तं भवति—यत्र विनेयानां प्रतीतिखण्डना न जायते तादृग्वर्णनीयम् । तत्र केवलमानुषस्य एकपदे सप्ताणँवलङ्घनमसम्भाव्यमानतयाऽनृतमिति हृदये- स्फुरदुपदेश्यस्य चतुर्वर्गोपायस्याप्यलीकतां बुद्धौ निवेशयति । रामादेस्तु तथा- व्यतिरिक्त—। अर्थात् अधिक। यह कहा गया—जहां विनेय (शिक्षणीय) जनों की प्रतीति खण्डित नहीं होती, उस प्रकार का वर्णन करना चाहिए। वहां केवल मानुष का एक छलांग में सात समुद्र लांघ जाना असम्भाव्यमान होने के कारण 'अनृत' के रूप में हृदय में प्रतीत होता हुआ उपदेश्य चतुर्वर्ग के उपाय की भी अलीकता को बुद्धि में निविष्ट करता है। परन्तु राम