ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished680 पृष्ठ
पृष्ठ 389, कुल 680 में से
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तृतीय उद्योतः ३२९
ध्वन्यालोकः
श्लोकद्वयेनान्वयव्यतिरेकाभ्यां वर्णानां द्योतकत्वं दर्शितं भवति ।
श्लोकद्वय से अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा वर्णों का द्योतकत्व मालूम होता है।
लोचनम्
व्याचष्टे-श्लोकद्वयेनेति । यथासंख्यप्रसङ्गपरिहारार्थं श्लोकाभ्यामिति न कृतम् ।
पूर्वश्लोकेन हि व्यतिरेक उक्तो द्वितीयेनान्वयः । अस्मिन्विषये शृङ्गारलक्षणे
शषादिप्रयोगः सुकवित्वमभिवाञ्छता न कर्तव्य इत्येवंफलत्वादुपदेशस्य
कारिकाकारेण पूर्वं व्यतिरेक उक्तः । न च सर्वथा न कर्तव्योऽपि तु वीभत्साद्यौ
कर्तव्य एवेति पश्चादन्वयः । वृत्तिकारेण त्वन्वयपूर्वको व्यतिरेक इति शैलीमनु-
सर्तुमन्वयः पूर्वमुपात्तः ।
एतदुक्तं भवति-यद्यपि विभावानुभावव्यभिचारिप्रतीतिसम्पदेव रसास्वादे
निवन्धनम् । तथापि विशिष्टश्रुतिकशब्दसमर्थ्यमानास्ते विभावादयस्तथा
भवन्तीति स्वसंवित्सिद्धमदः । तेन वर्णानामपि श्रुतिसमयोपलभ्यमानार्थान-
पेक्ष्यपि श्रोत्रैकग्राह्यो मृदुपारुषात्मा स्वभावो रसास्वादे सहकार्येत्र । अत एव च
सहकारितामेवाभिधातुं निमित्तसप्तमी कृता वर्णपदादिष्विति । न तु वर्णैरेव
रसाभिव्यक्तिः, विभावादिसंयोगाद्धि रसनिष्पत्तिरित्युक्तं बहुशः । श्रोत्रैक-
ग्राह्योऽपि च स्वभावो रसनिष्यन्दे व्यापियत एव, अपद्गीतध्वनिवत् पुष्कर-
कारिकाओं का तात्पर्य से व्याख्यान करते हैं— श्लोक द्वय से—। यथासंख्य का प्रसंग
हटाने के लिए ‘दोनों श्लोकों से’ (श्लोकाभ्यां) यह नहीं किया है, क्यों कि प्रथम
श्लोक से ‘व्यतिरेक’ कहा है, द्वितीय से ‘अन्वय’। शृङ्गार रूप इस विषय में श, ष
आदि का प्रयोग सुकवित्व की इच्छा वाला व्यक्ति नहीं करे, एतद्रूप उपदेश के फल
के कारण कारिकाकार ने पहले ‘व्यतिरेक’ कहा है। ऐसा नहीं कि सर्वथा नहीं करे,
अपि तु बीभत्स आदि में करे ही, यह बाद में ‘अन्वय’ है। परन्तु वृत्तिकार ने
‘अन्वयपूर्वक व्यतिरेक’ इस शैली के अनुसरण के लिए ‘अन्वय’ का पहले उपादान
किया है।
बात यह कही गई—यद्यपि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी की प्रतीतिसम्पत्ति
ही रसास्वाद में कारण (निबन्धन) है, तथापि जिनका सुनना विशिष्ट होता है ऐसे
शब्दों द्वारा समर्प्यमाण होकर वे विभाव आदि उस प्रकार (अर्थात् रसास्वाद में निबन्धन)
होते हैं, यह स्वप्रतीतिसिद्ध बात है। इस कारण वर्णों का भी श्रवण के अवसर में
ज्ञायमान अर्थ की अपेक्षा नहीं रखने वाला भी एकमात्र श्रोत्रद्वारा ग्राह्य मृदु अथवा
परुषरूप स्वभाव रसास्वाद में सहकारी है ही। और इसी लिए सहकारिता के
अभिधान के लिए ‘वर्ण, पद आदि में’ यह निमित्तसप्तमी की है। न कि वर्णों से ही रस
की अभिव्यक्ति होती है, विभाव आदि के संयोग से रसनिष्पत्ति होती है, यह बहुत बार
कहा जा चुका है। एकमात्र श्रोत्रद्वारा ग्राह्य स्वभाव भी रसनिष्यन्द में व्यापृत होता