भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 680 में से

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पृष्ठ 388

३२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र वर्णानामनर्थकत्वाद्व्योतकत्वमसम्भवीत्याशङ्क्येदमूच्यते— शषौ सरेफसंयोगो ढकारश्चापि भूयसा। विरोधिनः स्युः शृङ्गारे ते न वर्णा रसच्युतः ॥ ३ ॥ त एव तु निवेश्यन्ते बीभत्साद्यौ रसे यदा। तदा तं दीपयन्त्येव ते न वर्णा रसच्युतः ॥ ४ ॥ उनमें, वर्णों के अनर्थक होने के कारण द्योतकत्व असम्भव है, यह आशङ्का करके कहते हैं— श, ष, रेफ के साथ संयोग, और ढकार बहुत बार (प्रयुक्त होने पर) शृङ्गार में विरोधी हैं, इसलिए वर्ण रस को प्रवाहित करने वाले नहीं (सिद्ध) होते हैं ॥३॥ परन्तु वे ही जब बीभत्स आदि रस में निवेशित किये जाते हैं तब उस (रस) को दीपित ही करते हैं, इसलिए वर्ण रस को प्रवाहित करने वाले नहीं होते हैं ॥ ४ ॥ लोचनम् प्रबन्धः इत्यभिप्रायेण वर्णादीनां यथाक्रममुपादानम् आदिशब्देन पदैकदेश- पदद्वित्यादीनां ग्रहणम् । सप्तम्या निमित्तत्वमुक्तम् । दीप्ततेऽवभासते सकलका- व्यावभासकतयेति पूर्ववत्काव्यविशेषत्वं समर्थितम् ॥ २ ॥ भूयसेति प्रत्येकमभिसम्बध्यते । तेन शकारो भूयसेत्यादि व्याख्यातव्यम् । रेफप्रधानस्संयोगः र्कहंद्रं इत्यादिः । विरोधिन इति । परुषा वृत्तिर्विरोधिनी शृङ्गारस्य । यतस्ते वर्णा भूयसा प्रयुज्यमाना न रसांश्च्योतन्ति स्रवन्ति । यदि वा तेन शृङ्गारविरोधित्वेन हेतुना वर्णाः शषादयो रसाच्छृङ्गाराच्च्यवन्ते तं न व्यञ्जयन्तीति व्यतिरेक उक्तः । अन्वयमाह—त एव त्विति । शादयः । तमिति । बीभत्सादिकं रसम् । दीपयन्ति द्योतयन्ति । कारिकाद्वयं तात्पर्येण 'प्रबन्ध' होता है, इस अभिप्राय से वर्ण आदि का क्रम से उपादान है। 'आदि' शब्द से पद के एकदेश, पदद्वितय आदि के ग्रहण हैं (……पद आदि में) सप्तमी से निमित्तत्व कहा है। दीप्त होता है अर्थात् सकल काव्य के अवभासकरूप से अवभासित होता है, इससे पूर्व की भांति काव्यविशेषत्व का समर्थन किया ॥ २ ॥ बहुत बार—। यह प्रत्येक के साथ लगेगा । इस लिए 'बहुत बार शकार' इत्यादि व्याख्यान करना चाहिए । रेफप्रधान संयोग र्कहंद्रं इत्यादि । विरोधी—। परुषा वृत्ति शृङ्गार की विरोधिनी है। क्यों कि वे वर्ण बहुत बार प्रयुज्यमान होकर रसों को प्रवाहित नहीं करते । अथवा ('तेन' अर्थात्) शृङ्गार के विरोधी होने के कारण श, ष आदि वर्ण रस अर्थात् शृङ्गार से च्युत होजाते हैं, अर्थात् उसे व्यञ्जित नहीं करते, यह 'व्यतिरेक' कहा गया । 'अन्वय' कहते हैं—वे ही—। अर्थात् श आदि (वर्ण) । उसको अर्थात् बीभत्स आदि रस को । दीपित करते हैं अर्थात् द्योतित करते हैं। दोनों