भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 680 में से

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पृष्ठ 378

३१८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अनेन हि वाक्येन निशार्थो न च जागरणार्थः कश्चिद्विवक्षितः । किं तर्हि ? तत्त्वज्ञानावहितत्वमतत्त्वपराङ्मुखत्वं च मुनेः प्रतिपाद्यत इति तिरस्कृतवाच्यस्यास्य व्यञ्जकत्वम् । इस वाक्य से रात्र्यर्थ और न तो जागरणार्थ कोई विवक्षित है। तो क्या है ? मुनि का तत्त्वज्ञान में अवहित होना और अतत्त्व से पराङ्मुख होना प्रतिपादन किया है, इस तिरस्कृतवाच्य का व्यञ्जकत्व है । लोचनम् भूतानि जाग्रति अतिशयेन सुप्रबुद्धरूपाणि सा तस्य रात्रिरप्रबोधविषयः । तस्या हि चेष्टायां नासौ प्रबुद्धः । एवमेव लोकोत्तराचारव्यवस्थितः पश्यति मन्यते च । तस्यैवान्तर्बहिश्चकरणवृत्तिश्चरितार्था । अन्यस्तु न पश्यति न च मन्यत इति । तत्त्वदृष्टिपरेण भाव्यमिति तात्पर्यम् । एवं च पश्यत इत्यपि मुनेरित्यपि च न स्वार्थमात्रविश्रान्तम् । अपि तु व्यङ्ग्य एव विश्राम्यति । यत्तच्छब्दयोश्च न स्वतन्त्रार्थतेति सर्व एवायमाख्यातसहायः पदसमूहो व्यङ्ग्यपरः । तदाह—अनेन हि वाक्येनेति । प्रतिपाद्यत इति ध्वन्यत इत्यर्थः । विषमथितो विषम्यतां प्राप्तः । केषाञ्चिद्दुष्कृतिनामतिविवेकिनां वा । केषा- ञ्चित्सुकृतिनामत्यन्तमविवेकिनां वा अतिक्रामत्यमृतनिर्माणः । केषाञ्चिन्मिश्र- कर्मणां विवेकाविवेकवतां वा, विषामृतमयः । केषामपि मूढप्रायाणां धाराप्रा- योगभूमिकारूढानां वा अविषामृतमयः कालोऽतिक्रामतीति सम्बन्धः । रहता है कि कैसे इसे त्याग किया जाय ! परन्तु जिस मिथ्यादृष्टि में समस्त भूत जागते रहते हैं अर्थात् अतिशय रूप से सुप्रबुद्ध रहते हैं, वह उसके (संयमी के) रात्रि अर्थात् अप्रबोध का विषय है। क्यों कि उस (रात्रि) की चेष्टा (स्थिति) में वह प्रबुद्ध नहीं है। इसी प्रकार लोकोत्तर क्रियाकलाप (आचार) में व्यवस्थित होकर देखता है और मानता है। उसी की आभ्यन्तर और बाह्य इन्द्रियों की वृत्ति चरितार्थ है । परन्तु दूसरा न तो देखता है और न तो मानता है । तात्पर्य यह कि तत्त्वदृष्टि के लिए तत्पर होना चाहिए । और इस प्रकार 'देखते हुए' और 'मुनि के' यह 'अपने अर्थमात्र में नहीं रहता, अपितु व्यङ्ग्य में ही विश्राम लेता है। और 'जो' 'वह' ( 'यत्' 'तत्' ) शब्दों के स्वतन्त्र अर्थ नहीं हैं इसलिए सभी यह आख्यातसहाय पदसमूह व्यङ्ग्य में तात्पर्य रखता है । उसे कहते हैं—इस वाक्य से—। प्रतिपादन किया है अर्थात् ध्वनित होता है । विषमियत अर्थात् विषम्यता को प्राप्त । किन्हीं दुष्कृतियों अथवा अतिविवेकियों का । किन्हीं सुकृतियों अथवा अत्यन्त अविवेकियों का अमृत बन जाता है । किन्हीं मिश्रकर्म वालों (कुछ दुष्कृत कुछ सुकृत वालों) का अथवा विवेक-अविवेक वालों का विष-अमृतमय होता है । किन्हीं मूढप्राय अथवा धारा के क्रम से प्राप्त योग की भूमिका में आरूढ़ लोगों का न विषममय न अमृतमय काल व्यतीत होता है । 'विष'