ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३१७ ध्वन्यालोकः अविवक्षितवाच्यस्यात्यन्ततिरस्कृतवाच्ये प्रभेदे वाक्यप्रकाशता यथा— या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ अविवक्षितवाच्य के अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य (नामक) प्रभेद में वाक्यप्रकाशता, जैसे— 'जो सब भूतों की रात्रि है उसमें संयमी जागता रहता है और जिस में भूत (प्राणिमात्र) जागते रहते हैं वह देखते हुए मुनि की रात्रि है।' लोचनम् धर्मान्तरसंक्रान्तो योऽर्थः । अत्र च यथा व्यङ्ग्यधर्मान्तरसङ्क्रान्तिस्तथा पूर्वोक्तमनुसन्धेयम् । एवमुत्तरत्रापि । एवं प्रथमभेदस्य द्वावपि प्रकारौ पदप्रकाशकत्वेनोदाहृत्य वाक्यप्रकाशक- त्वेनोदाहरति—या निशेति । विवक्षित इति । तेन ह्युक्तेन न कश्चिदुपदेश्यं प्रत्युपदेशः सिद्धयति । निशायां जागरितव्यमन्यत्र रात्रिवदासितव्य- मिति किमनेनोक्तेन । तस्माद्बाधितस्वार्थमेतद्वाक्यं संयमिनो लोकोत्तरता- लक्षणेन निमित्तेन तत्त्वदृष्टाववधानं मिथ्यादृष्टौ च पराङ्मुखत्वं ध्वनति । सर्वशब्दार्थस्य चापेक्षिततयाप्युपपद्यमानतेति न सर्वशब्दार्थान्यथानुप- पत्त्यायमर्थ आक्षिप्तो मन्तव्यः । सर्वेषां ब्रह्मादिस्थावरान्तानां चतुर्दशाना- मपि भूतानां या निशा व्यामोहजननी तत्त्वदृष्टिः तस्यां संयमी जागर्ति कथं प्राप्येतेति । न तु विषयवर्जनमात्रादेव संयमीति यावत् । यदि वा सर्वभूतनि- शायां मोहिन्यां जागर्ति कथमियं हेयेति । यस्यां तु मिथ्यादृष्टौ सर्वाणि जैसे व्यङ्ग्य धर्मान्तर में (वाच्य की) सङ्क्रान्ति है वैसे ही पूर्वोक्त का अनुसन्धान कर लेना चाहिए । इस प्रकार आगे भी । इस प्रकार प्रथम भेद के दोनों भी प्रकारों को पदप्रकाशक रूप से उदाहरण देकर वाक्यप्रकाशक रूप से उदाहरण देते हैं—जा सब०— । विवक्षित— । उस कथन से कोई उपदेश्य के प्रति उपदेश सिद्ध नहीं होता । रात्रि में जागना चाहिए और अन्यत्र (दिन में) रात्रि की भाँति रहना चाहिए, इस कथन से क्या ? इसलिए अपने अर्थ के बाधित होने पर यह वाक्य लोकोत्तरता रूप निमित्त से संयमी का तत्त्वदृष्टि में अवधान और मिथ्यादृष्टि में पराङ्मुखत्व ध्वनित करता है । 'सब' (सर्व) शब्द के अर्थ के आपेक्षिक होने पर भी उपपत्ति है इस लिए 'सब' शब्द के अर्थ की अन्यथानुप- पत्ति से यह अर्थ आक्षिप्त नहीं समझना चाहिए । सभी अर्थात् ब्रह्मा से लेकर स्थावर- पर्यन्त चतुर्दश भूतों (८ दैव, १ मानुषक और ५ तैर्यक्) के जो रात्रि अर्थात् व्यामोह- जननी तत्त्वदृष्टि है उसमें संयमी जागता रहता है, कैसे (तत्त्वदृष्टि) पाई जाय ! न कि विषयवर्जन मात्र से संयमी है । अथवा, सब भूतों की मोहिनी रात्रि में जागता