ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा वा— एमेअ जणो तिस्सा देउ कवोलोपमाइ ससिबिम्बम् । परमत्थविआरे उण चन्दो चन्दो विअ वराओ ॥ अत्र द्वितीयश्चन्द्रशब्दोऽर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यः । अथवा, जैसे— 'इसी प्रकार लोग उसके कपोलों की उपमा शशिबिम्ब से देते हैं, परमार्थ रूप से विचार करने पर चन्द्र तो चन्द्र के समान वराक ( बेचारा ) है ।' यहां दूसरा 'चन्द्र' शब्द अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य है । लोचनम् यत्प्रेमानाम तदप्यनौचित्यकलङ्कितमिति शोकालम्बनोद्दीपनविभावयोगात्करुण- रसो रामस्य स्फुटीकृत इति । एमेअ इति । एवमेव जनस्तस्या ददाति कपोलोपमायां शशिबिम्बम् । परमार्थविचारे पुनश्चन्द्रश्चन्द्र इव वराकः ॥ ( इति छाया । ) एवमेवेति स्वयमविवेकान्धतया । जन इति लोकप्रसिद्धगतानुगतिकता- मात्रशरणः । तस्या इत्यसाधारणगुणगणमहार्घवपुषः । कपोलोपमायामिति निर्व्याजलावण्यसर्वस्वभूतमुखमध्यवर्तिप्रधानभूतकपोतलतस्योपमायां प्रत्युत तदधिकवस्तुकर्तव्यं ततो दूरनिकृष्टं शशिबिम्बं कलङ्कव्याजजिह्मीकृतम् । एवं यद्यपि गड्डरिकाप्रवाहपतितो लोकः, तथापि यदि परीक्षकाः परीक्षन्ते तद्वराकः कृपैकभाजनं यश्चन्द्र इति प्रसिद्धः स चन्द्र एव क्षयित्वविलासशून्यत्वमलिनत्व- कलङ्कित है । इस प्रकार शोक के आलम्बन-उद्दीपन विभावों के योग से राम का करुणरस स्फुट हो गया है । इसी प्रकार— । अर्थात् स्वयं अविवेकान्ध होने के कारण । लोग—। अर्थात् लोक में फैली बात के पीछे चल पड़ने के मात्र पक्षपाती । उसके अर्थात् असाधारण गुणगणों से कीमती शरीर वाली के । कपोलों की उपमा अर्थात् निर्व्याजलावण्यसर्व- स्वभूत और मुख मध्य में रहने वालों में प्रधानभूत कपोलतल की उपमा, प्रत्युत उससे अधिक वस्तु को देना चाहिए तो उससे अत्यन्त निकृष्ट एवं कलङ्कव्याज ( शश ) द्वारा मलिन किए गए शशिबिम्ब से ( देते हैं ) । इस प्रकार यद्यपि संसार गड्डरिका ( भेड़ की चाल ) की भाँति प्रवाहपतित है, तथापि यदि परीक्षक लोग परीक्षा करते हैं तब वराक (बेचारा) अर्थात् एकमात्र कृपा का भाजन जो 'चन्द्र' नाम से प्रसिद्ध है वह चन्द्र ही क्षयित्व, विलासशून्यत्व और मलिनत्व धर्मान्तरों में संक्रान्त अर्थ वाला है । यहाँ