भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 375, कुल 680 में से

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पृष्ठ 375

तृतीय उद्योतः ३१५

ध्वन्यालोकः प्रेम्णः प्रिये नोचितम्' । अत्र रामेणेत्येतत्पदं समसाहसैकरसत्वादि- व्यङ्ग्याभिसङ्क्रमितवाच्यं व्यञ्जकम् । राम ने प्रेम के उचित कार्य नहीं किया।' यहां 'राम' यह पद 'साहसैकरसत्व' आदि व्यङ्ग्य में संक्रमितवाच्य रूप में व्यञ्जक है । लोचनम् रतामुखप्रसादादिलक्ष्यमाणया सोढम् । यथा येन प्रकारेण कुलजन इति यः कश्चित्पामरप्रायोऽपि कुलवधूशब्दवाच्यः । उच्चैः शिरो धत्ते एवंविधाः किल वयं कुलवध्वो भवाम इति । अथ च शिरःकर्तनावसरे त्वया शीघ्रं कृत्यतामिति तथा सोढं तथोच्चैः शिरो धृतं यथान्योऽपि कुलस्त्रीजन उच्चैः शिरो धत्ते नित्यप्रवृत्ततया । एवं रावणस्य तव च समुचितकारित्वं निर्व्यूढम् । मम पुनः सर्वमेवानुचितं पर्यवसितम् । तथाहि राज्यनिर्वासनादिनिरवकाशीकृतधनुर्व्या- पारस्यापि कलत्रमात्ररक्षणप्रयोजनमपि यच्चापमभूत्तत्संप्रति त्वय्यरक्षितव्यापन्ना- यामेव निष्प्रयोजनम्, तथापि च तद्धारयामि । तन्नूनं निजजीवितरक्षैवास्य प्रयोजनत्वेन संभाव्यते । न चैतद्युक्तम् । रामेणेति । समसाहसरसत्वसत्यसंध- त्वोचितकारित्वादिव्यङ्ग्यधर्मान्तरपरिणतेनेत्यर्थः । 'कापुरुषादिधर्मपरिग्रह- स्त्वादिशब्दात्' इति यद्व्याख्यातम्, तदसत्; कापुरुषस्य ह्येतदेव प्रत्युतोचितं स्यात् । प्रिय इति शब्दमात्रसेवैतदिदानीं संवृत्तम् । प्रियशब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तं उस प्रकार बिना विकार के, नेत्रों की विस्फारता और मुख की प्रसन्नता आदि से लक्ष्यमाण उत्सव-प्राप्ति की बुद्धि से सहन किया । जिस प्रकार कुलजन अर्थात् जो कोई पामर-प्राय भी जो 'कुलवधू' शब्द से अभिहित है । सिर ऊँचा रखती है, कि हम कुलवधुएँ इस प्रकार की होती हैं । और भी, सिर काटने के अवसर में तुमने 'शीघ्र काटो' ( यह कह कर ) सहन किया और ऊँचा सिर रखा, जैसे अन्य भी कुल- स्त्रियाँ नित्य प्रवृत्त होने के कारण सिर ऊँचा रखती हैं । इस प्रकार रावण का और तुम्हारा समुचितकारित्व निष्पन्न हो जाता है । मेरा तो सभी कुछ अनुचित पर्यवसित हुआ । जैसा कि राज्य से निर्वासन आदि के अवसर में धनुष का कोई व्यापार रहा नहीं, फिर भी कलत्रमात्र की रक्षा के प्रयोजन के लिए भी जो चाप था वह भी इस समय जब कि अरक्षित अवस्था में विपन्न हुई तो निष्प्रयोजन हो गया, और तब भी उसे धारण करता हूँ । तो निश्चय ही अपने प्राणों की रक्षा ही इसके प्रयोजन रूप में सम्भावित होती है । यह तो ठीक नहीं । 'राम'- । अर्थात् समसाहसरसत्व, सत्य- संधत्व, उचितकारित्व आदि व्यङ्ग्य धर्मान्तरों में परिणत । 'आदि' शब्द से कापुरुष आदि धर्म का परिग्रह है, यह जो कि व्याख्यान किया है, वह ठीक नहीं, क्यों कि बल्कि कापुरुष के यही उचित होता । 'प्रिये' यह शब्दमात्र ही इस समय हो गया है । और 'प्रिय' शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त जो प्रेम का नाम है वह भी अनौचित्य से