ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( इति त्रीणि पदानि अत्यन्ततिरस्कृतव्यङ्ग्ययुक्तानि ) ३१४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सन्नद्धे विरहविधुरां त्वय्युपेक्षेत जायाम्', यथा वा- 'किमिव हि मधू- राणां मण्डनं नाकृतीनाम्', एतेषूदाहरणेषु 'समिध' इति 'सन्नद्ध' इति 'मधुराणा'मिति च पदानि व्यञ्जकत्वाभिप्रायेणैव कृतानि । तस्यैवार्थान्तरसङ्क्रमितवाच्ये यथा- 'रामेण प्रियजीवितेन तु कृतं सन्नद्ध होने पर कौन विरहविधुर पत्नी की उपेक्षा करता है ?'; अथवा, जैसे— 'मधुर आकृतियों का मण्डन क्या नहीं है !'; इन उदाहरणों में 'समिधा' 'सन्नद्ध' और 'मधुर' ये पद व्यञ्जकत्व के अभिप्राय से ही किए गए हैं । उसी के ही अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य में, जैसे— 'हे प्रिये, जीवित रहने के लोभी लोचनम् पूर्वकारित्वादयो ध्वन्यन्ते । तथैव मधुरशब्देन सर्वविषयरञ्जकत्वतर्पकत्वादिकं लक्षयता सातिशायाभिलाषविषयत्वं नात्राश्चर्यमिति वक्तुरभिप्रेतं ध्वन्यते । तस्यैवेति । अविवक्षितवाच्यस्य यो द्वितीयो भेदस्तत्रेत्यर्थः । 'प्रत्याख्यानरुषः कृतं समुचितं क्रूरेण ते रक्षसा सोढं तच्च तथा त्वया कुलजनो धत्ते यथोच्चैः शिरः । व्यर्थं सम्प्रति बिभ्रता धनुरिदं त्वद्व्यापदः साक्षिणा' इति । रक्षःस्वभावादेव यः क्रूरोऽनतिलङ्घ्यशासनत्वदुर्मदत या च प्रसद्य निराक्रि- यमाणः क्रोधान्धः तस्यैतत्तावत्स्वचित्तवृत्तिसमुचितमनुष्ठानं यन्मूर्धकर्तनं नाम, माऽन्योऽपि कश्चिन्ममाज्ञां लङ्घयिष्यतीति । त इति यथा तादृगपि त्वया न गणितस्तस्यास्तवेत्यर्थः । तदपि तथा अविकारेणोत्सवापत्तिबुद्ध्या नेत्रविस्फा- सकता ), अपेक्षापूर्वकत्व ( जो बिना सोचे-विचारे कर बैठता है ) आदि अर्थों को ध्वनित करता है । उसी प्रकार 'मधुर' शब्द सभी विषयों का रञ्जकत्व, तर्पकत्व आदि अर्थ को लक्षित करता हुआ, 'अतिशय अभिलाषा का विषय होना यहाँ आश्चर्य नहीं' यह वक्ता का अभिप्रेत ( अर्थ ) ध्वनित करता है । उसीके - । अर्थात् अविवक्षित- वाच्य का जो दूसरा भेद कहा है, उसमें । 'तुम्हारे तिरस्कार के समुचित ही क्रूर राक्षस ( रावण ) ने किया, और उसे तुमने उस प्रकार सहन किया, जिस प्रकार कि कुलाङ्गनाएँ सिर ऊँचा रखती हैं । तत्काल इस धनुष को व्यर्थ धारण करते हुए तुम्हारे संकट के साक्षी, ( जीवित रहने के लोभी राम ने, हे प्रिये प्रेम के उचित कार्य नहीं किया ) ।' राक्षस-स्वभाव के कारण ही जो क्रूर अनतिलंघ्यशासन होने से दुर्मद होने के कारण हठात् तिरस्कृत, क्रोधान्ध है उसका यह अपनी चित्तवृत्ति के समुचित अनुष्ठान है सिर काट डालना, जिससे कोई मेरी आज्ञा का उल्लङ्घन नहीं करेगा । तुम्हारे अर्थात् उस प्रकार के भी उसे तुमने कुछ नहीं समझा, उस तुम्हारे । उसे भी