ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ३१३ ध्वन्यालोकः ( अविवक्षितवाच्यस्यात्यन्ततिरस्कृतवाच्ये प्रभेदे पदप्रकाशता यथा महर्षेर्व्यासस्य—'सप्तैताः समिधः श्रियः', यथा वा कालिदासस्य—'कः अविवक्षितवाच्य के अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य प्रभेद में पदप्रकाशता, जैसे महर्षि व्यास का—'ये सात सम्पत्ति की समिधाएं हैं'; अथवा जैसे कालिदास का—'(तुम्हारे) लोचनम् भिधेयस्य सम्बन्धी यो भेदः क्रमद्योत्यो नाम स्वभेदसहितः सोऽपि प्रत्येकं द्विधैव । अनुरणनेन रूपं रूपणसादृश्यं यस्य तादृग्व्यङ्ग्यं यत्तस्येत्यर्थः । मह- र्षेरित्यनेन तदनुसन्धत्ते यत्प्रागुक्तम्, अथ च रामायणमहाभारतप्रभृतिनि लक्ष्ये दृश्यत इति । धृतिः क्षमा दया शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा । मित्राणां चानभिद्रोहः सप्तैताः समिधः श्रियः ॥ समिच्छब्दार्थस्यात्र सर्वथा तिरस्कारः, असम्भवात् । समिच्छब्देन च व्यङ्ग्योऽर्थोऽनन्यापेक्षलक्ष्म्युद्दीपनक्षमत्वं सप्तानां वक्तृभिप्रेतं ध्वनितम् । यद्यपि—'निःश्वासान्ध इवादर्शः' इत्याद्युदाहरणादप्ययमर्थो लभ्यते, तथापि प्रसङ्गाद्बहुलक्ष्यव्यापित्वं दर्शयितुमुदाहरणान्तराण्युक्तानि । अत्र च वाच्यस्या- त्यन्ततिरस्कारः पूर्वोक्तमनुसृत्य योजनीयः किं पुनरुक्तेन । सन्नद्धपदेन चात्रा- सम्भवत्स्वार्थेनोद्यतत्वं लक्षयता वक्तुरभिप्रेता निष्करुणकत्वाप्रतिकार्यत्वापेक्षा- भी प्रत्येक पदप्रकाश और वाक्यप्रकाश रूप से दो प्रकार का है । उससे अन्य विव- क्षितवाच्य का सम्बन्धी जो अपने भेदों सहित 'क्रमद्योत्य' नाम का भेद है, वह भी प्रत्येक दो प्रकार का ही है । अनुरणन से रूप अर्थात् रूपणसादृश्य जिसका हो उस प्रकार के उस (व्यङ्ग्य) का । 'महर्षि का' इस के द्वारा उसका अनुसन्धान करते हैं जिसे पहले कह चुके हैं—'और भी, रामायण, महाभारत प्रभृति लक्ष्य में देखा जाता है' । धृति, क्षमा, दया, शौच, कारुण्य, अनिष्ठुर वाणी और मित्रों से अद्रोह, ये सात सम्पत्ति की समिधाएँ हैं । 'समित्' (समिधा) शब्द के अर्थ का यहाँ सर्वथा तिरस्कार है, क्यों कि (वह अर्थ) असम्भव है । और 'समित्' (समिधा) शब्द से व्यङ्ग्य अर्थ 'अन्य की अपेक्षा न करके सातों का सम्पत्ति के उद्दीपन में क्षमत्व' (यह अर्थ) वक्ता के अभिप्रेत रूप में ध्वनित होता है । यद्यपि 'निःश्वासान्ध इवादर्शः' इत्यादि उदाहरण से भी यह अर्थ प्राप्त होता है तथापि प्रसङ्ग से बहुत लक्ष्यों में व्यापित्व दिखाने के लिए अन्य उदाहरण कहे हैं । और यहाँ वाच्य का अत्यन्ततिरस्कार पहले कहे हुए के अनुसार लगा लेना चाहिए, पुनः कहने से क्या लाभ ! 'सन्नद्ध' पद, जिसका अपना अर्थ सम्भव नहीं हो रहा है, 'उद्यतत्व' (अथवा उद्धतत्व) को लक्षित करता हुआ, वक्ता के अभिप्रेत निष्करुणकत्व, अप्रतीकार्यत्व (जिसका कोई प्रतिकार नहीं हो