ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २८१ ध्वन्यालोकः तथा च दीपकादावलङ्कारे उपमाया गम्यमानत्वेऽपि तत्परत्वेन चारु- त्वस्याव्यवस्थनान्न ध्वनिव्यपदेशः । यथा— चन्दमऊएहि णिसा णलिनी कमलेहि कुसुमगुच्छेहि लआ । हंसेहि सरअसोहा कव्वकहा सज्जनेहि करइ गरुई ॥ (चन्द्रमयूखैर्निशा नलिनी कमलैः कुसुमगुच्छैर्लता । हंसैश्शारदशोभा काव्यकथा सज्जनैः क्रियते गुर्वी ॥ इति छाया ) मार्ग नहीं है। जैसा कि दीपक आदि अलङ्कार में उपमा के गम्यमान होने पर भी तत्पर रूप से चारुत्व के न होने पर ध्वनि व्यपदेश नहीं होता । जैसे— चन्द्रकिरणों से रात्रि, कमलों से नलिनी, फूल के गुच्छों से लता, शरत्काल की शोभा हंसों से और काव्यकथा सज्जनों से गौरवान्वित की जाती है । लोचनम् भिरिति वाक्यशेषः । पुनःशब्दस्तदुक्ताद्विशेषद्योतकः । चन्दमऊ इति । चन्द्रम- यूखादीनां न निशादिना विना कोऽपि परभागलाभः । सज्जनानामपि काव्यकथां विना कीदृशी साधुजनता । चन्द्रमयूखैश्च निशाया गुरुकीकरणं भास्वरत्वसेव्यत्वादि यत्क्रियते; कमलैर्नलिन्याः शोभापरिमललक्ष्म्यादि, कुसु- मगुच्छैर्लताया अभिगम्यत्वमनोहरत्वादि, हंसैः शारदशोभायाः श्रुतिसुखकर- त्वमनोहरत्वादि, तत्सर्वं काव्यकथायाः सज्जनैरित्येतावानयमर्थो गुरुः क्रियत इति दीपकबलाच्चकास्ति । कथाशब्द इदमाह—आसतां तावत्काव्यस्य केचन सूक्ष्मा विशेषाः, सज्जनैर्विना काव्यमित्येष शब्दोऽपि ध्वंसते । तेषु तु शब्द उस कहे हुए से विशेष का द्योतक है । चन्द्रकिरणों—। चन्द्रकिरण आदि का रात्रि आदि के बिना कोई महत्त्व लाभ नहीं है, सज्जनों की भी काव्यकथा के बिना कैसी साधुजनता ? चन्द्रकिरणों से रात्रि का जो गुरुकीकरण अर्थात् भास्वर होना और सेव्य होना आदि किया जाता है कमलों से नलिनी की शोभा, परिमल, लक्ष्मी आदि जो होती है, फूल के गुच्छों से लता का जो अभिगम्यत्व, मनोहरत्व आदि जो होता है और हंसों से शरत्काल की शोभा का श्रुतिसुखकर होना और मनोहर होना आदि जो होता है वह सब कुछ काव्यकथा का सज्जनों से सम्पन्न होता है, इतना अर्थ 'गौरवा- न्वित किया जाता है' इस दीपक के बल से प्रकाशित होता है । 'कथा' शब्द यह कहता है—काव्य के कोई सूक्ष्म विशेष हों, ( किन्तु ) सज्जनों के बिना 'काव्य' यह शब्द भी नष्ट होता है । उन सज्जनों के विद्यमान रहने पर केवल 'काव्य' शब्द के