भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 340

२८० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ससन्देहादिषूपमारूपकातिशयोक्तीनां प्रकाशमानत्वं प्रदर्शितमित्य- लङ्कारान्तरस्यालङ्कारान्तरे व्यङ्ग्यत्वं न यत्नप्रतिपाद्यम् ॥ २६ ॥ इयत्पुनरुच्यत एव— अलङ्कारान्तरस्यापि प्रतीतौ यत्र भासते । तत्परत्वं न वाच्यस्य नासौ मार्गो ध्वनेर्मतः ॥ २७ ॥ अलङ्कारान्तरेषु त्वनुरणनरूपालङ्कारप्रतीतौ सत्यामपि यत्र वाच्य- स्य व्यङ्ग्यप्रतिपादनौन्मुख्येन चारुत्वं न प्रकाशते नासौ ध्वनेर्मार्गः । ससन्देह आदि ( अलङ्कारों ) में उपमा, रूपक और अतिशयोक्ति का प्रकाशित होना दिखाया गया है । इस प्रकार अलङ्कारान्तर का अलङ्कारान्तर में व्यङ्ग्य होना यत्नप्रतिपाद्य नहीं है ॥ २६ ॥ इतना तो फिर कहते ही हैं— अलङ्कारान्तर की भी प्रतीति में जहां वाच्य का तत्परत्व नहीं भासित होता है वह मार्ग ध्वनि का नहीं माना गया है ॥ २७ ॥ परन्तु अलङ्कारान्तरों में अनुरणनरूप अलङ्कार की प्रतीति के होने पर भी जहाँ वाच्य का व्यङ्ग के प्रतिपादन के औन्मुख्य से चारुत्व जाहिर नहीं होता है वह ध्वनि का लोचनम् 'तत्रेह प्रकरणाद्व्यङ्ग्यत्वेनेत्यवगन्तव्यम्' इति वक्ष्यति । अन्तरशब्दो वोभय- त्रापि विशेषपर्यायः; वैषयिकी सप्तमी, न तु प्राग्व्याख्यायामिव निमित्तसप्तमी । तदयमर्थः-वाच्यालङ्कारविशेषविषये व्यङ्ग्यालङ्कारविशेषो भातीत्युद्भटादिभि- रुक्तमेवेत्यर्थशक्त्यालङ्कारो व्यज्यत इति तैरुपगतमेव । केवलं तेऽलङ्कारलक्षण- कारत्वाद्वाच्यालङ्कारविशेषविषयत्वेनाहुरिति भावः ॥ २६ ॥ ननु पूर्वै रेव यदिदमुक्तं किमर्थं तव यत्न इत्याशङ्क्याह—इयदिति । अस्मा- यह जानना चाहिए' यह कहेंगे । अथवा 'अनन्तर' शब्द दोनों स्थलों में 'विशेष' अर्थ का वाचक है, सप्तमी वैषयिकी अर्थात् विषयरूप अर्थ की वाचिका है, न कि पहले की व्याख्या के समान निमित्तसप्तमी है । तो अर्थ यह है—वाच्य अलङ्कारविशेष के विषय में व्यङ्ग्य अलङ्कारविशेष प्रतीत होता है यह उद्भट आदि ने कहा ही है, अर्थात् अर्थ- शक्ति से अलङ्कार व्यञ्जित होता है यह उन्होंने माना ही है । भाव यह कि केवल उन्होंने अलङ्कार-लक्षणकार होने के नाते वाच्य अलङ्कारविशेष के विषयरूप से कहा है ॥ २६ ॥ यह आशङ्का करके कि जब कि प्राचीनों ने ही यह कह दिया है तो तुम्हारा यत्न किसलिए ? ( उत्तर में ) कहते हैं—इतना—। 'हम भी' यह वाक्यशेष है । 'पुनः'