भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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द्वितीय उद्योतः २७९

ध्वन्यालोकः
अन्यत्र वाच्यत्वेन प्रसिद्धो यो रूपकादिरलङ्कारः सोऽन्यत्र प्रती-
यमानतया बाहुल्येन प्रदर्शितस्तत्रभवद्भिर्भट्टोद्भटादिभिः । तथा च
अन्यत्र वाच्यरूप से प्रसिद्ध जो रूपक आदि अलङ्कार है वह अन्यत्र प्रतीयमान
रूप से बहुलतया, आदरणीय उद्भट आदि आचार्यों द्वारा दिखाया गया है। जैसा कि
लोचनम्
अर्थशक्त्या तु कोऽलङ्कारो भातीत्याशङ्काबीजम् । सर्व इति प्रदर्शित इति च
पदेनासम्भावनात्र मिथ्यैवेत्याह ।
उपमानेन तत्त्वं च भेदं च वदतः पुनः ।
ससन्देहं वचः स्तुत्यै ससन्देहं विदुर्यथा ॥ इति ।
तस्याः पाणिरयं नु मारुतचलत्पत्राङ्गुलिः पल्लवः ।
इत्यादावुपमा रूपकं वा ध्वन्यते । अतिशयोक्तेश्च प्रायशः सर्वालङ्कारेषु
ध्वन्यमानत्वम् । अलङ्कारान्तरस्येति । यत्रालङ्कारोऽप्यलङ्कारान्तरं ध्वनति तत्र
वस्तुमात्रेणालङ्कारो ध्वन्यत इति कियदिदमसम्भाव्यमिति तात्पर्येणालङ्कारा-
न्तरशब्दो वृत्तिकृता प्रयुक्तो न तु प्रकृतोपयोगी; न ह्यलङ्कारेणालङ्कारो ध्वन्यत
इति प्रकृतमदः, अर्थशक्त्युद्भवे ध्वनौ वस्त्विवालङ्कारोऽपि व्यङ्ग्य इत्येतावतः
प्रकृतत्वात् । तथा चोपसंहारग्रन्थे 'तेऽलङ्काराः परां छायां यान्ति ध्वन्यङ्गतां
गताः' इत्यत्र श्लोके वृत्तिकृत् 'ध्वन्यङ्गता चोभाभ्यां प्रकाराभ्याम्' इत्युपक्रम्य
सम्भाव्य है, परन्तु अर्थशक्ति से कौन-सा अलङ्कार प्रतीत होता है ! यह आशङ्का का
बीज है । 'सर्व' और 'दिखाया गया है' इन दोनों से 'यहां असम्भावना मिथ्या ही है'
यह कहते हैं ।
उपमान के साथ ( उपमेय का ) अभेद और पुनः भेद कहते हुए कवि के ससन्देह
वचन को स्तुति के लिए ससन्देह मानते हैं। जैसे—
उस ( नायिका का ) यह हाथ है या हवा से चञ्चल पत्तों की उंगलियों वाला
पल्लव है ।
इत्यादि में उपमा अथवा रूपक ध्वनित होता है । और अतिशयोक्ति प्रायः सभी
अलङ्कारों में ध्वनित होती है । अलङ्कारान्तर का—। जहां अलङ्कार भी अलङ्कारान्तर
को ध्वनित करता है वहां वस्तुमात्र रूप से अलङ्कार ध्वनित होता है, यह कितना
असम्भाव्य ही है, इस तात्पर्य से वृत्तिकार ने 'अलङ्कारान्तर' शब्द का प्रयोग किया है,
न कि प्रकृत में ( वह शब्द ) उपयोगी है; क्योंकि यह प्रकृत नहीं कि अलङ्कार से
अलङ्कार ध्वनित होता है, बल्कि इतना ही प्रकृत है कि अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि में वस्तु
की भांति अलङ्कार भी व्यङ्ग्य होता है । जैसा कि उपसंहार ग्रन्थ में 'वे अलङ्कार
ध्वनि का अङ्ग होकर अधिक छाया प्राप्त करते हैं' इस स्थल में वृत्तिकार 'ध्वनि का
अङ्गत्व दो प्रकारों से' यह उपक्रम करके 'वहां यह प्रकरण से व्यङ्ग्य होने के कारण