ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अर्थशक्तेरलङ्कारो यत्राप्यन्यः प्रतीयते । अनुस्वानोपमव्यङ्ग्यः स प्रकारोऽपरो ध्वनेः ॥ २५ ॥ वाच्यालङ्कारव्यतिरिक्तो यत्रान्योऽलङ्कारोऽर्थसामर्थ्यात्प्रतीयमानो- ऽवभासते सोऽर्थशक्त्युद्भवो नामानुस्वानरूपव्यङ्ग्योऽन्यो ध्वनिः॥२५॥ तस्य प्रविरलविषयत्वमाशङ्क्येदमुच्यते— रूपकादिरलङ्कारवर्गो यो वाच्यतां श्रितः । स सर्वो गम्यमानत्वं बिभ्रद् भूम्ना प्रदर्शितः ॥ २६ ॥ अर्थशक्ति से जहां भी अन्य अलङ्कार प्रतीत होता है वह अनुस्वानोपमव्यङ्ग्य ध्वनि का अन्य प्रकार है ॥ २५ ॥ वाच्य अलङ्कार से अतिरिक्त जहां अन्य अलङ्कार अर्थसामर्थ्य से प्रतीत होता हुआ अवभासित होता है वह अर्थशक्त्युद्भव नाम का अनुस्वानरूप व्यङ्ग्य अन्य ध्वनि है ॥ २५ ॥ उसके प्रविरलविषय होने की आशङ्का करके यह कहते हैं— रूपक आदि अलङ्कारवर्ग जो वाच्यता का आश्रयण करता है वह सब गम्यमान रूप में बहुत विस्तार से दिखाया गया है । ॥ २६ ॥ लोचनम् एवमर्थशक्त्युद्भवो द्विभेदो वस्तुमात्रस्य व्यञ्जनीयत्वे वस्तुध्वनिरूपतया निरूपितः । इदानीं तस्यैवालङ्काररूपे व्यञ्जनीयेऽलङ्कारध्वनित्वमपि भवती- त्याह—अर्थेत्यादि । न केवलं शब्दशक्तेरलङ्कारः प्रतीयते पूर्वोक्तनीत्या यावद्- र्थशक्तेरपि । यदि वा न केवलं यत्र वस्तुमात्रं प्रतीयते यावदलङ्कारोऽपीत्यपि- शब्दार्थः । अन्यशब्दं व्याचष्टे—वाच्येति ॥ २५ ॥ आशङ्क्येति । शब्दशक्त्या श्लेषाद्यलङ्कारो भासत इति सम्भाव्यमेतत् । इस प्रकार अर्थशक्त्युद्भव दो प्रकार का होता है, वस्तुमात्र के व्यञ्जनीय होने पर वस्तुध्वनि रूप से वह निरूपण किया गया, अब उसी के अलङ्कार रूप के व्यञ्जनीय होने पर अलङ्कार-ध्वनित्व भी होता है, यह कहते हैं—अर्थ० इत्यादि । न केवल शब्दशक्ति से अलङ्कार प्रतीत होता है बल्कि पूर्वोक्त नीति से अर्थशक्ति से भी (अलङ्कार प्रतीत होता है ) । यदि वा 'भी' ( 'अपि' ) शब्द का अर्थ है कि न केवल जहां वस्तु- मात्र प्रतीत होता है बल्कि अलङ्कार भी । 'अन्य' शब्द की व्याख्या करते हैं— वाच्य० ॥ २५ ॥ आशङ्का करके—। शब्दशक्ति से श्लेष आदि अलङ्कार भासित होता है, यह तो