भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 337

द्वितीय उद्योतः २७७ ध्वन्यालोकः केवलं भणितिवशेनैवाभिनिष्पन्नशरीरः । यथोदाहृतम् 'एवंवादिनि' इत्यादि । यथा वा— सिहिपिञ्छकण्णपूरा जाआ वाहस्स गव्विरी भमइ । मुत्ताफलरइअपसाहणाणं मज्झे सवत्तीणम् ॥ २४ ॥ है, न केवल उक्ति द्वारा ही जिसका शरीर अभिनिष्पन्न है। जैसे, उदाहृत है—'एवं वादिनि०' इत्यादि । अथवा जैसे— मोर-पंखों के कनफूल पहने व्याध की पत्नी मुक्ताफलों के गहने पहनी हुई अपनी सौतों के बीच गर्वीली होकर घूमती है ॥ २४ ॥ लोचनम् ध्वननं कृतम् । तव तारुण्येनोन्नतौ स्तनावेति हि वचने न व्यञ्जकता । न केवलमिति । उक्तिवैचित्र्यं तावत्सर्वथोपयोगि भवतीति भावः । शिखिपिच्छकर्णपूरा जाया व्याधस्य गर्विणी भ्रमति । मुक्ताफलरचितप्रसाधनानां मध्ये सपत्नीनाम् ॥ शिखिमात्रमारणमेव तदासक्तस्य कृत्यम् । अन्यासु त्वासक्तो हस्तिनोऽ- प्यमारयदिति हि वचनेनोक्तमुत्तमसौभाग्यम् । रचितानि विविधभङ्गीभिः प्रसाधनानीति तासां सम्भोगव्यग्रिमाभावात्तद्विरचनशिल्पकौशलमेव परमिति दौर्भाग्यातिशय इदानीमिति प्रकाशितम् । गर्वश्च बाल्याविवेकादिनापि भव- तीति नात्र स्वोक्तिसद्भावः शङ्क्यः । एष चार्थो यथा यथा वर्ण्यते आस्तां वा वर्णना, बहिरपि यदि प्रत्यक्षादिनावलोक्यते तथा तथा सौभाग्यातिशयं व्याधवध्वा द्योतयति ॥ २४ ॥ कथन में व्यञ्जकता नहीं है। न केवल—। भाव यह कि उक्तिवैचित्र्य सब प्रकार से उपयोगी होता है । उसमें आसक्त नायक का केवल मोरों का मारना ही कार्य रह गया और दूसरी सौतों में आसक्त वह हाथियों को भी मार डालता था, इस कथन से ( अपना ) उत्तम सौभाग्य अभिहित किया । विविध भङ्गियों से जिनके प्रसाधन बनाए गए हैं, इससे प्रकाशित किया कि सम्भोग की व्यग्रता न होने के कारण प्रसाधन के बनाने का शिल्प- कौशल ही ज्यादा था, इस प्रकार अब उनका अतिशय दुर्भाग्य है । गर्व तो बाल्य के कारण अविवेक आदि से भी उत्पन्न होता है इसलिए यहां अपनी उक्ति के सद्भाव की शङ्का नहीं करनी चाहिए । यह अर्थ जैसे जैसे वर्णन करते हैं अथवा वर्णना हो भी, यदि बाहर भी प्रत्यक्ष आदि द्वारा देखा जाता है उस-उस प्रकार व्याधवधू का अतिशय सौभाग्य द्योतन करता है ॥ २४ ॥