भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

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२७६ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरो यथोदाहृतमेव—‘शिख-
रिणि’ इत्यादि ।
यथा वा—
साअरविइण्णजोव्वणहत्थालम्बं समुण्णमन्तेहिम् ।
अब्भुट्ठाणं विअ मम्महस्स दिण्णं तुह थणेहिम् ॥
स्वतः सम्भवी य औचित्येन बहिरपि सम्भाव्यमानसद्भावो न
कवि द्वारा निबद्ध वक्ता की प्रौढ़ उक्तिमात्र से निष्पन्न शरीर वाला, जैसे उदाहृत
है—‘शिखरिणि०’ इत्यादि ।
अथवा, जैसे—
आदर के साथ यौवन द्वारा हस्तावलम्ब दिए जाने पर उठते हुए तुम्हारे स्तनों
ने कामदेव को ( स्वागत में ) अभ्युत्थान-सा प्रदान किया है ।
स्वतः सम्भवी वह है औचित्य से बाहर भी सद्भाव जिसका सम्भावित हो रहा
लोचनम्
स्यात् । एषा च कवेरेवोक्तिः प्रौढा । शिखरिणीति । अत्र लोहितं बिम्बफलं
शुको दशतीति न व्यञ्जकता काचित् । यदा तु कविनिबद्धस्य साभिलाषस्य
तरुणस्य वक्तुरित्थं प्रौढोक्तिस्तदा व्यञ्जकत्वम् ।
सादरवितीर्णयौवनहस्तालम्बं समुन्नमद्भ्याम् ।
अभ्युत्थानमिव मन्मथस्य दत्तं तव स्तनाभ्याम् ॥
स्तनौ तावदिह प्रधानभूतौ ततोऽपि गौरवितः कामस्ताभ्यामभ्युत्थानेनो-
पचर्यते । यौवनं चानयोः परिचारकभावेन स्थितमित्येवंविधेनोक्तिवैचित्र्येण
त्वदीयस्तनावलोकनप्रवृद्धमन्मथावस्थः को न भवतीति भङ्ग्या स्वाभिप्राय-
यह कवि की ही उक्ति प्रौढ है । शिखरिणि० । यहां लाल बिम्बफल को शुक काटता है,
यह कोई व्यञ्जकत्व नहीं है । परन्तु जब कवि द्वारा निबद्ध साभिलाष तरुण वक्ता की
इस प्रकार प्रौढ उक्ति होगी, तब व्यञ्जकत्व होगा ।
‘( नायिका के ) दोनों स्तन यहां प्रधानभूत हैं, उनसे भी अधिक गौरव वाला काम-
देव उनके द्वारा अभ्युत्थानपूर्वक उपचारित हो रहा है, और यौवन इन दोनों ( स्तनों )
के परिचारक रूप में स्थित है’ इस प्रकार के उक्तिवैचित्र्य द्वारा ‘तुम्हारे स्तनों के अव-
लोक से प्रवृद्ध कामावस्था वाला कौन नहीं हो जाता है, इस ढङ्ग ( भङ्गी ) से अपने
अभिप्राय का ध्वनन किया है । ‘जवानी के कारण तुम्हारे स्तन उन्नत हो गए हैं’ इस