भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 680 में से

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पृष्ठ 335

द्वितीय उद्योतः २७५ ध्वन्यालोकः अर्थशक्त्युद्द्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्ये ध्वनौ यो व्यञ्जकोऽर्थ उक्तस्त- स्यापि द्वौ प्रकारौ—कवेः कविनिबद्धस्य वा वक्तुः प्रौढोक्तिमात्रनि- ष्पन्नशरीर एकः, स्वतःसम्भवी च द्वितीयः। कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरो यथा— सज्जेहि सुरहिमासो ण दाव अप्पेइ जुइजणलक्खमुहे। अहिणवसहारमुहे णवपल्लवपत्तले अणङ्गस्स शरे॥ अर्थशक्त्युद्भव अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि में जो व्यञ्जक अर्थ कहा है उसके भी दो प्रकार हैं—कवि की अथवा कविनिबद्ध वक्ता की प्रौढ़ उक्तिमात्र से निष्पन्न शरीर वाला एक और स्वतः सम्भवी दूसरा। कवि की प्रौढ़ उक्तिमात्र से निष्पन्न शरीर वाला, जैसे—वसन्तमास युवतिजनों को लक्ष्य करने वाले मुखों (अग्रभाग अर्थात् बाण के फल) से युक्त, नये पल्लवों के (पंखों से) युक्त, नये सहकार प्रभृति (कामदेव के बाणों) को तैयार कर रहा है, (अभी प्रहार करने के लिए उन्हें कामदेव के) अर्पित नहीं कर रहा है। लोचनम् इत्यपिशब्दस्यार्थः। प्रौढोक्तेरप्यवान्तरभेदमाह—कवेरिति। तेनैते त्रयो भेदा भवन्ति। प्रकर्षेण ऊढः सम्पादयितव्येन वस्तुना प्राप्तस्तत्कुशलः प्रौढः। उक्ति- रपि समर्पयितव्यवस्त्वर्पणोचिता प्रौढेत्युच्यते। सजयति सुरभिमासो न तावदर्पयति युवतिजनलक्ष्यमुखान्। अभिनवसहकारमुखान्नवपल्लवपत्रलाननङ्गस्य शरान्॥ अत्र वसन्तश्चेतनोऽनङ्गस्य सखा सजयति केवलं न तावदर्पयतीत्येवंवि- धया समर्पयितव्यवस्त्वर्पणकुशलयोक्त्या सहकारोद्भैदिनी वसन्तदशा यत उक्ता अतो ध्वन्यमानं मन्मथोन्माथस्यारम्भं क्रमेण गाढगाढीभविष्यन्तं व्यनक्ति। अन्यथा वसन्ते सपल्लवसहकारोद्गम इति वस्तुमात्रं न व्यञ्जकं है। प्रौढोक्ति का भी अवान्तर भेद कहते हैं—कवि की—। इस कारण ये तीन भेद होते हैं। प्रकर्ष से ऊढ अर्थात् सम्पादयितव्य वस्तु से प्राप्त, उसका कुशल प्रौढ है। समर्पयितव्य वस्तु के अर्पण में उचित उक्ति भी 'प्रौढ' कहलाती है। यहां 'चेतन, कामदेव का सखा वसन्त केवल तैयार कर रहा है, अर्पित नहीं कर रहा है' समर्पयितव्य वस्तु के अर्पण में कुशल इस प्रकार की उक्ति द्वारा आम्र (सहकार) पैदा करने वाली वसन्त की स्थिति जिस कारण कही गई है उस कारण ध्वनित होते हुए और क्रम से गाढ-गाढतर होते हुए मन्मथोन्माथ के आरम्भ को व्यक्त करती है, अन्यथा 'वसन्त में पल्लवसहित सहकार का उद्गम' यह वस्तुमात्र व्यञ्जक नहीं होगा।