ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
द्वितीय उद्योतः २७५ ध्वन्यालोकः अर्थशक्त्युद्द्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्ये ध्वनौ यो व्यञ्जकोऽर्थ उक्तस्त- स्यापि द्वौ प्रकारौ—कवेः कविनिबद्धस्य वा वक्तुः प्रौढोक्तिमात्रनि- ष्पन्नशरीर एकः, स्वतःसम्भवी च द्वितीयः। कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरो यथा— सज्जेहि सुरहिमासो ण दाव अप्पेइ जुइजणलक्खमुहे। अहिणवसहारमुहे णवपल्लवपत्तले अणङ्गस्स शरे॥ अर्थशक्त्युद्भव अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि में जो व्यञ्जक अर्थ कहा है उसके भी दो प्रकार हैं—कवि की अथवा कविनिबद्ध वक्ता की प्रौढ़ उक्तिमात्र से निष्पन्न शरीर वाला एक और स्वतः सम्भवी दूसरा। कवि की प्रौढ़ उक्तिमात्र से निष्पन्न शरीर वाला, जैसे—वसन्तमास युवतिजनों को लक्ष्य करने वाले मुखों (अग्रभाग अर्थात् बाण के फल) से युक्त, नये पल्लवों के (पंखों से) युक्त, नये सहकार प्रभृति (कामदेव के बाणों) को तैयार कर रहा है, (अभी प्रहार करने के लिए उन्हें कामदेव के) अर्पित नहीं कर रहा है। लोचनम् इत्यपिशब्दस्यार्थः। प्रौढोक्तेरप्यवान्तरभेदमाह—कवेरिति। तेनैते त्रयो भेदा भवन्ति। प्रकर्षेण ऊढः सम्पादयितव्येन वस्तुना प्राप्तस्तत्कुशलः प्रौढः। उक्ति- रपि समर्पयितव्यवस्त्वर्पणोचिता प्रौढेत्युच्यते। सजयति सुरभिमासो न तावदर्पयति युवतिजनलक्ष्यमुखान्। अभिनवसहकारमुखान्नवपल्लवपत्रलाननङ्गस्य शरान्॥ अत्र वसन्तश्चेतनोऽनङ्गस्य सखा सजयति केवलं न तावदर्पयतीत्येवंवि- धया समर्पयितव्यवस्त्वर्पणकुशलयोक्त्या सहकारोद्भैदिनी वसन्तदशा यत उक्ता अतो ध्वन्यमानं मन्मथोन्माथस्यारम्भं क्रमेण गाढगाढीभविष्यन्तं व्यनक्ति। अन्यथा वसन्ते सपल्लवसहकारोद्गम इति वस्तुमात्रं न व्यञ्जकं है। प्रौढोक्ति का भी अवान्तर भेद कहते हैं—कवि की—। इस कारण ये तीन भेद होते हैं। प्रकर्ष से ऊढ अर्थात् सम्पादयितव्य वस्तु से प्राप्त, उसका कुशल प्रौढ है। समर्पयितव्य वस्तु के अर्पण में उचित उक्ति भी 'प्रौढ' कहलाती है। यहां 'चेतन, कामदेव का सखा वसन्त केवल तैयार कर रहा है, अर्पित नहीं कर रहा है' समर्पयितव्य वस्तु के अर्पण में कुशल इस प्रकार की उक्ति द्वारा आम्र (सहकार) पैदा करने वाली वसन्त की स्थिति जिस कारण कही गई है उस कारण ध्वनित होते हुए और क्रम से गाढ-गाढतर होते हुए मन्मथोन्माथ के आरम्भ को व्यक्त करती है, अन्यथा 'वसन्त में पल्लवसहित सहकार का उद्गम' यह वस्तुमात्र व्यञ्जक नहीं होगा।
२७६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरो यथोदाहृतमेव—‘शिख-
रिणि’ इत्यादि ।
यथा वा—
साअरविइण्णजोव्वणहत्थालम्बं समुण्णमन्तेहिम् ।
अब्भुट्ठाणं विअ मम्महस्स दिण्णं तुह थणेहिम् ॥
स्वतः सम्भवी य औचित्येन बहिरपि सम्भाव्यमानसद्भावो न
कवि द्वारा निबद्ध वक्ता की प्रौढ़ उक्तिमात्र से निष्पन्न शरीर वाला, जैसे उदाहृत
है—‘शिखरिणि०’ इत्यादि ।
अथवा, जैसे—
आदर के साथ यौवन द्वारा हस्तावलम्ब दिए जाने पर उठते हुए तुम्हारे स्तनों
ने कामदेव को ( स्वागत में ) अभ्युत्थान-सा प्रदान किया है ।
स्वतः सम्भवी वह है औचित्य से बाहर भी सद्भाव जिसका सम्भावित हो रहा
लोचनम्
स्यात् । एषा च कवेरेवोक्तिः प्रौढा । शिखरिणीति । अत्र लोहितं बिम्बफलं
शुको दशतीति न व्यञ्जकता काचित् । यदा तु कविनिबद्धस्य साभिलाषस्य
तरुणस्य वक्तुरित्थं प्रौढोक्तिस्तदा व्यञ्जकत्वम् ।
सादरवितीर्णयौवनहस्तालम्बं समुन्नमद्भ्याम् ।
अभ्युत्थानमिव मन्मथस्य दत्तं तव स्तनाभ्याम् ॥
स्तनौ तावदिह प्रधानभूतौ ततोऽपि गौरवितः कामस्ताभ्यामभ्युत्थानेनो-
पचर्यते । यौवनं चानयोः परिचारकभावेन स्थितमित्येवंविधेनोक्तिवैचित्र्येण
त्वदीयस्तनावलोकनप्रवृद्धमन्मथावस्थः को न भवतीति भङ्ग्या स्वाभिप्राय-
यह कवि की ही उक्ति प्रौढ है । शिखरिणि० । यहां लाल बिम्बफल को शुक काटता है,
यह कोई व्यञ्जकत्व नहीं है । परन्तु जब कवि द्वारा निबद्ध साभिलाष तरुण वक्ता की
इस प्रकार प्रौढ उक्ति होगी, तब व्यञ्जकत्व होगा ।
‘( नायिका के ) दोनों स्तन यहां प्रधानभूत हैं, उनसे भी अधिक गौरव वाला काम-
देव उनके द्वारा अभ्युत्थानपूर्वक उपचारित हो रहा है, और यौवन इन दोनों ( स्तनों )
के परिचारक रूप में स्थित है’ इस प्रकार के उक्तिवैचित्र्य द्वारा ‘तुम्हारे स्तनों के अव-
लोक से प्रवृद्ध कामावस्था वाला कौन नहीं हो जाता है, इस ढङ्ग ( भङ्गी ) से अपने
अभिप्राय का ध्वनन किया है । ‘जवानी के कारण तुम्हारे स्तन उन्नत हो गए हैं’ इस
द्वितीय उद्योतः २७७ ध्वन्यालोकः केवलं भणितिवशेनैवाभिनिष्पन्नशरीरः । यथोदाहृतम् 'एवंवादिनि' इत्यादि । यथा वा— सिहिपिञ्छकण्णपूरा जाआ वाहस्स गव्विरी भमइ । मुत्ताफलरइअपसाहणाणं मज्झे सवत्तीणम् ॥ २४ ॥ है, न केवल उक्ति द्वारा ही जिसका शरीर अभिनिष्पन्न है। जैसे, उदाहृत है—'एवं वादिनि०' इत्यादि । अथवा जैसे— मोर-पंखों के कनफूल पहने व्याध की पत्नी मुक्ताफलों के गहने पहनी हुई अपनी सौतों के बीच गर्वीली होकर घूमती है ॥ २४ ॥ लोचनम् ध्वननं कृतम् । तव तारुण्येनोन्नतौ स्तनावेति हि वचने न व्यञ्जकता । न केवलमिति । उक्तिवैचित्र्यं तावत्सर्वथोपयोगि भवतीति भावः । शिखिपिच्छकर्णपूरा जाया व्याधस्य गर्विणी भ्रमति । मुक्ताफलरचितप्रसाधनानां मध्ये सपत्नीनाम् ॥ शिखिमात्रमारणमेव तदासक्तस्य कृत्यम् । अन्यासु त्वासक्तो हस्तिनोऽ- प्यमारयदिति हि वचनेनोक्तमुत्तमसौभाग्यम् । रचितानि विविधभङ्गीभिः प्रसाधनानीति तासां सम्भोगव्यग्रिमाभावात्तद्विरचनशिल्पकौशलमेव परमिति दौर्भाग्यातिशय इदानीमिति प्रकाशितम् । गर्वश्च बाल्याविवेकादिनापि भव- तीति नात्र स्वोक्तिसद्भावः शङ्क्यः । एष चार्थो यथा यथा वर्ण्यते आस्तां वा वर्णना, बहिरपि यदि प्रत्यक्षादिनावलोक्यते तथा तथा सौभाग्यातिशयं व्याधवध्वा द्योतयति ॥ २४ ॥ कथन में व्यञ्जकता नहीं है। न केवल—। भाव यह कि उक्तिवैचित्र्य सब प्रकार से उपयोगी होता है । उसमें आसक्त नायक का केवल मोरों का मारना ही कार्य रह गया और दूसरी सौतों में आसक्त वह हाथियों को भी मार डालता था, इस कथन से ( अपना ) उत्तम सौभाग्य अभिहित किया । विविध भङ्गियों से जिनके प्रसाधन बनाए गए हैं, इससे प्रकाशित किया कि सम्भोग की व्यग्रता न होने के कारण प्रसाधन के बनाने का शिल्प- कौशल ही ज्यादा था, इस प्रकार अब उनका अतिशय दुर्भाग्य है । गर्व तो बाल्य के कारण अविवेक आदि से भी उत्पन्न होता है इसलिए यहां अपनी उक्ति के सद्भाव की शङ्का नहीं करनी चाहिए । यह अर्थ जैसे जैसे वर्णन करते हैं अथवा वर्णना हो भी, यदि बाहर भी प्रत्यक्ष आदि द्वारा देखा जाता है उस-उस प्रकार व्याधवधू का अतिशय सौभाग्य द्योतन करता है ॥ २४ ॥
२७८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अर्थशक्तेरलङ्कारो यत्राप्यन्यः प्रतीयते । अनुस्वानोपमव्यङ्ग्यः स प्रकारोऽपरो ध्वनेः ॥ २५ ॥ वाच्यालङ्कारव्यतिरिक्तो यत्रान्योऽलङ्कारोऽर्थसामर्थ्यात्प्रतीयमानो- ऽवभासते सोऽर्थशक्त्युद्भवो नामानुस्वानरूपव्यङ्ग्योऽन्यो ध्वनिः॥२५॥ तस्य प्रविरलविषयत्वमाशङ्क्येदमुच्यते— रूपकादिरलङ्कारवर्गो यो वाच्यतां श्रितः । स सर्वो गम्यमानत्वं बिभ्रद् भूम्ना प्रदर्शितः ॥ २६ ॥ अर्थशक्ति से जहां भी अन्य अलङ्कार प्रतीत होता है वह अनुस्वानोपमव्यङ्ग्य ध्वनि का अन्य प्रकार है ॥ २५ ॥ वाच्य अलङ्कार से अतिरिक्त जहां अन्य अलङ्कार अर्थसामर्थ्य से प्रतीत होता हुआ अवभासित होता है वह अर्थशक्त्युद्भव नाम का अनुस्वानरूप व्यङ्ग्य अन्य ध्वनि है ॥ २५ ॥ उसके प्रविरलविषय होने की आशङ्का करके यह कहते हैं— रूपक आदि अलङ्कारवर्ग जो वाच्यता का आश्रयण करता है वह सब गम्यमान रूप में बहुत विस्तार से दिखाया गया है । ॥ २६ ॥ लोचनम् एवमर्थशक्त्युद्भवो द्विभेदो वस्तुमात्रस्य व्यञ्जनीयत्वे वस्तुध्वनिरूपतया निरूपितः । इदानीं तस्यैवालङ्काररूपे व्यञ्जनीयेऽलङ्कारध्वनित्वमपि भवती- त्याह—अर्थेत्यादि । न केवलं शब्दशक्तेरलङ्कारः प्रतीयते पूर्वोक्तनीत्या यावद्- र्थशक्तेरपि । यदि वा न केवलं यत्र वस्तुमात्रं प्रतीयते यावदलङ्कारोऽपीत्यपि- शब्दार्थः । अन्यशब्दं व्याचष्टे—वाच्येति ॥ २५ ॥ आशङ्क्येति । शब्दशक्त्या श्लेषाद्यलङ्कारो भासत इति सम्भाव्यमेतत् । इस प्रकार अर्थशक्त्युद्भव दो प्रकार का होता है, वस्तुमात्र के व्यञ्जनीय होने पर वस्तुध्वनि रूप से वह निरूपण किया गया, अब उसी के अलङ्कार रूप के व्यञ्जनीय होने पर अलङ्कार-ध्वनित्व भी होता है, यह कहते हैं—अर्थ० इत्यादि । न केवल शब्दशक्ति से अलङ्कार प्रतीत होता है बल्कि पूर्वोक्त नीति से अर्थशक्ति से भी (अलङ्कार प्रतीत होता है ) । यदि वा 'भी' ( 'अपि' ) शब्द का अर्थ है कि न केवल जहां वस्तु- मात्र प्रतीत होता है बल्कि अलङ्कार भी । 'अन्य' शब्द की व्याख्या करते हैं— वाच्य० ॥ २५ ॥ आशङ्का करके—। शब्दशक्ति से श्लेष आदि अलङ्कार भासित होता है, यह तो
द्वितीय उद्योतः २७९
ध्वन्यालोकः
अन्यत्र वाच्यत्वेन प्रसिद्धो यो रूपकादिरलङ्कारः सोऽन्यत्र प्रती-
यमानतया बाहुल्येन प्रदर्शितस्तत्रभवद्भिर्भट्टोद्भटादिभिः । तथा च
अन्यत्र वाच्यरूप से प्रसिद्ध जो रूपक आदि अलङ्कार है वह अन्यत्र प्रतीयमान
रूप से बहुलतया, आदरणीय उद्भट आदि आचार्यों द्वारा दिखाया गया है। जैसा कि
लोचनम्
अर्थशक्त्या तु कोऽलङ्कारो भातीत्याशङ्काबीजम् । सर्व इति प्रदर्शित इति च
पदेनासम्भावनात्र मिथ्यैवेत्याह ।
उपमानेन तत्त्वं च भेदं च वदतः पुनः ।
ससन्देहं वचः स्तुत्यै ससन्देहं विदुर्यथा ॥ इति ।
तस्याः पाणिरयं नु मारुतचलत्पत्राङ्गुलिः पल्लवः ।
इत्यादावुपमा रूपकं वा ध्वन्यते । अतिशयोक्तेश्च प्रायशः सर्वालङ्कारेषु
ध्वन्यमानत्वम् । अलङ्कारान्तरस्येति । यत्रालङ्कारोऽप्यलङ्कारान्तरं ध्वनति तत्र
वस्तुमात्रेणालङ्कारो ध्वन्यत इति कियदिदमसम्भाव्यमिति तात्पर्येणालङ्कारा-
न्तरशब्दो वृत्तिकृता प्रयुक्तो न तु प्रकृतोपयोगी; न ह्यलङ्कारेणालङ्कारो ध्वन्यत
इति प्रकृतमदः, अर्थशक्त्युद्भवे ध्वनौ वस्त्विवालङ्कारोऽपि व्यङ्ग्य इत्येतावतः
प्रकृतत्वात् । तथा चोपसंहारग्रन्थे 'तेऽलङ्काराः परां छायां यान्ति ध्वन्यङ्गतां
गताः' इत्यत्र श्लोके वृत्तिकृत् 'ध्वन्यङ्गता चोभाभ्यां प्रकाराभ्याम्' इत्युपक्रम्य
सम्भाव्य है, परन्तु अर्थशक्ति से कौन-सा अलङ्कार प्रतीत होता है ! यह आशङ्का का
बीज है । 'सर्व' और 'दिखाया गया है' इन दोनों से 'यहां असम्भावना मिथ्या ही है'
यह कहते हैं ।
उपमान के साथ ( उपमेय का ) अभेद और पुनः भेद कहते हुए कवि के ससन्देह
वचन को स्तुति के लिए ससन्देह मानते हैं। जैसे—
उस ( नायिका का ) यह हाथ है या हवा से चञ्चल पत्तों की उंगलियों वाला
पल्लव है ।
इत्यादि में उपमा अथवा रूपक ध्वनित होता है । और अतिशयोक्ति प्रायः सभी
अलङ्कारों में ध्वनित होती है । अलङ्कारान्तर का—। जहां अलङ्कार भी अलङ्कारान्तर
को ध्वनित करता है वहां वस्तुमात्र रूप से अलङ्कार ध्वनित होता है, यह कितना
असम्भाव्य ही है, इस तात्पर्य से वृत्तिकार ने 'अलङ्कारान्तर' शब्द का प्रयोग किया है,
न कि प्रकृत में ( वह शब्द ) उपयोगी है; क्योंकि यह प्रकृत नहीं कि अलङ्कार से
अलङ्कार ध्वनित होता है, बल्कि इतना ही प्रकृत है कि अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि में वस्तु
की भांति अलङ्कार भी व्यङ्ग्य होता है । जैसा कि उपसंहार ग्रन्थ में 'वे अलङ्कार
ध्वनि का अङ्ग होकर अधिक छाया प्राप्त करते हैं' इस स्थल में वृत्तिकार 'ध्वनि का
अङ्गत्व दो प्रकारों से' यह उपक्रम करके 'वहां यह प्रकरण से व्यङ्ग्य होने के कारण
२८० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ससन्देहादिषूपमारूपकातिशयोक्तीनां प्रकाशमानत्वं प्रदर्शितमित्य- लङ्कारान्तरस्यालङ्कारान्तरे व्यङ्ग्यत्वं न यत्नप्रतिपाद्यम् ॥ २६ ॥ इयत्पुनरुच्यत एव— अलङ्कारान्तरस्यापि प्रतीतौ यत्र भासते । तत्परत्वं न वाच्यस्य नासौ मार्गो ध्वनेर्मतः ॥ २७ ॥ अलङ्कारान्तरेषु त्वनुरणनरूपालङ्कारप्रतीतौ सत्यामपि यत्र वाच्य- स्य व्यङ्ग्यप्रतिपादनौन्मुख्येन चारुत्वं न प्रकाशते नासौ ध्वनेर्मार्गः । ससन्देह आदि ( अलङ्कारों ) में उपमा, रूपक और अतिशयोक्ति का प्रकाशित होना दिखाया गया है । इस प्रकार अलङ्कारान्तर का अलङ्कारान्तर में व्यङ्ग्य होना यत्नप्रतिपाद्य नहीं है ॥ २६ ॥ इतना तो फिर कहते ही हैं— अलङ्कारान्तर की भी प्रतीति में जहां वाच्य का तत्परत्व नहीं भासित होता है वह मार्ग ध्वनि का नहीं माना गया है ॥ २७ ॥ परन्तु अलङ्कारान्तरों में अनुरणनरूप अलङ्कार की प्रतीति के होने पर भी जहाँ वाच्य का व्यङ्ग के प्रतिपादन के औन्मुख्य से चारुत्व जाहिर नहीं होता है वह ध्वनि का लोचनम् 'तत्रेह प्रकरणाद्व्यङ्ग्यत्वेनेत्यवगन्तव्यम्' इति वक्ष्यति । अन्तरशब्दो वोभय- त्रापि विशेषपर्यायः; वैषयिकी सप्तमी, न तु प्राग्व्याख्यायामिव निमित्तसप्तमी । तदयमर्थः-वाच्यालङ्कारविशेषविषये व्यङ्ग्यालङ्कारविशेषो भातीत्युद्भटादिभि- रुक्तमेवेत्यर्थशक्त्यालङ्कारो व्यज्यत इति तैरुपगतमेव । केवलं तेऽलङ्कारलक्षण- कारत्वाद्वाच्यालङ्कारविशेषविषयत्वेनाहुरिति भावः ॥ २६ ॥ ननु पूर्वै रेव यदिदमुक्तं किमर्थं तव यत्न इत्याशङ्क्याह—इयदिति । अस्मा- यह जानना चाहिए' यह कहेंगे । अथवा 'अनन्तर' शब्द दोनों स्थलों में 'विशेष' अर्थ का वाचक है, सप्तमी वैषयिकी अर्थात् विषयरूप अर्थ की वाचिका है, न कि पहले की व्याख्या के समान निमित्तसप्तमी है । तो अर्थ यह है—वाच्य अलङ्कारविशेष के विषय में व्यङ्ग्य अलङ्कारविशेष प्रतीत होता है यह उद्भट आदि ने कहा ही है, अर्थात् अर्थ- शक्ति से अलङ्कार व्यञ्जित होता है यह उन्होंने माना ही है । भाव यह कि केवल उन्होंने अलङ्कार-लक्षणकार होने के नाते वाच्य अलङ्कारविशेष के विषयरूप से कहा है ॥ २६ ॥ यह आशङ्का करके कि जब कि प्राचीनों ने ही यह कह दिया है तो तुम्हारा यत्न किसलिए ? ( उत्तर में ) कहते हैं—इतना—। 'हम भी' यह वाक्यशेष है । 'पुनः'
३. तृतीय उद्योत: पद, वाक्य, वर्ण, संघटना एवं प्रबन्ध-व्यञ्जकता विचार
द्वितीय उद्योतः २८१ ध्वन्यालोकः तथा च दीपकादावलङ्कारे उपमाया गम्यमानत्वेऽपि तत्परत्वेन चारु- त्वस्याव्यवस्थनान्न ध्वनिव्यपदेशः । यथा— चन्दमऊएहि णिसा णलिनी कमलेहि कुसुमगुच्छेहि लआ । हंसेहि सरअसोहा कव्वकहा सज्जनेहि करइ गरुई ॥ (चन्द्रमयूखैर्निशा नलिनी कमलैः कुसुमगुच्छैर्लता । हंसैश्शारदशोभा काव्यकथा सज्जनैः क्रियते गुर्वी ॥ इति छाया ) मार्ग नहीं है। जैसा कि दीपक आदि अलङ्कार में उपमा के गम्यमान होने पर भी तत्पर रूप से चारुत्व के न होने पर ध्वनि व्यपदेश नहीं होता । जैसे— चन्द्रकिरणों से रात्रि, कमलों से नलिनी, फूल के गुच्छों से लता, शरत्काल की शोभा हंसों से और काव्यकथा सज्जनों से गौरवान्वित की जाती है । लोचनम् भिरिति वाक्यशेषः । पुनःशब्दस्तदुक्ताद्विशेषद्योतकः । चन्दमऊ इति । चन्द्रम- यूखादीनां न निशादिना विना कोऽपि परभागलाभः । सज्जनानामपि काव्यकथां विना कीदृशी साधुजनता । चन्द्रमयूखैश्च निशाया गुरुकीकरणं भास्वरत्वसेव्यत्वादि यत्क्रियते; कमलैर्नलिन्याः शोभापरिमललक्ष्म्यादि, कुसु- मगुच्छैर्लताया अभिगम्यत्वमनोहरत्वादि, हंसैः शारदशोभायाः श्रुतिसुखकर- त्वमनोहरत्वादि, तत्सर्वं काव्यकथायाः सज्जनैरित्येतावानयमर्थो गुरुः क्रियत इति दीपकबलाच्चकास्ति । कथाशब्द इदमाह—आसतां तावत्काव्यस्य केचन सूक्ष्मा विशेषाः, सज्जनैर्विना काव्यमित्येष शब्दोऽपि ध्वंसते । तेषु तु शब्द उस कहे हुए से विशेष का द्योतक है । चन्द्रकिरणों—। चन्द्रकिरण आदि का रात्रि आदि के बिना कोई महत्त्व लाभ नहीं है, सज्जनों की भी काव्यकथा के बिना कैसी साधुजनता ? चन्द्रकिरणों से रात्रि का जो गुरुकीकरण अर्थात् भास्वर होना और सेव्य होना आदि किया जाता है कमलों से नलिनी की शोभा, परिमल, लक्ष्मी आदि जो होती है, फूल के गुच्छों से लता का जो अभिगम्यत्व, मनोहरत्व आदि जो होता है और हंसों से शरत्काल की शोभा का श्रुतिसुखकर होना और मनोहर होना आदि जो होता है वह सब कुछ काव्यकथा का सज्जनों से सम्पन्न होता है, इतना अर्थ 'गौरवा- न्वित किया जाता है' इस दीपक के बल से प्रकाशित होता है । 'कथा' शब्द यह कहता है—काव्य के कोई सूक्ष्म विशेष हों, ( किन्तु ) सज्जनों के बिना 'काव्य' यह शब्द भी नष्ट होता है । उन सज्जनों के विद्यमान रहने पर केवल 'काव्य' शब्द के
२८२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ः ध्वन्यालोकः इत्यादिषूपमागर्भत्वेऽपि सति वाच्यालङ्कारमुखेनैव चारुत्वं व्यव- तिष्ठते न व्यङ्ग्यालङ्कारतात्पर्येण । तस्मात्तत्र वाच्यालङ्कारमुखेनैव का- व्यव्यपदेशो न्याय्यः । यत्र तु व्यङ्ग्यपरत्वेनैव वाच्यस्य व्यवस्थानं तत्र व्यङ्ग्य-मुखेनैव व्यपदेशो युक्तः । इत्यादि के उपमा से गर्भित होने पर भी वाच्य अलङ्कार के प्रकार से ही चारुत्व व्यवस्थित होता है व्यङ्ग्य अलङ्कार के तात्पर्य से नहीं । इस लिए वहां वाच्य अल- ङ्कार के प्रकार से ही काव्यव्यपदेश उचित है । परन्तु जहां व्यङ्ग्यपर रूप से ही वाच्य का व्यवस्थान हो वहाँ व्यङ्ग्य के प्रकार से ही व्यपदेश ठीक है । लोचनम् सत्स्वास्ते सुभगं काव्यशब्दव्यपदेशभागपि शब्दसन्दर्भमात्रम्; तथा तैः क्रियते यथादरणीयतां प्रतिपद्यत इति दीपकस्यैव प्राधान्यं नोपमायाः । एवं तु कारिकार्थमुदाहरणेन प्रदर्श्यास्या एव कारिकाया व्यवच्छेद्यबलेन योऽर्थोऽभि- मतो यत्र तत्परत्वं स ध्वनेर्मार्ग इत्येवंरूपस्तं व्याचष्टे—यत्र त्विति । तत्र च वाच्यालङ्कारेण कदाचिद्व्यङ्ग्यमलङ्कारान्तरं, यदि वा वाच्यालङ्कारस्य सद्भावमात्रं न व्यञ्जकता, वाच्यालङ्कारस्याभाव एव वेति त्रिधा विकल्पः । एतच्च यथायोग- व्यपदेश को धारण करने वाला भी शब्दसन्दर्भमात्र सुभग है; उस प्रकार उनके द्वारा किया जाता है अर्थात् आदरणीयता को प्राप्त करता है, इस प्रकार दीपक का ही प्राधान्य है, उपमा का नहीं । इस प्रकार कारिका के अर्थ को उदाहरण द्वारा प्रदर्शित करके इसी कारिका का व्यवच्छेद्य के बल से जो अर्थ अभिमत है कि 'जहां तात्पर्य है, वह ध्वनि का मार्ग है' उसकी व्याख्या करते हैं—परन्तु जहां—। वहां तीन प्रकार का विकल्प है१—वाच्य अलङ्कार से कभी व्यङ्ग्य अलङ्कारान्तर, अथवा वाच्य अलङ्कार का सद्भावमात्र है, व्यञ्जकता नहीं है, या वाच्य अलङ्कार का अभाव है । इसे जैसा १ प्रस्तुत यह है कि व्यङ्ग्य अलङ्कार से ही व्यपदेश होता है । अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि में कभी अलङ्कार से अलङ्कार व्यङ्ग होता है, कभी वाच्य अलङ्कार का सद्भावमात्र होता है और कभी वह भी नहीं होता । अन्तिम दो स्थितियों में वस्तुध्वनि का सद्भाव माना जाता है, अर्थात् वहां वस्तुमात्र व्यञ्जक होता है । ग्रन्थकार ने इन्हीं बातों को आगे के उदाहरणों में निर्देश किया है । आगे के आचार्यों ने अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि में अलङ्कार से अलङ्कार, अलङ्कार से वस्तु, वस्तु से वस्तु और वस्तु से अलङ्कार की ध्वनियोंको स्वतःसम्भवी, कविप्रौढोक्तिसिद्ध और कविनिबद्धवक्तृ- प्रौढोक्तिसिद्ध के तीन भागों में विभक्त करके १२ भेद किए हैं । प्रस्तुत ग्रन्थ के वक्ष्यमाण उदाहरणों का अध्ययन करते हुए इन भेदों का भी ध्यान रखना चाहिए ।
द्वितीय उद्योतः २८३ ध्वन्यालोकः यथा— प्राप्तश्रीरेष कस्मात्पुनरपि मयि तं मन्थखेदं विदध्या- न्निद्रामप्यस्य पूर्वामनलसमनसो नैव सम्भावयामि । सेतुं बध्नाति भूयः किमिति च सकलद्वीपनाथानुयात- स्त्वय्यायाते वितर्कानिति दधत इवाभाति कम्पः पयोधेः ॥ जैसे— जब कि इसे लक्ष्मी प्राप्त हो गई है तब फिर यह क्यों मुझमें मन्थन का कष्ट करेगा ? आलस्य-रहित मन वाले इसकी पहली निद्रा की भी सम्भावना नहीं ही करता हूँ, क्या समस्त द्वीपनाथों से अनुगत यह फिर से सेतु बनाएगा ? इस प्रकार तुम्हारे आने पर वितर्कों को मानों धारण करते हुए समुद्र का कम्प प्रतीत होता है। लोचनम् मुदाहरणेषु योज्यम् । उदाहरति—प्राप्तेति । कस्मिंश्चिदनन्तबलसमुदायवति नरपतौ समुद्रपरिसरवर्तिनि पूर्णचन्द्रोदयतदीयबलावगाहनादिना निमित्तेन पयोधेस्तावत्कम्पो जातः । सोऽनेन सन्देहेनोत्प्रेक्ष्यत इति ससन्देहोत्प्रेक्षयोः सङ्करात्सङ्करालङ्कारो वाच्यः । तेन च वासुदेवरूपता तस्य नृपतेर्ध्वन्यते । यद्यपि चात्र व्यतिरेको भाति, तथापि स पूर्ववासुदेवस्वरूपात्, नाद्यतनात् । अद्यतनत्वे भगवतोऽपि प्राप्तश्रीकत्वेनानालस्येन सकलद्वीपाधिपतिविजयित्वेन च वर्तमानत्वात् । न च सन्देहोत्प्रेक्षानुपपत्तिबलाद्रूपकस्याक्षेपः, येन वाच्यालङ्कारोपस्कार- कत्वं व्यङ्ग्यस्य भवेत् । यो योऽसम्प्राप्तलक्ष्मीको निर्व्याजविजिगीषाक्रान्तः बैठें, उदाहरणों में घटाना चाहिए । उदाहरण देते हैं—जब कि इसे०—। किसी अनन्त बलसमुदायसम्पन्न राजा के समुद्रतट पर उपस्थित होने पर पूर्ण चन्द्रोदय अथवा उसकी सेना के अवगाहन आदि के कारण समुद्र का कम्पन उत्पन्न हुआ । वह (कम्पन) इस सन्देह से उत्प्रेक्षित हुआ है, इसलिए ससन्देह और उत्प्रेक्षा के सङ्कर होने से सङ्क- रालङ्कार वाच्य है । उससे राजा का वासुदेव—( श्रीकृष्ण ) रूपत्व ध्वनित होता है । यद्यपि यहां ‘व्यतिरेक’ (अलङ्कार) प्रतीत होता है, तथापि वह पूर्व वासुदेव के स्वरूप से न कि अद्यतन (वर्तमान वासुदेव के स्वरूप) से । क्योंकि सम्प्रति भगवान् भी लक्ष्मी को प्राप्त करने से, अनालस्य और समस्त द्वीपाधिपतियों के विजयी रूप से वर्तमान हैं। ससन्देह और उत्प्रेक्षा अलङ्कार दोनों अनुपपन्न हो जायेंगे, इस प्रकार ( उनकी अनुपपत्ति के बल से ) ‘रूपक’ का आक्षेप होगा, जिससे व्यङ्ग्य का उपस्कारकत्व बन जायगा, यह नहीं ( कह सकते ), क्योंकि इस अर्थ का सम्भावन करेंगे कि जिसे जिसे लक्ष्मी प्राप्त न होगी और निर्व्याज विजिगीषा ( विजय करने की इच्छा ) से आक्रान्त
२८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा वा ममैव— लावण्यकान्तिपरिपूरितदिङ्मुखेऽस्मिन् स्मेरेऽधुना तव मुखे तरलायताक्षि । अथवा, जैसे मेरा ही— हे चञ्चल और दीर्घ नेत्रों वाली ! लावण्य और कान्ति से दिशाओं को भर देने वाले तुम्हारे इस मुख के इस समय कुछ विकसित होने पर यह समुद्र जो क्षोभ नहीं लोचनम् स स मां मथ्नीयादित्याद्यर्थसम्भावनात् । न च पुनरपीति पूर्वामिति भूय इति च शब्दैरयमाकृष्टोऽर्थः । पुनरर्थस्य भूयोर्थस्य च कर्तृभेदेऽपि समुद्रैक्य- मात्रेणाप्युपपत्तेः । यथा पृथ्वी पूर्वं कार्तवीर्येण जिता पुनरपि जामदग्न्ये- नेति । पूर्वा निद्रा च सिद्धा राजपुत्राद्यवस्थायामपीति सिद्धं रूपकध्वनिरेवा- यमिति । शब्दव्यापारं निनैवार्थसौन्दर्यबलाद्रूपणाप्रतिपत्तेः । यथा च— ज्योत्स्नापूरप्रसरधवले सैकतेऽस्मिन्सरय्वा वाद्द्यूतं सुचिरमभवत्सिद्धयूनोः कयोश्चित् । एकोऽवादीत्प्रथमनिहतं केशिनं कंसमन्यो मत्वा तत्त्वं कथय भवता को हतस्तत्र पूर्वम् ॥ इति केचिदुदाहरणमत्र पठन्ति, तदसत्; भवतेत्यनेन शब्दबलेनात्र त्वं वासुदेव इत्यर्थस्य स्फुटीकृतत्वात् । लावण्यं संस्थानमुग्धिमा, कान्तिः प्रभा ताभ्यां परिपूरितानि संविभक्तानि होगा वह वह मुझे मथन करेगा, इत्यादि । ऐसा नहीं कह सकते कि यह अर्थ 'फिर भी' 'पहली' और 'फिर से' इन शब्दों से लाया गया है क्यों कि कर्तृभेद होने पर भी समुद्र के एक होने से 'फिर' इस अर्थ की उपपत्ति हो जायगी । जैसे पृथ्वी को पहले कार्तवीर्य ने जीता, फिर जामदग्न्य ने भी । राजपुत्रादि अवस्था में भी पहली निद्रा सिद्ध है, इस प्रकार यह 'रूपक ध्वनि'१ ही है यह बात सिद्ध हुई । क्यों कि शब्दव्यापार के बिना ही अर्थसौन्दर्य के बल से रूपणा की प्रतिपत्ति (अभेद का ज्ञान) होता है । और जैसे— 'चांदनी के प्रवाह से सफेद सरयू के इस सैकत में किन्ही सिद्ध युवक-युवति की देर तक बहसबाजी चलती रही, एक ने कहा कि केशी को पहले मारा, दूसरे ने कहा कि कंस को, ठीक समझ कर कहिए कि आपने उनमें पहले किसको मारा ।' कुछ लोग इस उदाहरण को यहां पढ़ते हैं, वह ठीक नहीं, क्यों कि 'आपने' इस शब्द के बल से यहां 'तुम वासुदेव हो' यह अर्थ स्फुट कर दिया गया है । लावण्य अर्थात् संस्थानमुग्धिमा, कान्ति अर्थात् प्रभा, इनसे परिपूरित-संविभक्त— १. इस उदाहरण में सन्देह और उत्प्रेक्षा के सङ्कररूप वाच्य अलङ्कार से भगवान् वासुदेव से वर्तमान राजा का अभेदारोपरूप रूपक का ध्वनि यह सिद्धान्त पक्ष है । व्यतिरेक अलङ्कार का
द्वितीय उद्योतः २८५ ध्वन्यालोकः क्षोभं यदेति न मनागपि तेन मन्ये सुव्यक्तमेव जलराशिरयं पयोधिः ॥ इत्येवंविधे विषयेऽनुरणनरूपरूपकाश्रयेण काव्यचारुत्वव्यवस्था- नाद्रूपकध्वनिरिति व्यपदेशो न्याय्यः । प्राप्त करता है इससे स्पष्ट ही है कि यह जलराशि है (अर्थात् जडराशि है) । इस प्रकार के विषय में अनुरणनरूप रूपक के आश्रयण से काव्य के चारुत्व के व्यवस्थित होने के कारण 'रूपकध्वनि' यह व्यपदेश ठीक है । लोचनम् हृद्यानि सम्पादितानि दिङ्मुखानि येन । अधुना कोपकालुष्यादनन्तरं प्रसादोन्मुख्येन । स्मेरे ईषद्विहसनशीले तरलायते प्रसादान्दोलनविकाससुन्दरे अक्षिणी यस्यास्तस्या आमन्त्रणम् । अथ चाधुना न एति, वृत्ते तु क्षणान्तरे क्षोभमगमत् । कोपकषायपाटलं स्मेरं च तव मुखं सन्ध्यारुणपूर्णशशधरमण्ड- लमेवेति भाव्यं क्षोभेण चलचित्ततया सहृदयस्य । न चैति तत्सुव्यक्तमन्वर्थ- तायं जलराशिर्जाड्यसञ्चयः । जलादयः शब्दा भावार्थप्रधाना इत्युक्तं प्राक् । तत्र च क्षोभो मदनविकारात्मा सहृदयस्य त्वन्मुखावलोकनेन भवतीत्यत्य- भिधाया विश्रान्ततया रूपकं ध्वन्यमानमेव । वाच्यालङ्कारश्चात्र श्लेषः, स च न अर्थात् हृद्य, बनाया है दिशाओं को जिसने । अभी अर्थात् कोपकालुष्य से, अनन्तर प्रसन्नता के प्रति उन्मुखता के कारण । स्मेर अर्थात् कुछ विहसनशील और तरलायत अर्थात् प्रसन्नता के आन्दोलनजनित विकास से सुन्दर आंखें जिसकी हैं, उसका यह आमन्त्रण (संबोधन) है । और इस समय (क्षोभ) प्राप्त नहीं करता, अभी क्षणभर पहले क्षोभ प्राप्त किया । कोपकषायपाटल और स्मेर तुम्हारा मुख सन्ध्यारुण और पूर्ण चन्द्रमण्डल ही है । चलचित्त होने के कारण सहृदय व्यक्ति को क्षोभ वाजिब है, लेकिन वह (समुद्र को) नहीं हुआ इसलिये यह स्पष्ट हो गया कि यह (समुद्र) जलराशि है, अर्थात् यथार्थ रूप से जाड्यराशि है । यह पहले कह चुके हैं कि 'जल' आदि शब्द भावार्थप्रधान (जाड्य आद्यर्थक हैं। यहां सहृदय व्यक्ति को तुम्हारे मुख के अव- लोकन से मदनविकार रूप क्षोभ होता है; इतने में अभिधा के विश्रान्त हो जाने के कारण 'रूपक' ध्वन्यमान ही है । यहां वाच्य अलङ्कार श्लेष है, पर वह व्यञ्जक नहीं व्यङ्ग्यत्व यहां वास्तविक नहीं है यह भी बात हुई । तीसरी शङ्का के अनुसार ससन्देह और उत्प्रेक्षा के बल से रूपक का आक्षेप है । इसके उत्तर में लोचनकार लिखते हैं कि अर्थ यह करेंगे कि जो जो लक्ष्मी को न प्राप्त किया एवं विजयेच्छा से युक्त है वह वह मुझे मन्थन करेगा । इस प्रकार ससन्देह और उत्प्रेक्षा की अनुपपत्ति नहीं होगी । इस प्रकार यह रूपकध्वनि का उदाहरण है । नवीन आचार्यों के अनुसार यह कविप्रौढोक्तिसिद्ध अलङ्कार से अलङ्कार व्यङ्ग्य का उदाहरण है ।
२८६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः उपमाध्वनिर्यथा— वीराणं रमइ घुसिणरुणम्मि ण तदा पिआथणुच्छङ्गे । दिट्ठी रिउगअकुम्भत्थलम्मि जह बहलसिन्दूरे ॥ यथा वा ममैव विषमबाणलीलायाम सुरपराक्रमणे कामदेवस्य— उपमा-ध्वनि, जैसे— वीरों की दृष्टि जिस प्रकार सिन्दूर से भरे शत्रुओं के हाथियों के कुम्भस्थलों में रमण करती है उस प्रकार कुंकुम से लाल प्रिया के स्तनोत्सङ्ग में रमण नहीं करती । अथवा जैसे मेरा ही 'विषमबाणलीला' में असुरों पर पराक्रम के अवसर में कामदेव का— लोचनम् व्यञ्जकः । अनुरणनरूपं यद्रूपकमर्थशक्तिव्यङ्ग्यं तदाश्रयेणेह काव्यस्य चारुत्वं व्यवतिष्ठते । ततस्तेनैव व्यपदेश इति सम्बन्धः । तुल्ययोजनत्वादुपमाध्वन्यु- दाहरणयोर्लक्षणं स्वकण्ठेन न योजितम् । वीराणां रमते घुसृणारुणे न तथा प्रियास्तनोत्सङ्गे । दृष्टी रिपुगजकुम्भस्थले यथा बहलसिन्दूरे ॥ प्रसाधितप्रियतमाश्वासनपरतया समनन्तरीभूतयुद्धत्वरितमनस्कतया च दोलायमानदृष्टित्वेऽपि युद्धे त्वरातिशय इति व्यतिरेको वाच्यालङ्कारः । तत्र तु येयं ध्वन्यमानोपमा प्रियाकुचकुड्मलाभ्यां सकलजनत्रासकरेष्वपि शात्रवेषु मर्दनोद्यतेषु गजकुम्भस्थलेषु तद्वशेन रतिमाददानानामिव बहुमान इति सैव वीरतातिशयचमत्कारं विधत्त इत्युपमायाः प्राधान्यम् । असुरपराक्रमणे इति । है । अनुरणन रूप अर्थशक्ति से व्यङ्ग्य जो 'रूपक' है उसके आश्रय से यहां काव्य का चारुत्व व्यवस्थित होता है। इसलिए उसी से व्यपदेश है। योजना के समान होने के कारण (अर्थात् ऊपर के ही ढंग से बात होने के कारण) उपमाध्वनि के दोनों उदा- हरणों का लक्षण अपने शब्द द्वारा प्रस्तुत नहीं किया है । सजी-धजी (प्रसाधित) प्रियतमा के आश्वासन में लगे होने के कारण और तुरत होने वाले युद्ध के लिए त्वरितमनस्क होने के कारण दृष्टि के दोलायमान होने पर भी युद्ध में (वीरों की) अतिशय त्वरा होती है, यह 'व्यतिरेक' वाच्य अलङ्कार है । जो यह प्रिया के कुचकुङ्मलों से उपमा ध्वनित हो रही है, समस्त जनों को भीत करने वाले भी, मर्दनोद्यत शत्रुओं के हाथियों के कुम्भस्थलों में उस (उपमा) के कारण रति धारण करते हुए (वीरों) का बहुमान है, इस कारण वही (ध्वन्यमान उपमा) वीरतातिशय का चमत्कार उत्पन्न करती है अतः उपमा का प्राधान्य है । असुरों पर पराक्रम के अवसर में—। वहां इस (कामदेव) की त्रैलोक्यविजय वर्णन करते हैं।
द्वितीय उद्योतः २८७ ध्वन्यालोकः तं ताण सिरिसहोअररअणाहरणम्मि हिअअमेकरसम् । बिम्बाहरे पिआणं णिविसिअं कुसुमवाणेण ॥ ( तत्तेषां श्रीसहोदररत्नाहरणे हृदयमेकरसम् । बिम्बाधरे प्रियाणां निवेशितं कुसुमबाणेन ॥ इति छाया ) आक्षेपध्वनिर्यथा— स वक्तुमखिलान् शक्तो हयग्रीवाश्रितान् गुणान् । योऽम्बुकुम्भैः परिच्छेदं ज्ञातुं शक्तो महोदधेः ॥ उन (असुरों) के लक्ष्मी के साथ पैदा होनेवाले रत्नों के लूटने में एकरस हृदय को कामदेव ने प्रियाओं के बिम्बाधर में संलग्न कर दिया । आक्षेपध्वनि, जैसे— 'हयग्रीव भगवान् के समस्त गुणों को वह कह सकता है जो जल के घड़ों से महासमुद्र के परिमाण को जान सकता है ।' लोचनम् त्रैलोक्यविजयो हि तत्रास्य वर्ण्यते । तेषामसुराणां पातालवासिनां यैः पुनः पुनरिन्द्रपुरावमर्दनादि किं किं न कृतं तद्धृदयमिति यत्तेभ्यस्तेभ्योऽतिदुष्करे- भ्योऽप्यकम्पनीयव्यवसायं तच्च । श्रीसहोदराणामत एवानिर्वाच्योत्कर्षाणामि- त्यर्थः । तेषां रत्नानामा समन्ताद्धरणे एकरसं तत्परं यद्धृदयं तत्कुसुमबाणेन सुकुमारतरोपकरणसम्भारेण प्रियाणां बिम्बाधरे निवेशितम्, तदवलोकनपरि- चुम्बनदर्शनमात्रकृतकृत्यताभिमानयोगि तेन कामदेवेन कृतम् । तेषां हृदयं यदत्यन्तं विजिगीषाज्वलनजाज्वल्यमानमभूदिति यावत् । अत्रातिशयोक्तिर्वा- च्यालङ्कारः । प्रतीयमाना चोपमा । सकलरत्नसारतुल्यो बिम्बाधर इति हि तेषां बहुमानो वास्तव एव । अत एव न रूपकध्वनिः । रूपकस्यारोप्यमाणत्वे- जिन्होंने बार बार इन्द्रपुरी (अमरावती) के अवमर्दन आदि क्या क्या नहीं किया उन पातालवासी असुरों का हृदय और जो उन उन अतिदुष्कर कार्यों से अविचलनीय व्यवसाय वालां है, वह । लक्ष्मी के साथ पैदा होने वाले, अर्थात् जिनके उत्कर्ष का वर्णन नहीं किया जा सकता । उन रत्नों के समग्रतया हरण में एकरस अर्थात् तत्पर जो हृदय वह सुकुमारतर उपकरण-सम्भार वाले (अर्थात् फूलों के बाण वाले) कामदेव ने प्रियाओं के बिम्बाधर में संलग्न कर दिया, अर्थात् उस कामदेव ने (उनके हृदय को) उसके अवलोकन, परिचुम्बन, दर्शनमात्र में अपने को कृतकृत्य मान लेने वाला बना दिया है । उनका हृदय, जो अत्यन्त विजयेच्छा की अग्नि से प्रज्वलित हो रहा था । यहां अतिशयोक्ति वाच्य अलङ्कार है और उपमा प्रतीयमान है । क्यों कि उनका यह बहुमान कि बिम्बाधर सारे रत्नों के सारतुल्य है, वास्तव है । अतएव रूपक ध्वनि
२८८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्रातिशयोक्त्या हयग्रीवगुणानामवर्णनीयताप्रतिपादनरूपस्यासा- धारणतद्विशेषप्रकाशनपरस्याक्षेपस्य प्रकाशनम् । अर्थान्तरन्यासध्वनिः शब्दशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्योऽर्थशक्तिमू- लानुरणनरूपव्यङ्ग्यश्च सम्भवति । तत्राद्यस्योदाहरणम्— देव्वाएत्तम्मि फले किं कीरइ एत्तिअं पुणा भणिमो । कङ्किल्लपल्लवाः पल्लवाणँ अण्णाण ण सरिच्छा ॥ यहां अतिशयोक्ति से हयग्रीव के गुणों की अवर्णनीयता-प्रतिपादनरूप, और उन (गुणों) की विशेषता प्रकाशनपरक 'आक्षेप' का प्रकाशन है । 'अर्थान्तरन्यासध्वनि' शब्दशक्तिमूल अनुरणनरूप व्यङ्ग्य और अर्थशक्तिमूल अनुरणनरूप व्यङ्ग्य (इन दो प्रकारों से) सम्भव है । इनमें प्रथम का उदाहरण— 'फल विधाता के अधीन है, क्या किया जाय ? (फिर भी) इतना कहते हैं कि रक्ताशोक के पल्लव अन्य पल्लवों के सदृश नहीं होते ।' लोचनम् नावास्तवत्वात् । तेषामसुराणां वस्तुवृत्त्यैव सादृश्यं स्फुरति । तदेव च सादृश्यं चमत्कारहेतुः प्राधान्येन । अतिशयोक्त्येति । वाच्यालङ्काररूपयेत्यर्थः । अवर्ण- नीयताप्रतिपादनमेवाक्षेपस्य रूपमिष्टप्रतिषेधात्मकत्वात् । तस्य प्राधान्यं विशे- षणद्वारेणाह—असाधारणेति । सम्भवतीत्यनेन प्रसङ्गाच्छब्दशक्तिमूलस्यात्र विचार इति दर्शयति । दैवायत्ते फले किं क्रियतामेतावत्पुनर्भणामः । रक्ताशोकपल्लवाः पल्लवानामन्येषां न सदृशाः ॥ अशोकस्य फलमाम्रादिवन्नास्ति, किं क्रियतां पल्लवास्त्वतीव हृद्या इतीयता- भिधा समाप्तैव । अत्र फलशब्दस्य शक्तिवशात्समर्थकमस्य वस्तुनः पूर्वमेव प्रतीयते । लोकोत्तरजिगीषातदुपायप्रवृत्तस्यापि हि फलं सम्पल्लक्षणं दैवायत्तं नहीं है। क्यों कि रूपक आरोप्यमाण होने के कारण वास्तव नहीं होता। उन असुरों के वस्तुतः ही सादृश्य स्फुरित होता है। और वही सादृश्य प्रधान रूप से चमत्कार का हेतु है। अतिशयोक्ति से—। अर्थात् वाच्यालङ्कार रूप अतिशयोक्ति से। अवर्णनीयता का प्रतिपादन ही आक्षेप का लक्षण है, क्यों कि (वह) इष्ट का प्रतिषेध रूप होता है। विशेषण द्वारा उसका प्राधान्य कहते हैं—उन (गुणों) की विशेषता—। 'सम्भव है' इससे प्रसङ्ग से शब्दशक्तिमूल का यहां विचार है, यह दिखाते हैं। अशोक का फल आम आदि की भांति नहीं है, क्या किया जाय ! परन्तु पल्लव अतीव हृद्य हैं, यहां तक अभिधा समाप्त ही है। यहां 'फल' शब्द के शक्तिवश इस वस्तु का समर्थक पहले ही प्रतीत होता है। लोकोत्तर विजयेच्छा और उसके उपाय में प्रवृत्त का
द्वितीय उद्योतः २८९ ध्वन्यालोकः पदप्रकाशश्चायं ध्वनिरिति वाक्यस्यार्थान्तरतात्पर्येऽपि सति न विरोधः । द्वितीयस्योदाहरणं यथा— हिअअट्ठाविअमण्णुं अवरुण्णमुहं हि मं पसाअन्त । अवरद्धस्स वि ण हु दे पहुजाणअ रोसिउं सक्कम् ॥ ( हृदयस्थापितमन्युमपरोषमुखीमपि मां प्रसादयन् । अपराध्रस्यापि न खलु ते बहुज्ञ रोषितुं शक्यम् ॥ इति छाया) यह ध्वनि पदप्रकाश है, इसलिए वाक्य के अर्थान्तर में तात्पर्य होने पर भी विरोध नहीं है । दूसरे का उदाहरण, जैसे— हृदय में क्रोध स्थापित करके मुख पर क्रोध प्रकट न करनेवाली भी मुझे तुम प्रसन्न कर रहे हो, इसलिए हे बहुत समझदार, तुम्हारे अपराधी होने पर भी तुम पर क्रोध नहीं किया जा सकता । लोचनम् कदाचिन्न भवेदपीत्येवंरूपं सामान्यात्मकम् । नन्वस्य सर्ववाक्यस्याप्रस्तुत- प्रशंसा प्राधान्येन व्यङ्ग्या तत्कथमर्थान्तरन्यासस्य व्यङ्ग्यता, द्वयोर्युगपदेकत्र प्राधान्यायोगादित्याशङ्कयाह—पदप्रकाशेति । सर्वो हि ध्वनिप्रपञ्चः पदप्रकाशो वाक्यप्रकाशश्चेति वक्ष्यते । तत्र फलपदेऽर्थान्तरन्यासध्वनिः प्राधान्येन । वाक्ये त्वप्रस्तुतप्रशंसा । तत्रापि पुनः फलपदोपात्तसमर्थ्यसमर्थकभावप्राधान्यमेव भातीत्यर्थान्तरन्यासध्वनिरेवायमिति भावः । हृदये स्थापितो न तु बहिः प्रकटितो मन्युर्यया । अत एवाप्रदर्शितरोष- मुखीमपि मां प्रसादयन् हे बहुज्ञ, अपराद्धस्यापि तव न खलु रोषकरणं शक्यम् । अत्र बहुज्ञेत्यामन्त्रणार्थो विशेषे पर्यवसितः । अनन्तरं तु तदर्थपर्या- भी सम्पत् रूप फल कदाचित् न भी हो, इस प्रकार का सामान्य रूप ( समर्थक ) है । इस समग्र वाक्य का प्रधान रूप से व्यङ्ग्य अप्रस्तुत प्रशंसा है, तो अर्थान्तरन्यास का व्यङ्ग्यत्व कैसे ? क्यों कि दोनों का एक ही समय प्राधान्य नहीं होगा, यह आशङ्का करके कहते हैं—पदप्रकाश—। यह कहेंगे कि सारा ध्वनिप्रपञ्च पदप्रकाश और वाक्य- प्रकाश होता है । वहां 'फल' पद में अर्थान्तरन्यासध्वनि प्रधानरूप से है । वाक्य में अप्रस्तुत-प्रशंसा है । भाव यह कि वहां भी फिर 'फल' पद से उपात्त समर्थ्यसमर्थकभाव का प्राधान्य ही प्रतीत होता है, अतः यह अर्थान्तरन्यासध्वनि है । हृदय में स्थापित किया है न कि बाहर प्रकट किया है मन्यु ( क्रोध ) को जिसने । अतएव रोष को प्रदर्शित न करने वाली भी मुझे प्रसादन करता हुआ, हे बहुत समझ- दार, अपराधी होने पर भी तुम पर रोष करना शक्य नहीं । यहां 'बहुत समझदार' यह आमन्त्रणार्थ विशेष में पर्यवसित है । बाद में उसके अर्थ के पर्यालोचन से जो १६ ध्व०
२९० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र हि वाच्यविशेषेण सापराधस्यापि बहुज्ञस्य कोपः कर्तुमशक्य इति समर्थकं सामान्यमन्वितमन्यत्तात्पर्येण प्रकाशते । व्यतिरेकध्वनिरप्युभयरूपः सम्भवति । तत्राद्यस्योदाहरणं प्राक्प्र- दर्शितमेव । द्वितीयस्योदाहरणं यथा— जाएज्ज वणुद्देसे खुज्ज विअ पाअव्रो गडिअवत्तो । मा माणुसम्मि लोए ताएकरसो दरिद्दो अ ॥ ( जायेय वनोद्देशे कुब्ज एव पादपो गलितपत्रः । मा मानुषे लोके त्यागैकरसो दरिद्रश्च ॥ इति छाया ) यहां वाच्य विशेष से 'अपराधी होने पर भी बहुत समझदार पर क्रोध नहीं किया जा सकता' यह समर्थक सामान्य तात्पर्य से अन्वित अन्य ( विशेष ) को प्रकाशित करता है । व्यतिरेक ध्वनि भी दो प्रकार का सम्भव है । उनमें प्रथम का उदाहरण पहले दिखाया ही है । दूसरे का उदाहरण, जैसे— जंगल के प्रदेश में ही गलितपत्र कुबड़ा वृक्ष ( बनकर ) पैदा हो, पर मनुष्य लोक में त्याग में परायण और दरिद्र मत हो । लोचनम् लोचनाद्यत्सामान्यरूपं समर्थकं प्रतीयते तदेव चमत्कारकारि । सा हि खण्डिता सती वैदग्ध्यानुनीता तं प्रत्यसूयां दर्शयन्तीत्थमाह । यः कश्चिद्द्बहुज्ञो धूर्तः स एवं सापराधोऽपि स्वापराधावकाशमाच्छादयतीति मा त्वमात्मनि बहुमानं मिथ्या ग्रहीरिति । अन्वितमिति । विशेषे सामान्यस्य संबद्धत्वादिति भावः । व्यतिरेकध्वनिरपीति । अपिशब्देनार्थान्तरन्यासवदेव द्विप्राकारत्वमाह । प्रागिति । 'खं येऽत्युज्ज्वलयन्ति' इति । 'रक्तस्त्वं नवपल्लवैः' इति । जायेय,वनोद्देश सामान्य रूप समर्थक प्रतीत होता है वही चमत्कारकारी है । वह खण्डिता ( नायक द्वारा ) विदग्धा से अनुनय किये जाने पर उसके प्रति असूया दिखाती हुई इस प्रकार कहती है । जो कोई बहुत समझदार धूर्त है वह इस प्रकार अपराधी होकर भी अपने अपराध का स्थान ढंकता है, इस लिए तुम अपने में मिथ्या बहुमान न रखो । अन्वित—। भाव यह कि विशेष में सामान्य सम्बद्ध होता है । व्यतिरेकध्वनि भी—। 'भी' शब्द से अर्थान्तरन्यास की भांति ही दो प्रकार होना कहा है । पहले—। 'खं येऽत्युज्ज्वलयन्ति०' और 'रक्तस्त्वं नवपल्लवैः०' पैदा हो, जंगल
द्वितीय उद्योतः २९१ ध्वन्यालोकः अत्र हि त्यागैकरसस्य दरिद्रस्य जन्मानभिनन्दनं त्रुटितपत्रकुब्ज- पादपजन्माभिनन्दनं च साक्षाच्छब्दवाच्यम् । तथाविधादपि पादपा- त्तादृशस्य पुंस उपमानोपमेयत्वप्रतीतिपूर्वकं शोच्यतायासाधिक्यं तात्प- र्येण प्रकाशयति । उत्प्रेक्षाध्वनिर्यथा— चन्दनासक्तभुजगनिःश्वासानिलमूच्छितः । मूर्च्छयत्येष पथिकान्मधौ मलयमारुतः ॥ अत्र हि मधौ मलयमारुतस्य पथिकमूर्च्छाकारित्वं मन्मथोन्माथ- यहां त्यागपरायण दरिद्र (पुरुष) के जन्म का न अभिनन्दन और त्रुटितपत्र एवं कुबड़े वृक्ष के जन्म का अभिनन्दन साक्षात् शब्द का वाच्य है । उस प्रकार के भी वृक्ष से उस प्रकार के पुरुष की उपमानोपमेय सम्बन्ध की प्रतीतिपूर्वक तात्पर्यतः शोचनीयता का आधिक्य प्रकाशित करता है । उत्प्रेक्षाध्वनि, जैसे— वसन्तकाल में चन्दन में लिपटे साँपों की सांस की हवा से बढ़ा हुआ यह मलयमारुत पथिक जनों को मूर्च्छित करता है । यहां वसन्तकाल में मलयमारुत का पथिकमूर्च्छाकारी होना काम के उन्माथ लोचनम् एव वनस्यैकान्ते गहने यत्र स्फुटतरबहुवृक्षसम्पत्त्या प्रेक्ष्यतेऽपि न कश्चित् । कुब्ज इति रूपघटनादावनुपयोगी । गलितपत्र इति । छायामपि न करोति तस्य का पुष्पफलवत्तेत्यभिप्रायः । तादृशोऽपि कदाचिदाङ्गारिकस्योपयोगी भवेदुल्लूका- दीनां वा निवासायेति भावः । मानुष इति । सुलभार्थिजन इति भावः । लोक इति । यत्र लोक्यते सोऽर्थिभिस्तेन चार्थिजनो न च किचिच्छक्यते कर्तुं तन्महद्वैशसमिति भावः । अत्र वाच्यालङ्कारो न कश्चित् । उपमानेत्यनेन व्यतिरेकस्य मार्गपरिशुद्धिं करोति । आधिक्यमिति । व्यतिरेकमित्यर्थः । के प्रदेश में ही, वन के एकान्त गहन में जहां स्पष्ट रूप से बहुत वृक्षों के कारण कोई दिखाई नहीं देता । कुबड़ा अर्थात् रूपघटना आदि के सम्बन्ध में अनुपयोगी । गलितपत्र—। अभिप्राय यह कि छाया भी नहीं करता है उसके पुष्पित-फलित होने की बात ही कौन ? भाव यह कि उस प्रकार का भी (वृक्ष) कदाचित् आङ्गारिक के उपयोग में आ जाय अथवा उल्लू पक्षियों के निवास के लिए हो । मनुष्य—। भाव यह कि जहां अर्थिजन सुलभ हैं । लोक—। भाव यह कि जहां अर्थिजनों से वह और उससे अर्थिजन देखे जाते हैं, (वहां यदि) नहीं कुछ कर सकते हैं तब वह बड़ा अपराध है । यहां कोई वाच्य अलङ्कार नहीं है । 'उपमान' इसके द्वारा व्यतिरेक के मार्ग का परिशोधन करते हैं । आधिक्य—। अर्थात् व्यतिरेक । उत्प्रेक्षा की है—। क्यों कि विषवात से
२१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः दायित्वेनैव । तत्तु चन्दनासक्तभुजगनिःश्वासानिलमूर्च्छितत्वेनोत्प्रेक्षि- तमित्युत्प्रेक्षा साक्षादनुक्तापि वाक्यार्थसामर्थ्यादनुरणनरूपा लक्ष्यते । न चैवंविधे विषये इवादिशब्दप्रयोगमन्तरेणासंबद्धतैवेति शक्यते वक्तुम् । गमकत्वादन्यत्रापि तदप्रयोगे तदर्थावगतिदर्शनात् । यथा— देने वाला होने के कारण ही है, परन्तु उसे चन्दन में लिपटे हुए सर्पों की सांस की हवा से बढ़े होने (मूर्च्छित होने) के कारण उत्प्रेक्षा की है, इस प्रकार साक्षात् अनुक्त भी उत्प्रेक्षा वाच्यार्थ की सामर्थ्य से अनुरणन रूप में लक्षित होती है । इस प्रकार के विषय में 'इव' आदि शब्दों के प्रयोग के बिना असम्बद्धता ही है, यह नहीं कह सकते, क्योंकि गमक हैं, अन्यत्र भी उनका प्रयोग न होने पर उनके अर्थ का ज्ञान देखा जाता है । जैसे— लोचनम् उत्प्रेक्षितमिति । विषवातेन हि मूर्च्छितो बृंहित उपचितो मोहं करोति । एकश्च मूर्च्छितः पथिकमध्येऽन्येषामपि धैर्यच्युतिं विदधन्मूर्च्छां करोतीत्युभयथो- त्प्रेक्षा । नन्वत्र विशेषणमधिकीभवद्धेतुतयैव सङ्गच्छते । ततः किं ? न हि हेतुता परमार्थतः । तथापि तु हेतुता उत्प्रेक्ष्यत इति यत्किञ्चिदेतत् । तदिति । तस्ये- वादेरप्रयोगेऽपि तस्यार्थस्येत्युत्प्रेक्षारूपस्यावगतेः प्रतीतेर्दर्शनात् । एतदेवोदाह- रति–यथेति । ईर्ष्याकलुषस्यापीषदरुणच्छायाकस्य । यदि तु प्रसन्नस्य मुखस्य सादृश्यमुद्वहेत्सर्वदा वा तत्किं कुर्यात्तन्मुखं त्वेतद्भवतीति मनोरथानामप्यपथ- मिदमित्यपिशब्दस्याभिप्रायः । अङ्गे स्वदेहे न मात्येव दश दिशः पूरयति यतः । अद्यैता कालेनैकं दिवसमात्रमित्यर्थः । अत्र पूर्णचन्द्रेण दिशां पूरणं स्वरस- सिद्धमेवमुत्प्रेक्ष्यते । मूर्च्छित बृंहित या उपचित होकर मोह उत्पन्न करता है । और एक मूर्च्छित होकर पथिकों के बीच अन्य लोगों का भी धैर्य च्युत करता हुआ मूर्च्छा करता है, इस प्रकार दोनों प्रकार से उत्प्रेक्षा है । शंका करते हैं कि यहां विशेष अधिक होने के कारण हेतु रूप से संगत होता है । (समाधान देते हैं) कि तो क्या ? परमार्थतः हेतुत्व नहीं है । तब भी हेतुत्व उत्प्रेक्षित होता है, अतः यह कुछ ही है । उनका— । क्योंकि उन 'इव' आदि के प्रयोग न होने पर भी उत्प्रेक्षारूप उस अर्थ की अवगति या प्रतीति देखी जाती है । इसका ही उदाहरण देते हैं—जैसे— । ईर्ष्या से कलुष अर्थात् ईषदरुण छाया वाला भी । परन्तु यदि प्रसन्न मुख का सादृश्य धारण करता तो सब समय क्या कर डालता । तेरा मुख यह होता है (अर्थात् चन्द्र होता है) यह बात मनोरथों का भी विषय नहीं हो सकती, यह 'भी' (अपि) शब्द का अभिप्राय है । अङ्ग में अर्थात् अपनी देह में नहीं समाता है जिस कारण दस दिशाओं को पूरित करता है । आज
द्वितीय उद्योतः २९३ ध्वन्यालोकः ईसाऽकलुसस्स वि तुह मुहस्स णं एस पुण्णिमाचन्दो । अज्ज सरिसत्तणं पाविऊण अङ्गे विअ ण माइ ॥ ( ईर्ष्याकलुषस्यापि तव मुखस्य नन्वेष पूर्णिमाचन्द्रः । अद्य सदृशत्वं प्राप्याङ्ग एव न माति ॥ इति छाया ) यथा वा— त्रासाकुलः परिपतन् परितो निकेतान् पुंभिर्न कैश्चिदपि धन्विभिरन्वबन्धि । तस्थौ तथापि न मृगः क्वचिदङ्गनाभि राकर्णपूर्णनयनेषुहतेक्षणश्रीः ॥ यह पूर्णिमाचन्द्र ईर्ष्या से कलुष भी तुम्हारे मुख का आज सादृश्य पाकर मानों अपने अङ्ग में ही नहीं समाता है । अथवा जैसे— भय से व्याकुल, चारों ओर घरों में दौड़ते हुए हिरन को किन्हीं धनुर्धारी पुरुषों ने नहीं पीछा किया, तथापि वह मानों कहीं अङ्गनाओं द्वारा कान तक खींचे हुए नेत्र के बाण से आंखों की शोभा के नष्ट हो जाने के कारण कहीं नहीं ठहरा । लोचनम् ननु ननुशब्देन वितर्कोत्प्रेक्षारूपमाचक्षाणेनासम्बद्धता निराकृतेति सम्भा- वयमान उदाहरणान्तरमाह-यथा वेति । परितः सर्वतो निकेतान् परिपतन्नाक्र- मन्न कैश्चिदपि चापपाणिभिरसौ मृगोऽनुबद्धस्तथापि न क्वचित्तस्थौ त्रासचाप- लयोगात्स्वाभाविकादेव । तत्र चोत्प्रेक्षा ध्वन्यते-अङ्गनाभिराकर्णपूर्णनेत्रशरैर्हता ईक्षणश्रीः सर्वस्वभूता यस्य यतोऽतो न तस्थौ । नन्वेतदप्यसम्बद्धमस्त्वित्या- अर्थात् इतने समय से एक दिन मात्र । यहां स्वभावतः सिद्ध पूर्णचन्द्र द्वारा दिशाओं का पूरण इस प्रकार उत्प्रेक्षित होता है । 'मानों' ( ननु ) इस शब्द से वितर्क रूप उत्प्रेक्षा का अभिधान करते हुए 'अस- म्बद्धता निराकरण की गई है' यह सम्भावना करते हुए दूसरा उदाहरण कहते हैं— अथवा जैसे—। चारों ओर घरों में दौड़ता अर्थात् चौकड़ी भरता हुआ यह मृग किसी धनुर्धारी से पीछा नहीं किया गया तथापि कहीं नहीं ठहरा भय के कारण स्वाभाविक चापलयोग से ही । वहां उत्प्रेक्षा ध्वनित हो रही है कि अङ्गनाओं के कान तक खींचे हुए नेत्रबाणों से सर्वस्वभूत जिसकी नेत्रशोभा हत हो गई है । जिस कारण उस कारण
२९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शब्दार्थव्यवहारे च प्रसिद्धिरैव प्रमाणम् । श्लेषध्वनिर्यथा— रम्या इति प्राप्तवतीः पताकाः रागं विविक्ता इति वर्धयन्तीः । यस्यामसेवन्त नमद्वलीकाः समं वधूभिर्वलभीर्युवानः ॥ शब्द और अर्थ के व्यवहार में प्रसिद्धि ही प्रमाण है । श्लेषध्वनि, जैसे— जिस (द्वारका नगरी) में युवक लोग सुन्दर होने के कारण प्रसिद्धि को प्राप्त, एकान्त या पवित्र होने के कारण राग को बढ़ाने वाली एवं झुकी जाती हुई त्रिवलि वाली वधुओं के साथ, रम्य होने के कारण पताकाओं से युक्त, एकान्त होने से राग (सम्भोग की अभिलाष) बढ़ाने वाली, झुके हुए छज्जों वाली वलभियों (निजी वासगृहों) का सेवन करते थे । लोचनम् शङ्कयाह—शब्दार्थेति । पताका ध्वजपटान् प्राप्तवती । रम्या इति हेतोः । पताकाः प्रसिद्धीः प्राप्तवतीः । किमाकाराः प्रसिद्धीः रम्या इत्येवमाकाराः । विविक्ता जनसङ्कुलत्वाभावादित्यतो हेतो रागं सम्भोगाभिलाषं वर्धयन्तीः । अन्ये तु रागं चित्रशोभामिति । तथा रागममुरागं वर्धयन्तीः । यतो हेतोः विविक्ता विभक्ताङ्ग्यो लटभाः याः । नमन्ति वलीकानि छदिपर्यन्तभागा यासु । नमन्त्यो वल्लयस्त्रिवलीललक्षणा यासाम् । सममिति सहेत्यर्थः । ननु सम- शब्दात्तुल्यार्थोऽपि प्रतीतः । सत्यम् ; सोऽपि श्लेषबलात् । श्लेषश्च नाभिधा- वृत्तेराक्षिप्तः, अपि त्वर्थसौन्दर्यबलादेवेति सर्वथा ध्वन्यमान एव श्लेषः । अत नहीं ठहरा । यह भी असम्बद्ध है यह आशङ्का करके कहते हैं—शब्द और अर्थ—। पताका अर्थात् ध्वजपटों को प्राप्त करती हुई । रम्य होने के कारण । पताका अर्थात् प्रसिद्धियां प्राप्त करती हुई । किस आकार की प्रसिद्धियां ? रम्य आकार की । विविक्त अर्थात् लोगों को भीड़-भाड़ न होने के कारण राग अर्थात् सम्भोग की अभिलाषा बढ़ाती हुई । दूसरे (कहते हैं) राग अर्थात् चित्रशोभा । उस प्रकार राग अर्थात् अनुराग बढ़ाती हुई । जिस कारण से विविक्त अर्थात् विभक्त अङ्गों वाली लटभाएं (सुन्दरियां) । झुक रहे हैं वलीक अर्थात् छज्जे जिनमें । झुक रही हैं वलियां अर्थात् त्रिवलियां जिनकी । समं (साथ) अर्थात् साथ । शंका करते हैं कि 'समं' शब्द 'तुल्य' अर्थ में भी मालूम है ? (समाधान करते हैं कि) ठीक है, वह भी श्लेष के बल से (अर्थात् यहां 'समं' का तुल्य अर्थ भी श्लेष के बल से है प्रतीत होगा) । और श्लेष (यहां) अभिधावृत्ति से आक्षिप्त नहीं, अपितु अर्थसौन्दर्य के बल से ही (आक्षिप्त है), इस लिए सर्वथा श्लेष