ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः निःशेषागारकर्मश्रमशिथिलतनुः कुम्भदासी तथात्र । अस्मिन् पापाहमेका कतिपयदिवसप्रोषितप्राणनाथा पान्थायेत्थं तरुण्या कथितमवसरव्याहृतिव्याजपूर्वम् ॥ उभयशक्त्या यथा—'दृष्ट्या केशवगोपरागहृतया' इत्यादौ ॥२३॥ प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः सम्भवी स्वतः । अर्थोऽपि द्विविधो ज्ञेयो वस्तुनोऽन्यस्य दीपकः ॥ २४ ॥ कामों से थक कर ढीली पनभरिन यहाँ सोती है, कुछ ही दिनों से जिसके प्राणनाथ परदेश चले गए हैं ऐसी मैं पापिन अकेली यहाँ सोती हूँ । इस प्रकार तरुणी ने पथिक से अवसर के कथन के व्याज से कहा । उभयशक्ति से, जैसे—'दृष्ट्या केशवगोपरागहृतया०' इत्यादि में ॥ २३ ॥ अन्य वस्तु का दीपक अर्थ भी दो प्रकार का जानना चाहिए—प्रौढ़ उक्तिमात्र से निष्पन्न शरीर वाला और स्वतः सम्भवी ॥ २४ ॥ लोचनम् निरूप्य तृतीयं प्रकारमाह—उभयेति । शब्दशक्तिस्तावद्गोपरागादिशब्दश्लेष- वशात् । अर्थशक्तिस्तु प्रकरणवशात् । यावदत्र राधारमणस्याखिलतरुणीजन- च्छन्नानुरागगरिमास्पदत्वं न विदितं तावदर्थान्तरस्याप्रतीतेः, सलेशमिति चात्र स्वोक्तिः ॥ २३ ॥ एवमर्थशक्त्युद्भवस्य सामान्यलक्षणं कृतम् । श्लेषाद्यलङ्कारेभ्यश्चास्य विभक्तो विषय उक्तः । अधुनास्य प्रभेदनिरूपणं करोति—प्रौढोक्तीत्यादिना । योऽर्थान्तरस्य दीपको व्यञ्जकोऽर्थ उक्तः सोऽपि द्विविधः । न केवलमनुस्वा- नोपमो द्विविधः, यावत्तद्भेदो यो द्वितीयः सोऽपि व्यञ्जकार्थद्वैविध्यद्वारेण द्विविध है । इस प्रकार उपसंहार के व्याज से दोनों प्रकारों को सोदाहरण निरूपण कर के तीसरा प्रकार कहते हैं—उभय०—। 'गोपराग' आदि श्लेष के कारण शब्दशक्ति है, और अर्थशक्ति प्रकरण के कारण है, क्यों कि जब तक राधारमण ( श्रीकृष्ण ) का समस्त तरुणियों में छिपे ढंग से अनुराग-गरिमा का स्थानभूत होना विदित नहीं होता है तब तक अर्थान्तर की प्रतीति नहीं होती है । 'सलेशं' यह ( कवि की ) अपनी उक्ति है ॥२३॥ इस प्रकार अर्थशक्त्युद्भव का सामान्य लक्षण किया और श्लेष आदि अलङ्कारों से इसका विषय विभक्त कहा । अब इसके प्रभेद का निरूपण करते हैं—अन्यवस्तु० इत्यादि द्वारा । जो अर्थान्तर का दीपक अर्थात् व्यञ्जक अर्थ कहा है, वह भी दो प्रकार का है । न केवल अनुस्वानोपम दो प्रकार का है, उसका जो दूसरा भेद है, वह भी व्यञ्जक अर्थ के द्वैविध्य के द्वारा दो प्रकार का है, यह 'भी' ( 'अपि' ) शब्द का अर्थ